शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

म्मताज़ भाई पतंगवाले...



aRANYA…





म्मताज़ भाई पतंगवाले...



Scene-1.
विवेक और तनु सजे सजाए घर में सुबह ब्रेक फास्ट टेबल पर बैठे हैं... विवेक अख़बार पढ़ रहा है तनु भीतर काम कर रही है। विवेक फोन करता है।)
विवेक- ओए मनोज कैसा है? अबे मैंने तुझे दो जोक sms किये थे तूने साले जवाब ही नहीं दिया?.. अच्छा अभी तक हंस रहा है। गज़ब के जोक थे हे ना? मनोज तूने बहुत दिन से कोई जोक नहीं भेजा? अबे थोड़ा हम भी हंस लेगें तो तेरा कुछ बिगड़ जाएगा क्या? कल का प्लान? रुक तनु से पूछता हूँ... तनु... तनु...
तनु- क्या है?
विवेक- मनोज पूछ रहा है कि वह कल Saturday की फिल्म टिकिट बुक करा रहा है? चलोगी?
तनु- मंजु आएगी क्या पूछो?
विवेक- अबे तेरी बीबी आएगी क्या?... हाँ कह रहा है तनु... चलोगी?
तनु- done.
विवेक- done है मनोज.. कल मिलते हैं?... सुना सुना.. (झूठा हंसता है।) अबे यह तो नया जोक है बे.. यह कभी नहीं सुना था... हा.. हा.. हा.... मज़ा आ गया। चल तो बॉय।....(फोन काटता है।)... साला आजकल जोक्स पर हंसी ही नहीं आती है। (तीन तरीके से अलग-अलग हसने की कोशिश करता है.... अंत में ख़ासने लगता है।) तनु.. तनु... बॉस...बॉस.. आज ऑफिस की छुट्टी करते हैं... चलो आज ही हम फिल्म देख ढालते हैं क्या कहती हो?
तनु- एक तो तुम मुझे यह घर में बॉस कहना बंद करो... ऑफिस की बातें ऑफिस में ही खत्म...।
विवेक- यार तनु मुझे आजकल जोक्स पर हंसी ही नहीं आती? क्या है यह? चलो यार कहीं चल देते हैं... माँ चु... मतलब भाड़ में जाए सब कुछ.. कहीं भी... बिना किसी को बताए...
तनु- फिर तुम्हें ’कहीं भाग जाने...’ का बुखार चढ़ा है...रिलेक्स... शाम तक उतर जाएगा।
विवेक- अरे!! सही कह रहा हूँ मैं....साला कहीं छुप जाते हैं इस दुनिया में, कहीं किसी को पता ही नहीं चले कि हम कहाँ है? और फिर कभी-कभी छुप के देखेगें कि कैसे लोग हमें तलाश रहे हैं... मैं थक गया हूँ.. इस.. इस...you know.. इस.. you know मैं क्या कह रहा हूँ?
तनु- No I don’t know तुम क्या कह रहे हो... और तुम यह सब कह सकते हो क्योंकि तुम्हारी बॉस तो मैं ही हूँ... पर मेरे ऊपर मेरा बॉस है जो मेरा पति नहीं है.. सो वह जवाब मांगेगा...।
विवेक- कह देना वह पागल था.. भाग गया। अब मैं भी पगला रही हूँ.... मैं भी भागना चाहती हूँ....
तनु- कल हम जा रहे हैं ना फिल्म... कल तक तुम सही हो जाओगे। तुमने अब तक नहाया भी नहीं है... तुम फिर लेट कराओगे... जाओ...।
विवेक- तुमने जैसे बड़ा नहा लिया...
तनु- तुम्हारे बाद... जल्दी जाओ...
विवेक- चलो ना... साथ चलते हैं... चलो..।
तनु- तुम ओर देर करवाओगे...।
विवेक- अभी बहुत टाईम है... चलो ना..।
तनु- नहीं.. तुम जाओ और जल्दी बाहर आना...।
विवेक- ऑफिस में भी बॉसगिरी... घर में भी बॉसगिरी... फिर बोलती हो घर में बॉस नहीं हूँ... झूठी..।
तनु- जाओ...।
(विवेक अंदर जाता है.... तनु घर जमाने लगती है तभी फोन की घंटी बजती है।)
तनु- हेलो... हेलो... जी... जी नहीं जहाँ कोनो बिक्की नहीं है... रांग नम्बर है..। bloody village people.. फोन तक लगाना नहीं आता।
(फिर घंटी बजती है।)
तनु- हेलो.. हेलो... अरे भई आपसे कहाँ ना यहाँ कोई बिक्की नहीं रहता.. आप अजीब आदमी है... रांग नम्बर है चचा.. चश्मा पहनकर फोन घुमाओ...।
(विवेक बाहर आता है.... फोन की घंटी दौबारा बजती है.. तनु फोन उठाती है... विवेक फोन के पास बढ़ता है... तनु बात करके उसे फोन पकड़ा देती है...)
तनु- हेलो.. जी हाँ जहीं रहता है आपका बिबेक.. सही नम्बर डॉयल कर दिया आपने इस बार... लीजिए बात करिये...।
विवेक- हेलो... हाँ मैं विवेक बोल रहा हूँ...।
तनु- अरे विवेक.. वो बिक्की से बात करना चाहता है.. बिक्की बोलो.. बिक्की... और गांव वाला बनकर.. बिक्की...
(विवेक तनु को देखता है... तनु चुप हो जाती है। कुछ देर में विवेक फोन रखता है।)
विवेक- हाँ आनंद.. अरे... अच्छा... अच्छा... oh no.. ठीक है.. हाँ... मैं सोचता हूँ.. okay bye.. bye.
तनु- क्या हुआ? अरे कुछ बोलो भी... क्या हुआ?
विवेक- म्मताज़ भाई... म्मताज़ भाई की तबीयत बहुत खराब है... मुझसे एक बार मिलना चाहते हैं।
तनु- यह कौन था।
विवेक- आनंद.. मेरे बचपन का दोस्त..।
तनु- अरे तुमने कभी बताया नहीं मुझे?
विवेक- हाँ.. तुम तो जानती हो मुझे बचपन की बातें करना अच्छा नहीं लगता।
तनु- पर यह म्मताज़ भाई... कौन है?
विवेक- म्मताज़ भाई... म्मताज़ भाई पतंग वाले...।
तनु- बिक्की...।
(black out…)

scene-2.
(ट्रेन की आवाज़ के साथ बहुत से लड़के प्रवेश करते है एक लाईन बनाते जोकि राशन की लाईन है...। विवेक ट्रेन में बैठा है... बैठे-बैठे फोन करता है...।)
विवेक- तनु... तनु.. थोड़ा तेज़ बोलो... हाँ आवाज़ आई... बॉस बहले तो धन्यवाद मेरी एक दिन की छुट्टी मंज़ूर करने के लिए... पर एक बात कहना चाहता हूँ... मुझे नहीं लगता है कि मुझे आना चाहिए था... अरे वह सब बचपन की बेवकूफियाँ थीं... अचानक भावनाओं में बहकर यह क्या जल्दबाज़ी में हमने रिज़र्वेशन करवा लिया..। हाँ.. हाँ.... अरे पर अब गांव से, इन लोगों से मेरा कुछ संबंध ही नहीं बचा है.... मैं इन लोगों के बीच जाकर क्या करुंगा..? अपनी यह छुट्टी अलग बर्बाद हो गई, अब अपनी बेवकूफी पर पछता रहा हूँ...। थेंक गाड़ तुमने कल शाम का ही वापसी का रिज़र्वेशन करवा दिया.. क्यों जा रहा हूँ मैं? चूतियापा है यह सब... सॉरी.. सॉरी...। ठीक है बाबा मैं जाऊंगा.. म्मताज़ भाई से अच्छे से मिलूगां और वापिस भाग आऊंगा...Sunday तो बचा कम से कम... चलो बॉय... good night… अगर मैं सो पाया तो... okay good night.. love you. … साला क्या चुतियापा है।

Scene-3.
(विवेक की बातचीत के दौंरान एक लड़का लगातार ’बिक्की...’ का नाम चिल्ला रहा हैं.... उसे ढूढ़ रहा हो... तभी वह राशन की लाईन के पास आता है। वह आनंद है।)
आनंद- अबे तू यहाँ क्या कर रहा है? म्मताज़ भाई की काली पतंग नहीं देखी... अबे वह देख ऊपर... ।
बिक्की- यह साला.. पतंग उड़ाने का टाईम ही मेरी माँ को सारे काम सूझते हैं... माँए बहुत चालाक होती है गुरु...।
आनंद- अबे वह तो अवस्थी जी खड़े है... हेलो सर....
(अवस्थी जी स्कूल के अंग्रेज़ी के टीचर हैं... जो हमेशा टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं.. अवस्थी सर आनंद को पसंद करते हैं और बिक्की से चिढ़ते हैं।)
अवस्थी- अरे आनंद.. good morning anand…
आनंद- sir good afternoon sir…
अवस्थी- हाँ... good afternoon.. good afternoon… very good anand… I was just checking. How are you beta?
आनंद- good sir, bye sir…
अवस्थी-bye anand… (अपने सामने वाले से...) very good boy…
(आनंद वापिस बिक्की के पास आता है।)
आनंद- अबे उन्हें दे दे ना झोला...?
बिक्की- बुढ़ऊ खड़ूस है... म्मताज़ भाई गोता मारने वाले है.... रुक कोशिश करता हूँ।
आनंद- मरेगा...।
बिक्की- good morning sir… sorry.. good afternoon sir…
अवस्थी- Now you looking at me sale?
बिक्की- अंकिल.. अंकिल.. मुझे बहुत ज़रुरी काम से जाना है... आनंद की माँ बेहोश हो गई है... आनंद के साथ पचौरी डॉक्टर के घर पर उन्हें लेने जाना पड़ेगा.. तो...
अवस्थी- तो?? what i do?? हें? What I do?
बिक्की- तो आप राशन की दुकान से दो किलों शक्कर लेकर घर पहुंचा देगें।
(अवस्थी जी उसे दो थप्पड़ मारते हैं।)
अवस्थी- डॉक्टर??? साले सीधे पतंग के पीछे भागोगे... i dont know you only क्या? भागो यहाँ से.. stay in line… (अपने सामने वाले से) very bad boy…
बिक्की- कितने निर्दयी है अंकिल आप... भगवान आपको माफ नहीं करेगा अगर आनंद की माँ मर गई तो।
आनंद- अबे साले... मेरी माँ क्यों मरेगीं?
बिक्की- चुप।
आनंद- मेरी माँ को क्यों मार रहा है बे?
बिक्की- अबे तू मुझे मरवाएगा।
आनंद- तू मर मुझे क्या?..मेरी माँ पर मत जा...।
अवस्थी-(अपने पीछे वाले से..) this is my place, reservation.. I’LL BE BACK…
(अवस्थी जी आते हैं और बिक्की को एक चपत ओर लगाते हैं। और वापिस अपनी जगह खड़े हो जाते हैं।)
आनंद- अबे म्मताज़ भाई की पतंग ने गोता मारा।
बिक्की- काली पतंग मुझे मिल जाए तो मैं... अबे वह काटा... एक ओर...
आनंद- म्मताज़ भाई ने एक गोते में दो-दो पेच काट डाले गुरु... वह जा रही है दोनों पतंग।
बिक्की- अबे तू कहाँ गया...।
आनंद- पतंग लूटने..।
(बिक्की कुछ देर रुकता है.. फिर उससे रहा नहीं जाता... वह सीधा अवस्थी जी के पास जाता है।)
बिक्की- अंकिल.. यह रहा झोला.. और यह राशन कार्ड.. दो किलो शक्कर भरवा लेना.. मैं अभी आया।
(बिक्की वहाँ से भाग जाता है।)
बिक्की- अबे आनंद रुक... वहाँ नहीं.. पतंग टाल की तरफ जा रही है.. इधर से... इधर से...।
अवस्थी- अबे साले.. कुत्ते कमीने... हरामज़ादे...।

Scene-4.
(बिक्की और आनंद वापिस भागते हुए आते हैं... तब तक राशन की लाईन के लोग पतंग लूटने वाले बन चुके हैं...।)
आनंद- धत तेरी... एक पतंग आवस्थी जी के घर पर चली गई...।
बिक्की- जिन लोगों को पतंग का “प” भी नहीं पता उनके घर ही हमेशा पतंग कटके जाती है...।
आनंद- बिक्की दूसरी... इधर ही आ रही हैं।
बिक्की- इसमें मांझा बहुत है.. मैं उधर जा रहा हूँ।
आनंद- अबे पतंग इधर आ रही है तू दूसरी तरफ क्यों जा रहा है?
बिक्की- पतंग इधर है.. पर उसका मांझा... उस तरफ... ।
(बिक्की भागता हुआ दूसरी तरफ जाता है.. फिर भागता हुआ आता है और एक जगह पतंग को लेकर कूद जाता है। वह भीतर से चिल्लाता है... “लूट ली...म्मताज़ भाई मैंने पतंग लूट ली... या हूँ” तभी सारे बच्चे हंसने लगते हैं। बिक्की चुप हो जाता है। बाहर आता है... वह बुरी तरह कीचड़ में गंदा हुआ पड़ा है। सारे बच्चे उसे चिढ़ाते हैं...। उसकी पूरी खुशी काफूर हो जाती है।)
आनंद- पतंग के लिए नाली में कूदने की क्या ज़रुरत थी। अब मरेगा तू...।
बिक्की- मरे तेरी माँ...।
(black out…)
Scene-5.

(अवस्थी जी... बिक्की की माँ और उसकी बहन बैठे हैं... शक्कर से भरा हुआ झोला.. बिक्की की माँ के पास रखा है...। बिक्की की बहन होमवर्क करने का नाटक कर रही है... बिक्की और आनंद आते हैं। अवस्थी जी के हाथ में डिक्शनरी है... वह बिक्की की बहन को अंग्रेजी के नए शब्द सिखा रहे हैं....)
अवस्थी- Nobody, none, except me can speak अंग्रेज़ी का ’अ’ in this entire 200 cubic metre of village territory…. PHOTOSYINTHESIS.. HA..HA…HA…..HA…
बिक्की- मरे गए... अवस्थी जी अभी भी बैठें है...।
(आनंद हंसने लगता है।)
बिक्की- अबे हंस मत... अभी भी कीचड़ है क्या?... ठीक लग रहा हूँ ना...?
आनंद- ला यह पतंग मुझे दे दे...।
बिक्की- चल.. म्मताज़ भाई ने काटी है इसे... पहली बार लूटी है मैंने किसी को नहीं दूंगा... कल उन्हें जाकर दिखाऊंगा.. कि देखों आपने जिस पतंग को काटा था मैं उसे लूट लाया...।
आनंद- ठीक है.. अब तो तेरा म्मताज़ ही मालिक है.. जा...।
(अवस्थी जी अंग्रेज़ी का फिर कोई शब्द कहते हैं और हंसने लगते हैं।)

बिक्की- तू जा घर..
आनंद- मैं नहीं जाऊंगा यार...।
बिक्की- जा न यार....।
आनंद- अबे नहीं जाऊंगा...।
बिक्की- अबे चले जा यार...।
आनंद- अरे तू गया मैं गया...।
बिक्की- अबे क्यों नहीं जाएगा बे...।
आनंद- तेरी थोड़ी आवाज़ सुनुगां... आआ मम्मी.. नहीं मम्मी... बस करो मम्मी... ऊऊउउ... फिर घर जाऊंगा...।
बिक्की- तुझे विद्या माता की कसम जा अपने घर...।
आनंद- कसम वसम चूल्हे में भसम....।
बिक्की- तुझे तेरी माँ के मरने की कसम...
आनंद- सड़ी सुपाड़ी बन में डाली सीता जी ने कसम उतारी.. अब चढ़ा ले कोई भी कसम, इसके ऊपर तो कोई कसम चढ़ती ही नहीं है... ले बॆटा अब जा अंदर...।
बिक्की- मर यहीं पर... पर तू देख मैं कैसे पतंग बचा लूगा।
(बिक्की भीतर जाता है... अवस्थी जी उसे देखकर नमस्ते करते हैं...। और हंसने लगते हैं।)
अवस्थी- अरे बिक्की जी नमस्ते।
बिक्की- नमस्ते अंकिल...।
अवस्थी- आओ आओ... मैं तो कब से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।
(बिक्की धीरे से चोरी छुपे घर में घुसता है और पतंग भीतर रख देता है। अवस्ती जी उसे देख लेते हैं... माँ को इशारा करते हैं कि बिक्की आ गया है। और आवाज़ लगाते हैं।)
अवस्थी- बिक्की!!! बिक्की... come.. come here… sit.. sit..
(बिक्की अवस्थी जी से बचता हुआ माँ के बगल में बैठने लगता है... जहाँ शक्कर का झोला पड़ा हुआ है।)
माँ- य़हा कहाँ शक्कर पर बैठोगे... जाओ सर बुला रहे हैं ना... ।
अवस्थी-come beta.. come… sit here…हम लोग कब से तुम्हारा waiting कर रहे थे।
माँ-कहाँ रह गए थे तुम... अवस्थी जी कह रहे थे तुम अचानक भाग लिए थे बिक्की बेटा...।
(अवस्थी जी हंसने लगते हैं। पीछे से बिक्की की बहन इशारा करती है कि बहुत पिटाई होने वाली है।)
अवस्थी- हाँ...suddenly.. भाग लिया.. मैं पीछे से बिक्की बेटा-बिक्की बेटा चिल्लाता रहा पर.. he didn’t stop only… there must be some important work.. क्यो बेटा?
बहन- महत्वपूर्ण काम...
माँ- हाँ.. बोलो...
अवस्थी- say something…???
(बिक्की सबकी तरफ देखता है और धीरे से अवस्थी जी के बगल में खड़ा होता है...।)
AFTER MY BATH I TRY TRY TRY..
TO WIPE MYSELF TILL I’M DRY DRY DRY..
HANDS TO WIPE AND FINGIR AND TOES
TWO WET LEGS AND A SHINY NOSE
JUST THINK HOW MUCH LESS TIME I WOULD TAKE
IF I WERE A DOG AND COULD SHAKE SHAKE SHAKE…
(सभी देखते रह जाते हैं...)
अवस्ती-PHOBIA…
माँ- अरे...बड़ा शरारती है... पूरे घर का काम करता है यह अकेला.. बड़ा मन लगाकर.. इसकी बहन तो बस बैठी रहती है... जा भाई के लिए पानी लेकर आ...
बिक्की- पानी नहीं चाहिए...।
बहन- सच में पानी लाऊं?
माँ- और जा भाई के लिए चाय भी चढ़ा दे... कब से यह बिना शक्कर की चाय पी रहा है.. अब से मिलेगी तुझे शक्कर वाली चाय सुबह शाम... दोनो टाईम...।
बिक्की- मुझे फीकी चाय पसंद है।
अवस्थी- अरे ऎसे कैसे बेटा.... इतनी दूर से मैं शक्कर लेकर आया हूँ तुम्हारे लिए... अब तो मीठी चाय ही पीनी पड़ेगी। चलिए तो मैं जाता हूँ।
माँ- अरे एक चाय और पी जाते...।
अवस्थी- नहीं.. अब तो इन्हें दीजिए चाय...। यह बदबू कहाँ से आ रही है... ओह.. बिक्की.. तुम्हारे पास से यह बदबू आ रही है क्या????
(माँ गुस्से में शक्कर का झॊला लेकर अंदर चली जाती है।अंदर से आवज़ लगाती है।)
माँ- बिक्की बेटा ज़रा अंदर तो आना... तुमसे ज़रुरी बात करनी है। अवस्थी जी आते रहिएगा।
अवस्ती- जी... बिक्की... पतंग... जाओ अब चाय पियो!!! Shake shake shake…
(अवस्थे जी खूब पिटाई होगी का ईशारा करके चले जाते हैं... बाहर अवस्थी जी को आनंद मिलता है।)
अवस्थी-आनंद, what are you doing here?
आनंद- I looking for you… sir.
अवस्थी-why???
आनंद- मैं निबंध लिखना चाहता हूँ... my best teacher…
(दोनों चले जाते हैं... पीछे से बिक्की के पिटने की आवाज़ आती है......बिक्की चिल्ला चिल्ला कर रोता है.. मगर झूठा। बहुत मार खाने के बाद वह झूठा रोता हुआ बाहर बहन के पास आता है।)
बिक्की- देखा.. इतना पिटने पर भी कुछ नहीं हुआ... एक आँसू नहीं टपका....
(तभी माँ बाहर आती है उसकी पतंग लेकर... और उसके सामने पतंग के टुकड़े-टुकड़े कर देती है। तब बिक्की रोना शुरु करता है। बहन उसे गले लगा लेती है।)
(black out)
Scene-6.
(बिक्की और आनंद बैठा हुए हैं... सामने म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान धीरे-धीरे खुल रही हैं... अंधेरे में म्मताज़ भाई बैठे दिखाई दे रहे हैं।)
आनंद- अबे गलत है बे यह..
बिक्की- हाँ यार..
आनंद- तेरी माँ तो बहुत ही danger है बे।
बिक्की- हाँ यार..।
आनंद- मार मारके तुझे पतंग बना दिया बे।
बिक्की- हाँ यार...।
आनंद- मुझसे सुनते नहीं बना बे.. मैं तो घर चला गया...
बिक्की- आनंद तू मेरा सबसे पक्का दोस्त है।
आनंद- तू अगर वह पतंग मुझे दे देता तो इतना नहीं पिटता।
बिक्की- हं।
आनंद- कल मैं बहुत पिटा।
बिक्की- क्यों?
आनंद- अबे चाय गिर गई गलती से.. माँ ने सूत दिया।
बिक्की- माँए बहुत denger होती है गुरु।
आनंद- अबे, हम लोग यहाँ क्यों बैठे हैं बे।
बिक्की- माँ ने सब्ज़ी ख़रीदने भेजा है।
आनंद- पर सब्ज़ी बाज़ार तो पीछे हैं...।
बिक्की- पता है।
आनंद- अबे पैसे ऎसे क्यों रखें है.. और यह पर्ची क्या है... ओह..
(आनंद पर्ची पढ़ता है...।)
आनंद- एक किलो आलू, एक किलो प्याज़, आधा टमाटर। और धनिया-मिर्च-अदरक मुफ़्त.. ढ़ाई रुपये...। चल सब्ज़ी लेते हैं..। मौल-भाव करते हैं चव्वनी बच जाएगी... चल।
बिक्की- म्मताज़ भाई की दुकान खुल गई।
(म्मताज़ भाई की दुकान धीरे-धीरे खुलती है... दोनों अवाक से म्मताज़भाई की दुकान को खलते हुए देखते हैं....म्मताज़ भाई हल्के अंधेरे में नमाज़ पढ़ रहे हैं।)
बिक्की- सजे धजे से हर दिन रहते..../ जब देखो मुस्काते रहते...
आनंद- रहते...
बिक्की- जैसे ही मैदान में आते....
आनंद- आते...
बिक्की- दुश्मन के छक्के छुड़ाते...
आनंद- छुड़ाते...
बिक्की- जो भी इनके सामने आया...
आनंद- आया...
बिक्की- एक गोते में करा सफाया...
आनंद- सफाया...
बिक्की- गलती न फिर किसी की दाल...
आनंद- दाल..
बिक्की- काली पतंग है तुर्रा लाल...
आनंद- लाल..
बिक्की- सब लोगों की शामत आई...
आनंद- आई...
बिक्की- आ गए मेरे म्मताज़ भाई...
आनंद- भाई.... क्या बात है दोस्त तूने लिखी है यह कविता..क्या बात है बिक्की मज़ा ही आ गया...।लेकिन सुन बे... तू म्मताज़ भाई से तो दूर ही रह।
बिक्की- चल..।
आनंद- तू पागल है रे.. हे! अबे कल की मार भूल गया।
बिक्की- पतंग लूटी थी मैंने, म्मताज़ भाई को तो बताना ही है।
आनंद- पिटेगा।
बिक्की- तू नहीं समझेगा.. एक पतंगबाज़ ही दूसरे पतंगबाज़ का दुख समझ सकता है। जाते ही सबसे पहले उनको पिटाई वाली बात बताऊंगा कि कैसे एक पतंगबाज़ के साथ... के साथ... छोड़ तू नहीं समझेगा। सुन तू इधर ही रह.. मैं उनसे मिलकर आता हूँ।
आनंद- ठीक है.. पिटाई भी बताना और जो अभी तू फिर पिटेगा वो भी एड़वांस में बता देना।
(बिक्की पतंग की दुकान पर पहुंचता है।)
म्मताज़-अरे को भाई? क्या ख्याल है?
बिक्की- ख्याल दुरुस्त है म्मताज़ भाई।
म्मताज़-अरे मिंया बड़े बुझे-बुझे लग रिये हो? क्या बात है।
बिक्की- नहीं.. नहीं म्मताज़ भाई। म्मताज़ भाई कल जो आपने एक गोते में दो पतंग काटी थी ना.. उसमें से एक तो अवस्थी जी के घर चली गई और दूसरी पतंग.. वह दूसरी पतंग मैंने लूटी थी म्मताज़ भाई।
म्मताज़-क्या बात कर रिये हो मिंया?
बिक्की- और म्मताज़ भाई.. म्मताज़ भाई जब वह पतंग लेकर मैं.. घर गया..तो.. तो...
म्मताज़-तो क्या हुआ मिंया?
बिक्की- अरे म्मताज़ भाई.. कुछ नहीं.. जाने दीजिए।
म्मताज़-अरे मिंया तो लेकर आना था उस पतंग को अपना शिकार देखने की हमें भी बड़ी तलब हैं।
बिक्की- वही तो मैं कह रहा था म्मताज़ भाई...मैं लाने वाला था.. वह.. वह.. असल में रास्ते में याद आया कि ’ओ तेरी पतंग तो भूल ही गया।’
म्मताज़-बड़ा मज़ा आया कल पतंग बाज़ी में... तुम्हें वह जोहर सिख़ाने थे मिंया.. कैसे एक बार में दो को साफ किया जाता है।
बिक्की- म्मताज़ भाई मैं सब देख रिया था... आप बहुत ऊपर थे... एकदम ऊपर.. फिर आंधी की तरह नीचे आए.. और एक बार में दोनों साफ.. मैं नीचे खड़े होकर सब देखा था..।
म्मताज़-देखना तू बड़ा होकर एक बहुत बड़ा पतंगबाज़ बनेगा।
बिक्की- पर आपने तो मुझे कभी पतंग उड़ाते हुए देखा ही नहीं है?
म्मताज़-अरे...इसलिए कह रिया हूँ क्योंकि...जब भी मैं कोई पेच काटता हूँ.. सिर्फ तेरे बारे में सोचता हूँ...।
(तभी म्मताज़ ने कुछ कपड़ों के नीचे से एक हिचका निकाला। मांझा सुर्ख लाल रंग का था।)
म्मताज़-यह इसे छू के देख... देख।... अरे अरे.. देखके अभी हाथ कट जाएगा।
बिक्की- म्मताज़ भाई... पिछली बार आपने मांझा दिया था और कहाँ था कि ऊपर से रखकर ढ़ील दे देना...बस दुश्मन का काम तमाम।’
म्मताज़-कहा तो था मिंया... तुमने क्या किया?
बिक्की- मैंने वही किया जो आपने कहा था, मैंने ऊपर से रखकर ढ़ील दी, उसने नीचे से खेच दिया। म्मताज़ भाई इतनी बुरी तरह कटा था कि महल्ली के बच्चे-बच्चे हंस रहे थे।
म्मताज़-तुमसे भी छोटे बच्चे... ?
बिक्की- म्मताज़ भाई!!!
म्मताज़-कौन सा मांझा था वह?’
बिक्की- वही कत्थई वाला।
म्मताज़-साला... मियां लूटते है यह बरेली वाले भी... इस मांझे की बड़ी शिक़ायत मिली है...। अगली बार से मैं अगर यह मांझा दूँ भी ना.. तो तुम मत लेना ... साफ मना कर देना। इसे मैं वापिस बरेली भिजवाता हूँ। अपन हमेशा क्वाल्टी की चीज़ ही लेते है। इस लाल मांझे को देख रिया है? इसे सिर्फ मैं ही इस्तेमाल करता हूँ.. बस... किसी को नहीं दिया मियां आज तक यह.... छुपा के रखता हूँ। आज पहली बार तुम्हें दे रिया हूँ...संभालके। म्मताज़ भाई ने दिया है यह किसी को बक मत देना... यहाँ भीड़ लग जाएगी।... जब पचास पेंच(पतंग) काट दो तो म्मताज़ भाई को याद रखना... भूलना नहीं। यह ले... पतंग भी निकाल के रखी है अपुन ने तेरे वास्ते... दो रुपये हुए । इस्पेसल है... बस ढ़ील देते रहना हवा से बातें करेगी।’
बिक्की- ’नहीं म्मताज़ भाई... पतंग है मेरे पास... बस मांझा काफ़ी होगा।’
म्मताज़-पतंग कहाँ से आई... वह लढ़्ढू चोर की दुकान से ले ली क्या मिया?’
बिक्की- क्या कह रहे हो म्मताज़ भाई.. मैं तो लढ़्ढू की दुकान की तरफ देखता भी नहीं हूँ। कल वाली लूटी हुई पतंग रखी है।
(म्मताज़ पतंग वापिस रख लेता है, बिक्की पैसे देता है। विवेक प्रवेश करता है।)
म्मताज़-वैसे मिंया इस मांझे से वह लूटी हुई पतंग उड़ाओगे तो फिर बच्चे हंसेगें।’
बिक्की- म्मताज़ भाई अभी पैसे नहीं है पतंग के...।
म्मताज़-पैसे कौन मांग रहा है मिंया... पैसे जब हो तब दे देना... अभी तो उस मांझे की इज्जत रखो।
(बिक्की पतंग लेकर निकलता है वहाँ उसे आनंद नहीं दिखता है... वह कुछ देर आनंद को खोजता है.. तभी सामने विवेक खड़ा दिखता है।)
विवेक- पतंगबाज़ी के बीच में पैसों की बातें करना कितना बड़ा गुनाह है... और वह भी म्मताज़ भाई जैसे पतंगबाज़ के सामने...। कहाँ जा रहे हो...? घर? हाथ में पतंग लेकर? पिटोगे.. अब तो शायद मार भी दिये जाओ... अंदन को भूल जाओ वह घर पर नहीं है... अब.... कितनी ओछी बात है.. म्मताज़ भाई के हाथों दी हुई पतंग फाड़ोगे....।
(विवेक चला जाता है... कुछ उसके दोस्त आते हैं...।)
बिक्की- फाड़ूगां... फाडूगां...
(बिक्की बहुत कोशिश करता है पर फाड़ नहीं पाता है। और अंत में रोने लगता है।)
माँ- बिक्की बेटा ज़रा अंदर तो आना... तुमसे ज़रुरी बात करनी है।
(black out)
Scene-7.
(टियूशन या स्कूल अवस्थी सर पढ़ा रहे हैं... सारे लोग अपना अंग्रेज़ी का पाठ रट रहे हैं...। अवस्थी सार हर वाक्य को ब्लैक-बोर्ड पर लिखते जा रहे हैं।)
अवस्थी- we are human.
बच्चे- Are we human...? Are we human..? Are we human..?
जग्गू- अबे पतंग कटके जा रही है।
बिक्की- कहाँ?
(बिक्की बाहर झांकता है.. तभी माँ की आवाज़ आती है.. या स्कूल में उसके साथ बैठी बहन ही आवाज़ निकालती है और सब हंसने लगते हैं-“बिक्की बेटा ज़रा अंदर तो आना... तुमसे ज़रुरी बात करनी है।“ बिक्की डर के मारे वापिस पढ़ने बैठ जाता है।)
अवस्थी- kite is flying.
बच्चे- Is kite flying? Is kite flying? is kite flying???
(तभी वहाँ से म्मताज़ भाई गुज़रते हैं...)
म्मताज़-क्या मिंया class room में बैठे-बैठे बच्चों से पतंग उड़वा रिये हो?
अवस्थी- good evening brother mmtaz…
म्मताज़-good evening मिंया अवस्थी...।
अवस्थी- brother mmtaz is going…
बच्चे- Is brother mmtaz going???
( म्मताज़ भाई चले जाते हैं.... सारे बच्चे म्मताज़ को देखने कमरे से निकलर... झांकते हैं)
चिंटू- अबे, म्मताज़ भाई कितने लंबे है बे...
मोनू- पहली बार हमारी गली से गुज़र रहे हैं
जग्गू- अबे उनके हाथ में उनकी काली पतंग है लाल तुर्रे वाली... किसी को देने जा रहें है लगता है।
अवस्थी- what is this?? What is this??
(सभी बच्चे घबराकर अपनी जगह बैठ जाते हैं और एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाने लगते हैं।)
अवस्थी- No Hindi.. talk only in English.
चिंटु- brother mmataz…. Hmmmm.. tall.. very tall.
मोनू- brother mmtaz first time.. going...
जग्गू- brother mmtaz.. black kite.. red tail... thank you very much.
बिक्की- sir.. sir.. can I go for suu suu…??
अवस्थी- जल्दी.. मेरा मतलब... QUICK…
आनंद- तेरा अब म्मताज़ ही मालिक है।
अवस्थी- No hindi… only in English.. Anand stand up… what?
आनंद- sir.. sir…My friend bikki will die today.
अवस्थी- SHUT UP.
(तभी स्कूल की घंटी बजती है और सारे बच्चे भाग जाते है।)


Scene-8.

(बिक्की भागता हुआ म्मताज़ के पीछे जाता है... पूरा स्कूल मिलकर म्मताज़ का घर बन जाता है दरवाज़ा आता है और म्मताज़ भाई उसमें सिर झुकाके प्रवेश करते हैं....। म्मताज़ भाई को देखके..उनकी बच्ची दौड़कर उनके गले लग जाती है... वह उसे अपने पास बिठा लेते है.. तभी भीतर से उनकी बीबी पानी लेकर आती है... उनकी बेटी आकर बड़ी सी ड्राईंग बुक उनको दिखाती है... वह उसकी ड्राईंग देखकर उसे चूमते हैं... तभी वह लड़की अचानक पलटकर बिक्की की तरफ देखने लगती है। बिक्की घबराकर दरवाज़े के पीछे छुप जाता है... वह धीरे-धीरे चलकर आती बिक्की के पास आती है।)
लड़की- तू कौन है?
बिक्की- मैं कोई नहीं हूँ.. कोई भी नहीं...
(और बिक्की रोने लगता है... रोते-रोते वहीं बैठ जाता है... सीन बदलता है... आनंद बिक्की का बस्ता लेकर आता है।)
आनंद- बिक्की.. ऎ बिक्की... अरे बिक्की है क्या...? अब अंधेरे में क्यों बैठा है? अबे तेरे घरवाले तुझे ढ़ूढ़ के पागल हो गए बे.. अबे म्मताज़ भाई भी तुझे ढूढ़ रहे हैं....बेटा कल अवस्थी सर तेरे कान लाल नहीं... हरे कर देगें।
(बिक्की चुप है।)
आनंद- ’क्यों रें आन्टी ने मारा क्या?
(बिक्की चुप है।)
आनंद- मैं जाऊं क्या?
(आनंद जाने लगता है, बिक्की उसका हाथ पकड़ लेता है।)
बिक्की- म्मताज़ भाई का अपना घर है.. तुझे पता है.? उनकी एक बेटी है? बीवी है?
(यह कहते ही वह रोने लगता है।)
आनंद- तो????
बिक्की- तो? तो म्मताज़ भाई झूठे हैं... पूरी की पूरी तरह झूठे।
आनंद- हा.. हा.... हा... हा....अबे तू बच्चा है क्या?
बिक्की- मैं बच्चा नहीं हूँ।
आनंद- अबे सबके होते हैं बे।
बिक्की- आनंद!!! म्मताज़ भाई के बीबी बच्चे कैसे हो सकते हैं? वह एक पतंगबाज़ हैं.. बड़े पतंगबाज़।
(आनंद फिर हंसने लगता है... बिक्की चिल्लना शुरुकरता है।)
आनंद- बेटा तेरे भी बीबी बच्चे होगें देख लेना।
बिक्की- छी...छी..। मेरे नहीं होगें।
आनंद- सच कह रहा हूँ..।
बिक्की- अबे चल हट.. तेरे को पता है एक पतंगबाज़ क्या होता है? अबे वह.. हीरो है... वह सुपरमेन है....।
(और फिर उससे कुछ बोलते नहीं बनता वह आनंद को मारने लगता है।)
आनंद- अबे तू पगला गया है क्या..? अबे क्या कर रहा है? ओए...
(आनंद वहाँ से भाग जाता है। बिक्की बस्ते से लाल मांझा निकालता है और उसके टुकड़े-टुकड़े कर देता है।)

बिक्की- नहीं चाहिए लाल मांझा.. नहीं चाहीए लाल मांझा... नहीं चाहिए.. नही चाहिए......पतंगबाज़ी एक झूठा खेल है... आज से पतंगबाज़ी बंद।
(black out…)

Scene-9.
(बहन होमवर्क कर रही है। बिक्की बाहर से घर का बहुत सारा सामान लेकर अंदर आता है.. वह कुछ बदल चुका है... जाते जाते बहन को टाफी देता है और भीतर चला जाता है।)
बहन- भाई मुझॆ मांझा पड़ा मिला है...तुझे चाहिए क्या?
बिक्की- नहीं... नाली में फेंक दे उसे...।
बहन- भाई तुम चोरी-चोरी पतंग तो नहीं उड़ाते हो ना।
बिक्की- पागल है... बता तूने आखरी बार मुझे पतंग उड़ाते कब देखा था?
बहन- भाई पिछली स्कूल की छुट्टीयों में.. अब तो दूसरी छुट्टीयाँ आ गई...पूरा एक साल... पर क्यों?
(बिक्की एक किताब लेकर बाहर आता है और बहन के बगल में पढ़ने बैठ जाता है।)
बिक्की- बस नहीं उड़ाना.. और तू चुप रह पतंग की बात मत कर..।
बहन- अच्छा... और आनंद कहाँ है?
बिक्की- उससे कट्टी चल रही है। गघा है वह... सूअर.. उल्लू.. और तू क्या यह होमवर्क करने का नाटक करती रहती है? परिक्षा खत्म हो चुकी है कब की... तेरे चक्कर में मुझे भी पढ़ना पड़ता है।
बहन- ऎ!! ऎ!! चिढ़ क्यों रहा है? पतंग उड़ान तूने छोड़ा है... तो उसका गुस्सा मुझपे क्यों निकाल रहा है?
(तभी बाहर से एक बच्चा ’पतंग लूट ली...’ और दूसरा लड़का ’क्या काटा है म्मताज़ भाई ने...’ चिल्लाता है, बिक्की भागता हुआ बाहर देखने जाता है।)
माँ- बिक्की बेटा ज़रा अंदर तो आना... तुमसे ज़रुरी बात करनी है।
(माँ की आवाज़ सुनते ही वह पढ़ने बैठ जाता है। बहन हसने लगता है।)
बहन- क्या हुआ?
बिक्की- माँ अंदर हैं क्या?
बहन- नहीं वह तो अवस्थी जी के घर गई हैं।
बिक्की- मेरे कान बजने लगे हैं।
बहन- तेरे को पता है, जबसे तूने पतंगबाज़ी छोड़ी है, माँ, अवस्थी जी... अवस्थी सर..यूं समझ ले पूरा गांव तुझसे कितना खुश रहने लगा है।
बिक्की- इन सबके साथ तू भी बहुत खुश होगी?
बहन- नहीं.....मुझे तो तू पतंग उड़ाते हुए बहुत सुंदर दिखता है।
बिक्की- तुझे पता है बाहर इस वक़्त कितनी पतंगे उड़ रही हैं...आसमान म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान हो चुका है। एक पतंगबाज़ पतंग उड़ाना बंद कर सकता है पर उसके बारे में सोचना कभी भी बंद नहीं कर सकता..। पतंग का नाम लेते ही मुझे म्मताज़ भाई दिखते हैं और मुझसे पूछते है कि “क्या ख्याल है मिंया?”
बहन- भाई जाओ पतंग उड़ाओ जाके...।
बिक्की- नहीं... नहीं.. म्मताज़ भाई झूठे हैं... वह पतंगबाज़ नहीं है।
बहन- तू ही कहता था कि म्मताज़ भाई दुनियां के सबसे बड़े पतंगबाज़ हैं।
बिक्की- नहीं हैं... झूठ है सब....मुझे कभी कभी बहुत गुस्सा आता है.. इच्छा होती है कि म्मताज़ भाई की आँखों के सामने मैं लड़्डू की दुकान से पतंग खरीदू या देर रात एक बाल्टी पानी लेकर जाऊं और म्मताज़ भाई की पतंग की दुकान को भीतर-बाहर हर जगह से गीली कर दूं।
बहन- यह गुस्सा मुझपर निकालने से तो अच्छा है कि यह कर ही दे।
बिक्की- नहीं कर सकता ना...
बहन- क्यों?
बिक्की- भूल गई माँ ने क्या कहाँ था?
बहन- हाँ... भगवान सब देखता है।
बिक्की- हाँ.. भगवान सब देखता है।
(तभी बाहर पतंग की आवाज़ आती है और बिक्की खिड़की की तरफ भागता है।)
माँ- बेटा ज़रा अंदर तो आना... तुमसे ज़रुरी बात करनी है।
बिक्की- तू झूठ बोल रही थी माँ भीतर ही है.. हे ना?
बहन- नहीं रे।
बिक्की- मैं देखकर आता हूँ।
(बिक्की अंदर जाता है... बाहर म्मताज़ भाई दरवाज़ा खटखटाते हैं। बहन दरवाज़ा खोलती है।)
बहन- बिक्की... बिक्की.. बिक्की... तुमसे कोई मिलने आया है।
(पहले विवेक बाहर निकलता है उसके पीछे बिक्की आता है... दोनों के चहरों पर म्मताज़ भाई को लेकर एक जैसा आश्चर्य है। पर बिक्की म्मताज़ भाई से नाराज़ है।)
म्मताज़-अरे को भाई? क्या ख़्याल है?
विवेक- ख़्याल दुरुस्त हैं म्मताज़ भाई।
म्मताज़-क्या मिंया अंदर नहीं बुलाओगे?
बहन- आईये म्मताज़ भाई... आईये।
(बिक्की बहन को भीतर धकेल देता है।)
म्मताज़-क्या मिंया पतंगबाज़ी का शोक़ काफूर हो गया?
विवेक- माँ ने मना किया हुआ है।
म्मताज़-क्या मिंया? पतंगबाज़ी के साथ पुरानी दोस्ती भी छोड़ दी?
(बिक्की चुप रहता है।)
म्मताज़-अरे वह लाल मांझे से कितनी पतंग काटी तुमने, बताया ही नहीं मिंया?
विवेक- वह लाल मांझा गलती से पानी में गिर के खराब हो गया था।
म्मताज़-अरे मुझे बताय होता मिंया मैं.. मैं..।
बिक्की- मुझे अब लाल मांझा नहीं चाहिए म्मताज़ भाई।
म्मताज़-ओ... क्या चाहते हो मिंया?
विवेक- म्मताज़ भाई मैं ठीक इस वक़्त आपकी गोद में बैठना चाहता हूँ.. आपको चूम लेना चाहता हूँ... और आपकी खूबसूरत काली पतंग, लाल मांझे के साथ उड़ाना चाहता हूँ।
बिक्की- मैंने पतंगबाज़ी छोड़ दी है म्मताज़ भाई, अब मैं कंचे खेलता हूँ।
बहन- म्मताज़ भाई हमारा घर पता था?
म्मताज़-नहीं.. आनंद आया था दुकान पर, उसी से पता चला।
बिक्की- वह क्यों आया था?
म्मताज़-पतंग लेने आया था।
बिक्की- पतंग लेने? उसका पतंगबाज़ी से क्या लेना-देना?? वह पतंगबाज़ नहीं है... मैं तो उसे अपना हिचका पकड़ने के लिए भी ना खड़ा करुं... वह पतंग में रखकर भजिए खाएगा।
म्मताज़-क्या मियां खुद तो पतंगबाज़ी छोड़के कंचे खेलने लगे हो, कम से कम दूसरों को तो पंतग उड़ाने दो, मेरे बीबी बच्चों को भूखा मारोगे क्या?
बिक्की- म्मताज़ भाई?
विवेक- म्मताज़ भाई आप अपना घर चलाने के लिए पतंग बेचते हो? पतंगबाज़ी महज़ एक खेल है, धंधा है? आप बस एक ओर आदमी हो? नहीं.. म्मताज़ भाई यह झूठ है... सब झूठ है।
बिक्की- आप झूठे हैं।
म्मताज़-क्या?
बिक्की- आप झूठे हैं म्मताज़ भाई।
(तभी माँ की बाहर आवाज़ आती है।)
बहन- भाई.. भाई.... माँ आ गई। भाई माँ आ गई।
(माँ को देखते ही बिक्की म्मताज़ भाई से दूर खड़ा हो जाता है। माँ म्मताज़ भाई को आश्चर्य से देखती हैं। माँ के हाथ में एक झोला है।)
म्मताज़-तो.. क्या ख़्याल है?
माँ- क्या?
म्मताज़-क्या ख़्याल है?
बिक्की- ख़्याल दुरुस्त है म्मताज़ भाई... ख़्याल दुरुस्त है माँ।
बहन- माँ यह म्मताज़ भाई है... इनकी सराफे में पतंग की बहुत सुंदर दुकान है... यह बहुत बड़े पतंगबा....
माँ- जानती हूँ मैं... तू चुप रह। मैं यह रख कर आती हूँ।
म्मताज़-मैं झूठा नहीं हूँ मिंया (बिक्की से) हाँ मैंने तुमसे थोड़ा झूठ बोला था मिंया... वह लाल मांझे से मैं पतंग नहीं उड़ाता हूँ... वह तो उसी वक़्त नया मांझा आया था। पर मिंया कथई मांझा उतना खराब नहीं है, मैं उससे पतंग उड़ा चुका हूँ।’
(माँ वापिस आती है।)
बिक्की- मैं उस झूठ की बात नहीं कर रहा हूँ म्मताज़ भाई।
म्मताज़-तो फिर क्या बात हैं मिंया?
बिक्की- म्मताज़ भाई आपका...
विवेक- कह दे...
बहन- बिक्की!!!
म्मताज़-मैं समझा मिंया... पेंच काटने की बात ना (पतंग काटने)... तो ऎसा है कि मैं तुम्हारे बड़े होने का इंतज़ार कर रिया था। पंतगबाज़ी... सिखाई नहीं जा सकती है मिंया... वह आती है या नहीं आती है।
बिक्की- मुझे आती है क्या?
म्मताज़-अगर नहीं आती तो मैं यहाँ क्यों आता मिंया?
बिक्की- पर आपने तो कहा था कि कथई मांझे से ऊपर से रखकर ढ़ील देना और हरे से नीचे से खेंच देना?
म्मताज़-मिंया यह सब कहने की बातें है.. जब पतंग लड़ रही होती है...तो उस लड़ाई में पढ़ाई भूलना पड़ता है।’
माँ- अरे यह क्या है? हें... पढ़ाई क्यों भूलेगा वो? तुम दोनों यह क्या बात कर रहे हो?
बहन- माँ असल में...
माँ- क्या?
बिक्की- ’म्मताज़ भाई आप तो हमेशा ख़ीच के पतंग काटते हो?’
म्मताज़-नहीं तो....।’
’बिक्की- मैंने आपके हर पेच देखें हैं।’
म्मताज़-अच्छा?’
बिक्की- हाँ म्मताज़ भाई...।’
म्मताज़-मुझे कभी पता नहीं चला... मिंया पतंग लड़ाते वक़्त मुझे कुछ भी याद नहीं रहता।’
बिक्की- मुझे भी म्मताज़ भाई, मुझे भी कुछ याद नहीं रहता...। मैं तो पतंग को देखता हूँ और सब कुछ भूल जाता हूँ।
माँ- बिक्की!!!... क्या बातें कर रहे हो आप लोग?
बहन- माँ बिक्की...
माँ- हाँ तू ही बता.. बोल...
बिक्की-म्मताज़ भाई माँ बहुत डेंजर हैं।
(बहन चुप हो जाती है... माँ, म्मताज़ भाई के एकदम पास जाती हैं।)
माँ- तुम यहाँ क्यों आए हो.. म्मताज़?
म्मताज़-इन साहबज़ादे से मिलने।’
माँ- अच्छा। ऎसे ही?
म्मताज़-जी?
माँ- मतलब...कोई ख़ास वजह?’
म्मताज़-ना...ना.. कोई ख़ास वजह तो नहीं है...।’
माँ- अच्छा......तो आप ऎसे ही चले आए?’
म्मताज़-हाँ....ना..ना.., ऎसे ही तो नहीं आया मैं... वजह है.. मगर वह ख़ास वजह नहीं है।’
माँ- अच्छा... क्या वजह है?’
म्मताज़-यह साहबज़ादे बहुत दिन से दिखे नहीं थे सो...।’
माँ- इनकी परिक्षा चल रही थी।’
म्मताज़-हाँ मुझे पता था..। पर वह तो खत्म हुए काफ़ी समय हो गया है... तो मैंने सोचा..।’
माँ- क्या सोचा?’
म्मताज़-सोचा....पतंगबाज़ी का मौसम है.. और यह जनाब नदारद।’
माँ- इन्होने पतंग बाज़ी छोड़ दी है।’
म्मताज़-हाँ..हाँ.. अभी बताया इन्होने कि आपको पतंगबाज़ी पसंद नहीं है सो यह आजकल कंचे खेलने लगे है।’
माँ- बिक्की?
म्मताज़-कंचे जैसा ज़मीनी खेल आपको आसमान की पतंबाज़ी से अच्छा लगता है?
माँ- म्मताज़ यह पतंग नहीं उड़ाएगा यह फैसला इसने खुद लिया है। मैंने इससे कुछ नहीं कहा...
म्मताज़-क्या मिंया... यह.. सच...
माँ- जी हाँ.....और अब यह मेरा भी फैसला है कि अब यह कभी पतंग नहीं उड़ाएगा...।
म्मताज़-जी मैं समझा...।
माँ- और तुमने कंचे खेलना कब से शुरु कर दिया?
विवेक- माँ आपको बीच में बोलने की क्या ज़रुरत है? यह मेरे और म्मताज़ भाई के बीच की बात है।
म्मताज़-मैं चलता हूँ।
(पर म्मताज़ भाई वहीं खड़े रहते हैं.. कुछ देर में बिक्की उठकर उनके गले लग जाता है।)
विवेक- म्मताज़ भाई देखो आपकी उंग्लियाँ और मेरी उग्लियों में मांझे के कटे के बिल्कुल एक जैसे निशान है..।
बिक्की- म्मताज़ भाई मैं एक पतंगबाज़ हूँ।
(बिक्की बहुत हिंसक तरीके से म्मताज़ भाई के गले लगने लगता है।)
म्मताज़-बिक्की..बिक्की।
माँ- ऎ बिक्की.. क्या कर रहा है?
(माँ उसे खींचकर अलग करती है।)
माँ- नमस्ते म्मताज़ भाई।
(म्मताज़ जाने लगता है तभी दरवाज़े पर जाकर रुक जाता है.. मुड़ता है।)
म्मताज़-(माँ से...) मैं आपसे एक बात कहना चाह रहा था.... रहने दीजिए...।
(रहने दीजिए कहकर वह चले जाते हैं, माँ गुस्सा हो जाती है।)
माँ- रहने दीजिए क्या? अरे क्या रहने दीजिए?... ओए म्मताज़.. दम है तो कहकर जा.. क्या रहने दीजिए..।
(यह कहते हुए माँ म्मताज़ के पीछे चली जाती है... बिक्की और बहन एक दूसरे को देखते हैं... और बिक्की की बहन, बिक्की के गले में अपना हाथ डाल देती है।)
(black out..)
Scene-10.
(म्मताज़ भाई की दुकान खुली हुई है आनंद प्रवेश करता है।)
आनंद- म्मताज़ भाई... आज तो मज़ा ही आ गया था।
म्मताज़-क्या ख़्याल है मिया?
आनंद- सही है म्मताज़ भाई... सही है। पतंग न.. आज पतंग उठ गई थी... इतनी ऊपर उड़ गई थी.. फिर पेड़ में फंस के फट गई... म्मताज़ भाई एक पतंग ओर दे देते???
म्मताज़-आनंद तुम पहले मैदान में पतंग उड़ाना सीख़ो।
आनंद- मैदान में तो बच्चे जाते हैं..
म्मताज़-अच्छा यह लो.. यह कनकईया उड़ाओ...
आनंद- यह उड़ेगी भी... म्मताज़ भाई मैं दूसरों की पतंग काटना चाहता हूँ।
म्मताज़-पतंग उड़ाने का मज़ा तो लो पहले मिंया... उधर क्या बिक्की है।
आनंद- किधर?
म्मताज़-उस तरफ?
आनंद- अरे नहीं म्मताज़ भाई.. उसने तो पूरी तरह पतंगबाज़ी छोड़ दी है.. पागल है वह, ज़रा-ज़रा सी बात पर चिढ़ जाता है.. मुझसे ठीक से बात भी नहीं करता है, मैंने तो उससे मिलना ही बंद कर दिया है।
म्मताज़-वह एक पतंगबाज़... वह आएगा वापिस.. अरे बिक्की..वह देख उधर खड़ा तो हैं.... बिक्की..।
आनंद- मैं हूँ पतंगबाज़ म्मतज़ भाई... बिक्की कहीं नहीं है।
म्मताज़-यह ले... मस्त पतंग है...चलो मिंया फिर नमाज़ का बख़्त हो गया है।
आनंद- ठीक है म्मताज़ भाई।
(आनंद म्मताज़ की दुकान से निकलता है.. पीछे से बिक्की उसे आवाज़ लगाता है।)
बिक्की- आनंद. आनंद..।
आनंद- बिक्की? बिक्की तू क्या कर रहा है.. और क्या हो गया तुझे?
बिक्की- तू खूब पतंग उड़ा रहा है आजकल?
आनंद- हाँ.. आज म्मताज़ भाई कह रहे थे कि मैं बड़ा पतंगबाज़ हूँ..।
बिक्की- तू कंचे खेलने क्यों नहीं आता बे?
आनंद- चल... बहुत बड़ा पतंगबाज़ी का टूर्नामेंट है और मैं म्मताज़ भाई की चख़री पकडूंगा उसमें?
बिक्की- तू???
आनंद- हाँ मैं और नहीं तो कौन बे?
बिक्की- सद्दी मांझे में अंतर पता है.. म्मताज़ भाई की चख़री पकडेगा?
आनंद- अबे... चल बे.. तुझसे कौन बात करे मैं जाता हूँ। बिक्की नहा ले बे.. अजीब लग रिया है।
(आनंद जाने लगता है पीछे से बिक्की आवाज़ लगाता है।)
बिक्की- आनंद।
आनंद- क्या?
(आनंद पलटता है और बिक्की उसके सिर पर एक ज़ोर का पत्थर मार देता है। विवेक चिल्लाता है...’बिक्की’.. बिक्की’.. बिक्की रुक जाता है। आनंद रोने लगता है बिक्की बिना कुछ किये वहीं बुत सा खड़ा रहता है।)
आनंद- तू पागल हो गया है... रुक मैं अभी तेरी माँ को सब बताता हूँ.... खून... खून निकलने लगा है... आंटि.. आंटि...।
(आनंद बाहर जाता है।)
विवेक- तुमारी पतंग कट चुकी है.... और तुम्हारे मांझे को म्मताज़ भाई ने कहीं पकड़ रखा है.. अब तुम अपने पतंग कटने के दुख को भूलकर अपने मांझॆ को बचाने की गंदी कोशिश कर रहे हो? म्मताज़ भाई का अपना परिवार है.. बीबी है, एक खूबसूरत बच्ची है।
बिक्की- और मैं?
विवेक- तुम कोई नहीं हो... कोई नहीं।
(माँ भीतर आती है।)
माँ- बिक्की बेटा कितना ढूढ़ रही थी तुझे स्कूल को देर हो रही है।
(माँ उसे तैयार करके स्कूल भेजती है। दूसरी तरफ अवस्थी जी खड़े हैं।)
अवस्थी- यह देख क्रिकेट... यह खेल... वह छक्का।
(बहन आती है।)
बहन- भईया मेरे साथ खेलो ना।
(आनंद पतंग उड़ाता दिखता है।)
आनंद- म्मताज़ भाई काटा है.. काटा है।
(बिक्की आनंद को फिर पत्थर मारता है। माँ वापिस आती है। इस बार सब बहुत तेज़ी से करने लगते हैं।)

माँ- बिक्की बेटा कितना ढूढ़ रही थी तुझे स्कूल को देर हो रही है।
(माँ उसे तैयार करके स्कूल भेजती है। दूसरी तरफ अवस्थी जी खड़े हैं।)
अवस्थी- यह देख क्रिकेट... यह खेल... वह छक्का।
(बहन आती है।)
बहन- भईया मेरे साथ खेलो ना।
(आनंद पतंग उड़ाता दिखता है।)
आनंद- म्मताज़ भाई काटा है.. काटा है।
(बिक्की आनंद को फिर पत्थर मारता है। माँ वापिस आती है... तीसरी बार में सब बहुत तेज़ी से होने लगता है... बिक्की चक्कर खाकर गिर जाता है सब चले जाते हैं और हमें... म्मताज़ भाई विवेक की गोदी में बैठे दिखते हैं...। तभी माँ की लोरी की आवाज़ आती है... वह बिक्की को सुला रही हैं...। म्मताज़ भाई लोरी गाना शुरु करते हैं... कुछ देर में म्मताज़ भाई की बेटी और आनंद उनके पास आते हैं...।)
बेटी- तुम कौन हो...?
विवेक- मैं कोई नहीं हूँ।
बेटी- तुम कौन हो?
विवेक- मैं कोई नहीं हूँ।
(विवेक.. म्मताज़ भाई उठ जाते हैं.. म्मताज़ भाई आनंद को देखते हैं)
म्मताज़- आनंद, देखो मैंने तुम्हारे वास्ते यह काली पतंग लाल तुर्रे के साथ और यह लाल मांझा रखा है.. यह आज से तुम्हारा... मेरे पतंगबाज़...।
(विवेक गुस्से में जाता है और पतंग फाड़कर वहाँ से चला जाता है.... सभी बिक्की..बिक्की गुस्से में चिल्लने लगते हैं।)
Scene-11.
(यहाँ बिक्की की नींद खुलती है। वह उठता है... उसे बगल में पड़ी हुई माचिस दिखाई देती है.. वह उसकी एक तीली जलाता है... कुछ देर उसे देखता रहता है.. उठता है... चलते हुए उसे बहुत सा कचरा रास्ते में दिखता है... वह उस कचरे को उठाता चलता है.. म्मताज़ भाई की दुकान के पास पहुंचता है.. उसके नीचे घुसकर सारा कचरा रखता है और आग लगा देता है... बहुत देर तक उसे जलते हुए देखता है। तभी भीतर से आवाज़ आती है.. “आग..आग..आग” बिक्की डर जाता है वह आग बुझाने की कोशिश करता है..। कुछ लोगों के इस तरफ आने की आवाज़ आती है, बिक्की घबरा जाता है और वहाँ से भाग जाता है।)

Scene-12.
(आनंद की आवाज़ आती है...’बिक्की.. बिक्की..बिक्की..” विवेक स्टेशन पर उतरता है।)
आनंद- लाओ सामान मुझे दे दो।
विवेक- अरे रहने दो.. बस एक ही बैग़ है। रुको मैं तनु को फोन कर दूं... मेरी बीबी...।
आनंद- मैं तब तक गाड़ी लेकर आता हूँ।
विवेक- ठीक है।
आनंद- हेलो.. हेलो.. हाँ तनु.. मैं पहुच गया हूँ ठीक-ठाक.. हाँ आनंद आ गया था लेने.. वह गाड़ी लेने गया है।.. आनंद अजीब सा हो गया है.. गंभीर. बहुत बड़ा... तनु एक बात सच कहुं मैं क्या करुंगा म्मताज़ भाई से मिलकर..? तनु यह वैसा ही है जैसे आप बचपन के कपड़े ज़बरद्स्ती अभी पहनने की कोशिश करो.. कपड़े फट जाएगें.. और कुछ भी नहीं होगा। इच्छा तो हो रही है कि शाम तक बस यहीं इसी स्टेशन पर ही बैठा रहूं.. किसी से ना मिलू।
आनंद- बिक्की... बिक्की.. ।
विवेक- चलो बिक्की गाड़ी ले आया है.. मैं चलता हूँ... कहाँ जाऊंगा.. वही म्मताज़ भाई की दुकान पर और क्या? बॉय.. हाँ मिलने के बाद फोन करुंगा।
आनंद- बिक्की..बिक्की..।
विवेक- आया...
(तभी एक और फोन आता है।)
विवेक- ओए मनोज.. अरे सुन.. मैं तेरेको बाद में करता हूँ.. हाँ... सुन जोक्स भेजते रहियों.. बाद में करता हूँ.. bye.. bye..
(विवेक बाहर जाता है... देखता है कि आनंद साईकल लेकर आया है।)
विवेक- अबे यह क्या है।
आनंद- चल बैठ..।
विवेक- अबे मैं बैठ नहीं पाऊंगा... यार टेक्सी कर लेते हैं।
आनंद- यहीं तो जाना है। आजा.. चिंता मत कर..।
विवेक- गिर जाऊंगा...।
(विवेक बैठता है... आनंद साईकल चलाता हुआ अंदर आता है... विवेक डरा हुआ पीछे बैठा है...।)
आनंद- ठीक है।
विवेक- अरे यार सही चलाता है तू तो.. कब सीख़ी तूने?
आनंद- इस साईकल पर तू पहले भी चढ़ चुका है।
विवेक- अच्छा? कब रे?
आनंद- जाने दे तुझे याद नहीं होगा।
(कुच दूर चलने के बाद....।)
विवेक- दो मिनि साईकल रोक.. ।
आनंद- क्यों?
विवेक- अरे रोक तो... सुन आनंद मैं सोच रहा था.. देख मेरी इच्छा... एक चाय पीने की हो रही है।
आनंद- अरे म्मताज़ भाई से मिलने के बाद पी लेना?
विवेक- नहीं अभी चाय पीते हैं।
आनंद- ठीक है.. वैसे म्मताज़ भाई इंतज़ार कर रहे होगें।
विवेक- अरे चल देंगे यार.. उन्हीं से मिलने मैं यहाँ इतनी दूर आया हूँ।
आनंद- ठीक है.. ओ छोटू दो कट ला...
(आनंद पिशाब का इशारा करके जाता है। छोटू चाय लेकर आता है।)
छोटू- चाय...।
विवेक- एक रख दे वह आ रहे हैं...। सुन.. तू पतंग उड़ाता है?
छोटू- ना।
विवेक- क्यों नहीं उड़ाता बे?
छोटू- टाईम नहीं है...।
विवेक- म्मताज़ भाई को जानता है?
छोटू- कौन म्मताज़ भाई?
विवेक- अरे जिनकी सराफे में पतंग की सुंदर दुकान है।
छोटू- सराफे में कोई पतंग की दुकान नहीं है....।
विवेक- तो उनकी पतंग की दुकान कहाँ है?
(आनंद आता है।)
आनंद- चाय दे।
(एक बार में चाय ख़त्म कर देता है।)
आनंद- चलें...।
विवेक- अभी तो पतंग का मौसम हैं गांव में..। तू उड़ाता है पतंग?
आनंद- नहीं..। चल म्मताज़ भाई इंतज़ार कर रहे होगें।
(दोनों साईकल पर बैठते हैं। आनंद कुछ देर सईकल चलाता है... विवेक उतर जाता है। उसके सामने आता है.. आनंद अभी भी साईकल चला रहा है।)
विवेक- आनंद.. मैंने जो तुझे पत्थर मारा था उसका निशान अभी भी तेरे माथे पर है... तुझे हमारे बचपन की कुछ याद है? कैसे हम लोग पतंग के पीछे भागा करते थे.. वह हमारे अंग्रेज़ी टीचर.. अवस्थी सर..? हाँ मुझे याद आया तेरी साईकल पर तेरे ही खेत से आम चुराने हम जाते थे...? तुझे कुछ याद है? शायद तुझे सब कुछ याद हो.. मुझे कुछ भी याद नहीं है... कुछ भी नहीं। तू बहुत बड़ा हो गया है.. यह गांव पूरी तरह बदल गया है... कुछ भी वैसा नहीं रहा... मैं.. मैं विवेक हो गया हूँ.. बिक्की बहुत पहले जल चुका है।
(विवेक वापिस साईकल पर बैठता है।...)
विवेक- अरे यह तो अवस्थी जी का घर है...? जहाँ सबसे ज़्यादा पतंग कटके जाया करती थी?
आनंद- हाँ.. अब यहाँ एक मॉल बन रहा है।
विवेक- मॉल और यहाँ?
आनंद- हाँ..मॉल और यहाँ। तू वापिस कब जा रहा है?
विवेक- आज शाम की ट्रेन है।
आनंद- कुछ दिन रुक जाता?
विवेक- असल में... यार तुझे तो पता है.....।
आनंद- जाने दे.. तू आ गया यह क्या कम है।
(एक जगह आकर आनंद अपनी साईकल रोकता है।)
विवेक- अरे यह म्मताज़ भाई का घर नहीं है।
आनंद- अब म्मताज़ भाई यहीं रहते हैं। मैं साईकल खड़ी करके आता हूँ.. तुम जाओ अंदर..।
Scene-13.
(विवेक वहीं खड़ा रहता है... बहुत धीमी आवाज़ लगाता है।)
विवेक- म्मताज़ भाई... म्मताज़ भाई..।
(आनंद वापिस आता है।)
आनंद- अरे तुम यहीं खड़े हो.. चलो आ जाओ। म्मताज़ भाई... बिक्की आ गया... म्मताज़ भाई.. आ जाओ।
(विवेक वहीं खड़ा रहता है। आनंद अंदर चला जाता है।)
आनंद- अरे म्मताज़ भाई यह क्या पहन लिया आपने.. अरे! क्या बचपना है? बिक्की.. तुम रुको वहीं... म्मताज़ भाई बाहर आ रहे हैं।
(भीतर से खटर पटर की आवाज़ आती है.. विवेक थोड़ा सहम जाता है.... वह देखता है कि उसकी बहन भीतर से भागती हुई बाहर निकलती है.. उसके पीछे बिक्की निकलता है.. बहन के हाथ में पतंग है... बिक्की उससे अपनी पतंग वापिस देने के लिए बोलता है...)
बहन- ले...ले... आ..जा...ले....।
बिक्की- पतंग वापस दे...?
बहन- तू पास आया तो फाड़ दूंगी... दूर रह..।
बिक्की- दे पतंग....।
( दोनों में लड़ाई होती है और पतंग फट जाती है... दोनों फटी हुई पतंग को आश्चर्य से देखते है मानों पहली बार पतंग फटी हो... फिर दोनों धूमकर विवेक को देखते हैं.. जो उन्हें देख रहा है.... बिक्की और बहन धीरे-धीरे खिसकते हुए एक कोनें में जाते है तभी आनंद म्मताज़ भाई को लेकर प्रवेश करता है। वह म्मताज़ भाई को धीरे-धीरे संभालते हुए बाहर लाता है। म्मताज़ भाई बहुत बूढ़े और दुबले हो चुके है लेकिन उन्होनें वही कपड़े पहने हैं .. सफेद लंबे कालर वाली शर्ट... सफेद बेलबाटम पेंट... और सफेद बड़ी हील के जूते... वह आनंद को वहीं रुकने को कहते हैं... और वह धीरे-धीरे चलते हुए विवेक के पास आते हैं। उसके सामने खड़े होकर पहले उसे देखते हैं।)
म्मताज़-क्या मिंया? क्या ख़्याल है?
विवेक- जी?
म्मताज़-क्या ख़्याल हैं मिंया?
(विवेक कोई जवाब नहीं दे पाता है।)
आनंद- ’इनके ख्याल दुरुस्त है म्मताज़ भाई।
विवेक- हाँ.. ख्याल दुरुस्त हैं म्मताज़ भाई, ख़्याल दुरुस्त हैं।
म्मताज़-अरे मिंया क्या बात है!! तुम तो बिलकुल नहीं बदले.. बस थोड़ा वज़न बढ़ा लिया है अपना।
विवेक- जी!!!
म्मताज़-अरे आनंद.. ज़रा बैठने की व्यवस्था करों मिंया, इतनी दूर से आए हैं बिक्की मिंया थक गए होंगे।
(आनंद भीतर जाकर एक खाट ले आता है और एक टिन का ढिब्बा जिसपर उसे बैठने का इशारा करता है।)
विवेक- अरे म्मताज़ भाई अंदर ही चलकर बैठते हैं।
म्मताज़-अरे वहाँ कहाँ अंधेरी कोठरी में बैठोगे.. यहाँ आंगन में बैठते हैं. खुले में। आनंद ज़रा बज़ार से जलेबीयाँ उठा लाओ कुछ!!
विवेक- म्मताज़ भाई इसकी कोई ज़रुरत नहीं है।
(आनंद चला जाता है।)
म्मताज़-मुँह तो मीठा कर लो? फिर बातें करेगें।
विवेक- म्मताज़ भाई आप तो बिल्कुल नहीं बदले.. आप बिलकुल वैसे ही....
म्मताज़-बदल गया हूँ मिंया... बहुत बदल गया हूँ... इन हड़्डीयों पर यूं समझों कि चमड़ी लटाए घूम रहा हूँ.. अपनी पतंग बहुत झोल खा रही है.. कभी भी टूट जाएगी। बैठो मिंया...।
विवेक- घर में और कोई नहीं है?
म्मताज़-नहीं... तो शादी हो गई तुम्हारी?
विवेक- हाँ.. तनु है उसका नाम। बंबई की लड़की है। अच्छी है।
म्मताज़-अच्छी ही होगी मिंया.. हमारे बिक्की की पसंद है.. खुश हो?
विवेक- हाँ... बहुत खुश हूँ।
म्मताज़-पतंग उड़ाते हो मिंया कभी-कभी?
(विवेक चुप हो जाता है। म्मताज़ भाई उसे देखते रहते हैं... वह चुप रहता है। वह धीरे से म्मताज़ भाई के पास आता है.. और उनके गले लग जाता है।)
बिक्की- पतंग के बारे में क्या कहूं म्मताज़ भाई? एक शाप सी वह मेरे जीवन से चिपकी हुई है। जब भी रास्ते में, बाज़ार में.. आसमान में पतंग को उड़ते हुए देखता हूँ तो आप ही याद आते हो। आप, मेरे म्मताज़ भाई...और याद आता है अपना पूरा बचपन.. लानत है मुझपर कि मैं किसी को भी नहीं बता पाया कि मेरा एक गांव है... और उस गांव में मेरे एक म्मताज़ भाई हैं... जो इस दुनियाँ के सबसे बड़े पतंगबाज़ हैं।
विवेक- नहीं म्मताज़ भाई पतंग कहाँ उड़ा पाता हूँ समय ही नहीं मिलता... बंबई तो आप जानते ही हैं.. रोटी की दौड़ में ही सारा समय कट जाता है।
म्मताज़-रोटी नहीं मिंया... ब्रेड़ और बटर में... हाँ वैसे भी पतंग तो आसमान की बात है... ज़मीन पर भागते रहने से आसमान की सुध कोई कैसे ले सकता है?
विवेक- आपकी पतंगबाज़ी कैसी चल रही है?
म्मताज़-मिंया पतंगबाज़ी कभी की जीवन से नदारद है... पतंगबाज़ी का किस्सा तो उसी दिन तमाम हो गया था जिस दिन अपनी दुकान जली थी। भाई की साईकल की दुकान पर काम कर-कर के पूरा कर्ज़ा उतारा मिंया..। दिमाग़ में पतंग हाथ में मड़गाड़...हा..हा..हा... साईकल की दुकान में मन नहीं लगा कभी..। सोचा था धीरे-धीरे पैसे जमा करुगाँ और फिर से पतंग की दुकान खोलूंगा? आज तक उसी की प्लानिंग कर रिया हूँ। मिंया यह पतंगबाज़ी ऎसी बला है कि छूटे नहीं छूटती... पर खोलूंगा मिंया.. खुदा हाफिस करने से पहले पतंग की दुकान खुलेगी.. तुम आना आपनी बीबी बच्चों के साथ पतंग लेने... बहतरीन काली पतंग दूंगा लाल तुर्रे वाली।
(म्मताज़ भाई ख़ांसना चालू करते हैं... विवेक उन्हें लिटा देता है।)
विवेक- पानी लाऊं?
(म्मताज़ भाई मना कर देते हैं। विवेक का फोन बजता है।)
विवेक- हेलो मनोज बोल... हाँ... अबे मै बंबई में नहीं हूँ.. अपने गांव आया हुआ हूँ.. नहीं अभी जोक नहीं सुन सकता.. सुन ना.. नहीं सुन सकता हूँ जोक भाई.. नहीं मैं फिल्म देखने भी नहीं आ पाऊँगा.. अबे बंबई में नहीं हूँ तो कैसे आऊंगा फिल्म देखने..। तनु को घर पर फोन करके पूछ ले..। गांव आया हुआ हूँ.. ऎसे ही..। अबे कोई प्रापर्टी बेचने नहीं आया.. यूं ही आया था..। मैं तुझसे बाद में बात करता हूँ.. बाद में.. अरे तू समझ नहीं रहा है.. बाद में ना.. अच्छा सुना एक जोक.. जल्दी सुना....।
(विवेक जोक सुनने लगता है.. तभे आनंद आता है.. वह जलेबीयाँ रखकर भीतर से पानी लाता है.. म्मताज़ भाई की ख़ांसी थोड़ी रुक जाती है। विवेक अभी भी फोन पर है..।)
विवेक- सुन तू sms कर दे.. मैं पढ़ लूंगा... अरे बहुत लंबा जोक़ है.. खत्म हो गया? अच्छा था.. बाय.. ठीक है sms कर दे.. बाद में बात करता हूँ।... sorry..। इनको अचानक ख़ासी आ गई तो.. मैंने पूछा था पानी के बारे में.. पर इन्होंने मना कर दिया।
आनंद- लो जलेबी खालो..।
(विवेक एक जलेबी लेता है और म्मताज़ भाई के बगल में बैठ जाता है।)
आनंद- लीजिए.. जलेबियाँ... गरम-गरम हैं.. चख़ लें?
(म्मताज़ भाई उठके बैठ जाते हैं..)
म्मताज़-अरे यह ज़ालिम जलेबीया... इन्हीं का आसरा है... वाह!!!
(तभी म्मताज़ भाई विवेक का हाथ पकड़ लेते हैं...उसे जलेबी खाने से रोक देते हैं।)
म्मताज़-रुको मिंया... वह जली हुई है..।
विवेक- क्या?
म्मताज़-जली हुई है वह जलेबी.. यह खाओ।
(विवेक वह जलेबी खा लेता है।)
बिक्की- विवेक.. तुम्हें जलने की बदबू नहीं आ रही है?
विवेक- अरे अजीब सी जलने की बदबू आ रही है।
आनंद- यहाँ पीछे किसी ने कूड़े में आग लगा दी होगी।
विवेक- अच्छा? अजीब सी घबराहट हो रही है इस बदबू से...
आनंद- अभी कुछ देर में चली जाएगी।
विवेक- हाँ.. रुक मैं देखकर आता हूँ।
म्मताज़-तू आ गया मुझे बहुत अच्छा लगा। क्या कहा था आनंद मिंया एक फोन करोगे भागा हुआ आएगा वह.. पतंगबाज़ बाज़।
आनंद- हाँ म्मताज़ भाई।
म्मताज़-जब मैं बहुत छोटा था ना तब मैं पतंग के पीछे पगलाया फिरता था...पर मिंया यक़ीन करो कभी उड़ा नहीं पाया.. कभी नहीं। अब्बा की साईकल की दुकान पर काम करता था.. और अब्बा ऎसे कि एक बार देख ले... मैं वहीं मूत देता था। जब छोटा था तो सिर्फ पंचर बनाना जानता था फिर धीरे-धीरे मड़गाड़ लगाना.. स्पोक बनाना..सीखा.. और जैसे ही पूरी साईकल बनाना आया तब तक मैं बड़ा हो चुका था। तब तक मेरी पतंग उड़ाने की इच्छा भी मेरी तरह जवान हो चुकी थी। अब्बा ने मेरी जवानी देखकर मेरी शादी कर दी। सुहाग रात के दिन मैं अपनी बेग़म से दूर बैठा था। मेरी बेग़म बहुत इस्मार्ट थी मिंया... बहुत देर के इंतज़ार के बाद उसने पूछ लिया “क्या चाहते हो मिंया..?” पहली बार ज़िदग़ी में किसी ने मुझसे पूछा था “क्या चाहते हो मिंय़ा?” मैंने कहाँ ’पतंग.. पतंग... और सिर्फ पतंग।“
(विक्की म्मताज़ भाई के बगल में जाकर बैठ जाता है। विवेक दूर ही खड़ा रहता है। धीरे से विवेक जाकर बिक्की की जगह बैठ जाता है और बिक्की उस जगह से हट जाता है।)
म्मताज़-यह मिंया मुझे अपने बचपन की याद दिलाते थे... जैसा पतंग के पीछे मैं पागल था यह भी वैसे ही पगले थे..। बहुत दिनों से पतंगबाज़ी की बड़ी इच्छा हो रही थी... तो तेरी याद आ गई..... आनंद से कहाँ कि ’देख पता तो कर मेरा पतंगबाज़ कहाँ है...’ और यह देख तू मेरे सामने बैठा है।
आनंद- हाँ म्मताज़ भाई।
म्मताज़-पतंग उड़ाए?
विवेक- क्या?
म्मताज़-पतंग उड़ाए अभी?
विवेक- इस वक्त?
म्मताज़-हाँ।
आनंद- म्मताज़ भाई ने काली पतंग लाल तुर्रे के साथ मंगवा कर रखी हुई है तेरे लिए।
विवेक- चलो म्मताज़ भाई.. आ... उड़ाते हैं।
म्मताज़-रुक मैं ज़रा कपड़े बदल लूं.. इस बुढ़ापे में इन कपड़ों में ज़्यादा देर रहा नहीं जाता... मैं अभी आया।
आनंद- धीरे...आराम से...
म्मताज़-अरे तू बैठ मैं चला जाऊंगा। अभी पतंग में जोते भी बांधने हैं.. आया मैं...
(म्मताज़ भाई अंदर चले जाते हैं। विक्की टहलने लगता है। वह बार बार बिक्की को देखता है.. बिक्की म्मताज़ भाई के पीछे-पीछे चला जाता है।)
आनंद- बहुत चाहते हैं तुझे म्मताज़ भाई...।
विवेक- हाँ... । यार मुझे बड़ी धबराहट हो रही है। यह जलने की बदबू जा ही नहीं रही है।
आनंद- मुँह धो ले.. मुझे तो नहीं आ रही है बदबू।
विवेक- यहीं कहीं... आस-पास ही कहीं से...
आनंद- छोड़ ना...
विवेक- सुन.. मैं जाना चाहता हूँ।
आनंद- क्या? कहाँ?
विवेक- वापिस.. स्टेशन..
आनंद- मतलब.. अभी टाईम है तेरी ट्रेन में...।
विवेक- सुन तू बस मुझे स्टेशन पर छोड़ दे... मैं जाना चाहता हूँ.. मैं जाना चाहता हूँ।
आनंद- अरे म्मताज़ भाई क्या सोचेगें... कुछ देर...।
विवेक- नहीं.. अभी.. इसी वक्त मुझे जाना है। मैं जाना चाहता हूँ... चल वरना मैं चला जाऊंगा।
(आनंद कुछ देर रुकता है.. एक बार म्मताज़ भाई का दरवाज़ा देखता है... एक बार विवेक तरफ देखता है।)
आनंद- चल।
(black out)
Scene-14.
(विवेक स्टेशन पर अकेला बैठा हुआ है। कुछ चाय वाले.. अखबार वाले निकलते हैं। वह बहुत बोर हो रहा है। वह तनु को फोन लगाता है।)
विवेक- तनु.. हेलो.. कैसी हो? स्टेशन पर हूँ.. हाँ मिल लिया म्मताज़ भाई से। अच्छे है वह। हाँ आनंद भी ठीक है। बस... हाँ मलतब बस मिल लिया और क्या होगा??... कोई ख़ास बात नहीं हुई बस यहाँ वहाँ की.. ऎसे ही.. तुम ठीक हो। मैं ठीक हूँ भाई (चिल्ला देता है।) चलो सुबह मिलता हूँ। ओके.. bye.
(फोन काटने के बाद कुछ देर बैठा रहता है। फिर मनोज को फोन करता है।)
विवेक- हाँ बे मनोज.. अब सुना तेरा जोक.. उस समय थोड़ा बिज़ी था। अबे सुना ना... अच्छा नया है... सुना.. अच्छा..अच्छा.... हा..हा...हा..हा...हा...हा.....................।
(विवेक ज़ोर-ज़ोरसे हंसने लगता है... उसकी हंसी बढ़ती जाती है और धीरे-धीरे अंधेरा हो जाता है।)
BLACK OUT….
THE END…

1 टिप्पणी:

  1. ये भी बड़ा मौज वाला नाटक लग रहा है। नाटक पढ़ने से ज्यादा आनंद नाटक देखने में आता है। इसे भी विशलिस्ट में डाल लिया है जी।

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