रविवार, 12 मार्च 2017






aRANYA Presents,














    चुहल...



















                                                   Written & Directed by- manav kaul




Scene-0

MUSIC फेड इन होता है.......लाईट आती है तो हमें चार (या ज़्यादा भी हो सकती हैं) लड़कियाँ म्युज़ियम नुमा जगह में बुत बनी खड़ी दिखाई देती है..एक लाईने में...। कुछ बच्चे स्कूल ड्रेस में मूज़ियम देखने आते है और एक कोने में कुछ शोर गुल के बाद चुप चाप खड़े हो जाते हैं। एक केरिकेचरिश सा आदमी म्योज़ियम का पर्चा लेकर दूसरी तरफ से आता है। कुछ देर सारी लड़कियों को निहारने के बाद उसे पता लगता है कि कोई केमरा नहीं लगा है... और कोई वॉचमेन भी नहीं है निगरानी को..। वह धीरे धीर लड़कियों को छूना शुरु करता है...। कभी अपनी उंगली से तो कभी उस तरीके से जैसे भीड़ भरी बस में पुरुष औरतों को छूते हैं... जैसे ही वह किसी भी लड़की को छूता है लड़कियाँ पेडुलम की तरह हिलने लगाती हैं। लगभग हर उम्र की महिलाए हैं.... जब वह सबसे आगे की लड़की तक पहुँचता है तो बाक़ी सारी लड़कीयाँ पेंडुलम की तरह हिल रही हैं... वह उस लड़की को तेज़ घक्का देने लगता है वह कुछ देर में  गिर जाती है। वह आदमी घबराकर यहाँ वहाँ देखता है... बच्चे भी डर जाते हैं...  एक एक करके सारी लड़कियाँ गिरने लगती हैं। वह आदमी भाग जाता है... बच्चे भी सारे घबराकर भाग जाते हैं... आखरी औरत गिरने को होती है... हम ब्लैक आऊट करते हैं।

Scene-1

(ब्लैक आऊट में हमें गाना सुनाई देता है... यह गाना निम्मी गा रही है। गाना ख़त्म होते तक लाईट आ जाती है.. हम देखते हैं कि संन्नाटे में सुधीर, निम्मी (सुधीर की बहन) और माँ (आरती की माँ) बैठे हैं।)

निम्मी-  गाना ख़त्म हो गया!!

(कोई कुछ नहीं कहता.. निम्मी सुधीर को आँख दिखाती है.. सुधीर झिझकर ताली बजाता है।)

सुधीर-  हम लोग चलें...? बहुत देर हो चली है... शायद वह कहीं फस गई होंगी।
माँ-       फसेंगी क्यों?
निम्मी-  मतलब अटक गई होगीं..।
माँ-       अटक गई होगी? वह क्यों अटकेगी?
निम्मी-  नहीं... असल में...!!
माँ-       क्या?
सुधीर-  आंटी हमारी ना आख़री बस का टाईम भी हो रहा है। अभी नहीं.... पर कुछ देर में...
निम्मी-  भईया इतना मज़ा तो आ रहा है...।
सुधीर-  मज़ा?
माँ-       क्यों आपको ठीक नहीं लग रहा यहाँ?
सुधीर-  नहीं नहीं आंटी...  ऎसी बात नहीं है.. बहुत सही है.. सब!
माँ-       वह बस आती ही होगी।
निम्मी-  तब तक मैं एक गाना ओर गा देती हूँ।
माँ-       नहीं..!
सुधीर-  निम्मी थोड़ा रुक भी जाओ।
निम्मी-  अच्छा ठीक है तो आप ही गा दीजिये...
माँ-       मैं?
सुधीर-  निम्मी तुम्हारा दिमाग़ ठीक है? हम यहां लड़की देखने आए हैं और तुम आंटी से कह रही हो कि गाना सुनाओं?
निम्मी-  नहीं नहीं भईया...मैं तो असल में..
माँ-       मैं गाती हूँ ....... सुनाऊँ..
सुधीर-  जी!!? हाँ हाँ...
निम्मी-  सुनाईये ना... बिंदास... !

(माँ गाना सुनाने लगती हैं..... वह आलाप लेती हैं तभी सब कुछ शांत हो जाता है... दरवाज़े की तरफ से लाईट बढ़ती है और सुधीर उस तरफ देखता है और दर्शकों से कहता है।)



सुधीर-  कुछ बदलने वाला है...हे ना? यह आहट  बरबस हम तक पहुँच जाती है। जैसे सालों से थमें हुए तालाब के किनारे हम बरसों-बरस इंतज़ार कर रहे थे... तभी एक कंकड़ कहीं से आकर गिरता है , लहरें उठती हैं, और हमें पता चलता है कि इस थमें हुए तलाब के भीतर कितना कुछ था जो हरकर कर रहा था...  और कुछ भी वैसा नहीं रहता जो सालों से चला आ रहा है... ठीक उस क्षण, सब कुछ बदल जाता है।

 (आरती भागती हुई भीतर आती है। सुधीर खड़ा होकर नमस्ते करता है.. बाक़ी सभी बैठे रहते हैं.. सुधीर को अजीब लगता है और वह तुरंत बैठ जाता है।)
आरती-
sorry office में थोड़ी देर हो गई, मैं बस मुँह धोकर आती हूँ।
(आरती भीतर चली जाती है।)
सुधीर-  (निम्मी से) मैं खड़ा हो गया था।
निम्मी-  क्या ?
माँ-       अचानक ऑफिस में कोई ज़रुरी काम आ गया होगा सो इसे जाना पड़ा।
निम्मी-  तो आरती संड़े को भी काम करती हैं?
माँ-       अरे प्रायवेट कंपनी है... जब काम बढ़ जाता है तो जाना पड़ता है, पर कभी-कभी।
(आरती बिना मुँह धोए वापिस आ जाती है।)
माँ-       बेटा आओ बेठों.. बड़ा मज़ा आ रहा था.. हे ना?
सुधीर-  जी!

(सुधीर और निम्मी एक साथ कहते हैं...’हाँ.. बिल्कुल।’)

माँ-       यह सुधीर है, पास ही के गाँव में... गाँव में...
सुधीर-  मैं स्कूल में टीचर हूँ।
निम्मी-  अरे... सरकारी स्कूल में!
माँ-       हाँ टीचर हैं। मैं ज़रा कुछ खाने को बनाती हूँ... तुम लोग बैठके आराम से बातें करो।(माँ भीतर चली जाती है।)
निम्मी-  अरे वाह!
सुधीर-  निम्मी हमें तो निकलना.....?
निम्मी-  अरे आंटी...हमें थोड़ी जल्दी है। आखरी बस निकल जाएगी।
माँ-       (भीतर से ही) अरे बस अभी हो जाएगा।  
निम्मी-  फिर ठीक है...।
(निम्मी की कुछ समझ में नहीं आता कि वह बात कहाँ से शुरु करे। कुछ देर की चुप्पी के बाद..)
निम्मी-  मैं निम्मी....
आरती- मैं आरती..
निम्मी-  यह मेरे भाई...
आरती- जी!
निम्मी-  आप गाना गाती हैं?
सुधीर-  निम्मी नहीं!!
निम्मी-  भईया ज़रा बात करने दो। (तंज़ में)
आरती- तुम गाती हो?
निम्मी-  बिल्कुल.. मैं तो...
आरती- तो सुनाओ।
निम्मी-  सुनाऊँ?
माँ-       (निम्मी पहला सुर लगाती है तभी भीतर से माँ की आवाज़ आती है।) निम्मी ज़रा मेरी थोड़ी मदद करा दोगी।
निम्मी-  जी.... आई.... गाना तो रह ही गया। चलो बाद में...।

(निम्मी सुधीर को आँख दिखाकर  भीतर चली जाती है। सुधीर और आरती कुछ देर असहज चुप्पी में रहते हैं।)

सुधीर-  हमारे यहाँ यह एक पागल है..।
आरती- यह एक ही..

(अचानक आरती के मुँह से निकल जाता है.. सुधीर की समझ नहीं आता वह क्या करे।)

आरती- आप हंसे क्यों थे? जब मैं आई थी?
सुधीर-  आपने देख लिया था..? sorry.. असल में...।
आरती- क्या असल में?
सुधीर-  मैं बताऊँ आपको?
आरती- जी।
सुधीर-  आप मुँह धोने भीतर गई थी ना?
आरती- हाँ।
सुधीर-  पर आपने मुँह तो धोया ही नहीं?
आरती- हाँ... मुझे लगा क्या मुँह धोना।

(दोनों कुछ देर तक शांत रहते हैं।)

आरती- आपको पसीना बहुत आता है?

(सुधीर जेब में रुमाल टटोलता है तो उसे पता चलता है कि वह रुमाल नहीं लाया .. तो वह अपनी शर्ट से पसीना पौछता है।)

सुधीर-  नहीं... युं नहीं आता है.. पर... अभी... मुझे ना इसकी आदत नहीं है।
आरती- पसीने की?
सुधीर-  नहीं...यह इस तरह.. आना... और... मुझे अजीब लगता है।
आरती- तो क्यों आए?
सुधीर-  पता नहीं। माँ हैं नहीं.... और बापू और निम्मी लगातार मेरी शादी की चिंता में रहते हैं। उनको लगता है कि मेरे चुप रहने का कारण मेरा अकेलापन है।
आरती- क्या वह सही हैं?
सुधीर-  पता नहीं। शायद हो भी।
आरती- अच्छा....आप शादी नहीं करना चाहते।
सुधीर-  मैं बिल्कुल करना चाहता हूँ.. पर यह तरीके देखिए ना कितने  डरावने हैं। मतलब ऎसे आकर बैठना और... फिर....  मैं आपसे एक बात और कहना चाहता हूँ.. मना करने में आप ज़्यादा समय नहीं लेना... मुझे वह दिन बड़े डरावने लगते हैं।
आरती- कौन से दिन?
सुधीर-  वह मना करने के पहले वाले दिन होते है ना... वह।
लगता है जैसे एक लंबी परिक्षा चल रही है...। बुख़ार बना रहता है।
आरती- बुख़ार?
सुधीर-  हाँ, मुझे तो परिक्षा के नाम से ही बुख़ार आ जाता था।
आरती- और अब आप स्कूल में टीचर हैं।
सुधीर-  देखो त्रासदी...।
आरती- त्रासदी या बदला.? आप अब टीचर हो गए हैं वहाँ, जहाँ कभी परिक्षा दिया करते थे।

( तभी माँ भीतर से आती है।)
माँ-       बेटा यह टेस्ट कर लेना ठीक है क्या? असल में घर में सब कुछ यह ही बनाती है.. तो.. मुझे कुछ भी काम नहीं करने देती है....
आरती- माँ...... माँ... ठीक है।
(माँ वापिस भीतर चली जाती है।)
आरती- माँ झूठ बोल रही थी।
सुधीर-  आपको यह मुझे बताने की कोई ज़रुरत नहीं थी।
आरती- मुझे झूठ पसंद नहीं है।
सुधीर-  तो आपको क्या पसंद है?
आरती- क्या कीजिएगा जानकर?
सुधीर-  कुछ नहीं... अगर कुछ किया जा सकता है तो बता दीजिए।
आरती- किस बारे में..?
सुधीर-  आपकी पसंद जानकर अगर कुछ किया जा सकता है... तो बता दीजिए?
आरती- नहीं....कुछ भी नहीं किया जा सकता है।

(चुप्पी..)

आरती- आपको कैसे लगता है कि मैं मना ही कर दूंगी।
सुधीर-  मना ही होता है... पर.. अगर...
आरती- अगर आपको बुरा ना लगे तो क्या हम बाहर बरामदे में चलें..।
सुधीर-  बरामदे में?
आरती- हाँ... मैं आपसे बात करते-करते पौधों को पानी भी दे दूगीं?
सुधीर- हाँ क्यों नहीं... चलिए।
(आरती भीतर जाकर पानी लेकर आती है... पौधो में पानी डालती रहती है।)
सुधीर-  आपके लिए क्या यह बहुत आम बात है?
आरती- हाँ!!!
सुधीर-  मेरे तो हाथ पैर ठंड़े पड़ जाते हैं।
आरती- पौधों को पानी डालने में?
सुधीर-  नहीं मैं तो इस तरह आने की बात कर रहा हूँ। मतलब इस तरह आना...
आरती- मैं समझ गई थी... मैं तो बस चुहल कर रही थी।
(वक़्फा)

(
सुधीर हंसने लगता है।)
सुधीर-  मुझे अच्छा लगा आपसे मिलकर... धन्यवाद।
आरती- किस बात का?
सुधीर-  यह चुहल का... मैंने कभी ऎसा सोचा नहीं था कि.. ऎसी परिक्षा की घड़ी में कोई चुहल भी हो सकती है।
आरती- ऎसे सोचिए ना कि चलो इस बहाने कम से कम पता तो लग गया कि इस धरती पर कहीं कोई आरती है और कहीं कोई ....
सुधीर-  सुधीर...
आरती- सुधीर है।
सुधीर-  हाँ.... आरती और सुधीर हैं।
आरती- आप गाना गाते हैं?
सुधीर-  कतई नहीं... अच्छा...! आप गाती हैं?
आरती- नहीं ।
सुधीर-  अच्छा? तो फिर आपने...?
आरती- आपको बच्चे अच्छे लगते हैं?
सुधीर-  शादी के बाद अगर एक हो तो ठीक है...  पर अगर आप दो चाहती है तो हम उसपर बात कर सकते हैं... मेरी माँ को भी.. दो...
आरती- नहीं.. नहीं नहीं... वैसे नहीं... आप बच्चो को पढ़ाते हैं ना इसलिए पूछा... आप तो माँ पर चले गए?
सुधीर-  अच्छा???? स्कूल में तो बच्चॆ ... बहुत है और बहुत बच्चे जब एक साथ आते हैं तो... अच्छॆ..

(तभी पीछे से माँ और निम्मी पकोड़े लेकर आते हैं।)

माँ-       अरे यह लोग कहाँ गए?
निम्मी-  वह बाहर है।भईया आईये गरमा गरम पकोड़े...।

(भीतर आते हुए आरती, सुधीर का हाथ पकड़कर उसे रोक लेती है।अपने पास ख़ीचती है.. कुछ देर दोनों एक दूसरे को देखते रहते हैं.... फिर आरती कहती है..)

सुधीर-  सुनिये मैं माफी चाहता हूँ.. मुझे लगा था कि आप दूसरे बच्चों की....
आरती- सुनिये....
सुधीर-  जी?
आरती- आप जवाब का इंतज़ार मत करिएगा... यह शादी नहीं हो सकती है।
सुधीर-  क्यों?
आरती- आप अभी जानना चाहते हैं?
सुधीर-  नहीं...
आरती- नहीं..
सुधीर-  नहीं...
आरती- ठीक है।
(आरती भीतर जाती है सुधीर वहीं खड़ा रहता है.... वह दर्शकों को देखता है।)

सुधीर-  एक बार मैंने खुद को ’चमत्कृत सा’ ताजमहल के सामने खड़ा पाया। मेरे चख़े अनुभवों के बाहर वह अनुभव था। मैं देर तक उसके गोल-गोल चक्कर काटता रहा... अचानक मुझे लगने लगा कि... बहुत भीतर एक संबंध मैं ताजमहल के साथ महसूस कर रहा हूँ, यह ताजमहल सिर्फ मेरा है। जब उसे बाक़ी लोग देख रहे थे, फोटो ख़ीच रहे थे,छू रहे थे तो मुझे घंनघोर जलन महसूस हो रही थी...। मैं इसे अपने साथ ले जाना चाहता था, अपने घर..।
बाद में मैं अपने घर एक छोटा सा ताजमहल खरीद कर ले आया... बहुत सालों तक वह टीवी के ऊपर रखा रहा फिर, आलमारी के ऊपर.. फिर कहीं गिर के टूट गया या  कहाँ गुम हो गया.. मुझे याद भी नहीं।

(सुधीर भीतर जाता है... माँ पकोड़े देती है उसे वह उस पकोड़े को देखता है... आरती कहती है।)
आरती- देख क्या रहे हैं....खाईये!
(सुधीर आश्चर्य से आती को देखता है.. दोनों एक दूसरे को कुछ देर देखते रहते हैं... निम्मी को कुछ अजीब लगता है... वह धीरे से एक रुमानी गाना शुरु करती है। माँ और सुधीर दोनों एक साथ निम्मी को कहते हैं.... “नहीं....” )

Black out…

 
Scene- 2.

(एक छोटे मोनटार्ज से सीन शुरु करते हैं जिसमें आरती एक व्यस्त प्रायवेट कंपनी केऑफिस में काम कर रही है...। तभी सुधीर प्रवेश करता है। सुधीर आरती की टेबल के सामने आकर खड़ा हो जाता है पर आरती उसे देख नहीं पाती। चपरासी चाय लेकर आरती के बगल में खड़ा है वह आरती को कहता है।)
चपरासी-आरती... कोई तुमसे मिलने आया है।
आरती- कहिए क्या काम है?
सुधीर-  काम तो ख़ास नहीं है।
आरती- अरे! आप? बैठिए मैं आती हूँ।

(आरती भीतर जाती है...  वह चपरासी सुधीर को घूर रहा होता है... इशारे से चाय पूछता है सुधीर घबराहट में मना कर देता है।आरती कुछ देर में वापिस आती है और सुधीर के सामने बैठ जाती है। वह चपरासी अभी भी सुधीर को घूर रहा है। सुधीर आरती के देखकर हंस देता है।)

आरती- अरे आप फिर हंस रहे हैं?
सुधीर-  आप फिर मुँह धोकर नहीं आई।
आरती- मैं मुँह धोने नहीं गई थी। तो बताईये कैसे आना हुआ?
सुधीर-  क्या हम यहीं बात करें?
आरती- क्यों यहाँ क्या बुराई है..?
सुधीर-  नहीं यहाँ भी बात की जा सकती है...
आरती- हाँ.. बोलिए..।
सुधीर-  आरती देखो मैं जो ... तुमसे...
आरती- ओह! आप किसी का काम करवाने आए हैं..? सुधीर यह प्रायवेट कंपनी है...  मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती.. और रिश्वत तो..
सुधीर-  अरे! मैं किसी का काम करवाने नहीं आया हूँ.. मैं तो आपसे...
आरती- मुझसे क्या?
सुधीर-  आपसे कहने आया था कि मेरी शादी तय हो गई है।
चपरासी-(थोड़ी देर की चुप्पी के बाद..) मुबारक हो... (मुबारक़ हो कहकर चपरासी चल देता है।)
आरती- ओह!!! आप कुछ देर बाहर बैठिए.. मैं आती हूँ...।

(सुधीर उठकर बाहर जाता है.... आरती.. अपने काम में लग जाती है.. उसका काम में मन नहीं लगता.. वह अपना पेन पटक देती है और फाईल बंद कर देती है।)

आरती- (दर्शकों से..) “कितनी अच्छी लड़की है यह....”   मैंने बहुत पहले ’कितनी अच्छी लड़की है यह’ इस नाम की  एक दुकान खोली थी वह जो किराने की दुकान होती है ना जिसमें जो आप चाहें आपको वह सब मिलता है... बिल्कुल वैसी। मुझे लगता था मैं जो बेचती हूँ वही लोग ख़रीदना चाहते हैं... फिर बहुत बाद में पता चला कि असल में जो लोग ख़रीदना चाहते हैं मैं तो वहीं बेच रही हूँ... यह बज़ार है... यहां डिमांड है और सप्लाई है... और इतिहास में हमारे जैसे थोक से थे...मैं तो बस उसे फुटकर में बेच रही हूँ...। इस सब में मैं क्या चाहती हूँ? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था।  तो एक दिन मैंने अपनी दुकान के शटर गिरा दिए...। बस.. अब मैं किसी को कुछ भी नहीं बेच रही हूँ।   

(तब तक दृश्य बदलता है और वह दिनों एक कैफे में बैठें हैं।)

वेटर-    सर भीड़ बहुत थी आपका आर्डर सुन नहीं पाया....
सुधीर-  मैंने कहा था दो चाय शक्कर कम...
वेटर-    जी अभी लाया।
आरती- अंत में आपको कोई लड़की मिल ही गई जिसने तुरंत हाँ कह दिया..?

(सुधीर चुप रहता है...।)

आरती- क्या हुआ? आप तो शादी करना चाहते थे... सब ठीक है!!!
सुधीर-  हाँ... मैं खुद यही सोच रहा था... पर फिर
guilt क्यों हो रहा था यह समझ में नहीं आया।
आरती- किस बात का
guilt?
सुधीर-  जिस दिन मैं आपसे मिला था उस दिन कुछ हुआ था। मतलब ऎसा कुछ हुआ नहीं था.... बस मैं कुछ भरोसे में था.. मेरी गलती है...। पर उस भरोसे की वजह से एक संबंध आपसे बन गया था...। इस संबंध में मैंने पहली बार अपनापन महसूस किया था... सो.. आप समझ रही होगीं मैं कैसा पागल हूँ।
आरती- हाँ...
सुधीर-  जी?
आरती- हाँ वही सोच रही हूँ
कि कितने पागल हो
सुधीर-  मैं माफी चाहता हूँ।

(दोनों कुछ देर शांत बैठे रहते हैं। )

आरती- तो कबकी है शादी?
सुधीर-  अभी डेट तय नहीं है पर वह कह रहे हैं कि जल्दी करना चाहते हैं।
आरती- तो लड़की ने हाँ बोल दिया?
सुधीर-  क्यों तुम्हें आश्चर्य हो रहा है?
आरती- नहीं अधिक्तर तुम परिक्षा में बैठते हो... इसलिए पूछा।
सुधीर-  इस बार मैं टीचर था... हाँ और ना मेरे हाथ में था।
आरती- तो तुमने हाँ कर दिया।
सुधीर-  हाँ मैंने कहा ना शादी तय हो गई है।
आरती- लड़की ने हाँ कह दिया... तुमने भी हाँ कह दिया ...तो मुझसे मिलने क्यों आए हो?
सुधीर-  इंमानदारी की बात है कि मुझे लगा एक आख़री चांस ले लेता हूँ.... अपने मन की पूरी बात आपसे कह दूंगा और आपसे पूरी बात सुन लूंगा.. तो कम से कम... हे ना।
आरती- (आरती हँसने लगती है) चुप हो जाओ.. चुप हो जाओ...।
सुधीर-  सॉरी !! सॉरी!!
आरती- यूं लगता है मानों शादी करने के लिए पैदा हुए थे!!
सुधीर-  वैसे टीचर बनने के लिए भी पैदा नहीं हुआ था।
आरती- तो पूरी ज़िदगी
compromise ही करोगे?
सुधीर-  एक बार सोचा
compromise नहीं करके देखता हूँ तो देखो कितनी डॉट ख़ा रहा हूँ।
आरती- मैं डॉट नहीं रही हूँ।
सुधीर-  हम बातचीत भी कहाँ कर रहे हैं? (दर्शकों से...) सब गड़बड़ हो गया...। (उठकर दर्शकों के करीब जाता है।) यह जो सॉप सीढ़ी का खेल है ना.. यह खेल बड़ा अजब है। कभी सीढ़ी मिलती है और कभी सांप... आपको क्या लगता है कि आप ऊपर की तरफ जा रहे हैं... एक बार सबसे ऊपर पहुंच गए तो इस गोल-गोल चक्कर से छुटकारा.. पर इस गोल गोल चक्कर से छुटकारा कभी नहीं है..। हम हर बार पासा फैंकते है.. और हर बार एक नंबर से रह जाते हैं। वो ९९ वें वाला साँप सामने मुँह बाए सामने खड़ा दिखता है और यह खेल फिर शुरु होता है...।. अब आप ही बताईये क्या करें?
आरती- मतलब?
सुधीर-  (वापिस आरती के पास) मतलब, मैं टीचर हूँ ... क्यों हूँ पता नहीं। बच्चे उतने अच्छे नहीं लगते पर उनके बीच घिरा रहता हूँ... स्कूल छोटे गांव में है और वहां कुछ भी करने को नहीं है.. बस हर शाम जाकर हनुमान टेकड़ी पर बैठ जाता हूँ। सुबह लगता है कि एक सीढ़ी मिल गई है अब ऊपर चढ़ जऊंगा.. पर शाम होते-होते साँप ड़्स लेता है और मैं वापिस वहीं का वहीं...।
आरती- तुम्हारे घर में सांप हैं? 
सुधीर-  नहीं मैं वह सांप सीढ़ी वाले सांप की बात कर रहा था।
आरती- मैं समझी नहीं...तुम घर में अकेले बैठकर सांप सीढ़ी खेलते हो..?

वक़्फा...

आरती- क्या हुआ?
सुधीर-  कुछ नहीं।
आरती- सॉरी.... मैं समझ गई तुम जो कहना चाहते हो।
सुधीर-  अब इसमें तुम पूछती हो कि पैदा क्यों हुआ हूँ...? मुझे नहीं पता.. मुझे यह भी नहीं पता कि मैं यहां क्यों आया हूँ...  तुम बहुत पसंद आई.. तो मैंने..

(इसी बीच वेटर चाय लेकर आता है.. वह एक कप टेबल पर रखने को होता है तभी आरती कहती है...)
आरती- मैं किसी से प्यार करती हूँ। (वेटर फ्रीज़ हो जाता है.... कुछ देर तक तीनों आश्चर्य में रुके रहते हैं)
सुधीर-  सॉरी... मुझे नहीं पता था... (वेटर कप वापिस ट्रे में रखता है और निकल जाता है।)  मैं... मतलब...माफ कर दीजिए।

(सुधीर चला जाता है।)

आरती- (दर्शकों से..) वह एक होगा जिसके साथ मैं अपना पूरा जीवन बिता सकती हूँ... वह एक हमेशा होगा। किसी के भी आते ही लगता है, यह तो है... प्यार तो होगा। प्यार है नहीं कभी भी.. वह हमेशा होगा।

Fade out…

Scene-3

(निम्मी अकेली बैठी हुई है।)

निम्मी-  आंटी... आंटी...।
माँ-       आई बस..।

(माँ भीतर से पानी लेकर आती हैं और निम्मी के बगल में बैठ जाती हैं।)

माँ-       मैं अंदर बहुत सोच रही थी... बेटा बहुत सोचा पर बिलकुल समझ में नहीं आया कौन हो तुम?
निम्मी-  अरे... अच्छा !! आंटी करीब एक साल पहले मैं अपने भाई के साथ आई थी.. आरती को देखने..।
माँ-       अच्छा... हाँ.. वही तो.. बिल्कुल..।
निम्मी-  हाँ..।
माँ-       गगन..
निम्मी-  नहीं.. आंटी.. सुधीर।
माँ-       हाँ...वह जो टकले थे।
निम्मी-  नहीं... नहीं भईया के तो बाल हैं।
माँ-       अरे हाँ... वह .. वह.. ना अनिक कपूर जैसी मूँछ वाले...।
निम्मी-  नहीं आंटी.. भईया चिकने हैं।
माँ-       ओफ!! अभी इसे इतने लोग देखने आ चुके हैं ना कि मेरा तो सिर पैर का कोई हिसाब नहीं है। तो वह जो है सुधीर कैसे हैं?
निम्मी-  बहुत अच्छे हैं।

वक़्फा...

माँ-       पानी पी लिया...
निम्मी-  हाँ।
माँ-       चाय?
निम्मी-  नहीं।
माँ-       तो फिर... हें...
निम्मी-  हाँ...
माँ-       अरे तो यहाँ एक साल बाद... आई क्यों हो?
निम्मी-  वह आरती...?
माँ-       उससे मिलने... ?
निम्मी-  नहीं.. मेरी अगले महीने शादी है... मैं उसी की इत्तला देने आई थी।
माँ-       अरे!
निम्मी-  आरती की तो शादी हो ही गई होगी... हे ना?
माँ-       इत्ती सी धरी हो तुम.. और देखो तुम्हारी शादी हो रही है.. और एक यह है.. ऊंट हो चुकी है पर..
निम्मी-  अरे वाह... मतलब शादी नहीं हुई अभी?
माँ-       तुम्हें बड़ी खुशी हो रही है?
निम्मी-  नहीं आंटी... यह तो ठीक नहीं है.. मतलब.. ऎसे कैसे.. अगर.. होनी तो.. बिल्कुल.. हें ना..
माँ-       रहने दो तुम... जब खुद के मुँह में लड्डू फसा हो तो दूसरों के लिए आशिर्वाद थोड़ी निकलता है। चलो बधाई है.. तो ठीक है फिर..
निम्मी-  पर आरती..
माँ-       वह जब आएगी हम बता देंगें।
निम्मी-  अच्छा आप बस मेरी यह चिठ्ठी उनको दे देना जब वह आएं..।
माँ-       ठीक।

(निम्मी लिखने बैठती है तभी.. आरती आ जाती है...)

आरती- निम्मी... तुम?
माँ-       अरे बेटा तुम जानती हो... वह एक लड़का आया था ना.. क्या नाम था..?
आरती- सुधीर..
माँ-       हाँ... अरे तुम्हें याद है।
आरती- निम्मी यहाँ कैसे...।

(निम्मी जल्दी जल्दी अपना लिखना खत्म करती है।)

माँ-       अरे सही काम सही समय से कर रही है... शादी... और देख लो तुम खुद को..

(माँ पानी का गिलास लेकर भीतर चली जाती है... निम्मी आरती के पास आती है... और उसे पर्ची देती है।)

.निम्मी- आपका ही इंतज़ार कर रही थी... आख़री बस निकल जाएगी.. आप बस इसे पढ़ लेना।

(निम्मी आरती को गले लगाती है, आरती की कुछ समझ में नहीं आता, निम्मी के जाने के बाद आरती पर्ची पढ़ती है , पहले आश्चर्य..... फिर हल्की मुस्कुराहट उसके चहरे पर आती है।)

BLACK OUT....

Scene-4

(स्कूल.... अचानक हम देखते हैं कि बहुत सारे बच्चे बैठे है.. एक कोने में कुर्सी लगी है.. और चपरासी घंटी बजाकर बच्चों के सारे पेपर उड़ाता है... सारे बच्चे अपने परिक्षा के पेपर लेकर अपनी-अपनी जगह पर आकर बैठ जाते हैं ... सूधीर भीतर से आकर कुर्सी पर बैठता है, चपरासी चला जाता है। कुछ देर में वह चपरासी वापिस आता है।)
चपरासी-साब...
सुधीर-  हाँ... क्या हुआ?
रानी-    कोई लड़की आपसे मिलने आई थी।
सारे बच्चे-         ओ ओ ओ ओ ओ!
सुधीर-  शू.. शू...।
चपरासी- अरे.. चुप..।
सुधीर-  चुप... देख नहीं रहे परिक्षा चल रही है.. चलो जाओ।

(चपरासी जाता है... तभी एक बच्चा चिल्लाता है supplementary sir!!! सुधीर उसे ले जाने का इशारा करता है वह भागता हुआ आता है और supplementary लेकर चला जाता है। चपरासी वापिस आता है।)

रानी-    मैंने कह दिया कि आप क्लास में व्यस्त हैं।
सारे बच्चे-(खिल्ली उड़ाने जैसा हंसते है।) हि हि हि हि।
सुधीर-  शू...शू... अच्छा किया..चलो अब।

(चपरासी चला जाता है। एक तरफ से आरती प्रवेश करती है और स्टेज के दूसरी तरफ बैठ जाती है हम इस हिस्से को हनुमान टेकड़ी कहते हैं। घंटी बजती है... आरती और सुधीर  एक साथ घड़ी को देखते हैं।)

सुधीर-  बस आखरी आधा घंटा और... चलो जल्दी खत्म करो...।

(तभी चपरासी भागकर वापिस आता है...।)

चपरासी-(झेंपते हुए।)साब!! वह लड़की कहकर गई कि वह हनुमान टेकड़ी पर इंतज़ार करेगी आपका..।
सारे बच्चे- भाई सॉब!!!
चपरासी-अरे चुप... बच्चे कितने बत्तमीज़ है यह..।
सुधीर-  हनुमान टेकड़ी...  पक्का हनुमान टेकड़ी???
चपरासी-हाँ।
सुधीर-  सुनो तुम यहां बैठो.. आधे घंटे में इनसे पेपर छीन लेना..। मैं चला..।
(सुधीर भागता हुआ जाता है। चपरासी सुधीर की कुर्सी पर बैठता है... और सारे बच्चों से कहता है।)
चपरासी-पंद्राह मिनट मेरी तरफ से एकस्ट्रा... ऎश करो!
(सारे बच्चे देखते हैं कि सर चले गए हैं.. वह सब खड़े होकर चपरासी को घेर लेरे हैं... चपरासी डर के मारे चिल्लाता है... “छुट्टी........!!!” सभी भाग जाते हैं... चपरासी भी कुर्सी लेकर निकल जाता है।)

Scene-5

(हनुमान टेकड़ी पर आरती....)

आरती- (दर्शकों से...) हमें पता है कि गलत क्या है... हम कुछ गलत नहीं करते हैं। पर वह जो बिंदु है जहाँ पर सही ख़त्म होता है और गलत शुरु होता है... हम उस बिंदु को  बार-बार छूने का मज़ा नहीं छोड़ते हैं... कभी भी।

option...

(हम कितनी ही कोशिश क्यों ना कर लें एक शब्द से कोई छुटकारा नहीं है... इंतज़ार। अगर आप ध्यान से सोचें तो ठीक अभी इस वक़्त हम इंतज़ार में है.. और इसकी एक फेहरिस्त हमारे दिमाग़, हमारे सबकान्शन्स में बनी हुई है.. छोटी टुच्ची चीज़ो से लेकर कुछ बड़ा होने के आश्चर्य तक.. हम लगातार इंतज़ार के झूले में झूल रहे हैं..। क्या मॄत्यु भी इसी झूले में होती है या हम अंत में झूलना छोड़ देते हैं?)

(सुधीर भागता हुआ प्रवेश करता है, वह हड़बड़ाया हुआ है। उसे देखकर विश्वास नहीं होता... वह बहुत कुछ कहने में कुछ नहीं कह पाता..)

सुधीर-  तुम... यहाँ मेरे गांव में...?.... मतलब... हनुमान टेकड़ी पर.... विश्वास नहीं.... ।

(वह बस हंसता जाता है कुछ कह नहीं पाता ढ़ंग से.. आरती उसे देख रही है।)

आरती- बहुत अच्छी हवा चलती है यहां।
वक़्फा...
आरती- पहले यह घर नहीं था यहां... यह शायद अभी-अभी बना है।
वक्फा...
आरती- तुम यहां अब नहीं आते हो?
वक्फा...
आरती- क्या हुआ?
सुधीर-  मुझे यक़ीन नहीं हो रहा है.... तुम यहां क्या कर रही हो?
आरती- तुमसे मिलने आई हूँ।
सुधीर-  क्यों?
आरती- देखने आई थी कि तुम्हारा शादीशुदा संसार कैसा चल रहा है... कितने बच्चे हैं?
सुधीर-  सब ठीक चल रहा है।
आरती- अच्छा है।
सुधीर-  तुम्हें कैसे पता कि वह घर पहले यहां नहीं था? तुम पहले भी यहां आ चुकी हो?
आरती- हाँ..  करीब एक साल पहले.. जब तुम मेरे ऑफिस आए थे उसके कुछ दिनों बाद.. तुमने कहाँ था कि तुम रोज़ शाम को यहाँ आते हो... पर तुम उस रोज़ नहीं आए थे।
सुधीर-  ओह!! तुम सच में आई थी? मैं क्यों नहीं आया था?
आरती- कुछ दिनों बाद मैं फिर आई थी... तब भी तुम नहीं देखे.... अब तुम्हारा घर, स्कूल कुछ पता नहीं था.. फिर मैंने सोचा अगर मैंने तुम्हें ढ़ूढ़ भी लिया तो क्या करुंगी... मैं तुम्हें तुम्हें शादी करने से रोकना तो नहीं चाहती । फिर मैं नहीं आई...।

(आरती सुधीर को बैठने का इशारा करती है... स्टेज के दूसरी तरफ वह बैठा  जाता है।)

सुधीर-  ओह! मैं बस बीच में एक दो बार ही नहीं आ पाया था... शायद। तुम यहां आई थीं... काश मैं..
आरती- काश क्या?
सुधीर-  काश कुछ नहीं.... जाने दो... पर अगर तुम मुझे शादी से रोकना नहीं चाहती थीं तो क्यों आई थी?
आरती- क्या हमारे पास हर क्यों का जवाब होता है? बस मैं आई थी.. मेरे पास इसका कोई ठीक कारण नहीं है।
सुधीर-  मैंने अभी तक शादी नहीं की है।
आरती- जानती हूँ... निम्मी आई थी.. कह रही थी कि.... सुनों मेरी, वह शादी में भेजते हैं ना वह तस्वीर है.. और तुम्हारी कोई दीवार है???
सुधीर-  निम्मी ... ओफ!! गधी... मैं.. मैं...  मैं उसे छोड़ूगा नहीं.. उसने यह तुम्हें क्यों बताया?  
आरती-नहीं निम्मी से नाराज़ मत हो वह तुमसे बहुत प्यार करती है। पर सच बताओ मेरी तस्वीर तुमने अपनी दीवार पर टांग रखी है।
सुधीर-  नहीं असल में दीवार में एक छेद हो गया था तो मैंने सोचा कि वह तस्वीर.......।
(आरती हंसने लगती है.. सुधीर बहुत शर्मिंदा हो जाता है।)

सुधीर-  तुम्हारे प्यार का क्या हुआ?
आरती- मेरे प्यार का?
सुधीर-  अरे...तुम किसी से प्यार करती थीं... शादी हो गई तुम्हारी?
आरती- हाँ...।
सुधीर-  मुबारक हो...। फिर तो...
आरती- सुधीर... अगर शादी की होती तो यहां क्यों आती!
सुधीर-  तुम असंभव हो!!
आरती- असंभव?
सुधीर-  कैसी हो तुम?
आरती- कैसी हूँ?
सुधीर-  मुझे तुमसे बहुत डर लगता है।
आरती- अरे!! मुझसे?
सुधीर-  हाँ।
आरती- मैंने क्या किया है?
सुधीर- 
मुझे लगता है कि एक पहेली चल रही है... जिसमें सारे जवाब कहीं बीच में है। देखो मैं तुमसे दो बार मिला हूँ और हर बार मिलने के बाद देर तक हमारे बीच हुई बातचीत को ही सुलझाता रहता हूँ।
आरती- तुम्हारे पास ना बहुत ख़ाली समय है।
सुधीर-  यह देखो... यह देखो.. जैसे यह जवाब... कैसा जवाब है यह...? चुभता भी है और सही भी लगता है।
आरती- मेरे दिमाग़ में ऎसा कुछ भी नहीं है...
सुधीर-  छोड़ो तुम नहीं समझोगी।
आरती- क्या नहीं समझूंगी?
सुधीर-  अगर तुम मेरी जगह होती ना तो तुम्हें पता चलता कि मैं क्या कह रहा हूँ...।
आरती- और अगर तुम मेरी जगह होते तो तुम्हें पता लगता कि तुम कितने
funny हो।
सुधीर- 
funny?????
आरती- हा.. सच में।
सुधीर-  कितना मस्त जीवन होता मेरा अगर... काश.. काश मैं तुम्हारी जगह होता जहाँ से अंत में सब
funny दिखता है।
आरती- और देखो, मुझे तुमपर रश्क होता है।
सुधीर-  मुझपर ....?
आरती- हा....तुम्हें पता है मैं यहां क्यों आ सकी.... क्योंकि मैं तुम्हारे पास आ सकती थी। तुम वह जगह देते हो कि तुम्हारे तक आसानी से पहुंचा जा सकता है...  तुम हो ही ऎसे.. ।
सुधीर-  बताओ...! तुम्हें मुझपर रश्क होता है और मैं तुम्हारे जैसा होना चाहता हूँ.. यह
funny है।
आरती- हाँ... सुनों ना... एक बार बदल कर देखते हैं...।
सुधीर-  क्या? क्या बदलकर देखते हैं?
आरती- रोल... मैं तुम्हारे जैसी होना चाहती हूँ... अभी.. इसी वक़्त!!
सुधीर-  अरे यह कोई मज़ाक है क्या? मतलब... तुम मेरे जैसी कैसे हो सकती हो?
आरती- बस तुम यहां आकर बैठ जाओ और मैं तुम्हारी जगह... हो गया।
सुधीर-  मैं तो ऎसे ही कह रहा था... तुम तो सच में .. ऎसा थोड़ी होता है।
आरती- उठो... उठो...

(आरती सुधीर के पास आ जाता है और उसे उठा देती है.... सुधीर उठता है...  आरती उसकी जगह बैठ जाती है...। सुधीर खड़ा रहता है...)

आरती-(सुधीर की तरह बोलने की कोशिश करती है।)अरे आप खड़े क्यों है जाईये बैठिये...।

(सुधीर की कुछ समझ नहीं आता...)

आरती- अरे.. देखों तुम जैसे ही मेरी जगह बैठोगे ना तो मेरे जैसे हो जाओगे.. जाओ...। आप खड़े क्यों है बैठिये।
सुधीर-  एक तो मैं ऎसे नहीं बोलता हूँ।

(सुधीर बैठता है...। फिर खड़ा हो जाता है।)

सुधीर-  अरे यह क्या है? हम इतने दिनों बाद मिले हैं और तुम तो इसे बिल्कुल मज़ाक बना दे रही हो।
आरती- तुम्ही ने कहा ना तुम्हें चुहल  पसंद है... तो हम बस चुहल कर रहे हैं समझ लो। चलो ना ... बैठो।

(सुधीर फिर बैठता है।)

आरती- तो माँ कैसी हैं...?
सुधीर-  माँ तो नहीं हैं... बताया था ना तुम्हें...?
आरती- तुम्हारी माँ है। (आरती इशारा करती है कि अब तुम मैं हूँ और मैं तुम हो।)
सुधीर-  माँ अच्छी है। (अचानक सुधीर को यह कहना अच्छा लगता है कि माँ अच्छी है। वह एक बार फिर कहता है और उसे अच्छा लगता है।)
आरती-
तो तुम किसी से प्रेम करते हो इसलिए तुमने मुझे मना कर दिया शादी के लिए..?
सुधीर-  मैंने? …. अरे मैं तो कब से तुम्हारे पीछे पड़ा हूँ....
आरती- अरे तुम समझ ही.....
सुधीर-  (अचानक सुधीर की समझ में आता है और वह बहुत खुश हो जाताहै।) हाँ मैंने.... अरे यह तो सब कुछ बदल गया.... बहुत सही है.... हाँ हाँ हाँ ... मैंने तुम्हें मना कर दिया.. साफ कह दिया भूल जाओ नहीं हो सकती यह शादी।
आरती- क्यों?
सुधीर-  क्योंकि… क्योंकि।
आरती- क्योंकि तुम किसी से प्यार करते थे.. जानती हूँ।
सुधीर-  नहीं … क्योंकि मुझे तुम्हारी नाक़ नहीं पसंद।
आरती- मेरी नाक़?
सुधीर-  हाँ और जैसे तुम हंसती हो.. वह भी नहीं पसंद…।  

(आरती सुधीर की तरफ आश्चर्य से देखती है। सुधीर घबराकर उसकी तरफ जाता है।)

सुधीर-  सॉरी सॉरी... वह हंसी वाली बात मुँह से निकल गई... गलती से... चुहल चुहल में गड़बड़ हो गई।
आरती- और नाक़ वाली.... ?
सुधीर-  तुम्हारी नाक तो बहुत अच्छी है।
आरती- अच्छा।
सुधीर-  क्या हुआ? मैंने कुछ ज़्यादा बोल दिया?
आरती- वहीं बैठो ... ठीक है.. सही जा रहे हो... और कुछ?
सुधीर-  एक और बात कहूँ.... ?
आरती- बोलो...।
सुधीर-  अच्छा तुम यह बताओ कि.... (उसे हंसी आती है।) यह बताओ कि ऎसा क्या देखा तुमने मुझमें कि तुम मुझसे शादी करने के पीछे मरी ही चली जा रही हो?
आरती- वाह!!
सुधीर-  कितना अच्छा लगा यह बोलकर..... अब जवाब दो.? बोलो...।
आरती- ह्म्म्म्म्म्म... जिस तरह तुमने मुझे मना किया। हा कहने में उतना आकर्षण नहीं है जितना ना कहने में है।
सुधीर-  अरे वाह!... बहुत सही.. और और...? 
आरती- शायद एक कहानी है... जितनी बार तुमसे मिली हूँ... एसा लगता है कि तुम्हारे सारे कहे में बहुत सारा अनकहा रह गया है... इसलिए बार-बार इसे जानने चली आती हूँ।
सुधीर-  यही तो... यही तो... बिल्कुल सही कहा तुमने ... यही अनकहा.. मुझे हमेशा लगता था कि कुछ अनकहा रह गया है... इसलिए बार-बार तुम्हारे बारे में सोचता था.. तुम..
आरती- यह क्या है?
सुधीर-  क्या है?
आरती- अभी तुम मैं थे और मैं तुम... अभी तुम तुम हो गए... छोड़ो तुमसे नहीं होगा। आराम से बैठते हैं....।
सुधीर-  सॉरी... पर

(सुधीर वापिस भागकर अपनी जगह पर बैठता है।..दोनों चुप हो जाते हैं।)

सुधीर-  ठीक है जब तक तुम नहीं कहोगी हम चुहल करते रहेंगें।
आरती- रहने दो।

(आरती पलटकर दूसरी तरफ देखने लगती है।)

सुधीर-  यह देखो.. मैं तुम हूँ.... और यह मेरी दर्द भरी कहानी सुनों.... मैं एक लड़की से प्रेम करता था। वह भी मुझसे भयंकर प्रेम करती थी... हम दोनों शादी करना चाहते थे.. पर नहीं कर पाए.. । मैं उसे कभी भुला नहीं पाया... इसलिए अब यह... हमारी शादी मुश्किल है.. नामुम्किन।

(आरती हंसने लगती है।)

आरती- कितनी सीधी सच्ची साफ बात है।
सुधीर-  हाँ।
आरती- झूठ है।
सुधीर-  यही सच है।
आरती- सच?
सुधीर-  हाँ..... बिल्कुल।
आरती- क्या नाम था उस लड़की का?... बोलो... जल्दी बताओ...
सुधीर-  उसका नाम...
आरती- झूठ...।
सुधीर-  तो यह तो ...
आरती- झूठ...।
सुधीर-  उसका नाम प्रेरणा है।
आरती- क्या?
सुधीर-  प्रेरणा।
आरती- तुम फस जाओगे...।
सुधीर-  नहीं फसूंगा।
आरती- पक्का?
सुधीर-  हा।
आरती- उसकी नाक़ कैसी है?................ अब मत बोलना मेरे जैसी!!
सुधीर-  बिल्कुल नहीं... उसकी नाक़ बहुत खूबसूरत... तराशी हुई...।
आरती- गाती है...।
सुधीर-  हाँ.... मेरी बहन निम्मी को वही गाना सिखाती थी... मैं वहीं पहली बार उससे मिला था.. उसकी संगीत क्लास में... वह गा रही थी और मैं मंत्रमुग्ध हो गया था।
आरती- पहली बार अकेले बात कब हुई।
सुधीर-  मैं तबला सीखने संगीत क्लास चला गया था.. हम दोनों गली तक साथ पैदल चलते थे... वहाँ उसने पहली बार मुझे ज़ाकिर हुसैन कहा था... अरे उस वक्त मेरे बाल बड़े हुआ करते थे।
आरती- सच में?
सुधीर-  हाँ.. असल में मैं उसके घर जाने से डरता था.. उसके पास दो कुत्ते थे। उसके पिताजी डॉक्टर थे... पर आरती वह जब भी मुझे देखती थी तो मुझे लगता था .. आह.. वह टीस उठती है ना नज़र मिलती है .. आह... उसके देखते ही.. ओह!
आरती- बस बस..
सुधीर-  और कुछ....
आरती- उसमें कोई बुराई?
सुधीर-  सिर्फ एक... उसने मुझे छोड़ दिया... जो मेरी समझ में नहीं आया।
आरती- क्यों ?
सुधीर-  क्योंकि हम एक दूसरे से बेहद प्यार करते थे।
आरती- तो जाकर कारण पता किया।
सुधीर-  मुझमें हिम्मत नहीं थी... ।
आरती- अभी मिलते हो?
सुधीर-  नहीं उसकी शादी हो चुकी है।
आरती- तुम सोए हो प्रेरणा के साथ?
सुधीर-  क्या?
आरती- सोए हो?
सुधीर-  यह वैसा प्यार नहीं था।
आरती- तो कैसा था?
सुधीर-  सच का प्यार...।
आरती- जिसमें साथ भजन गाते हैं?
सुधीर-  तुम नहीं समझोगी... इसलिए मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता।
आरती- ओ, तो यह भी एक कारण है।
सुधीर-  मुख्य कारण यही है।

(वक्फा)

आरती- तुम सच में किसी से प्यार करते थे?

(सुधीर दर्शकों से....)

सुधीर-  हम क्या पैदा कर देते हैं बीच में... कोई हमेशा बीच में होता है... हम हमेशा तीन होते हैं.. दो नहीं। तीसरा अगर कोई नहीं है तो हम प्रेम को बीच में खड़ा कर देते हैं... और कभी-कभी प्रेम के कारण वह दिखना बंद हो जाता है जिससे हम प्रेम करते हैं।

सुधीर-  प्रेरणा में एक बच्चों सी उत्सुक्ता थी.. उससे बातें मुक्त करती थी.. बांधती नहीं थी।
आरती- मैं तुमसे क्यों शादी करना चाहती हूँ?
सुधीर-  हाँ यह बताओ... क्यों?
आरती- मैं एक लड़के के प्रेम में थी... मैं नहीं वह मेरे प्रेम में था...।

(सुधीर मुस्कुरा देता है।)

आरती- क्या हुआ?
सुधीर-  नहीं.... कुछ नहीं।
आरती- तुम्हें कुछ अजीब लगा..
सुधीर-  ’वह’ तुम्हारे प्रेम में था....
आरती- हाँ... वह मेरे प्रेम में था..

सुधीर-  यह तुम्हें बताने की ज़रुरत नहीं है।
आरती- ज़रुरत हैं... क्योंकि तुमने तो शादी से मना कर दिया ना मुझे.. तो ज़रुरत है...।
सुधीर-  अच्छा...क्या नाम था उसका? जल्दी बताओ...
आरती- राकेश, दिनेश, रवि, रमेश... क्या फर्क पड़ता है।

(दोनों चुप हो जाते हैं।)

सुधीर-  फिर..
आरती- जब हम मिलते थे तो हम भजन नहीं करते थे... ।
सुधीर-  ओ!... मतलब तुम दोनों...।
आरती- हाँ.... अंत में वह शादी चाहता था पर मैं नहीं...
सुधीर-  क्यों?
आरती- मैं कॉलेज में थी.. यंग थी.. तैयार नहीं थी.. वह बहुत बोरिंग था.. वगैराह वगैराह..
सुधीर-  फिर..
आरती- उसकी शादी हो गई... और उसकी शादी होते ही वह मुझे  पसंद आने लगा.. या तुम्हारी भाषा में कहूं...ओ मैं तो तुम्हारी ही भाषा में बात कर रही हूँ.. मैं उससे प्यार करने लगी थी।  तुम मुझसे मिलने आए तो मुझे लगाकि अरे यह तो वही है... राकेश, दिनेश, रवि.. रमेश सा सुधीर... इसलिए तुम!!
सुधीर-  इसलिए तुम... मतलब...मैं इतना बोरिंग हूँ।
आरती- नहीं तुम्हारी नाक उससे बिल्कुल मिलती है... तुम्हारी बातें.. और तुम.. तुम इस वक़्त तो बोरिंग नहीं हो... ।
सुधीर-  सच में?
आरती- सच में मतलब..?
सुधीर-  सच में मैं इसलिए पसंद आया?
आरती- सच थोड़ा कड़वा है... तुम सुन नहीं पाओगे..?
सुधीर-  कोशिश करो...
आरती- सच यह कि...
Void है... ख़ालीपन...इसे भरने के लिए कुछ चाहिए.. एक खिलौना इसलिए तुम.. !!! कोई दूसरा भी हो सकता था.. पर आकर्षण तुम पर ही है क्योंकि.. इस खिलौने को देखकर लगता है कि इससे बहुत समय तक खेला जा सकता है ... यह नए-नए खेल में फसाए रखेगा.. और बोरियत नहीं होगी। इसलिए तुम....!!
सुधीर-  यह बात बहुत चुभ रही है।
आरती- क्यों?
सुधीर-  शायद बहुत सच्चाई है इसमें..।
आरती- मैंने पहले ही कहा था...?
सुधीर-  हा... तुमने पहले ही कहा था।


आरती- (दर्शको से...) पहले जब कुछ भी नहीं था.. तो ब्रह्म था..। वह एक.. । जब कुछ था ही नहीं तो वह अकेला बोर होने लगा.. तो उसे खुद को जनने की इच्छा हुई.. तो वह एक से दो हो गया..। दूसरे ने ’मैं’  को जानना शुरु किया.. फिर दूसरे की भी इच्छा हुई कि कोई उसे भी देखे जाने, admire करे.. तो वह दूसरा फिर से दो हो गया.. और इस तरह हम सब .. कोई हमें देखे.. समझे.. और जाने.. छी!!

आरती- तुम्हारी आख़री बस निकलने वाली है... चुहल ख़त्म करते हैं... बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलके।

(आरती उठती है और जाने को होती है। पर सुधीर नहीं हिलता।)

आरती- क्या हुआ? चलो।
सुधीर-  मुझे नहीं पता हम लोग इसके बाद कभी मिलेंगें भी कि नहीं....।
आरती- तो...।
सुधीर-  मैं इस मुलाक़ात को पहेली नहीं बनने देना चाहता हूँ।
आरती- इसमें कोई पहेली नहीं है।
सुधीर-  पर यह अधूरी है अभी....।
आरती- तुम अंत पर पहुचना चाहते हो?
सुधीर-  नहीं... मैं इस पहेली के जवाब तक पहुंचना चाहता हूँ...।
आरती- जवाब का मतलब अंत...
सुधीर-  नहीं जवाब अंत नहीं होते? जवाब बात को ख़त्म कर देते हैं।
आरती- तुम अजीब बातें कर रहे हो... यह तुम पर सूट नहीं करती हैं।
सुधीर-  क्योंकि मैं अभी भी मैं नहीं हूँ... मैं अभी भी तुम हूँ... मैंने खेलना बंद नहीं किया है... । बैठो... खड़ी क्यों हो।

(आरती बैठ जाती है।)

आरती- आख़री बस निकल गई तो मैं...।
सुधीर-  मैं...???
आरती- ’तुम’.... तुम क्या करोगे।
सुधीर-  हम यह क्या कर रहे हैं मुझे नहीं पता.. बस छूट जाएगी तो क्या होगा मुझे नहीं पता.. आज एक दिन मुझे कुछ भी पता नहीं करना है।
आरती- बहुत भूख लगी है... शायद मेरा घर पास ही है.... चलोगे?

(आरती उठकर जाने लगती है सुधीर बैठा रहता है।)

सुधीर-  सुनों.... अभी मैं तुम हूँ और तुम मैं हो.. हे ना?
आरती- हाँ...।
सुधीर-  क्या हम अब वह हो सकते हैं जो हम हमेशा से होना चाहते थे...?
आरती- मतलब ?
सुधीर-  मतलब वह एक.... जो हम सोचते हैं कि काश हम होते...?
आरती- देखो यह कुछ बहुत आगे जा रहा है।
सुधीर-  नहीं... यह बहुत सही जा रहा है।
आरती- तुम सच में यह चाहते हो?
सुधीर-  क्यों तुम्हें डर लग रहा है?
आरती- मैं डरपोक नहीं हूँ... पर यह महज़ चुहल थी.. पर अभी.. अभी यह..।
सुधीर-  चुहल ही है... यक़ीन मानों...।यह सब चुहल है.... तो????
आरती- ठीक है..। मैं और तुम... अब मैं और तुम नहीं है.. अब हम वो होगें जो हम हमेशा से होना चाहते थे। यही हे ना...? ठीक है..!

(आरती चली जाती है और सुधीर कुछ देर बैठा रहता है।)

सुधीर-  (दर्शकों से...) मैं पहली बार मैं नहीं था.... दूसरी तरफ बैठे हुए  खुद को देखा तो घबरा गया...लगा... मैं यह हूँ? मैं आज तक दूसरों के आईने में खुद को देखकर जी रहा था.. मैंने असल में खुद को अभी तक देखा ही नहीं था। क्या मैं आरती हूँ अभी?  और कितनी विचित्र बात है कि सुधीर हो जाने की थकान से मैं डरा बैठा हूँ। नहीं मैं आरती नहीं होना चाहता हूँ पर मैं वापिस सुधीर भी नहीं बनना चाहता हूँ... तो फिर... अब... मैं... क्या...????

Black out....  



Scene-6

(सुधीर और आरती आमने सामने खड़े हैं। दोनों एक दूसरे को कुछ देर देखते रहते हैं।)

आरती- तुम्हारा घर अच्छा है...। तो फिर शुरु करें....
सुधीर-  हाँ.... मैं आता हूँ...

(सुधीर exit करता है .. कुछ देर में कवि प्रवेश करता है... अब इसमें या तो आने वाले सारे पात्र अलग-अलग व्यक्ति निभाएं ... या सुधीर ही अलग-अलग व्यक्ति बनकर आए... वह निर्देशक के प्रयोग पर निर्भर है...। हमने दोनों तरह से कोशिश की थी.. हमारे हिसाब से नाटक ज़्यादा अपनी बात पहुँचाता है जब सुधीर ही सभी किरदार करे...।)

आरती- तो यह है जो तुम हमेशा से होना चाहते थे...?
कवि-    हाँ...।
आरती- कौन हो तुम..?

(सुधीर अपने झॊले और गमछे की तरफ इशारा करता है।)

कवि-    कवि हूँ। हमारे बीच की छूटी हुई जगह उतना ही ईश्वर अपने भीतर पाले हुए है जितना हमारा सारा अनकहा....  वह अनकहा वाली बात मेरे बीच में डाल दी....
आरती- नहीं नहीं...
कवि-    नहीं ना....  मैं फिर आता हूँ।

(सुधीर वापिस जाता है और वह भीतर तैयारी करते हुए गाना गाना शुरु करता है... और कुछ देर में अंदर गाता हुआ आता है। बीच में ही उसे समझ में आता है कि वह बहुत ख़राब गाता है.... वह रुक जाता है। और वापिस चला जाता है.... आरती हंसती है।)

गायक- यह तो बहुत ही बुरा है.... मैं फिर आता हूँ।

(जैकेट...चश्मा.. हेवरसेक... पहिनकर सुधीर रॉन बनकर आता है...। बहुत कानफिडेंट, किसी की परवाह नहीं जैसा व्यक्तित्व। वह आकर सामने खड़ा होता है।)

रॉन-     ह्म्म्म्म यह ठीक है... मैं रॉन हूँ... ROOOON , RON... RAAAOOON... RAAOOOOOONNNNN  हूँ।

(आरती मुस्कुराती है... कुछ देर उसको देखती है।)

आरती- सुधीर यह होना चाहते हो तुम....

रॉन-     yes, i know my shit...  मैं... मैं....मैं धूमता-फिरता हूँ... यायावर टाईप.. पहाड़ों, नदियों, nature lover...कहीं भी कभी भी बस निकल जाता हूँ... अकेले बिना किसी को कुछ भी बताए... you know that types
आरती- कहाँ-कहाँ गए हो?
रॉन-     अभी ... अभी तो शुरु किया है.. मतलब.. लिस्ट है मेरे पास.. बहुत सारी जगहों की
...!

(दोनों एक दूसरे को कुछ देर देखते हैं... रॉन मायूस हो जाता है...)

आरती- सुधीर!!!
रॉन-     सॉरी!! ..हाँ... हाँ....मैं जानता हूँ मैं असल में क्या होना चाहता हूँ ...... आरती सच में मैं जानता हूँ कि मैं क्या होना चाहता हूँ..... बस मैं आया।

(रॉन जाता है और एक बूढ़ा आदमी प्रवेश करता है... काला कोट पहिने... धीरे से आकर वह आरती के सामने समर्पित सा खड़ा हो जाता है। आरती उस बूढ़े आदमी को देखती है और मानों व उसे पहचानती हो जैसी आँखों से देखती है। कुछ देर में...)

आरती- मैं आती हूँ।

(आरती जाती है )

सुधीर-  (बूढ़ा आदमी.... दर्शकों से...) मैं सच में बूढ़ा होना चाहता हूँ.... सच। मैं असल में खुद से बड़ी अपेक्षाएं रखता हूँ!! मेरे घर वालों को भी मुझसे बहुत अपेक्षाएं हैं। शायद मेरे गाँव को भी मुझसे बड़ी अपेक्षाएँ हैं...  इस समाज को, शायद इस देश को भी। मैं जी नहीं पा रहा हूँ... मैं सिर्फ जीना चाहता हूँ... हल्का होकर.. जो जैसा है उसे ठीक वैसा का वैसा जी लेना चाहता हूँ। जैसे.... अगर दुख हैं तो मैं दुखी होना चहाता हूँ... और सुख में मुझे मुस्कुराने में कोई झिझक नहीं चाहिए। मैं बहुत जल्दी वहा पँहुचना चाहता हूँ जहाँ से मैं इन सारी अपेक्षाओं का दायरा लांघ सकूं... खुद से भी और दूसरों से भी और बस..  जीना शुरु करूं... बूढ़ा होकर।
(आरती प्रवेश करती है।  वह कपड़े बदलकर आई है... वह एकदम यूवा लग रही है। सुधीर आश्चर्य से उसे देखता है।)

आरती- ऎसे क्या देख रहे हो... मैं तो मुँह धोकर आई हूँ।
सुधीर-  तुम बहुत अच्छी लग रही हो...।

(आरती अचानक स्वतंत्र महसूस करती है... वह एक अंगड़ाई देती है... और पूरे मंच पर बच्चों सी उछल कूद करने लगती है... सुधीर दूर से उसे देखता रहता है।)

सुधीर-  यह क्या उम्र है..?
आरती- यही वह उम्र है... ठीक इस वक़्त के बाद सब बदल गया था.. मेरा मुझे देखना, लोगों का मुझे देखना, उनकी आँखें... सब कुछ... मुझे यह उम्र कितनी ज़्यादा याद है... मानों यह हमेशा मेरे साथ थी।
सुधीर-  तो तुम यह उम्र होना चाहती हो...।
आरती- नहीं यह उम्र नहीं... मैं इसकी खुशबू होना चाहती हूँ। मुक्त.. बेबाक़.... खुशबू।
सुधीर-  तुम जानती हो कि मैं तुम्हें कभी नहीं रोकूगाँ तुम्हारी खुशबू तक पहुँचने में... फिर हम साथ क्यों नहीं चल सकते?
आरती- मैं अकेले चलना चाहती हूँ....  और अगर ग़लती से साथ चल दिए तो बहुत दुखी होगे।
सुधीर-  मुझे एसा नहीं लगता है।
आरती- क्यों?
सुधीर-  खुशी बांटने में है... और.. अगर..
आरती- बचकानी बातें मत करो।
सुधीर-  क्या हम कतई साथ नहीं चल सकते?
आरती- तुम बूढे होकर भी बदले नहीं...।
सुधीर-  चोर, चोरी से जाए.. हेरा फेरी से नहीं!
आरती- यह क्या है?
सुधीर-  कुछ अजीब लग रहा है?
आरती- तुम बूढ़े होना चाहते हो?
सुधीर-  यह तुम पूछ रही हो?
आरती- हाँ... । क्यों मैं पूछ नहीं सकती?
सुधीर-  तुम्हें जवाब देना अजीब लगता है।
आरती- क्यों?
सुधीर-  मुझे लगता है तुम्हें तो सब पता है... ।
आरती- नहीं... मुझे नहीं पता है..  बताओ यह उम्र क्यों?
सुधीर-  यह उम्र नहीं ... मैं इसकी खुशबू होना चाहता हूँ।
आरती- तुम मेरी बात चोरी कर रहे हो।
सुधीर-  यहाँ हम सब चोर हैं... और चोरी के बाद अपना माल टटोल रहे हैं।
आरती- कुछ मिला?
सुधीर-  अगर कुछ मिल जाएगा तो लगेगा कि.. यह लो, हमने इससे भी मुनाफ़ा कमा लिया!!!
आरती- सुनो.... क्या कहके मैं पुकारु तुम्हें...?
सुधीर-  तुम्हें मेरा नाम पता है।
आरती- नहीं तुम वह नहीं हो अब, मैं तुम्हारे में कुछ दूसरा देख रही हूँ...
सुधीर-  दूसरा...?
आरती- जैसे बादल... बादल अच्छा है... वह हरदम बदल जाते हैं इससे पहले कि आप उन्हें समझ पाओं... मुझे बादल बहुत पसंद थे... जब बहुत हो जाते थे तो बरस जाते थे... । और मैं...???
सुधीर-  तुम...! मुझे कुछ दूसरा नहीं दिखता तुम्हारे में... मेरे लिए तुम चुहल थी, चुहल हो। तुम बहुत हो मेरे लिए.... पर बरसना हमेशा शेष रह जाता है।
आरती- चुहल!,  तुम्हें पता है... जब हम पहली बार मिले थे तो मुझे लगा था हम कभी नहीं मिलेंगें..।
सुधीर-  और मुझे यक़ीन था कि हम मिलेंगें।
आरती- दूसरी बार मुझे पता था कि हम ज़रुर मिलेंगें।
सुधीर-  और मैंने सोचा था कि अब नहीं होगी मुलाक़ात कभी...।
आरती- इस मुलाक़ात के बाद?
सुधीर-  सच पूछो तो.... हमें नहीं मिलना चाहिए।
आरती- कभी नहीं?
सुधीर-  तुम फिर चुहल कर रही हो। (दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं.. मानों सालों से एक दूसरे को जानते हो।)
चुहल-   बादल.. मैं बहुत खुश हूँ ... बहुत... जैसे पहली बारिश होती है ना...।
सुधीर-  नहीं... जैसे.. मिट्टी की खुशबू।
चुहल-   जैसे.. नीला आसमान..
सुधीर-  जैसे.. बचपना..
चुहल-   शरारत...।
सुधीर-  कोमल..।
चुहल-   जैसे तुम।
सुधीर-  जैसे प्रेम।
चुहल-   बादल।
सुधीर-  चुहल।

(चुहल बादल दोनों एक दूसरे की तरफ बढ़ते हैं.... धीरे-धीरे करीब आते हैं..  एक दूसरे को चूमते हैं।)



Black out...



Scene-7

(माँ और निम्मी बैठे हुए हैं... सामने मिठाई का डिब्बा पड़ा हुआ है। माँ मिठाई के डिब्बे को उठाती है।)

निम्मी-  मेरे से तो खुशी बरदाश्त नहीं हो रही है।
माँ-       कहाँ से लाए यह मिठाई?
निम्मी-  हमारे गांव की सबसे गज़ब मिठाई है...।
माँ-       अरे तो चख़ लेते हैं?
निम्मी-  नहीं नहीं... एक बार आरती आ जाए तो खोल लेंगें।
माँ-       अरे वह आती होगी.. तब तक.. थोड़ा सा।
निम्मी-  जब इतना इंतज़ार किया है तो थोड़ा ओर सही..।

(सुधीर की भीतर से आवाज़ आती है..।)

सुधीर-  आंटी शक्कर कहाँ है...।
माँ-       अरे वो.. रुको मैं आती हूँ।
सुधीर-  रहने दीजिये मिल गई.. मिल गई।

माँ-       अरे इसे क्या ज़रुरत थी चाय बनाने की.. मैं कर लेती...।
निम्मी-  अरे भईया गज़ब चाय बनाते हैं।
माँ-       आरती को पता है ना?
निम्मी-  पता नहीं आरती ने भईया के हाथ की चाय पी कि नहीं
माँ-       अरे वह नहीं.. आरती को पता है ना कि तुम लोग आ रहे हो?
निम्मी-  भईया ने तो कहा था कि पहले ख़त लिखकर बता देते हैं कि हम आ रहे हैं... पर मैंने कहा सरप्राईज़ देते हैं.. बड़ा मज़ा आएगा।
माँ-       अरे.. बता देते तो ठीक रहता... आरती को सरप्राईज़ पसंद नहीं है..।
निम्मी-  सरप्राईज़ सबको अच्छे लगते हैं।
माँ-       पर आरती ऎसी नहीं है..। वह तो....

(तभी आरती आफिस से वापिस आती है।)

आरती- अरे निम्मी! तुम क्या कर रही हो यहाँ?
निम्मी-  अरे आईये.. आप का ही इंतज़ार था... बैठिये।
माँ-       आरती यह लोग आए हैं...
आरती- कौन लोग?
माँ-       मैंने नहीं बुलाया.. यह लोग खुद आए हैं।
आरती- कौन लोग माँ?

(सुधीर अंदर से चाय लेकर आता है।)

सुधीर-  यह लीजिए गरमा गरम चाय..।
निम्मी-  दुल्हा पसंद आया?
आरती- क्या?
माँ-       निम्मी मज़ाक कर रही है।
आरती- तुम अंदर चाय बना रहे थे।
निम्मी-  भईया बह्त अच्छी चाय बनाते हैं।
सुधीर-  तुम्हारे लिए भी बनाई है।

(सुधीर चाय रखता है... कुछ देर चुप्पी रहती है.. कोई चाय नहीं छूता।)

आरती- तुमने मेरे लिए चाय बनाई है...!! मुझे विश्वास नहीं हो रहा है।
निम्मी-  ऎसा होता है।
माँ-       अच्छा छोड़ो.. चाय पीते हैं।
आरती- माँ रुको... सुधीर...... यह क्या हो रहा है?
सुधीर-  आंटी..असल में इसे कुछ नहीं पता.. मैं समझाता हूँ... मैंने निम्मी को बताया था कि तुम आईं थी मिलने.. तो फिर घर में बात छिड़ गई और मैने सोचा.. चलो..
आरती- तुमने सोचा चलो? चलो क्या?
सुधीर-  मतलब... अब तो हमको......
आरती- हमको शादी कर लेनी चाहिए.. है ना?
 सुधीर- हाँ और क्या?
आरती- मुझे जिस बात का डर था.. तुम बिल्कुल वैसे ही निकले...।
सुधीर-  कैसे?
आरती-मतलब... रमेश राकेश दिनेश सा सुधीर...।
सुधीर-  आरती....!
आरती- हम दोनों ने इतना अच्छा समय साथ गुज़ारा... और तुमने इतना छोटा मतलब निकाला उसका.. कि बस अब तो यह मेरी है? मैं बस एक चिज़ ही निकली ना अंत में तुम्हारे लिए... अरे इसके साथ तो बहुत मज़ा आया अब तो इसे सजाकर मैं अपने घर में ले जाऊंगा... इसे सबसे सही जगह रखूंगा.. यह पूरा जीवन मेरा मनोरंजन करेगीं।
सुधीर-  आरती यह क्या कह रही हो तुम?
आरती- सुधीर तुम्हें सच में कुछ समझ में नहीं आया... तुम...।

(आरती उठकर भीतर चली जाती है। सब लोग चुप रह जाते हैं।)

निम्मी-  भईया आपने तो कहा था कि आरती और आप ?
माँ-       मैने पहले ही कहा था कि उसको बता देते..।
निम्मी-  भईया चलो.... चलिए हम लोग चलते हैं... ।
माँ-       अब आप चाय पीकर जाईये.. और मिठाई भी चख़ लेते हैं।
निम्मी-  आप रख लीजिए मिठाई हम चलते हैं..।
सुधीर-  रुको... मैं... मै बात करता हूँ... तुम रुको।
निम्मी-  भईया जाने दो...
सुधीर-  नहीं कोई कनफ्यूजन है... आंटी मैं बस एक बार...

(सुधीर उठकर पीछे जाता है और आरती को आवाज़ लगाता है।)

सुधीर-  आरती... आरती... आरती... आरती... क्या हुआ? यह क्या है? आरती मैंने क्या किया ऎसा..?. आरती।

(आरती बाहर आती है।)
आरती- क्या हुआ...  तुम क्या चाहते हो?
सुधीर-  मुझे नहीं पता?
चुहल-   झूठ मत बोलो...।
सुधीर-  मैं सच कह रहा हूँ मुझे नहीं पता कि मैं क्या करना चाहता हूँ।
आरती- मैं बताऊं?
सुधीर-  हाँ।
आरती- तुम निम्मी और मेरी माँ को यह बताना चाहते हो कि तुम्हें तो कुछ समझ में नहीं आया.... जबकि तुम सब समझ रहे हो...।
सुधीर-  मुझे सच में कुछ समझ नहीं आ रहा है.. यह क्या है...
चुहल-   तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था बादल।
सुधीर-  मुझे बादल मत कहो।
माँ-       यह बादल कौन है?
निम्मी-  आरती... आरती... असल में मेरी गलती है मैं भईया को लेकर आई थी। चलो भईया.. चलो
सुधीर-  नहीं मैं खुद यहाँआना चाहता था.. ।
निम्मी-  चलो भईया.. बस ... अब चलते हैं...
सुधीर-  नहीं अगर मैं अभी चला गया तो यह सब कुछ फिर पहेली बन जाएगा, मुझे इसका जवाब चाहिए...।
निम्मी-  नहीं भईया.. चलो।
सुधीर-  मैं जा नहीं सकता।

(अचानक सुधीर पहली बार चिल्लाता है और निम्मी घबरा जाती है.. उसकी समझ में नहीं आता कि वह क्या करे। )

निम्मी-  यह क्या है चलो यहां से.....। (अरती और माँ से..) आपसे मिलकर अच्छा लगा... नमस्ते..।

(पर वह देखती है कि सुधीर वहीं खड़ा है।)

सुधीर-  नहीं .. नहीं ... मैं ऎसे नहीं जाऊँगा। मैं ऎसे नहीं जाऊँगा....तुम यहाँ आओ।

(सुधीर आरती का हाथ पकड़कर उसे ले जाता है..जहां वह शुरु में बैठे थे।)

आरती- सुधीर... सुधीर..।
सुधीर-  मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि इस वक़्त मैं क्या महसूस कर रहा हूँ। सुनों.. आओ चुहल खेलते हैं।
आरती- तुम पागल हो गए हो?
माँ-       यह क्या हो रहा है।
निम्मी-  भईया... सुनो... हो गया बहुत.. हम चलते हैं.... भईया क्या कर रहे हो आप?
आरती- सुधीर... तुम जाओ यहां से...।
निम्मी-  चलो भईया..।
सुधीर-  (चिल्लाता है।) मैं चला जाऊंगा... पर मैं गलत नहीं हूँ... सही क्या है मुझे नहीं पता, वह तुम बता पाऒगी... इसलिए चुहल खेलेते हैं.. आओ.. तुम इधर बैठो.. मैं उधर बैठता हूँ... (सुधीर आरती को अपनी जगह बिठाता है और खुद उसकी जगह बैठता है।) हाँ अब ठीक है... अब बताओ सही क्या है?
आरती- तुम सही हो सुधीर।
सुधीर-  चुहल... चुहल.. नहीं ऎसे नहीं शुरु से खेलते हैं.... तुम पूछो माँ कैसी है मेरी...पूछो..  जाने दो.. मैं बताता हूँ मेरी माँ बहुत अच्छी हैं।
निम्मी-  माँ... ??? भईया क्या कह रहे हो आप...???
सुधीर-  और यह निम्मी......तुम्हारी बहन निम्मी कैसी है? बताओ... बताओ...
माँ-       अरे यह क्या कह रहे हो तुम सुधीर।

(सुधीर बहुत तेज़ चीखने लगता है।)

सुधीर-  जब मैं तुमसे शादी नहीं करना चाहता तो क्यों आ गई यहाँ? क्या कर रहा हूँ मैं.... क्यों आ गया मैं यहाँ पर... ?
निम्मी-  भईया चलो यहाँ से... क्या कर रहे हो आप? चलो.... चलो....
माँ-       आरती तुम अंदर चलो।
सुधीर-  मैं नहीं जाऊँगा... मुझे जवाब चाहिए... यह पहेली है.. ।
निम्मी-  मैं जाती हूँ.. मैं नहीं देख सकती यह सब.. मैं जाती हूँ।

(निम्मी निकल जाती है।)

माँ-       आरती.. चलो.. मैं कह रही हूँ चलो...।
आरती- माँ... मैं बात करती हूँ.. आप अंदर जाओ....।
माँ-       लेकिन बेटा...।
आरती- माँ.. आप जाओ...।

(माँ भीतर चली जाती है।)

आरती- आओ चुहल खेलते हैं। आओ बैठो।

(सुधीर आता है और आरती के सामने बैठ जाता है।)

आरती- शुरु करें?
सुधीर-  हाँ।

Black out…
( fade in पर हम देखते है बिल्कुल scene number -0 है... लड़्कियाँ खड़ी हैं....और पेंडुलम की तरह हिल रही हैं.... आरती कुछ देर में बीच से निकलती है... सभी लड़कियाँ बिखर कर अपनी अपनी जगह लेती है। आरती दर्शकों से....)

आरती- क्या मैं ग़लत हूँ?
लड़की १-यह तो ग़लत लग रहा है।
आरती- तो सही क्या है?
२-        शायद... सही यह होता कि मैं अभी ’हाँ’ कह देती और इसे निभाती रहती... अंत तक।
आरती- हाँ यह एक तरीक़े से सही हो सकता था।
२-        एक तरीक़े से...?
आरती- किसी दूसरे तरीक़े से नहीं जिया जा सकता क्या?
२-        क्यों नहीं... पर फिर बाद में पछताओगी।
आरती- क्या हम इतने महत्वपूर्ण हैं? एक कहानी ज़ाया हो गई तो क्या होगा? कितनी सफल कहानियाँ तो हैं हमारे पास।
१-         तक़लीफ उदाहरण बनने की है...। एक पछताई कहानी का इस्तेमाल.. बाक़ी कहानियों को डराने के लिए कॉफी है।
आरती- एक ख़राब उदाहरण भी तो ज़रुरी है बाज़ार के लिए... मुझे दिक़्कत नहीं है...।
३-         बहुत पहले मैं एक लड़की को जानती थी जो पेन से काग़ज़ पर तितली बनाया करती थी।वह उसे रंगों से भर देती... फिर ...वह उस काग़ज़ को हवा में उछालती... उसे लगता कि तितली छिटकर एक दिन उड़ जाएगी। फिर एक दिन स्कूल के ड्राईंग के टीचर ने उस तितली को देखा और उसे प्रथम पुरस्कार दे दिया। बहुत समय तक वह तितली स्कूल के नोटिस बोर्ड पर चिपकी रही।
आरती- मूर्ख..
बाक़ी सब-        मूर्ख...
आरती- एक जीवन तो है हमारे पास.. और मुझे यह एक प्र्योग जैसा लगता है।मुझे पता है कि काग़ज़ पर पेन से बनाई  तितली कभी उड़ नहीं सकती.... पर मुझे प्रथम पुरुस्कार नहीं चाहिए, मैं उस उड़ने की आशा के भीतर खुश हूँ...। और इन अपनी बचकानीआशाओं के बीच मुझे किसी दूसरे की जगह नहीं दिखती। मैं इसमें अकेले रहना चाहती हूँ।
१-         इसका यह मतलब नहीं कि सन्यास ले लिया है।
आरती- कतई नहीं मैं इस जीवन को उसकी संपूर्णता में जीना चाहती हूँ।
३-         जैसे ताजमहल...
आरती- हाँ...जैसे ताजमहल .... मुझे ताजमहल बहुत पसंद है... मैं उसे देखना चाहती हूँ.. छूना चाहती हूँ.. पर उसे घर नहीं लाना चाहती।
सुधीर-  यह तो मेरी बात है।
आरती- तुम्हीं ने कहा था कि यहां हम सब चोर हैं।

(सभी लड़किया पलटकर सुधीर को देखती है.. आरती सुधीर के पास जाती है।)

आरती- हे ना?
सुधीर-  हाँ चोरी के बाद अपना माल टटोल रहे हैं
आरती- कुछ मिला?
सुधीर-  हाँ।
आरती- क्या?
सुधीर-  एक बात समझ में आई है... जो प्रेरणा है ना..
आरती- हाँ...
सुधीर-  उससे बातें मुक्त करती थी और मैं उसे बांधना चाहता था।हम आज भी सब कुछ बांधना ही चाहते हैं....। तुम्हारी तस्वीर अभी भी मेरी दीवार में टगी हुई है... मैं बस उस तस्वीर में  ज़बर्दस्ती खुद को उसमें घुसाने की कोशिश कर रहा था.. जबकि वह तस्वीर अपने आप में पूरी है... और मेरी दीवार पर काफ़ी अच्छी लगती है।
आरती- क्या यह अभी भी पहेली है?
सुधीर-  नहीं, बिल्कुल भी नहीं।
आरती- सुनो ...तुम हनुमान टेकड़ी जाना बंद तो नहीं करोगे ना?
सुधीर-  तुम फिर चुहल कर रही हो?
आरती- तुम्हें पसीना बहुत जल्दीआता है।
सुधीर-  असल में मुझे.......
आरती- तुम्हें इसकी आदत नहीं है?
सुधीर-  पसीने की..?
आरती- नहीं मैं तो चुहल की बात कर रही थी।
सुधीर-  मैं चलता हूँ।
आरती- अरे चाय... ?
सुधीर-  वह निम्मी नाराज़ होकर गई है... वह बवाल मचा देगी।

(सुधीर जाने को होता है तभी निम्मी की आवाज़ आती है.. वह मंच पर ही बाक़ी लड़कियों के साथ बैठी है।)

निम्मी-  भईया जब इतनी चाय बन गई है तो पीकर ही चलते हैं।
माँ-       और मिठाई भी चख़ लेंगें।

(Music fade in होता है.. माहौल हल्का हो जाता है। निम्मी आकर सुधीर के गले लगती है.. इसी वक़्त सारी लड़कियाँ आरती के साथ चाय में मदद करती हैं..। धीरे धीरे सभी मंच पर आते हैं... और सबको आरती, निम्मी और माँ चाय देते हैं....। पूरे मंच पर सारे लोग अलग-अलग ग्रुप में चाय पी रहे हैं और बात चीत कर रहे हैं... सभी एक साथ दर्शकों की तरफ धूमते हैं...। सामने आकर दर्शको को प्रणाम करते हैं।)

THE END……………………………………. PHEW!!!