शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

शक्कर के पाँच दानेः मानव कौल, Shakkar ke paach daane (Hindi Script)

शक्कर के पाँच दानेः मानव कौल अब मैं एक तरीके से मुस्कुराता हूँ और एक तरीके से हंस देता हूँ जी हाँ मैंने जिन्दा रहना सीख लिया है अब जो जैसा दिखता है, मैं उसे वैसा ही देखता हूँ जो नहीं दिखता वो मेरे लिए है ही नहीं अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं एक सफल मध्यमवर्गीय रास्ता हूँ रोज घर से जाता हूँ, रोज घर को आता हूँ अब मुझ पर कुछ असर नहीं होता या यूं समझ लीजिये मेरी जीभ का स्वाद छीन गया है. अब मुझे हर चीज एक जैसी सफेद दिखती है. अब मुझे कुछ पता नहीं होता पर सब जानता हूँ का भाव मैं अपने चेहरे पर ले आता हूँ. हर किस्से पर हंसना आह भरना मैं जानता हूँ अब मैं खुश हूँ – नहीं, नहीं खुश नहीं अब मैं सुखी हूँ – सुखी. क्योंकि अब मैं बस जिन्दा रहना चाहता हूँ. अब ना तो मैं उड़ता हूँ, ना बहता हूँ, मैं रूक गया हूँ. आप चाहे कुछ भी समझे, मैं अब तटस्थ हो गया हूँ अब मैं यथार्थ हूँ, यथार्थ सा हूँ “मुझे अपनी कल्पना की गोद में सर रखकर सो जाने दो मैं उस संसार को देखना चाहता हूँ, जिसका ये संसार प्रतिबिम्ब है” अब ये सब बेमानी लगता है. अब तो मेरा यथार्थ मेरी ही पुरानी कल्पनाओं पे हंसता है. अरे हाँ, आजकल मैं भी बहुत हंसता हूँ कभी कभी लगता है यह हंसना बीमारी है पर ये सोच कर फिर हंसी आ जाती है अब सब चीज जिस जगह पर होनी चाहिए उस जगह पर है ये सब काफी अच्छा लगता है अच्छा नहीं ठीक — हाँ — ठीक लगता है. पर …….. एक परेशानी है अजीब सी अधूरी …………. क्या बताऊं आजकल मुझे रोना नहीं आता, अजीब लगता है ना मुझे अब सुख या दुख से कोई, फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि वो जब भी आते हैं एक झुंझलाहट या एक हंसी से तृप्त हो जाते हैं अजीब बात है ना ……… नहीं नहीं …………. ये अजीब बात नहीं है ये एक अजीब एहसास है जैसा कि आप मर चुके हो और कोई यकीन न करे रोज की तरह लोग आपसे बातें करें, चाय पिलायें, आपके साथ घूमने जाऐं और सिर्फ आपको ये पता हो कि आप अब जिन्दा नहीं है मैं जानता हूँ, ये एक रूला देने वाला एहसास है पर आप आश्चर्य करेंगे. फिर भी, मुझे आजकल रोना नहीं आता है. ………….. नहीं नहीं नहीं …….. ये कविता मैंने नहीं लिखी ……… अपने बस की बात है ही नहीं मतलब ऐसे भारी शब्दों को एक दूसरे से लड़ाना उनकी आपस में कुश्ती कराना और उस भीषण हिंसा से किसी एक बात को बाहर निकालना. ये अपने आप में आश्चर्य है. मुझे तो पढ़ने और सुनने में ही पसीना आ जाता है. क्योंकि भाई मेरे लिए कुश्ती और कविता में कोई खास अन्तर नहीं है, मुझे तो आज तक ये समझ में नहीं आया कि कुश्ती क्यों लड़ी जाती है और कविता क्यों लिखी जाती है. मैंने जब पुंडलिक से पूछा कि ये कैसे होता है ? तो उसने जवाब दिया कि ‘कुश्ती दरअसल बाहर से लड़ी जाती है और कविता अपने भीतर से लड़कर लिखी जाती है. मुझे उसकी बात कुछ समझ में नहीं आई और मेरे मुँह से बस – हं – तिकला. पुंडलिक समझ गया. उसने कहा राजकुमार समस्य ये नहीं है कि तुम ना समझ हो. समस्या ये है कि तुममें समझ की काफी कमी है. (चींटिया दिखती हैं, वो चींटियों के साथ खेलता है, और फिर उठता है.) समस्या – मैं समस्या के पहाड़ पर घूम रहा हूँ – क्या भाई क्या …………. समस्या क्या है ? यही तो समस्या है …………. समस्या जब आती है तो अपने साथ अपना हल भी लाती है और हल के चलते ही समस्या फिर उग आती है. कहते हैं जिसके जीवन में समस्या नहीं उसने समझो जीवन जीया ही नहीं. इसका मतलब मैंने अभी तक जीवन जीया ही नहीं था. क्योंकि मेरे जीवन में कोई समस्या कभी रही नहीं. जबकि समस्या – इस शब्द को मैं बहुत पसंद करता हूँ और हमेशा चाहता था कि मैं समस्याओं से घिरा रहूँ. चारों तरफ समस्याओं के पहाड़ हो जिनको चीरता हुआ मैं उन्हें पार कर सकूं. पर मेरी ऐसी किस्मत कहाँ कि मुझे कोई समस्या नसीब हो. कुछ दिक्कतें आई पर आप उसे समस्या जैसा खुबसूरत शब्द नहीं दे सकते. पर आजकल मैं बहुत खुश हूँ. क्योंकि इस चिट्ठी के रूप में पहली बार मेरे पास वो चीज आई हैं जिसे मैं समस्या कह सकता हूँ. आज मैं वो सारे वाक्य बोल सकता हूँ, जो मैं हमेशा से बोलना चाहता था, पर थोड़ा गम्भीर होकर ……….. मैं आज …………. वैसे ये गम्भीर शब्द भी मुझे बहुत पसंद है. गंभीर क्या शब्द है …………… नहीं ……………. पर पहले समस्या ……………. आज मैं समस्या में हूँ ………….. दुखी हूँ ……… क्योंकि आज मैं एक भयानक समस्या से घिरा हूँ ………… क्या होगा मेरा ……………… कहीं मैं आत्महत्या करने की तो नहीं सोच रहा हूँ ………… ओह ये समस्या है. कहाँ है मेरा चाकू. हो गया ……………. अब समस्या, नहीं ……… नहीं ………… समस्या को अभी जाने दो. आपको मेरी समस्या अभी समझ में नहीं आयेगी. आप कहेंगे ये भी कोई समस्या हैं ? पर भैया मेरे लिए समस्या है. इसलिए अभी समस्या नहीं पहले पहली वाली बात. लड़नेवाली. आजकल मैं लड़ रहा हूँ. मैं अभी भी लड़ रहा हूँ. पिछले कई दिनों से लड़ रहा हूँ. तो मुझे समझ में आया ये लड़ना मतलब अपने से लड़ना हो तो मैं बहुत पहले शुरू कर चुका हूँ. असल में मैंने लड़ना तब शुरू किया था जब मेरी अकल दाड निकली थी. वैसे तो अकल दाड़ जिस उम्र में निकलनी चाहिए मेरी समझो कि ये दस साल बाद ही निकली. उसी वक्त मुझे समझ में आने लगा मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे कम ही लोग पसंद करते हैं. कम याने दो चार लोग ही. उनमें से एक है मेरी माँ. क्योंकि उसको मुझे डांटने और मुझ पर खीजने की ऐसी आदत पड़ है कि वो मेरे बगैर रह ही नहीं सकती. मैं जब भी कुछ करता हूँ ………………. मतलब कुछ काम …………… उसके बाद मैं तैयार हो जाता हूँ. माँ के अजीब से चेहरे की बनावट देखने को, वो झुर्रीदार चेहरे पर और गाढ़ी होती झुर्रीयां और हाथ ऊपर करके अपने छोटे कद को विकाल दिखाने जैसे सारे माँ के नृत्यों का मैं आदि हो चुका हूँ. हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं. वैसे मैं एक मामूली कद का आदमी हूँ. पर चाहूँ तो थोड़ा लम्बा दिख सकता हूँ, थोड़े कसे हुए कपड़े और रघु के हील वाले जूते पहनकर. कुछ लोग कहते हैं कि मैं रघु के जूते और लाल वाली चुस्त टी शर्ट पहनकर जब निकलता हूँ तो ठीक ही दिखता हूँ. मैं हमेशा हर काम ठीक ही करता हूँ, और ये सब जानते हैं. जब स्कूल में रिजल्ट आता था तो माँ से पूछो तो कहती थी हाँ ठीक ही रहा उसका रिजल्ट. मैं ठीक ठाक पैदा हुआ- ठीक ठाक पला बढ़ा, असल में मैं हमेशा एक बिदू है उसी पे रहता हूँ. जो अच्छे और बूरे के एकदम ठीक बीच में होता है. जिसे आप शून्य और मैं ठीक कहता हूँ. एक बार तो स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन के लिए मुझे टीम में ले या ना ले इस पर दो घंटे की बहस हुई. पर पहली बार मैंने अपने आप को महत्वपूर्ण समझा. बहस में आधे लोग कह रहे थे कि इसे ले सकते हैं ये बुरा नहीं खेलता. आधे लोग कह रहे थे कि इसे ना लें क्योंकि ये अच्छा भी नहीं खेलता. मैंने अन्त में जवाब दिया – सर सर मैं ठीक ही खेलता हूँ. किसी के समझ में नहीं आया अरे उनको शब्द नहीं मिल रहा था कि मैं कैसा खेलता हूँ. जब मैंने बताया कि वो शब्द ठीक है – मैं ठीक ही खेलता हूँ. तो सब मुझपर बरस पड़े कहने लगे ठीक क्या होता है – ठीक क्या होता है – ठीक कुछ नहीं होता है. तब से आज तक मैंने सिर्फ क्रिकेट खेलते हुए ही लोगों को दखा है. मेरे शरीर को देखकर बड़े से बड़ा आदमी धोखा खा सकता है. कई तो ये भी सोचते होगें कि ये तो दौड़ भी नहीं सकता. तब मैं सबको आश्चर्य में डाल देता हूँ – जब कोई भी खेल चाहे वो नया हो या पुंराना – मैं ठीक खेल के दिखा देता हूँ. पर समस्या यहीं से शुरू होती है. मैं उस बिन्दु के आगे बढ़ ही नहीं पाता हूँ. मैं पहले दिन ही ठीक पे पहुंच जाता हूँ और सालों खेलने के बाद भी ठीक पर ही रहता हूँ. माँ बताती है कि जब मैं छोटा था तो बहुत मोटा था. लोग कहते थे कि पैदा होते ही अपने बाप को खा गया इसलिए मोटा है. मुझे जब भी ये बात याद आती है तो मैं बहुत हंसता हूँ. अपने बाप को खालूं – गपर ………. गपर ……….. और हुप्प ………. मोटा हो जाउं ………………. फिर अचानक मैं दुबला होता गया उसका कारण भी माँ बताती है ………….. छोटे में मैंने रिन साबुन खा लिया था – बिस्कुट समझकर. चाट गया था ……… चप्पड …………… चप्पड़ ………. जब थोड़ी ही दूर चला था और धिप्प गिर पड़ा. तब माँ की समझ में आया कि मैं बेहोश हो गया हूँ. माँ बताती है. उसी समय उन्होंने मदर इण्डिया फिल्म देखी थी . उन्होंने मुझे गोद में उठाया और अस्पताल की ओर भाग ली. मैंने मदर इण्डिया फिल्म नहीं देखी पर माँ भागी क्यों …….. असल में मेरी माँ …… माँ की भूमिका एक बार जी भर के निभाना चाहती थी सो उन्होंने निभाई. १.५ किलोमीटर मुझ जैसे ताजे मोटे बच्चे को लेकर भागना. माँ पसीने पसीने हो गई. डॉक्टर के पास पहुंची तो डॉक्टर ने माँ को डांट दिया. डॉक्टर ने कहा – भागने की वजह से आपके बेटे ने जो रिन साबुन खाया था, वो अब झाग बनके चारों तरफ से निकल रहा है. माँ बताती है कि डॉक्टर ने दो मग्गे पानी निकाला था पीठ में से. फिर डॉक्टर ने बताया कि एहतियात बरतना – बहुत कमजोर हो गया है. कई सालों तक इसका ख्याल रखना होगा. जब तक १० साल का न हो जाए सर पर चोट नहीं आनी चाहिए – वगैरह. शायद कपडे धोने के साबुन से ही मेरी अकल दाड़ देर से निकली. अच्छा किसी को कैसे पता चलता है कि उसमें अकल आ गई ? क्योंकि ये कोई बल्ब तो है नहीं कि बटन दबाओ और कह दो कि अरे लाईट आ गई – अरे अकल आ गई. कैसे पता चलता है ?? ये प्रश्न एक दिन पुडलिक ने मुझे पूछा. मुझे लगा वो मेरी अकल देखना चाहता है मैं डर गया. मैंने ज्यदा सोचा नहीं, सोचत तो उसे लगता कि मेरे पास अकल ही नहीं है. बस थोड़ी देर में मैंने कहा अगर आपको पुराना किया चूतियापा लगने लगे ना तो समझो आपको अकल आ गई. वो हंस दिया. मुझे लगा मैंने कुछ गलत कहा. मैंने जल्दी में आगे जोड़ दिया और उसका एहसास आपको दाढ के यहाँ कहीं पीछे कोने मे होता है – ओह ! मैंने अपने जीवन में इतना शर्मनाक पहले कभी महसूस नहीं किया था. पर वो हंसा – और हंसा …… इतना हंसा कि मैं पसीने पसीने हो गया और फिर उसने अपना जवाब सुनाया – बाप रे बाप क्या जवाब था. एक-एक शब्द पहलवान का घूंसा था जो मेरे मूख्र दिमाग पे पड़ रहा था – धम धम धम. वो करीब दो घंटे लगातार बोलता रहा अब मैं दो घंटे तो नहीं बोल सकता सो मैं आपको मुख्य बातें बता देता हूँ उसने कहा था (कविता) फूल ने जुम्बिश को तेरी तेरी मेरी यहीं कहानी समझ की भंवरा आया समझ कि दाड़ में था दर्द दाँत से हाथ निकलते ही दर्द के मारे पैर बजे छन छन छन छन छन छन छन छन छन छन लेकिन तेरे दिल ने मेरे साइकिल के पहिये पर बैठा पहिया पंक्चर, अकल सिकन्दर घुटना दिमाग जब भी चलता पंखे सी आवाज़ें करता खर खर खर खर खर धरती का बोझ मेंढ़क का नाती ओंस की बूंद हाथी का दांत अकल की दाड़ मुँह का निवाला रात का चाँद सुबह का सूरज जैसा निकला, सारी की सारी चिड़िया फर फर फर फर फर फर फर फर फर फर उस दिन पुंडलिक मेरे सामने से कब उठा, कब रात हुई, कब सुबह हुई मुझे कुछ पता नहीं चला. अब मेरी ज़िंदगी का एक ही उद्देश्य रह गया था कि पुडलिक को कुछ ऐसा कह दूं कि वो हतप्रभ रह जाए. मैं उसके माथे पर पसीना देखना चाहता था. वैसे पुंडलिक भी अजीब आदमी था वो अपना जन्म दिन नहीं बनाता था. कहता था मैं पैदा नहीं प्रकट हुआ हूँ. मेरे लिए वो प्रकट ही हुआ था. वो मेरी माँ का भाई था और एक दिन अचानक मेरे घर रहने आ गया. मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. अरे मैं इतने सालो से अपनी माँ को जानता हूँ क्या मेरे अलावा भी माँ का कोई अपना हो सकता हैं? पता नहीं?? वो अपने को महान कवि कहता था और मुझे महान श्रोता. क्योकि मैं अकेला ही था पर मैं बहुत खुश था क्योंकि उसने जब मुझे अपनी पहली कविता सुनाई, तब से ही उसका तो पता नहीं पर मैं महान होता गया. पर कवि और श्रोता का हमारा सम्बन्ध थोड़ा उल्टा था, हर कविता सुनाने के बाद पुंडलिक मेरी तारीफ़ करने लगता था. क्योंकि उसको मेरे चेहरे का हतप्रभ भाव बहुत पसंद था. मेरे पास तो वैसे भी भावों की काफी क़मी थी पर ये ऐसा भाव था जिसे मैं पुंड़लिक के सामने सबसे ज्यादा चिपका देता था. क्योंकि उसकी सौ में से नब्बे बातें मेरी समझ में आती नहीं थी और जों थोड़ी बहुत समझ में आती थी, उसे बोलने में मैं डर जाता था. पुंडलिक वैसे तो कई बार मेरे सामने रोया था. उसको कुछ दुख था पता नहीं क्या पर कुछ था. लेकिन जब भी वो मेरे सामने रोता था ना तो मुझे बड़ी हँसी आती थी. मुझे लगता था कि पुंडलिक को अपना रोना बहुत शर्मनाक लगता है वो अपने रोने को अजीब तरीके से दबाता था. पुरे शरीर को विशेष मुद्रा में कड़क करके अपने मुंह को बंदरों जैसा बिचकाता रहता था और एक अजीब सी तीखी आवाज़ निकालता था ………….. ई …………. ई …… ई …….. वो अपनी माँ को बहुत चाहता था कहता था मैं अन्त तक उसके साथ रहा. मेरी माँ शायद अपनी माँ को नहीं चाहती थी. पता नहीं पर पुडलिक ने मुझे ऐसा कहा था. माँ को चाहना – मैं आज तक नहीं समझ पाया कि माँ को चाहना क्या होता है. जब मैं मेरी माँ को देखता था तो वो तो मुझे एक सूखी लकड़ी के समान औरत दिखती थी जो चुपचान घर में ढूंढ़-ढूंढ़ के काम निकालती थी. अजीब लगता है ना कई सालों से एक ही घर में लगातार काम करते जाना मुझे तो कभी कभी लगता था कि ये घर- घर नहीं है – एक नांव है ….. जिसमें जगह जगह पर गड्ढ़े हैं मेरी माँ उस नाव के बीच में मग्गा लेके बैठी है. जिससे वो लगातार पानी को बाहर फेंक रही है. (चींटियां दिखती है, वो चीटियों के साथ खेलता है, और फिर उठता है) पुंडलिक कहता था कि तेरी माँ बहुत आलसी है रे! अरे ये क्या कह दिया उसने. वो हमेशा ही ऐसा कुछ बोल के चला जाता था. मैं सोचता रहता था. धीरे-धीरे मुझे समझ में आया …. मदर इंडिया वाली घटना को छोड़ के मुझे लगा कि मेरी माँ सचमुच आलसी है. ये बात मेरे नामकरण से सिद्ध होती है. अब बोलिये उन्होंने मेरा नाम राजू रखा जो भारत में हर दूसरे आदमी का होता है. और ऊपर से स्कूल में दाखिला दिलाते वक्त माँ का वात्सल्य जागा और उन्होंने राजू को आगे बढ़ाकर राजकुमार कर दिया. माँ बताती है कि दाखिले को फार्म भरते वक्त वो स्कूल क्लर्क मेरी तरफ देखकर बहुत हंस रहा था. माँ को लगा दोष मेरी शकल का है. वैसे मेरे ख्याल से हर आदमी को अपना नाम खुद रखने की आजादी होनी चाहिए. वैसे मेरी माँ बड़ी रहस्यमय थी इस बात का मेरे अलावा किसी को पता नहीं है जब मेरी माँ अलमारी से अपना लाल रिबन निकालती थी तब समझो की समय हो गया और वो उस रिबन को पहन के निकल जाती थी. असल में उन्हें शौक था उन्हें अकेले फिल्म देखना बहुत अच्छा लगता था. कोई धार्मिक फिल्म नहीं सारी रोमाँस और मारधाड़ वाली. अब रोमाँस का तो पता नहीं पर शायद मारधाड़ का काफी असर पड़ गया था उन पर. क्योंकि उम्र के साथ साथ उनका चेहरा मर्दाना होता जा रहा था. उनकी दाढ़ी मूंछें निकलने लगी थी और बाद बाद में वो मुझे डांटते वक्त कहती थीं – कुते मैं तेरा खून पी जाऊंगी. तभी पुंडलिक ने मुझे एक किताब दी – मदर मैक्सिम गोर्की की. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. मुझे तो अभी तक लगता था कि सारी माँए किसी नियम के तहत एक जैसा बर्ताव करती हैं. पर ये – ये क्या था. पुंडलिक ने बताया कि ये कहानी सच्ची है. मैंने सोचा ऐसी माँ भी हो सकती है. मुझे याद आया पुंडलिक ने मुझसे कहा था कि वो अपनी माँ को बहुत चाहता था अब बस मैं एक और माँ के बारे में जानना चाहता था – पुंडलिक की. मैंने पूछा पुंडलिक क्या तुम्हारी माँ भी गोर्की की मदर जैसी है. मुझे लगा पुंडलिक के अदंर एक ज्वालामुखी था जो मेरे इस प्रश्न के जाते ही फूट पड़ा. वो बोला बोला बोलता रहा. ऐसे ऐसे उदाहरण देता रहा, ऐसे ऐसे शब्दो का इस्तेमाल करता रहा कि कहानी मुझे रोचक लगने लगी पर मेरी समझ में कुछ नहीं आया और मैंने उसी वक्त अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कर दिया ……….. हतप्रभ भाव और ये देखकर वो कुछ धीमा हुआ और भारी आवाज़ में धीरे धीरे बोला जो मुझे समझ में आने लगा. उसने कहा था – माँ के अन्तिम दिनों में मैंने पड़ना, लिखना घर से निकलना सब बंद कर दिया. मॅं सिर्फ माँ के साथ रहता था उन्हें गीता सुनाता था, सालों तक मैं घर से नहीं निकला. गीता सुनते सुनते ही उनकी मृत्यु हो गई. वो अचानक मर गई. मुझे बहुत अजीब लगा मैं खाली हो गया थां मुझे कुछ समझ में नहीं आया. तभी अचानक मेरी आँखों के सामने उनका मुस्कराता हुआ चेहरा घूमने लगा और वो चेहरा पेड़ बन गया और मैंने पेड़ के नीचे बैठकर लिखना शुरू किया. धूप चेहरा जला रही है परछाई जूता खा रही है शरीर पानी फेंक रहा है एक दरख्त पास आ रहा है उसकी आंचल में मैं पला हूँ उसकी वात्सल्य की सांस पीकर आज मैं भी हरा हूँ आप विश्वास नहीं करेंगे पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है मैं इसे माँ कहता हूँ जब रात शोर ख चुकी होती है जब हमारी घबराहट नींद को रात से छोटा कर देती है जब हमारी कायरता सपनों में दखल देने लगती है तब माथे पर उसकी उंगलियां हरकत करती हैं और मैं सो जाता हूँ और वो सो गया …………….. मैं अवाक सा बैठा रहा. अच्छा हुआ वो सो गया. क्योंकि मैं उसके सामने रोना नहीं चाहता था. मैं भाग कर उसके कमरे से बाहर निकल आया और मुझे वो दिखी. सूखी-सी लकड़ी के समान औरत जिसका चेहरा मर्दाना होता जा रहा था जो हाथ में मग्गा लिये पानी बाहर फेंक रही थी. मैं उपर से नीचे तक काँपने लगा. मुझे लगा पहली बार मुझे मेरी माँ दिखी. मैं तुंरत भाग के उसके गले लग गया और बरबस मेरे मुँह से निकल पड़ा – पेलागेया निलोबना माई मदर चटाक एक आवाज़ हुई. मेरा सर घूमने लगा. कई दिनों तक उसके वात्सल्य से भरे हुए उँगलियों के निशान मैं अपने गालों पर महसूस करता रहा. पर इस घटना से मैं हारा नहीं. मैंने माँ को मदर कहना नहीं छोड़ा. ये अलग बात हैं कि मैं मदर मन में बोलता था और उपर से माँ बोलता था. मदर मा मदर माँ ऐसे वैसे माँ और मेरे बीच सारे संवाद सालों पहले तय हो गये थे. किसी भी घटना का उन संवादों पर कुछ असर नहीं हुआ था. पुंडलिक ने एक बार कहा था कि तुझमें और तेरे गाँव में कोई अंतर नहीं है. ये कहकर वो चल दिया. मेरी समझ में नहीं आया ये क्या कह दिया उसने ? मैं सोचता रहा काफी समय बाद मेरी समझ में आया ये तो सच है. दरअसल मेरा गाँव गाँव ही नहीं था और ना ही पूरी तरह शहर था. यहाँ के लोग ना तो बहुत अमीर थे और ना ही भूखे मर रहे थे. ये इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि देश के नक्शे में इसका जिक्र हो और ऐसा भी नहीं है कि ये है ही नहीं यहाँ के लोग कुछ करना नहीं चाहते पर सभी अन्त में कुछ ना कुछ कर ही लेते हैं. यहाँ सब कुछ ठीक ठीक चलता है मेरी तरह – ठीक! पुंडलिक कहता है कि ये गाँव ऐसा लगता है कि छूटे हुए लोगों से बसा है जैसे रेत का ट्रक चलते हुए काफी रेत पीछे छोड़ जाता है ना वैसे ही रेत के समान छूटे हुए लोग इकट्ठे होकर ये गाँव बन गए. मेरा गाँव हाईवे और जंगल के ठीक बीच में था. पर मेरा घर हाईवे के किनारे था. सड़क के उस तरफ एक ढाबा था. जहाँ अजीब सी शक्ल के लोग हंसते और चिल्लाते हुए खाना खाते थे. लगता था कि आदमियों की आवाजें उनकी ना होकर गाड़ियों की आवाजें हो गई है. वैसे मैं दिन में सड़क के उस तरफ कम ही जाता था. मेरा तो काम सुबह ५ बजे का होता था. मैं मैं असल में ट्रक के पीछे कुछ लिखने जाता था. मुझे बस इतना पता है कि ये सारे ट्रक पूरे देश में हर गाँव हर शहर में जगह जगह जाते हैं. मैं ट्रकों के पीछे छोटे छोटे अक्षरों में चॉक से कुछ लिख देता था. किसके लिए पता नहीं. पर मेरे लिये ये अंतरिक्ष में संदेश भेजने जैसा था. मुझे पूरा विश्वास था कोई राजू राजकुमार छोटू, बंटी, चिंटूं, राकेश जैसा साधारण नाम वाला साधारण आदमी मेरी तरह सुबह पाँच बजे उठकर मेरा संदेश पढ़ रहा हे. क्योंकि मेरा सारा लिखा हुआ मेरे पास कभी वापस नहीं आता था. इसका मतलब कोई है जो मेरी बातों को पढ़कर मिटा देता है जिससे कोई दूसरा ना पड़ सके. हमारी दोस्ती काफी बढ़ गई थी. मैं अब अपनी सारी बातें उसे कह देता था पर संक्षेप में – घुमा फिरा कर चालाकी से. कहीं कोई दूसरा इसे पढ़कर हंसे ना और कहीं पुलिस घर पे आ गई तो – क्योंकि मैंने तो इसमें रघु, माँ, पुंडलिक राधे सभी की गोपनीय बातें लिख दी थीं. लेकिन मैं बहुत चालाक था पुलिस को कुछ पता नहीं चलता क्योंकि बहुत पहले मैंने ट्रक पर लिख दिया था. दोस्त अब से पुंडलिक = कवि, रघु = हीरो, राधे = गाँधी की लाठी, माँ = मग्गेवाली औरत. वैसे पाँच बजे उठने के मेरे दो मकसद होते थे. पहला ट्रक पर संदेश और दूसरा राधे से मुलाकात क्योंकि राधे रोज सुबह पाँच बजे मेरे घर के सामने आता था उसका नाम राधे है भी कि नहीं ये भी मुझे मालूम नहीं. क्योंकि जब भी वो मुझे देखता था तो राधे-राधे कहताथा और मैं भी जवाब में उसे राधे राधे कहता था. असल में हम दोनों एक दूसरे के लिए राधे थे. राधे को मैं सोने वाला बूढ़ा कहता था. क्योंकि वो सोना बीनने का काम करता था असल में हमारे घर में दो सोने चांदी की छोटी सी दुकानें थी. जिसका किराया हमें मिलता था. राधे रोज अपनी छोटी सी लोहे के दाँतवाली झाडूं लेकर आता था और सोना बीनता था. सोना बीनते वक्त वो एक सफेद पोटली जैसा हो जाता था. जो मेरी आँखों के सामने लुढ़कती रहती थी .काम करते वक्त वो एकदम चुप रहता था. सिर्फ उसकी सांसें लेने की आवाजें मुझे सुनाई देती थी. राधे को मैं सालों से जानता था मुझे लगता था कि वो किसी एक उम्र पर अटक गया है शायद उसके आगे बढ़ने की गुंजाईश ही नहीं होती. वो सालों से बूढ़ा था मुझे विश्वास ही नहीं होता है कि राधे कभी बच्चा भी होगा. वो गाँव से बाहर एक ही बार गया था और वो उसकी पहली और अंतिम यात्रा थी. वो गाँधीजी को देखने – सिर्फ देखने ने साबरमती आश्रम गया था – यह उसके जीवन की एकमात्र उपलब्धि थी जिसे वो अब तक ५० से ज्यादा बार सुना चुका है. हर बार जब वो गाँधीजी से मुलाकात कीघटलना सुनाता है तो गाँधीजी हर कहानी में राधेअस अलग अलग बात कहते थे – कई बार गाँधी जी ने सिफर्ग् नमस्ते कहा और राधे लौट आया. और कर्ठ बार राधे गाँधीजी के साथ खाना खा चुका है …. कई बार गाँधीजी उससे कुछ कहना चाहते थे पर रराधे को गाँव वापस आने की की जल्दी थी ….. और एक बार तो गाँधीजी ने राधे से कहा कि राधे – मैं बहुत थक चुका हूँ राधे अब तुम गाँधी बन जाओ. सोना बीनते वक्त मैं राधे से कम ही बोलता था पर एक बार मैंने कहा राधे तुम सोना क्यों बीनते हो, तो राधे ने जवाब दिया कि वो मरने के पहले एक बार वैष्णोदेवी माँ के दर्शन करना चाहता है. मैंने पूछा कितने पैसे चाहिए तुम्हें वैष्णोदेवी जाने के लिए. उसने कहा कम से कम हजार तो लगेंगे ही. मैंने कहा तो तुम्हारे पास हजार रूपये नहीं है. राधे ने कहा है ना ………… अरे ये क्या बात थी मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने कहा जब तुम माँ के दर्शन करना चाहते हो और तुम्हारे पास पैसे भी है तो जाते क्यों नहीं ……………… राधे चुप हो गया …………… ये चुप्पी अजीब थी सो मैंने भी टोका नहीं ……………….. राधे ने धीरे से कहा ………………… गाँधीजी से मिलने के कुछ समय बाद गाँधीजी की मृत्यु हो गई थीतब मुझे बहुत दुख हुआ . हमारे गाँव में गाँधी पार्क और उनकी पत्थर की मूर्ति स्थापना हुई, मुझे लगा गाँधीजी ने जरूर मरते वक्त कहा हो कि मेरी मूर्ति राधे के गाँव में जरूर लगाना ….. मैं घंटों उनकी मूर्ति के सामने खड़ा रहता था, गाँधीजी भी मेरी तरफ घंटों देखते रहते थे. मुझे लगा वो मुझसे कुछ कहना चाहते हैं …………. पर चूंकि पार्क में बहुत भीड़ होती है इसलिए कुछ कह नहीं पा रहे हैं. ……. फिर एक रात वो मेरे सपने में आए . ……… असल में वो नहीं आये, उन्होंने ही मुझे अपने आश्रम में बुला लिया ………. मैंने देखा गाँधीजी और बहुत सारी भीड़ है उन्होंने मुझे देखा और बोला राधे …………. मैंने प्रणाम किया उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और धीरे से कान में बोले ……… बेटा मैं नहीं जा पाया पर तू एक बार वैष्णो देवी जी चला जा माँ से मिल आ मैं दंग रह गया ये गाँधीजी मुझसे क्या कह रहे हैं? मैंने गाँधीजी की तरफ देखा तो देखता क्या हूँ ? गाँधीजी कबूतर बन गये और उड़ने लगे ……… अचानक नींद खुल गई सुबह होते ही मैं तुरत गाँधीजी से मिलने गाँधी पार्क गया तो देखा वही कबूतर गाँधीजी के सर पर बैठा है ………………………. सपना सच्चा था ………………. एकदम सच्चा …………. उस वक्त तक मैं एक बार ही गाँव के बाहर गया था सो बहुत डरा हुआ था. बहुत कोशिश की पर उस वक्त मैं जा नहीं पाया और अब जाना भी नहीं चाहता …….. क्योंकि मैंने अपना पूरा जीवन चाहे जैसा भी हो एक ही आशा में जिया है कि एक दिन मैं वैष्णव देवी जाउंगा ………… जरूर जाउंगा और अब अगर मैं चला गया तो फिर मैं ये सारे दिन कैसे बिताउंगा. जिस आशा में मैं जिया हूँ. वो आशा पलते-पलते बड़ी हो गई है मेरे बेटे जैसी. अब इस उम्र में मैं अपने बेटे की हत्या तो नहीं कर सकता ना. चींटियां दिखती है, वो चींटियां के साथ खेलता है और फिर उठता है. मुझे याद है कि गाँधीजी के बारे में मैंने अपने स्कूल में पढ़ा था हमारे मा-साब. गाँव में टीचर को मा-साब कहते हैं. बड़े नीरस ढंग से गाँधीजी के बारे में बताते थे. ना मा-साब को गाँधीजी के बारे में बताने में और ना ही हमको गाँधीजी के बारे में सुनने में मजा आता था और मुझे तो बिल्कुल भी नहीं .क्योंकि तब तक मैं रघु के विशाल और चमकदार संसार में प्रवेश कर चुका था. रघु…. रघु ……… रघु ………… रघु नहीं था वो एक चमत्कार था. वो बहुत खूबसूरत था उससे सब डरते थे क्योंकि पहले तो उसके पिताजी पुलिस थे जो तबादले की वजह से हमारे गाँव में आ गये और दूसरा पूरे गाँव में रघु ही था जो अंगे्रजी में थोड़ा बहुत बोल लेता था. हमारे स्कूल के मा-साब भी उससे डरते थे. क्योंकि उसकी अंग्रेजी का हमारे हिंदी के मास्टरों के पास कोई जवाब नहीं था. मेरे लिए रघु कक्षा ९ से कक्षा ११ तक कृष्ण था जिसकी बांसुरी पर मेरे जैसी कई गायें रघु के आगे पीछे मंडराती थी मेरे लिए वो हिरण, बब्बर शेर और घोड़े का अजीब मिश्रण था. वो हमेशा क्लास में लेट आता था और उसके आने के पहले वो नहीं उसकी आवाज़ आती थी. घोड़े जैसी टप ……….. टप …………. टप………….. ये उसके हील वाले लम्बे जूते थे. जैसे ही वो क्लास के दरवाजे पर प्रकट होता था तो उसके बब्बर शेर जैसे बालों को देखकर मा-साब अपनी कुर्सी छोड़ देते थे. वो एकदम चुस्त कपड़े पहनता था. वो बहुत अलग था पूरा गाँव एक तरफ औश्र रघु एक तरफ वो बहुत रंगीन था. और वो भारतीय नहीं किसी विदेशी भगवान को मानता था, जिसकी तस्वीर उसने अपने घर मेंं चारों तरफ लगा के रखी थी. बार -बार वो कहता था “वो भगवान है, वो भगवान है, वो भगवान है! एक बार वो कह रहा था उसके भगवान में फुर्ती है कि वो जब सोने जाते हैं ना तो जैसे ही बटन बंद करते हैं तो बल्ब बाद में बुझता है पहले वो सो जाते हैं. एक दिन भीड़ में गाय जैसी आवाज़ निकालकर मैंने रघु से पूछा – रघु कौनसा धर्म चलाते हैं तुम्हारे भगवान. वो हंसा बहुत हंसा काफी देर हंसने के बाद उसने अंग्रेजी में एक शब्द कहा मेरी समझ में नहीं आया. मेरा और रघु का रिश्ता कृष्ण और उसकी गाय जैसा ही था. हम दोनों ने कभी सीधे एक दूसरे से बात नहीं की थी. मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी. मैंने अपने ट्रक वाले दोस्त से रघु के बारे में बहुत सारी लिखी थीं. मैं उस वक्त घर सिर्फ सोने जाता था. खाना पीना भूल चुका था. मैं बस मैं बस रघु का पीछा किया करता था. उसके पास एक अजीब सी खूबसूरत लाल रंग की साइकिल थी. जब वो अपने हील वाले जूते और लाल चुस्त टी शर्ट पहनकर साइकिल चलाता था क्या दिखता था. मैं उसके पीछे भागता रहता था. उसकी साइकिल की घंटी की आवाज़ सुनने. जब वो अपनी साइकिल खड़ी करके कहीं जाता था तो मैं धीरे से उसकी साइकिल की घंटी बजा देता था. क्या आवाज़ थी उसकी घंटी की. हमारे गाँव की साइकिलों जैसी नहीं जो टन टन बजती थी. उसकी घंटी तो ट्रिंग ट्रिंग बजती थी. पर एक दिन उसने स्कूल में घोषणा कर दी कि वो गाँव छोड़कर जा रहा है. क्योंकि उसके पिताजी का तबादला शहर हो गया है. मैं उसी वक्त क्लास में रो दिया और धीरे से नहीं जोर से चिल्ला चिल्ला कर और कहता रहा – नहीं रघु नहीं तुम मुझे छोड़ के नहीं जा सकते. तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो ? नहीं – नहीं जब मैं चुप हुआ तो पूरी क्लास मेरे उपर हंस रही थी. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया. मैं उठा और क्लास से निकल गया. पर जाते वक्त एक बार मैं रघु का चेहरा देखना चाहता था – कहीं वो भी मेरे उपर नहीं हंस रहा है. पर मेरी हिम्मत नहीं हुई मुझे अपना किया बहुत बुरा और शर्मनाक लगने लगा. सुबह-सुबह उठा तो राधे से लिपटकर खूब रोया. राधे ने मुझे समझाया और कहा – कोई बात नहीं ऐसा तो होता है रोते नहीं. जब मैं भी गाँधीजी से विदा ले रहा था तो वो भी मेरा जाना बर्दाश्त नहीं कर पाये. उनकी आँखों में आंसू थे. मतलब वो समझ ही नहीं रहा है कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ. तब पहली बार मैं राधे पर नाराज हुआ और उठकर सड़क के उस तरफ चला गया और एक ट्रक के पास घंटों खड़ा रहा. मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया. कुछ दिनों बाद एक हवलदार घर पर आया. मैं घबरा गया उसने माँ से पूछा राजकुमार है. मेरे दिमाग में सीधे अपनी ट्रक वाली गलती याद आई. मैंने सोचा पकड़ा गया. अब सबको पता लग जाएगा कि मैं उन सबके बारे में क्या सोचता हूँ. मुझे जेल में जाने का डर नहीं था लेकिन ये कल्पना ही अपने आप में बहुत डरावनी है कि सबको पता लग जाए कि आप सब के बारे में क्या सोचते हैं? ये सबके सामने नंगा होने जैसा है. मैं डरते हुए उस हवलदार के सामने गया. मैंने कहा – जी मैं ही राजकुमार हूँ. वो हंसा – उसने मुझे एक बैग दिया और कहा – ये रघु साहब जाने से पहले आपको देने को कह गये थे – अच्छा नमस्ते. चला गया. मैंने बैग खोला तो देखता क्या हूँ उसमें रघु के हील वाले जूते थे और उसके भगवान की फोटो. राजकुमार ब्रूस ली की फोटो निकालता है उसे दण्डवत प्रणाम करता है. रघु के जूते मैं ज्यादा पहन नहीं पाया क्योंकि वो मुझे काटते थे. लेकिन जब तक मेरा पैर सूज नहीं गया मैंने उन्हें पहनना नहीं छोड़ा एक दिन पुंडलिक ने मेरा सूजा हुआ पैर देखा मुझे लगा उसे बहुत दुख होगा – पूछेगा क्या हुआ, पर नहीं उसने कुछ नहीं पूछा सिर्फ मेरे पैर की तरफ देखा मुस्कुराया और पलट कर खिड़की की तरफ देखने लगा. फिर धीरे से पलटा मुस्कुराया और बोला - जूता जब काटता है तो ज़िंदगी काटना मुश्किल हो जाता है. और जूता काटना जब बंद कर दे तो वक्त काटना मुश्किल हो जाता है. उस दिन पहली बार मैंने अकेलापन महसूस किया. क्योंकि यहाँ कोई मेरे साथ नहीं रहता था. ऐसा वक्त मुझे याद नहीं जब मैं बोल रहा हूँ कोई और सुन रहा हो. ये अलग बात है कि मेरे पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं. पर पुंडलिक भी कभी मेरे साथ नहीं रहा हमेशा मैं ही उसके साथ रहा हूँ. राधे की गाँधी की बातें अभी तक खत्म नहीं हुई थी. वहाँ भी मैं चुप रहता था. माँ की नाव में अभी तक पानी खत्म नहीं हुआ था. ट्रक वाला दोस्त था जिससे मैं अपनी सारी बातें कह देता था. पर वहाँ उस तरफ वो इसे पढ़ रहा है इस बात पर मुझे पहली बार संदेह हुआ. जूते घर के कोने में कई दिनों तक पड़े रहे वो कतई घर का हिस्सा नहीं लगते थे. बाद में घर ने उन्हें अपना हिस्सा बना लिया और ये नेक काम मेरी माँ ने ही किया. उन्होंने उन लम्बे हील वाले जूतों को दो गमले का रूप दे दिया. मैं देखता रहा. मुझे बहुत बुरा लगा. वो रघु के जूते थे. मेरे रघु के. पर मैंने कुछ नहीं कहा. क्योंकि जो संवाद हमारे बीच पहले ही तय हो चुके थे. मैं उन्हें अब तोड़ना नहीं चाहता था. (चींटियां दिखती हैं. वो चिंटियों के साथ खेलता है और फिर उठता है ) आप को लग रहा होगा कि मैं क्या कर रहा हूँ. मैं खेल रहा हूँ हाँ, सच में खेल रहा हूँ एक दिन क्या हुआ कि अचानक घर पे बैठे बैठे मैंने एक रेल देखी चींटियों की रेल जो एक के पीछे एक रिद्म में चली जा रही थी. मैं उनका पीछा करता गया कुछ समझ में नहीं आया कि वो कहाँ से आयी है और कहाँ को जा रही है. पर वो सब एक ही लाईन में चल रही थी. मैं शक्कर के पाँच दाने ले आया. फिर वो खेल शुरू हुआ. मैंने घर का दरवाजा बंद करके पूरे बाहर को बंद कर दिया तो भीतर की दुनिया मुझे साफ़ दिखने लगी. अब मैंने उस रेल के बगल में शक्कर के दाने जमाने शुरू किये पहले दो दाने पास पास तीसरा दूर चौथा और दूर पाँचवा सबसे आखिर में. दो तीन चींटियां उन शक्कर के दानों की ओर मुड़ने लगी रेल घूम चुकी थी जैसे ही चींटियां पाँचवे दाने पर पहुंचती थी मैं शुरू के दो दाने उठा लेता था और वो पाँचवे दाने के आगे रख देता था इस तरह मैं उन चींटियों की रेल को किसी भी तरफ घुमा देता था. बड़ा मजा आता था कि कोई है जो आपके इशारे पर घुम रहा है. सिर्फ शक्कर के पाँच दानों पर. ये मेरा सबसे पसंदीदा खेल था जो मैं रोज खेलता था. पुंडलिक जबसे हमारे यहाँ आया था बहुत कम ही कहीं जाता था. कभी कभी शहर में अपने दोस्त ताराचंद जैसवाल को मिलने जाता था और एक दिन में लौट आता था. मैं उसके सामने अपना चींटियों वाला खेल नहीं खेल पाता था ना, मैं कभी गाँव से बाहर नहीं गया. क्योंकि राधे ने मुझे बताया था कि गाँव के बाहर बहुत खतरा है. बाहर जाकर खाना भाषा लोग सब बदल जाते हैं. देखते नहीं हमारे गाँव के दोनों तरफ शहर है और उन शहरों की भीड़ कैसे हमारे गाँव की सड़क पे दौड़ती रहती है. पुंडलिक जब मेरे साथ बात करता था तो मुझे लगता था वो राजु मेरा नाम लेकर अपने से ही बात करता है. क्योंकि मैं कभी-कभी उठकर चला जाता था और जब वापिस आता था तो देखता था पुंडलिक अभी भी राजू नाम ले लेकर बात कर रहा है. वो अजीब से अकेलेपन का शिकार था. ये मैंने नहीं सोचा उसी को खुद से कहते हुए सुना है. एक बार वो एक अजीब सी चीज खुद को पढ़कर सुना रहा था – एक कुता अपनी ही दुम को काटने की कोशिश करता है. तब एक तरह का कुता – चक्रवात शुरू होता है. जो तभी खत्म होता हैजब इस तूफान से कुता कुते के रूप में निकल आता है. खालीपन – ये कुता मेरी और मैं उसकी आँखों में देखता हूँ. पुंडलिक बताता है कि वो घोषित कवि हुआ करता था. उसने हर तरह की कविता लिखने की कोशिश की दर्द भरी रोमाँस वाली, बच्चों पर, पर्यावरण पर, पत्थर पर, फूल पर पर किसी ने कौडी तक को नहीं पूछा. बाद बाद में तो लोग उसे देखकर भागने लगते थे. पुंडलिक चिल्लाकर कहता था. नहीं भाई अब मैं कोई कविता नहीं सुनाउंगा. पर कोई भी नहीं रूकता था. जो लोग रूक जाते थे पुंडलिक उन्हें घुमारिफराकर एक कविता सुना देता था. पुंडलिक बताता है कि लोग उसका मजाब उडड़ाने लगत थे. जिस घर में वो घुसता था. वहाँ से ची,ा पुकार की आवाजें लोगों को बाहर तक सुनाई देती थीं पुंडलिक ने बच्चों पर भी कविताएं लिखही थ्साी. सो मोहल्ले में बचें ने खेलना बंद कर दिया था. हर बच्चा पुंडलिक नाम से डरता थ .लोग उसके घर पर सब्जी, किराना सब पहुंचा देते थो क्योंकि कोई भी आदमी किसी भी बहाने से पुंडलिक की कोई भी कविता नहीं सुनना चाहता था छापना तो दूर की बात. आजकल पुंडलिक की कोई भी कविता नहीं सुनना चाहता था. छापना तो दूर की बात. आजकल पुंडलिक अपनी कविताएँ सुना कर मेरी तारीफ नहीं करता था बल्कि गुस्सा हो जाता था. एक बार कविता सुनाने के बाद उसने पूछा – क्यों कविता अच्छी नहीं लगी तुम्हें? मैंने कहा – नहीं अच्छी थी. उसने कहा – तो फिर गुस्से में क्यों देख रहे हो ………. अरे अजीब बात है. उसी ने मुझसे कहा था कि मैं तुझे गम्भीर श्रोता बनाना चाहता हूँ. वैसे भी आपको पता ही है कि गम्भीर शब्द मुझे कितना पसंद है. गम्भीर क्या शब्द है. पर भैय्या जब आप हतप्रभ भाव पर थोड़ा गम्भीर भाव लाने की कोशिश करते हैं तो आपका चेहरा थोड़ा ऐसा दिखने लगता है. पर मैं गम्भीर होने की पूरी कोशिश करता था. (चींटियां दिखती हैं, वो चींटियां के साथ खेलता है और फिर उठता है) एक दिन जब मैं अपना चींटियों वाला खेल खेल रहा था. तब अचानक मुझे लगना लगा कि मैं चींटी हो गया हूँ. मुझे अजीब लगने लगा. मुझे लगा कि कहीं खेलते खेलते मेरी अकल भी चींटिंयों जैसी तो नहीं हो गई. तभी मेरी नजर शक्कर के दानों पर पड़ी. तो देखता क्या हूँ, कि वो शक्कर के दाने, दाने ना होकर रघु, पुंडलिक, राधे, माँ और मेरा ट्रक वाला दोस्त हो गये हैं. और मैं उनके पीछे भागने लगा. इसका मतलब ये हुआ कि कोई है जो कोई है जो मेरे साथ खेल रहा है. जबकि मैं खेल नहीं रहा हूँ. जैसा कि मै चींटियों के साथ खेलता हूँ, जबकि चींटियां मेरे साथ नहीं खेल रही होती है. क्या पता शायद चींटियां भी किसी के साथ खेल रही हो, जबकि वो चींटियों के साथ नहीं खेल रहा हो. मतलब सभी, सभी के साथ खेल रहे हैं. इसका मतलब पुंडलिक भी मेरे साथ खेल रहा है. अब आपको मेरी समस्या समझ में आयेगी ………….. समस्या ……… मेरे लिये बहुत बड़ी समस्या है जिसके लिए मैं ये सब कर रहा हूँ. ये समस्या पुंडलिक के रूप में मेरे पास आई. दरअसल पुंडलिक अपना कविता संग्रह छपवाना चाहता था. शहर में कोई ताराचंद जैसवाल उसका दोस्त था जो संग्रह छपवाने में पुंडलिक की मदद कर रहा था. वैसे मैंने तो उसकी सारी कविताएँ सुनी थी. कुछ तो इत्ती बार कि आज भी मुझे जबानी याद है. समस्या की शुरूआत तब हुई जब पुंडलिक घर छोड़ के जा रहा था. जाते वक्त मैंने देखा उसके एक हाथ में उसकी डायरी जिसमें वो कविताएँ लिखता था और एक खत और दूसरे हाथ में मेरी माँ की फोटो और गीता थी. वो ये सब लेकर मेरे पास आया. मुझसे कहा अपने दोनों हाथ इस पर रखो और कसम खाओ …………… कसम खाओ ……… अपनी माँ की इस गीता की मेरी कविताओं की कि तुम मेरा कविता संग्रह जरूर छपवाओगे. मैं कसम खाउं. इससे पहले मैंने देखा कि उसने अपना सामान भी बांध लिया था. मैंने कहा – कहाँ जा रहे हो पुंडलिक? हमारे गाँव से शहर वैसे भी बहुत दूर नहीं था मतलब सामान बांधने जितना दूर तो बिलकुल भी नहीं था. मेरे सवाल का पुंडलिक ने कोई जवाब नहीं दिया. उसकी आवाज़ अज़ीब-सी होती जा रही थी. और वो कसम खाने पर जोर देता रहा सो मैंने कसम खा ली. विद्या माता की, धरती माता की, कविताओं की कसम, गीता की कसम ….. और भी दो तीन कसमें मैंने जोश में अपनी तरफ से और खा ली. मेरा क्या जाता था. कविता संग्रह पुंडलिक का था, ताराचंद जैसवाल उसे छापने वाला था. मैं कौन था? असल में मैं कोई भी नहीं था पर मेरी एक बात समझ में नहीं आई कि पुंडलिक मुझे कसम खाने की क्यों कह रहा है कि तुम मेरा कविता संग्रह छपवाना. असल में कसम खा कर मैं इस चक्कर में पूरी तरह से फंस चुका था. कसम की रसम पूरी होते ही पुंडलिक का चेहरा खिल उठा. उसने माँ की फोटो और गीता एक कोने में फेंक दी. और अपना सामान उठाकर निकल गया. दरवाजे पर पहुंचकार उसे ध्यान आया कि मैंने उससे कुछ पूछा था – कहाँ जा रहे हो पुंडलिक ? वो पलटा और बोला – पहले शहर जाकर तारचंद जैसवाल को ये कविताएँ और ये चिट्ठी दूंगा जिसमें मैंने इन कविताओं और तुम्हारे बारे में सब कुछ लिख दिया है. उसके बाद वहीं से सीधे तीर्थयात्रा और फिर सन्यास ये कहकर वो मेरे गले लग गया और कान में धीरे से बोला – मै तुम्हें कुछ देना चाहता था,मेरे जाने के बाद वो तुम्हें मिल जाएगा. धन्यवाद. नमस्ते. और वो चला गया. कविताओं के बारे में तो ठीक है पर मेरे बारे में चिठ्ठी में क्यों लिखा है ? मुझे वो क्या देना चाहता है और क्यों ?? मैने तो सिर्फ उसकी कविताऐं सुनी थी और आधी से ज्यादा तो समझ में भी नहीं आई. अगर सुनने वाले का चिठ्ठी विठ्ठी में जिक्र होता तो मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, पर एैसा नहीं था मैं पूरी तरह फंस चुका था। कैसे पुंडलिक ने मुझे इस समस्या में फंसाया इसका पता कुछ दिन पहले आई ताराचंद जैसवाल की चिठ्ठी से लगा. मतलब पुंडलिक मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता है, मुझे यकीन नहीं हुआ. मैं मानता हूँ मैं बहुत उपयोगी आदमी नहीं हूॅं, पर मेरा उपयोग कोई ऐसे कर सकता है इसका विश्रवास मुझे नहीं हुआ. पता है पुंडलिक ने मेरे साथ क्या किया? ताराचंद जैसवाल की चिठ्ठी में क्या लिखा था? ? ये रही उनकी चिठ्ठी. वैसे चिठ्ठी तो काफी बड़ी है. पर मुख्य बातें आपको सुना देता हूँ। (पढ़ता है ) राजकुमार ……….. कवि हृदय महान कवि को मेरा नमस्कार. आपकी कविताएं पढ़कर काफी खुशी हुई. पुंडलिक आपकी कविताओं के बारे में पहले भी मुझे बता चुके हैं. सारे लोग आपकी कविताओं की तारीफ कर रहे हैं. अगले महीने तक संग्रह छप जाएगा पर एक परेशानी है, संग्रह में एक कविता कम पड़ रही है ऐसा मैं नहीं हमारे संपादक महोदय सोचते हैं. आप तो बड़े कवि हैं इस संग्रह के बाद तो आपका नाम बड़े बड़े कवियों के साथ लिया जाएगा. कृपया कर एक कविता जल्द से जल्द भेजने का कष्ट करें. मेरी बेटी आपकी कविताओं की दीवानी है. शादी करने के बारे में क्या विचार है आपका ? पुंडलिक आपकी काफी तारीफ़ करता था दर्शन कब होंगे. संग्रह में आप अपना नाम राजकुमार ही लिखेंगे या कोई उपनाम भी जोड़ेंगे. बता दीजिएगा. आपका अपना ताराचंद जैसवाल. मतलब अब समस्या एक भयानक रूप ले चुकी है मैंने कसम क्यों खाई. अब पछता रहा हूँ कसम की छोड़ो मैं तो खुद चाहता हूँ कि पुंडलिक का कविता संग्रह छपे. मगर इस तरह से ……….. नहीं … मैंने क्या क्या नहीं किया, मैं कई दिनों से पुंडलिक की किताबों की तलाशी ले रहा हूँ. कि कहीं वो चार लाईन – दो लाईन – एक लाईन लिखी छोड़ गया हो. पर कहीं कुछ नहीं मिला. फिर मैंने पेन उठा लिया और पुंडलिक की तरह सोचते हुए लिखना शुरू किया …………….. खर-खर, फर-फर, छर-छर ……… मैं इसके आगे बढ़ ही नहीं पाया ……………. असल में मेरे जीवन में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ……… जिसके बारे में मैं लिखूं या जिससे लडूं. मुझे सब कुछ याद है जो अभी तक हुआ है पर यकीन मानिये – वो कुछ नहीं हुआ जैसा है. जैसा कि पुंडलिक कहता था कि कविता लिखने के लिए जरूरी है अपने जीवन अपने अनुभवों को याद करके, उनसे लड़के, उनका सामना करके जो बात कही या लिखी जाए वही कविता है. वाह ………. वाह ……….. ना तो ये बात मुझे तब समझ आयी थी ना अब समझ में आती है. मतलब कुश्ती अब समझ में आ जाती है पर कविता अभी भी मेरे लिए आश्चर्य है. क्या लड़ना ……………. किससे लड़ना …………….. भीतर की खुदाई ये मेरे समझ के परे की बात तब भी थी अब भी है. पर अब मेरे पास दूसरा कोई चारा नहीं. मुझे ये काम अब करना ही है. पर ऐसा नहीं है मैं लिखना शुरू कर चुका हूँ. चार दिन पहले ही मैंने वो खत जो ताराचंद जैसवाल को मुझे भेजना है उसकी शुरूआत और अन्त लिख दिया है. (पढ़ता है) शुरूआत – नमस्कार ताराचंद जी. नमस्ते. कैसे हैं आप ? मैं ठीक हूँ. आप अच्छे होंगे. मेरी कविता निम्नानुसार है - अंत – उपर्युक्त कविता ठीक है. मैं भी ठीक हूँ. गलती माफ़ ये कविता भेजने के बाद मैं ये घर, ये गाँव , ये शहर, ये देश छोड़कर जा रहा हूँ. मेरा पीछा करने की कोशिश मत करना. कविता संग्रह जरूर छापना, आपको कसम है. आपका आज्ञाकारी कवि राजकुमार “गम्भीर”. गम्भीर ……………….. गम्भीर ………………… शब्द मैंने जोड़ दिया वैसे तो मुझे समस्या शब्द भी अच्छा लगता है पर कवि राजकुमार समस्या गम्भीर ये नाम शायद अच्छा नहीं होगा. सो मैंने समस्या निकाल दिया. कवि राजकुमार गम्भीर नाम ठीक है. इतना काम मैंने तो कर दिया – कविता कैसे लिखूं ? लिखना ही है सभी रास्ते बंद है सीधी लम्बी सड़क है. छुपने के लिए कोई पगडंडी, गली, कुचा कुछ भी नही है. सो मुझे आगे बढ़ना है और लिखना है. अगर एक कसम खाई होती तो कसम से मैं वो कसम शायद तोड़ भी देता. पर जोश में खाई हुई सारी कसमें अब भूत बनकर मेरे ही पीछे पड़ गईं. अरे गाँधीजी मेरी रक्षा करो, ओ भगवान मेरी रक्षा करो ……… नहीं नहीं मेरी रक्षा ये नहीं कर सकते. एक कवि ही कवि की रक्षा कर सकता है. अब सिर्फ पुंडलिक ही मुझे बचा सकता है. उसने कहा थ्ज्ञा कि अपने से लड़ो सो मैं लड़ रहा हूँ. पुंडलिक ने जब मुझे अपनी माँ के बारे में बताया कि कैसे उनके अंतिम दिनों में उसने उनकी सेवा की तो मैं भी कल्पना करने लगा कि मैं माँ के अंतिम दिनों में माँ के लिए क्या क्या करूंगा. सबसे पहले तो मैं उनका मग्गा उनके हाथ से छीनकर कहीं दूर फेंक आऊंगा. और एक बार अपने हाथों से उन्हें लाल रिबन पहना कर फिल्म दिखाने ले जाउंगा. क्योंकि मेरी बड़ी इच्छा थी ये देखने की कि माँ फिल्म कैसे देखती होंगी. कैसे टिकट की लाईन में लगती होगी. इन्टरवल में क्या करती होगी और उनके लाल रिबन का फिल्म देखने से क्या ताल्लुक है. पर मेरी ये सारी इच्छाएँ, इच्छाएँ ही रह गई. क्योंकि एक सुबह जब मैं उठा तो देखा माँ अपने पलंग पर नहीं थी वो दरवाजे के पास जमीन पर औंधी पड़ी थी और उनके बालों में लाल रिबन बंधा हुआ था. मैंने कहा माँ – माँ पर वो उठी नहीं फिर मैंने मदर भी बोला पर वो हिली भी नहीं. मैं डर गया. मैं पुंडलिक को उठाने गया पर उसके पहले मैंने माँ के बालों से लाल रिबन निकालकर अपनी जेब में रख लिया. मैं नहीं चाहता था कि उनकी फिल्म देखनेवाली बात किसी और को पता चले. पुंडलिक आया. उसने घोषणा कर दी कि तैयारी कर लो तेरी माँ मर गई. ऐसा कैसे हो गया – कौनसी तैयारी और ये संभव कैसे हो सकता है. मुझे दुख नहीं आश्चर्य हो रहा था क्योंकि मुझे अपनी नहीं चिन्ता इस घर की थी. क्या ये घर कुछ नहीं कहेगा. क्योंकि माँ हमारे साथ नहीं इस घर के साथ रहती थी. शायद घर को पहले खत्म होना चाहिए था. शायद इसलिए माँ पलंग पे नहीं नीचे जमीन पर घर की गोद में मरी थी. तैयारी कर लो कहकर पुंडलिक चला गया. मुझे अकेला माँ के साथ छोड़ के. मैं क्या करता ? मैंने उन्हें पलटाया उनके सर के नीचे एक तकिया रखा और उनकी सूखी कड़क देह को देखने लगा ………………. इसी ने मुझे पैदा किया है – अजीब लगता है ना. पुंडलिक अर्थी का सामान और कुछ लोगों को लेकर आया. मैं रो नहीं रहा था पर सभी लोग मुझसे कह रहे थे. घबराओं नहीं ऐसा होता है – सब ठीक हो जाएगा वगैरह वगैरह. फिर मेरा सिर मुंडवाया गया और मैंने माँ को अग्नि दी. मैं अपनी माँ को जलते हुए देख रहा था. अचानक लकड़ियों के बीच मुझे उनका हाथ दिखा. मुझे लगा वो अपना मग्गा माँग रही है. मेरी इच्छा हुई कि उनका मग्गा लाकर उनके हाथों में पकड़ा दूं या कम से कम अपनी जेब से लाल रिबन निकालकर उनकी चिता में ही डाल दूं. पर मेरी हिम्मत नहीं हुई. मैं चुपचाप उनका जलना देखता रहा. वो जलती हुई लकड़ियों के बीच मेरी माँ है जो जल रही है. जब मैं घर लौट रहा था तो लगा शायद घर नहीं होगा. वो गिर चुका होगा या कहीं न कहीं कोई दरार तो जरूर पड़ी होगी. पर ऐसा कुछ नहीं था. सब कुछ सामान्य था. धूप चेहरा जला रही है परछाई जूता खा रही है शरीर पानी फेंक रहा है एक दरख्त पास आ रहा है उसकी आंचल में मैं पला हूँ उसकी वात्सल्य की साँस पीकर आज मैं भी हरा हूँ. आप विश्वास नहीं करेंगे पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है. मैं इसे माँ कहता हूँ. आजकल राधे काफी उदास रहता था. वो अपना काफी समय गाँधी पार्क में गाँधीजी के साथ बिताता था. कहता था आजकल वो और गाँधीजी काफी बातें करते हैं. पर गाँधीजी ने मेरी बात समझकर मुझे माफ भी कर दिया अब गाँधीजी वैष्णोदेवी जाने की जिद कम ही करते हैं. पर वो उदास था क्योंकि आजकल इस गाँव में वैष्णोदेवी जाने का मौसम था. लोग वैष्णोदेवी जा रहे थे वहाँ से लौट के आ रहे थे पर लोग राधे को भगा देते थे. राधे का भी एकदिन अचानक आना बंद हो गया था. घर के सामने धूल ही धूल जमा हो गई थी. राधे आ नहीं रहा था मुझे लगा इस धूल में राधे का कितना सारा सोना बिखरा पड़ा होगा. मैंने झाडू लगाकर वो सारी धूल इक्ट्ठी कर ली सोचा जब राधे आयेगा तो ये सारी धूल उसे दे दूगा. वो बहुत खुश होगा. पर राधे नहीं आया. फिर अचानक एक दिन वो आ गया मैंने पूछा राधे कहाँ थे इतने दिनों? वो कुछ नहीं बोला – चुपचाप बैठा रहा. मैंने कहा मैं गाँधी पार्क भी गया था. तुमको देखने पर तुम वहाँ भी नहीं दिखे तब भी वो चुप रहा. शायद वो जवाब नहीं देना चाहता था. सो मैं भी चुपचाप बैठा रहा. और मैंने जो इतने दिनों से धूल जमा करके रखी थी उसे लेने से भी राधे ने मना कर दिया. उसने कहा कि अब ये मेरे किसी काम की नहीं है. ये कहते ही वो एक सफेद पोटली बन गया और मेरे सामने लुढ़कने लगा. जब राधे इतने दिनों नहीं आया था तब मैंने पहली बार अपने जीवन में किसी का ना होना महसूस किया था. वैसे तो पुंडलिक भी चला गया था माँ भी नहीं रही. पर उनके जाने के बाद उनका ना होना मैंने कभी महसूस नहीं किया. जब तक राधे नहीं आया था मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरे अंदर इतनी खाली जगह छूट गई है कि मुझे अपनी ही आवाज़ गूंजती हुई सुनाई दे रही थी. बस यही है जो है. इसके अलावा मेरे जीवन में ऐसा कुछ नहीं हुआ है. जिसका जिक्र किया जा सके. कुछ छुटपुट बातें और है जैसे एक कुता घर के पिछवाड़े रोज मुझसे मिलने आने लगा. मैं भी शाम को उसके साथ समय बिताने लगा. अभी कुछ ही दिन हुए थे. मैं अभी उसका नाम रखने की सोच ही रहा था कि उसने अचानक आना बंद कर दिया. बस अब राधे है. मेरा ट्रक वाला दोस्त है और मैं हूँ. हम तीनों है और खुश हैं. लड़ाई खत्म. बस इतना ही मेरे साथ हुआ है. मतलब इतना ही हुआ है जो मुझे याद है जिसे सुनाया जा सके. पर इतने के बाद भी मेरी समझ में ये नहीं आया इसमें ऐसा क्या है जो कविता है . पुंडलिक कवि है कविता नहीं है. मेरी माँ भी मेरी माँ ही है. वो गोर्की की या पुंडलिक की माँ जैसी नहीं है. मेरी माँ के साथ घटनाएं हैं कविता नहीं है. राधे राधे है. जो गाँधी पार्क में लगी गाँधीजी की मूर्ति की लाठी है. उससे ज्यादा राधे कुछ नही है. ट्रक वाला दोस्त के बारे में मैं चुप रहना ही पसंद करता हूँ. रघु मेरे लिए चमत्कार था, चमत्कार है और चमत्कार रहेगा वो मेरा रघु है. पर कविता, वो तो कही नहीं है. मैं अपने से जितना लड़ सकता था लड़ा. ये कविता कहाँ छुपी है. इतनी सारी कसमें खा चुका हूँ. क्या होगा उनका ? ताराचंद जैसवाल वहाँ इंतजार कर रहा है. मैं यहाँ एक शब्द भी नहीं लिख पा रहा हूँ. पुंडलिक मुझे माफ कर देना. मुझसे नहीं होगा. कसम वसम चूल्हे में भसम ……………. सड़ी सुपारी बन में डाली सीताजी ने कसम उतारी. नहीं नहीं ये कुछ काम नहीं करेगा ये सब मैं अपने आपको बहलाने के लिए कर रहा हूँ. मैं एक तरह का खेल अपने साथ खेल रहा हूँ. ये खेल कब तक चलेगा. मुझे लिखना है और मैं अभी लिखकर रहूँगा. तैयार ………… अब ताराचंद जैसवाल ये रही आपकी चिट्ठी पूरी तरह पूरी. अब आपको जो समझना हो समझो. (पढ़ता है) शुरूआत – नमस्कार ताराचंद जी. नमस्ते. कैसे हैं आप ? आप अच्छे होंगे. मेरी कविता निम्नानुसार है …………… शक्कर के पाँच दानें जादू है जिनके पीछे चींटियां भागती है दो दानों पर पहुंचती है तीन आगे दिखती हैं. सारी चींटियों को बुला लेती हैं. पाँचवे दाने पर पहुंच जाती है पर पीछे के दो दानों को भूल जाती है फिर वही दो दाने आगे मिलते हैं. वो जादू में फंस जाती है. और घूमती रहती है. ये खेल कभी खत्म नहीं होता. क्योंकि चींटियां तलाश रही हैं खेल नहीं रही हैं. जादूगर एक है जो खेल रहा है. अंत - उपर्युक्त कविता ठीक है. मैं भी ठीक हूँ. गलती माफ, ये कविता भेजन के बाद मैं ये घर, ये गाँव , ये शहर, ये देश छोड़कर जा रहा हूँ. मेरा पीछा करने की कोशिश मत करना. कविता संग्रह जरूर छापना – आपको कसम है. आपका आज्ञाकारी कवि राजकुमार गम्भीर. ठीक है न ………….. ? (चींटियों का खेल खेलना शुरू करता है) ब्लैक आऊट Page 1 of 16शक्कर के पाँच दानेः मानव कौल अब मैं एक तरीके से मुस्कुराता हूँ और एक तरीके से हंस देता हूँ जी हाँ मैंने जिन्दा रहना सीख लिया है अब जो जैसा दिखता है, मैं उसे वैसा ही देखता हूँ जो नहीं दिखता वो मेरे लिए है ही नहीं अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मैं एक सफल मध्यमवर्गीय रास्ता हूँ रोज घर से जाता हूँ, रोज घर को आता हूँ अब मुझ पर कुछ असर नहीं होता या यूं समझ लीजिये मेरी जीभ का स्वाद छीन गया है. अब मुझे हर चीज एक जैसी सफेद दिखती है. अब मुझे कुछ पता नहीं होता पर सब जानता हूँ का भाव मैं अपने चेहरे पर ले आता हूँ. हर किस्से पर हंसना आह भरना मैं जानता हूँ अब मैं खुश हूँ – नहीं, नहीं खुश नहीं अब मैं सुखी हूँ – सुखी. क्योंकि अब मैं बस जिन्दा रहना चाहता हूँ. अब ना तो मैं उड़ता हूँ, ना बहता हूँ, मैं रूक गया हूँ. आप चाहे कुछ भी समझे, मैं अब तटस्थ हो गया हूँ अब मैं यथार्थ हूँ, यथार्थ सा हूँ “मुझे अपनी कल्पना की गोद में सर रखकर सो जाने दो मैं उस संसार को देखना चाहता हूँ, जिसका ये संसार प्रतिबिम्ब है” अब ये सब बेमानी लगता है. अब तो मेरा यथार्थ मेरी ही पुरानी कल्पनाओं पे हंसता है. अरे हाँ, आजकल मैं भी बहुत हंसता हूँ कभी कभी लगता है यह हंसना बीमारी है पर ये सोच कर फिर हंसी आ जाती है अब सब चीज जिस जगह पर होनी चाहिए उस जगह पर है ये सब काफी अच्छा लगता है अच्छा नहीं ठीक — हाँ — ठीक लगता है. पर …….. एक परेशानी है अजीब सी अधूरी …………. क्या बताऊं Page 2 of 16आजकल मुझे रोना नहीं आता, अजीब लगता है ना मुझे अब सुख या दुख से कोई, फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि वो जब भी आते हैं एक झुंझलाहट या एक हंसी से तृप्त हो जाते हैं अजीब बात है ना ……… नहीं नहीं …………. ये अजीब बात नहीं है ये एक अजीब एहसास है जैसा कि आप मर चुके हो और कोई यकीन न करे रोज की तरह लोग आपसे बातें करें, चाय पिलायें, आपके साथ घूमने जाऐं और सिर्फ आपको ये पता हो कि आप अब जिन्दा नहीं है मैं जानता हूँ, ये एक रूला देने वाला एहसास है पर आप आश्चर्य करेंगे. फिर भी, मुझे आजकल रोना नहीं आता है. ………….. नहीं नहीं नहीं …….. ये कविता मैंने नहीं लिखी ……… अपने बस की बात है ही नहीं मतलब ऐसे भारी शब्दों को एक दूसरे से लड़ाना उनकी आपस में कुश्ती कराना और उस भीषण हिंसा से किसी एक बात को बाहर निकालना. ये अपने आप में आश्चर्य है. मुझे तो पढ़ने और सुनने में ही पसीना आ जाता है. क्योंकि भाई मेरे लिए कुश्ती और कविता में कोई खास अन्तर नहीं है, मुझे तो आज तक ये समझ में नहीं आया कि कुश्ती क्यों लड़ी जाती है और कविता क्यों लिखी जाती है. मैंने जब पुंडलिक से पूछा कि ये कैसे होता है ? तो उसने जवाब दिया कि ‘कुश्ती दरअसल बाहर से लड़ी जाती है और कविता अपने भीतर से लड़कर लिखी जाती है. मुझे उसकी बात कुछ समझ में नहीं आई और मेरे मुँह से बस – हं – तिकला. पुंडलिक समझ गया. उसने कहा राजकुमार समस्य ये नहीं है कि तुम ना समझ हो. समस्या ये है कि तुममें समझ की काफी कमी है. (चींटिया दिखती हैं, वो चींटियों के साथ खेलता है, और फिर उठता है.) समस्या – मैं समस्या के पहाड़ पर घूम रहा हूँ – क्या भाई क्या …………. समस्या क्या है ? यही तो समस्या है …………. समस्या जब आती है तो अपने साथ अपना हल भी लाती है और हल के चलते ही समस्या फिर उग आती है. कहते हैं जिसके जीवन में समस्या नहीं उसने समझो जीवन जीया ही नहीं. इसका मतलब मैंने अभी तक जीवन जीया ही नहीं था. क्योंकि मेरे जीवन में कोई समस्या कभी रही नहीं. जबकि समस्या – इस शब्द को मैं बहुत पसंद करता हूँ और हमेशा चाहता था कि मैं समस्याओं से घिरा रहूँ. चारों तरफ समस्याओं के पहाड़ हो जिनको चीरता हुआ मैं उन्हें पार कर सकूं. पर मेरी ऐसी किस्मत कहाँ कि मुझे कोई समस्या नसीब हो. कुछ दिक्कतें आई पर आप उसे समस्या जैसा खुबसूरत शब्द नहीं दे सकते. पर आजकल मैं बहुत खुश हूँ. क्योंकि इस चिट्ठी के रूप में पहली बार मेरे पास वो चीज आई हैं जिसे मैं समस्या कह सकता हूँ. आज मैं वो सारे वाक्य बोल सकता हूँ, जो मैं हमेशा से बोलना चाहता था, पर थोड़ा गम्भीर होकर ……….. मैं आज …………. वैसे ये गम्भीर शब्द भी मुझे बहुत पसंद है. गंभीर क्या शब्द है …………… नहीं ……………. पर पहले समस्या ……………. आज मैं समस्या में हूँ ………….. दुखी Page 3 of 16हूँ ……… क्योंकि आज मैं एक भयानक समस्या से घिरा हूँ ………… क्या होगा मेरा ……………… कहीं मैं आत्महत्या करने की तो नहीं सोच रहा हूँ ………… ओह ये समस्या है. कहाँ है मेरा चाकू. हो गया ……………. अब समस्या, नहीं ……… नहीं ………… समस्या को अभी जाने दो. आपको मेरी समस्या अभी समझ में नहीं आयेगी. आप कहेंगे ये भी कोई समस्या हैं ? पर भैया मेरे लिए समस्या है. इसलिए अभी समस्या नहीं पहले पहली वाली बात. लड़नेवाली. आजकल मैं लड़ रहा हूँ. मैं अभी भी लड़ रहा हूँ. पिछले कई दिनों से लड़ रहा हूँ. तो मुझे समझ में आया ये लड़ना मतलब अपने से लड़ना हो तो मैं बहुत पहले शुरू कर चुका हूँ. असल में मैंने लड़ना तब शुरू किया था जब मेरी अकल दाड निकली थी. वैसे तो अकल दाड़ जिस उम्र में निकलनी चाहिए मेरी समझो कि ये दस साल बाद ही निकली. उसी वक्त मुझे समझ में आने लगा मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे कम ही लोग पसंद करते हैं. कम याने दो चार लोग ही. उनमें से एक है मेरी माँ. क्योंकि उसको मुझे डांटने और मुझ पर खीजने की ऐसी आदत पड़ है कि वो मेरे बगैर रह ही नहीं सकती. मैं जब भी कुछ करता हूँ ………………. मतलब कुछ काम …………… उसके बाद मैं तैयार हो जाता हूँ. माँ के अजीब से चेहरे की बनावट देखने को, वो झुर्रीदार चेहरे पर और गाढ़ी होती झुर्रीयां और हाथ ऊपर करके अपने छोटे कद को विकाल दिखाने जैसे सारे माँ के नृत्यों का मैं आदि हो चुका हूँ. हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं. वैसे मैं एक मामूली कद का आदमी हूँ. पर चाहूँ तो थोड़ा लम्बा दिख सकता हूँ, थोड़े कसे हुए कपड़े और रघु के हील वाले जूते पहनकर. कुछ लोग कहते हैं कि मैं रघु के जूते और लाल वाली चुस्त टी शर्ट पहनकर जब निकलता हूँ तो ठीक ही दिखता हूँ. मैं हमेशा हर काम ठीक ही करता हूँ, और ये सब जानते हैं. जब स्कूल में रिजल्ट आता था तो माँ से पूछो तो कहती थी हाँ ठीक ही रहा उसका रिजल्ट. मैं ठीक ठाक पैदा हुआ- ठीक ठाक पला बढ़ा, असल में मैं हमेशा एक बिदू है उसी पे रहता हूँ. जो अच्छे और बूरे के एकदम ठीक बीच में होता है. जिसे आप शून्य और मैं ठीक कहता हूँ. एक बार तो स्कूल की क्रिकेट टीम के चयन के लिए मुझे टीम में ले या ना ले इस पर दो घंटे की बहस हुई. पर पहली बार मैंने अपने आप को महत्वपूर्ण समझा. बहस में आधे लोग कह रहे थे कि इसे ले सकते हैं ये बुरा नहीं खेलता. आधे लोग कह रहे थे कि इसे ना लें क्योंकि ये अच्छा भी नहीं खेलता. मैंने अन्त में जवाब दिया – सर सर मैं ठीक ही खेलता हूँ. किसी के समझ में नहीं आया अरे उनको शब्द नहीं मिल रहा था कि मैं कैसा खेलता हूँ. जब मैंने बताया कि वो शब्द ठीक है – मैं ठीक ही खेलता हूँ. तो सब मुझपर बरस पड़े कहने लगे ठीक क्या होता है – ठीक क्या होता है – ठीक कुछ नहीं होता है. तब से आज तक मैंने सिर्फ क्रिकेट खेलते हुए ही लोगों को दखा है. मेरे शरीर को देखकर बड़े से बड़ा आदमी धोखा खा सकता है. कई तो ये भी सोचते होगें कि ये तो दौड़ भी नहीं सकता. तब मैं सबको आश्चर्य में डाल देता हूँ – जब कोई भी खेल चाहे वो नया हो या पुंराना – मैं ठीक खेल के दिखा देता हूँ. पर समस्या यहीं से शुरू होती है. मैं उस बिन्दु के आगे बढ़ ही नहीं पाता हूँ. मैं पहले दिन ही ठीक पे पहुंच जाता हूँ और सालों खेलने के बाद भी ठीक पर ही रहता हूँ. माँ बताती है कि जब मैं छोटा था तो बहुत मोटा था. लोग कहते थे कि पैदा होते ही अपने बाप को खा गया इसलिए मोटा है. मुझे जब भी ये बात याद आती है तो मैं बहुत हंसता हूँ. अपने बाप को खालूं – गपर ………. गपर ……….. और हुप्प ………. मोटा हो जाउं ………………. फिर अचानक मैं दुबला होता गया उसका कारण भी माँ बताती है ………….. छोटे में मैंने रिन साबुन खा लिया था – बिस्कुट समझकर. चाट गया था ……… चप्पड …………… चप्पड़ ………. जब थोड़ी ही दूर चला था और धिप्प गिर पड़ा. तब माँ की समझ में आया कि मैं बेहोश हो गया हूँ. माँ बताती Page 4 of 16है. उसी समय उन्होंने मदर इण्डिया फिल्म देखी थी . उन्होंने मुझे गोद में उठाया और अस्पताल की ओर भाग ली. मैंने मदर इण्डिया फिल्म नहीं देखी पर माँ भागी क्यों …….. असल में मेरी माँ …… माँ की भूमिका एक बार जी भर के निभाना चाहती थी सो उन्होंने निभाई. १.५ किलोमीटर मुझ जैसे ताजे मोटे बच्चे को लेकर भागना. माँ पसीने पसीने हो गई. डॉक्टर के पास पहुंची तो डॉक्टर ने माँ को डांट दिया. डॉक्टर ने कहा – भागने की वजह से आपके बेटे ने जो रिन साबुन खाया था, वो अब झाग बनके चारों तरफ से निकल रहा है. माँ बताती है कि डॉक्टर ने दो मग्गे पानी निकाला था पीठ में से. फिर डॉक्टर ने बताया कि एहतियात बरतना – बहुत कमजोर हो गया है. कई सालों तक इसका ख्याल रखना होगा. जब तक १० साल का न हो जाए सर पर चोट नहीं आनी चाहिए – वगैरह. शायद कपडे धोने के साबुन से ही मेरी अकल दाड़ देर से निकली. अच्छा किसी को कैसे पता चलता है कि उसमें अकल आ गई ? क्योंकि ये कोई बल्ब तो है नहीं कि बटन दबाओ और कह दो कि अरे लाईट आ गई – अरे अकल आ गई. कैसे पता चलता है ?? ये प्रश्न एक दिन पुडलिक ने मुझे पूछा. मुझे लगा वो मेरी अकल देखना चाहता है मैं डर गया. मैंने ज्यदा सोचा नहीं, सोचत तो उसे लगता कि मेरे पास अकल ही नहीं है. बस थोड़ी देर में मैंने कहा अगर आपको पुराना किया चूतियापा लगने लगे ना तो समझो आपको अकल आ गई. वो हंस दिया. मुझे लगा मैंने कुछ गलत कहा. मैंने जल्दी में आगे जोड़ दिया और उसका एहसास आपको दाढ के यहाँ कहीं पीछे कोने मे होता है – ओह ! मैंने अपने जीवन में इतना शर्मनाक पहले कभी महसूस नहीं किया था. पर वो हंसा – और हंसा …… इतना हंसा कि मैं पसीने पसीने हो गया और फिर उसने अपना जवाब सुनाया – बाप रे बाप क्या जवाब था. एक-एक शब्द पहलवान का घूंसा था जो मेरे मूख्र दिमाग पे पड़ रहा था – धम धम धम. वो करीब दो घंटे लगातार बोलता रहा अब मैं दो घंटे तो नहीं बोल सकता सो मैं आपको मुख्य बातें बता देता हूँ उसने कहा था (कविता) फूल ने जुम्बिश को तेरी तेरी मेरी यहीं कहानी समझ की भंवरा आया समझ कि दाड़ में था दर्द दाँत से हाथ निकलते ही दर्द के मारे पैर बजे छन छन छन छन छन छन छन छन छन छन लेकिन तेरे दिल ने मेरे साइकिल के पहिये पर बैठा पहिया पंक्चर, अकल सिकन्दर घुटना दिमाग जब भी चलता पंखे सी आवाज़ें करता Page 5 of 16खर खर खर खर खर धरती का बोझ मेंढ़क का नाती ओंस की बूंद हाथी का दांत अकल की दाड़ मुँह का निवाला रात का चाँद सुबह का सूरज जैसा निकला, सारी की सारी चिड़िया फर फर फर फर फर फर फर फर फर फर उस दिन पुंडलिक मेरे सामने से कब उठा, कब रात हुई, कब सुबह हुई मुझे कुछ पता नहीं चला. अब मेरी ज़िंदगी का एक ही उद्देश्य रह गया था कि पुडलिक को कुछ ऐसा कह दूं कि वो हतप्रभ रह जाए. मैं उसके माथे पर पसीना देखना चाहता था. वैसे पुंडलिक भी अजीब आदमी था वो अपना जन्म दिन नहीं बनाता था. कहता था मैं पैदा नहीं प्रकट हुआ हूँ. मेरे लिए वो प्रकट ही हुआ था. वो मेरी माँ का भाई था और एक दिन अचानक मेरे घर रहने आ गया. मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. अरे मैं इतने सालो से अपनी माँ को जानता हूँ क्या मेरे अलावा भी माँ का कोई अपना हो सकता हैं? पता नहीं?? वो अपने को महान कवि कहता था और मुझे महान श्रोता. क्योकि मैं अकेला ही था पर मैं बहुत खुश था क्योंकि उसने जब मुझे अपनी पहली कविता सुनाई, तब से ही उसका तो पता नहीं पर मैं महान होता गया. पर कवि और श्रोता का हमारा सम्बन्ध थोड़ा उल्टा था, हर कविता सुनाने के बाद पुंडलिक मेरी तारीफ़ करने लगता था. क्योंकि उसको मेरे चेहरे का हतप्रभ भाव बहुत पसंद था. मेरे पास तो वैसे भी भावों की काफी क़मी थी पर ये ऐसा भाव था जिसे मैं पुंड़लिक के सामने सबसे ज्यादा चिपका देता था. क्योंकि उसकी सौ में से नब्बे बातें मेरी समझ में आती नहीं थी और जों थोड़ी बहुत समझ में आती थी, उसे बोलने में मैं डर जाता था. पुंडलिक वैसे तो कई बार मेरे सामने रोया था. उसको कुछ दुख था पता नहीं क्या पर कुछ था. लेकिन जब भी वो मेरे सामने रोता था ना तो मुझे बड़ी हँसी आती थी. मुझे लगता था कि पुंडलिक को अपना रोना बहुत शर्मनाक लगता है वो अपने रोने को अजीब तरीके से दबाता था. पुरे शरीर को विशेष मुद्रा में कड़क करके अपने मुंह को बंदरों जैसा बिचकाता रहता था और एक अजीब सी तीखी आवाज़ निकालता था ………….. ई …………. ई …… ई …….. वो अपनी माँ को बहुत चाहता था कहता था मैं अन्त तक उसके साथ रहा. मेरी माँ शायद अपनी माँ को नहीं चाहती थी. पता नहीं पर पुडलिक ने मुझे ऐसा कहा था. माँ को चाहना – मैं आज तक नहीं समझ पाया कि माँ को चाहना क्या होता है. जब मैं मेरी माँ को देखता था तो वो तो मुझे एक सूखी लकड़ी के समान औरत दिखती थी जो चुपचान घर में ढूंढ़-ढूंढ़ के काम निकालती थी. अजीब लगता है ना कई सालों से एक ही घर में लगातार काम करते जाना मुझे तो Page 6 of 16कभी कभी लगता था कि ये घर- घर नहीं है – एक नांव है ….. जिसमें जगह जगह पर गड्ढ़े हैं मेरी माँ उस नाव के बीच में मग्गा लेके बैठी है. जिससे वो लगातार पानी को बाहर फेंक रही है. (चींटियां दिखती है, वो चीटियों के साथ खेलता है, और फिर उठता है) पुंडलिक कहता था कि तेरी माँ बहुत आलसी है रे! अरे ये क्या कह दिया उसने. वो हमेशा ही ऐसा कुछ बोल के चला जाता था. मैं सोचता रहता था. धीरे-धीरे मुझे समझ में आया …. मदर इंडिया वाली घटना को छोड़ के मुझे लगा कि मेरी माँ सचमुच आलसी है. ये बात मेरे नामकरण से सिद्ध होती है. अब बोलिये उन्होंने मेरा नाम राजू रखा जो भारत में हर दूसरे आदमी का होता है. और ऊपर से स्कूल में दाखिला दिलाते वक्त माँ का वात्सल्य जागा और उन्होंने राजू को आगे बढ़ाकर राजकुमार कर दिया. माँ बताती है कि दाखिले को फार्म भरते वक्त वो स्कूल क्लर्क मेरी तरफ देखकर बहुत हंस रहा था. माँ को लगा दोष मेरी शकल का है. वैसे मेरे ख्याल से हर आदमी को अपना नाम खुद रखने की आजादी होनी चाहिए. वैसे मेरी माँ बड़ी रहस्यमय थी इस बात का मेरे अलावा किसी को पता नहीं है जब मेरी माँ अलमारी से अपना लाल रिबन निकालती थी तब समझो की समय हो गया और वो उस रिबन को पहन के निकल जाती थी. असल में उन्हें शौक था उन्हें अकेले फिल्म देखना बहुत अच्छा लगता था. कोई धार्मिक फिल्म नहीं सारी रोमाँस और मारधाड़ वाली. अब रोमाँस का तो पता नहीं पर शायद मारधाड़ का काफी असर पड़ गया था उन पर. क्योंकि उम्र के साथ साथ उनका चेहरा मर्दाना होता जा रहा था. उनकी दाढ़ी मूंछें निकलने लगी थी और बाद बाद में वो मुझे डांटते वक्त कहती थीं – कुते मैं तेरा खून पी जाऊंगी. तभी पुंडलिक ने मुझे एक किताब दी – मदर मैक्सिम गोर्की की. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. मुझे तो अभी तक लगता था कि सारी माँए किसी नियम के तहत एक जैसा बर्ताव करती हैं. पर ये – ये क्या था. पुंडलिक ने बताया कि ये कहानी सच्ची है. मैंने सोचा ऐसी माँ भी हो सकती है. मुझे याद आया पुंडलिक ने मुझसे कहा था कि वो अपनी माँ को बहुत चाहता था अब बस मैं एक और माँ के बारे में जानना चाहता था – पुंडलिक की. मैंने पूछा पुंडलिक क्या तुम्हारी माँ भी गोर्की की मदर जैसी है. मुझे लगा पुंडलिक के अदंर एक ज्वालामुखी था जो मेरे इस प्रश्न के जाते ही फूट पड़ा. वो बोला बोला बोलता रहा. ऐसे ऐसे उदाहरण देता रहा, ऐसे ऐसे शब्दो का इस्तेमाल करता रहा कि कहानी मुझे रोचक लगने लगी पर मेरी समझ में कुछ नहीं आया और मैंने उसी वक्त अपने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कर दिया ……….. हतप्रभ भाव और ये देखकर वो कुछ धीमा हुआ और भारी आवाज़ में धीरे धीरे बोला जो मुझे समझ में आने लगा. उसने कहा था – माँ के अन्तिम दिनों में मैंने पड़ना, लिखना घर से निकलना सब बंद कर दिया. मॅं सिर्फ माँ के साथ रहता था उन्हें गीता सुनाता था, सालों तक मैं घर से नहीं निकला. गीता सुनते सुनते ही उनकी मृत्यु हो गई. वो अचानक मर गई. मुझे बहुत अजीब लगा मैं खाली हो गया थां मुझे कुछ समझ में नहीं आया. तभी अचानक मेरी आँखों के सामने उनका मुस्कराता हुआ चेहरा घूमने लगा और वो चेहरा पेड़ बन गया और मैंने पेड़ के नीचे बैठकर लिखना शुरू किया. धूप चेहरा जला रही है परछाई जूता खा रही है शरीर पानी फेंक रहा है Page 7 of 16एक दरख्त पास आ रहा है उसकी आंचल में मैं पला हूँ उसकी वात्सल्य की सांस पीकर आज मैं भी हरा हूँ आप विश्वास नहीं करेंगे पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है मैं इसे माँ कहता हूँ जब रात शोर ख चुकी होती है जब हमारी घबराहट नींद को रात से छोटा कर देती है जब हमारी कायरता सपनों में दखल देने लगती है तब माथे पर उसकी उंगलियां हरकत करती हैं और मैं सो जाता हूँ और वो सो गया …………….. मैं अवाक सा बैठा रहा. अच्छा हुआ वो सो गया. क्योंकि मैं उसके सामने रोना नहीं चाहता था. मैं भाग कर उसके कमरे से बाहर निकल आया और मुझे वो दिखी. सूखी-सी लकड़ी के समान औरत जिसका चेहरा मर्दाना होता जा रहा था जो हाथ में मग्गा लिये पानी बाहर फेंक रही थी. मैं उपर से नीचे तक काँपने लगा. मुझे लगा पहली बार मुझे मेरी माँ दिखी. मैं तुंरत भाग के उसके गले लग गया और बरबस मेरे मुँह से निकल पड़ा – पेलागेया निलोबना माई मदर चटाक एक आवाज़ हुई. मेरा सर घूमने लगा. कई दिनों तक उसके वात्सल्य से भरे हुए उँगलियों के निशान मैं अपने गालों पर महसूस करता रहा. पर इस घटना से मैं हारा नहीं. मैंने माँ को मदर कहना नहीं छोड़ा. ये अलग बात हैं कि मैं मदर मन में बोलता था और उपर से माँ बोलता था. मदर मा मदर माँ ऐसे वैसे माँ और मेरे बीच सारे संवाद सालों पहले तय हो गये थे. किसी भी घटना का उन संवादों पर कुछ असर नहीं हुआ था. पुंडलिक ने एक बार कहा था कि तुझमें और तेरे गाँव में कोई अंतर नहीं है. ये कहकर वो चल दिया. मेरी समझ में नहीं आया ये क्या कह दिया उसने ? मैं सोचता रहा काफी समय बाद मेरी समझ में आया ये तो सच है. दरअसल मेरा गाँव गाँव ही नहीं था और ना ही पूरी तरह शहर था. यहाँ के लोग ना तो बहुत अमीर थे और ना ही भूखे मर रहे थे. ये इतना महत्वपूर्ण नहीं था कि देश के नक्शे में इसका जिक्र हो और ऐसा भी नहीं है कि ये है ही नहीं यहाँ के लोग कुछ करना नहीं चाहते पर सभी अन्त में कुछ ना कुछ कर ही लेते हैं. यहाँ सब कुछ ठीक ठीक चलता है मेरी तरह – ठीक! पुंडलिक कहता है कि ये गाँव ऐसा लगता है कि छूटे हुए लोगों से बसा है जैसे रेत का ट्रक चलते हुए काफी रेत पीछे छोड़ जाता है ना वैसे ही रेत के समान छूटे हुए लोग इकट्ठे होकर ये गाँव बन गए. मेरा गाँव हाईवे और जंगल के ठीक बीच में था. पर मेरा घर हाईवे के किनारे था. सड़क के उस तरफ एक ढाबा था. जहाँ अजीब सी शक्ल के लोग हंसते और चिल्लाते हुए खाना खाते थे. लगता था कि आदमियों की आवाजें उनकी ना होकर गाड़ियों की आवाजें हो गई है. वैसे मैं दिन में सड़क के उस तरफ कम ही जाता था. मेरा तो काम सुबह ५ बजे का होता था. मैं मैं असल में ट्रक के पीछे कुछ लिखने जाता था. मुझे बस इतना पता है कि ये सारे ट्रक पूरे देश में हर गाँव हर शहर में जगह जगह जाते हैं. मैं ट्रकों के पीछे छोटे छोटे अक्षरों में चॉक से कुछ लिख देता था. किसके लिए Page 8 of 16पता नहीं. पर मेरे लिये ये अंतरिक्ष में संदेश भेजने जैसा था. मुझे पूरा विश्वास था कोई राजू राजकुमार छोटू, बंटी, चिंटूं, राकेश जैसा साधारण नाम वाला साधारण आदमी मेरी तरह सुबह पाँच बजे उठकर मेरा संदेश पढ़ रहा हे. क्योंकि मेरा सारा लिखा हुआ मेरे पास कभी वापस नहीं आता था. इसका मतलब कोई है जो मेरी बातों को पढ़कर मिटा देता है जिससे कोई दूसरा ना पड़ सके. हमारी दोस्ती काफी बढ़ गई थी. मैं अब अपनी सारी बातें उसे कह देता था पर संक्षेप में – घुमा फिरा कर चालाकी से. कहीं कोई दूसरा इसे पढ़कर हंसे ना और कहीं पुलिस घर पे आ गई तो – क्योंकि मैंने तो इसमें रघु, माँ, पुंडलिक राधे सभी की गोपनीय बातें लिख दी थीं. लेकिन मैं बहुत चालाक था पुलिस को कुछ पता नहीं चलता क्योंकि बहुत पहले मैंने ट्रक पर लिख दिया था. दोस्त अब से पुंडलिक = कवि, रघु = हीरो, राधे = गाँधी की लाठी, माँ = मग्गेवाली औरत. वैसे पाँच बजे उठने के मेरे दो मकसद होते थे. पहला ट्रक पर संदेश और दूसरा राधे से मुलाकात क्योंकि राधे रोज सुबह पाँच बजे मेरे घर के सामने आता था उसका नाम राधे है भी कि नहीं ये भी मुझे मालूम नहीं. क्योंकि जब भी वो मुझे देखता था तो राधे-राधे कहताथा और मैं भी जवाब में उसे राधे राधे कहता था. असल में हम दोनों एक दूसरे के लिए राधे थे. राधे को मैं सोने वाला बूढ़ा कहता था. क्योंकि वो सोना बीनने का काम करता था असल में हमारे घर में दो सोने चांदी की छोटी सी दुकानें थी. जिसका किराया हमें मिलता था. राधे रोज अपनी छोटी सी लोहे के दाँतवाली झाडूं लेकर आता था और सोना बीनता था. सोना बीनते वक्त वो एक सफेद पोटली जैसा हो जाता था. जो मेरी आँखों के सामने लुढ़कती रहती थी .काम करते वक्त वो एकदम चुप रहता था. सिर्फ उसकी सांसें लेने की आवाजें मुझे सुनाई देती थी. राधे को मैं सालों से जानता था मुझे लगता था कि वो किसी एक उम्र पर अटक गया है शायद उसके आगे बढ़ने की गुंजाईश ही नहीं होती. वो सालों से बूढ़ा था मुझे विश्वास ही नहीं होता है कि राधे कभी बच्चा भी होगा. वो गाँव से बाहर एक ही बार गया था और वो उसकी पहली और अंतिम यात्रा थी. वो गाँधीजी को देखने – सिर्फ देखने ने साबरमती आश्रम गया था – यह उसके जीवन की एकमात्र उपलब्धि थी जिसे वो अब तक ५० से ज्यादा बार सुना चुका है. हर बार जब वो गाँधीजी से मुलाकात कीघटलना सुनाता है तो गाँधीजी हर कहानी में राधेअस अलग अलग बात कहते थे – कई बार गाँधी जी ने सिफर्ग् नमस्ते कहा और राधे लौट आया. और कर्ठ बार राधे गाँधीजी के साथ खाना खा चुका है …. कई बार गाँधीजी उससे कुछ कहना चाहते थे पर रराधे को गाँव वापस आने की की जल्दी थी ….. और एक बार तो गाँधीजी ने राधे से कहा कि राधे – मैं बहुत थक चुका हूँ राधे अब तुम गाँधी बन जाओ. सोना बीनते वक्त मैं राधे से कम ही बोलता था पर एक बार मैंने कहा राधे तुम सोना क्यों बीनते हो, तो राधे ने जवाब दिया कि वो मरने के पहले एक बार वैष्णोदेवी माँ के दर्शन करना चाहता है. मैंने पूछा कितने पैसे चाहिए तुम्हें वैष्णोदेवी जाने के लिए. उसने कहा कम से कम हजार तो लगेंगे ही. मैंने कहा तो तुम्हारे पास हजार रूपये नहीं है. राधे ने कहा है ना ………… अरे ये क्या बात थी मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने कहा जब तुम माँ के दर्शन करना चाहते हो और तुम्हारे पास पैसे भी है तो जाते क्यों नहीं ……………… राधे चुप हो गया …………… ये चुप्पी अजीब थी सो मैंने भी टोका नहीं ……………….. राधे ने धीरे से कहा ………………… गाँधीजी से मिलने के कुछ समय बाद गाँधीजी की मृत्यु हो गई थीतब मुझे बहुत दुख हुआ . हमारे गाँव में गाँधी पार्क और उनकी पत्थर की मूर्ति स्थापना हुई, मुझे लगा गाँधीजी ने जरूर मरते वक्त कहा हो कि मेरी मूर्ति राधे के गाँव में Page 9 of 16जरूर लगाना ….. मैं घंटों उनकी मूर्ति के सामने खड़ा रहता था, गाँधीजी भी मेरी तरफ घंटों देखते रहते थे. मुझे लगा वो मुझसे कुछ कहना चाहते हैं …………. पर चूंकि पार्क में बहुत भीड़ होती है इसलिए कुछ कह नहीं पा रहे हैं. ……. फिर एक रात वो मेरे सपने में आए . ……… असल में वो नहीं आये, उन्होंने ही मुझे अपने आश्रम में बुला लिया ………. मैंने देखा गाँधीजी और बहुत सारी भीड़ है उन्होंने मुझे देखा और बोला राधे …………. मैंने प्रणाम किया उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और धीरे से कान में बोले ……… बेटा मैं नहीं जा पाया पर तू एक बार वैष्णो देवी जी चला जा माँ से मिल आ मैं दंग रह गया ये गाँधीजी मुझसे क्या कह रहे हैं? मैंने गाँधीजी की तरफ देखा तो देखता क्या हूँ ? गाँधीजी कबूतर बन गये और उड़ने लगे ……… अचानक नींद खुल गई सुबह होते ही मैं तुरत गाँधीजी से मिलने गाँधी पार्क गया तो देखा वही कबूतर गाँधीजी के सर पर बैठा है ………………………. सपना सच्चा था ………………. एकदम सच्चा …………. उस वक्त तक मैं एक बार ही गाँव के बाहर गया था सो बहुत डरा हुआ था. बहुत कोशिश की पर उस वक्त मैं जा नहीं पाया और अब जाना भी नहीं चाहता …….. क्योंकि मैंने अपना पूरा जीवन चाहे जैसा भी हो एक ही आशा में जिया है कि एक दिन मैं वैष्णव देवी जाउंगा ………… जरूर जाउंगा और अब अगर मैं चला गया तो फिर मैं ये सारे दिन कैसे बिताउंगा. जिस आशा में मैं जिया हूँ. वो आशा पलते-पलते बड़ी हो गई है मेरे बेटे जैसी. अब इस उम्र में मैं अपने बेटे की हत्या तो नहीं कर सकता ना. चींटियां दिखती है, वो चींटियां के साथ खेलता है और फिर उठता है. मुझे याद है कि गाँधीजी के बारे में मैंने अपने स्कूल में पढ़ा था हमारे मा-साब. गाँव में टीचर को मा-साब कहते हैं. बड़े नीरस ढंग से गाँधीजी के बारे में बताते थे. ना मा-साब को गाँधीजी के बारे में बताने में और ना ही हमको गाँधीजी के बारे में सुनने में मजा आता था और मुझे तो बिल्कुल भी नहीं .क्योंकि तब तक मैं रघु के विशाल और चमकदार संसार में प्रवेश कर चुका था. रघु…. रघु ……… रघु ………… रघु नहीं था वो एक चमत्कार था. वो बहुत खूबसूरत था उससे सब डरते थे क्योंकि पहले तो उसके पिताजी पुलिस थे जो तबादले की वजह से हमारे गाँव में आ गये और दूसरा पूरे गाँव में रघु ही था जो अंगे्रजी में थोड़ा बहुत बोल लेता था. हमारे स्कूल के मा-साब भी उससे डरते थे. क्योंकि उसकी अंग्रेजी का हमारे हिंदी के मास्टरों के पास कोई जवाब नहीं था. मेरे लिए रघु कक्षा ९ से कक्षा ११ तक कृष्ण था जिसकी बांसुरी पर मेरे जैसी कई गायें रघु के आगे पीछे मंडराती थी मेरे लिए वो हिरण, बब्बर शेर और घोड़े का अजीब मिश्रण था. वो हमेशा क्लास में लेट आता था और उसके आने के पहले वो नहीं उसकी आवाज़ आती थी. घोड़े जैसी टप ……….. टप …………. टप………….. ये उसके हील वाले लम्बे जूते थे. जैसे ही वो क्लास के दरवाजे पर प्रकट होता था तो उसके बब्बर शेर जैसे बालों को देखकर मा-साब अपनी कुर्सी छोड़ देते थे. वो एकदम चुस्त कपड़े पहनता था. वो बहुत अलग था पूरा गाँव एक तरफ औश्र रघु एक तरफ वो बहुत रंगीन था. और वो भारतीय नहीं किसी विदेशी भगवान को मानता था, जिसकी तस्वीर उसने अपने घर मेंं चारों तरफ लगा के रखी थी. बार -बार वो कहता था “वो भगवान है, वो भगवान है, वो भगवान है! एक बार वो कह रहा था उसके भगवान में फुर्ती है कि वो जब सोने जाते हैं ना तो जैसे ही बटन बंद करते हैं तो बल्ब बाद में बुझता है पहले वो सो जाते हैं. एक दिन भीड़ में गाय जैसी आवाज़ निकालकर मैंने रघु से पूछा – रघु कौनसा धर्म चलाते हैं तुम्हारे भगवान. वो हंसा बहुत हंसा काफी देर हंसने के बाद उसने अंग्रेजी में एक शब्द कहा मेरी समझ में नहीं आया. मेरा और रघु का रिश्ता कृष्ण और उसकी गाय जैसा ही था. हम दोनों ने कभी सीधे एक दूसरे से बात नहीं की थी. मेरी हिम्मत ही नहीं होती थी. मैंने अपने ट्रक वाले दोस्त से रघु के बारे में बहुत सारी लिखी थीं. मैं उस वक्त घर सिर्फ सोने जाता था. खाना पीना भूल चुका था. मैं बस Page 10 of 16मैं बस रघु का पीछा किया करता था. उसके पास एक अजीब सी खूबसूरत लाल रंग की साइकिल थी. जब वो अपने हील वाले जूते और लाल चुस्त टी शर्ट पहनकर साइकिल चलाता था क्या दिखता था. मैं उसके पीछे भागता रहता था. उसकी साइकिल की घंटी की आवाज़ सुनने. जब वो अपनी साइकिल खड़ी करके कहीं जाता था तो मैं धीरे से उसकी साइकिल की घंटी बजा देता था. क्या आवाज़ थी उसकी घंटी की. हमारे गाँव की साइकिलों जैसी नहीं जो टन टन बजती थी. उसकी घंटी तो ट्रिंग ट्रिंग बजती थी. पर एक दिन उसने स्कूल में घोषणा कर दी कि वो गाँव छोड़कर जा रहा है. क्योंकि उसके पिताजी का तबादला शहर हो गया है. मैं उसी वक्त क्लास में रो दिया और धीरे से नहीं जोर से चिल्ला चिल्ला कर और कहता रहा – नहीं रघु नहीं तुम मुझे छोड़ के नहीं जा सकते. तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो ? नहीं – नहीं जब मैं चुप हुआ तो पूरी क्लास मेरे उपर हंस रही थी. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया. मैं उठा और क्लास से निकल गया. पर जाते वक्त एक बार मैं रघु का चेहरा देखना चाहता था – कहीं वो भी मेरे उपर नहीं हंस रहा है. पर मेरी हिम्मत नहीं हुई मुझे अपना किया बहुत बुरा और शर्मनाक लगने लगा. सुबह-सुबह उठा तो राधे से लिपटकर खूब रोया. राधे ने मुझे समझाया और कहा – कोई बात नहीं ऐसा तो होता है रोते नहीं. जब मैं भी गाँधीजी से विदा ले रहा था तो वो भी मेरा जाना बर्दाश्त नहीं कर पाये. उनकी आँखों में आंसू थे. मतलब वो समझ ही नहीं रहा है कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ. तब पहली बार मैं राधे पर नाराज हुआ और उठकर सड़क के उस तरफ चला गया और एक ट्रक के पास घंटों खड़ा रहा. मैंने स्कूल जाना छोड़ दिया. कुछ दिनों बाद एक हवलदार घर पर आया. मैं घबरा गया उसने माँ से पूछा राजकुमार है. मेरे दिमाग में सीधे अपनी ट्रक वाली गलती याद आई. मैंने सोचा पकड़ा गया. अब सबको पता लग जाएगा कि मैं उन सबके बारे में क्या सोचता हूँ. मुझे जेल में जाने का डर नहीं था लेकिन ये कल्पना ही अपने आप में बहुत डरावनी है कि सबको पता लग जाए कि आप सब के बारे में क्या सोचते हैं? ये सबके सामने नंगा होने जैसा है. मैं डरते हुए उस हवलदार के सामने गया. मैंने कहा – जी मैं ही राजकुमार हूँ. वो हंसा – उसने मुझे एक बैग दिया और कहा – ये रघु साहब जाने से पहले आपको देने को कह गये थे – अच्छा नमस्ते. चला गया. मैंने बैग खोला तो देखता क्या हूँ उसमें रघु के हील वाले जूते थे और उसके भगवान की फोटो. राजकुमार ब्रूस ली की फोटो निकालता है उसे दण्डवत प्रणाम करता है. रघु के जूते मैं ज्यादा पहन नहीं पाया क्योंकि वो मुझे काटते थे. लेकिन जब तक मेरा पैर सूज नहीं गया मैंने उन्हें पहनना नहीं छोड़ा एक दिन पुंडलिक ने मेरा सूजा हुआ पैर देखा मुझे लगा उसे बहुत दुख होगा – पूछेगा क्या हुआ, पर नहीं उसने कुछ नहीं पूछा सिर्फ मेरे पैर की तरफ देखा मुस्कुराया और पलट कर खिड़की की तरफ देखने लगा. फिर धीरे से पलटा मुस्कुराया और बोला - जूता जब काटता है तो ज़िंदगी काटना मुश्किल हो जाता है. और जूता काटना जब बंद कर दे तो वक्त काटना मुश्किल हो जाता है. उस दिन पहली बार मैंने अकेलापन महसूस किया. क्योंकि यहाँ कोई मेरे साथ नहीं रहता था. ऐसा वक्त मुझे याद नहीं जब मैं बोल रहा हूँ कोई और सुन रहा हो. ये अलग बात है कि मेरे पास बोलने के लिए कुछ था ही नहीं. पर पुंडलिक भी कभी मेरे साथ नहीं रहा हमेशा मैं ही उसके साथ रहा हूँ. राधे की गाँधी की बातें अभी तक खत्म नहीं हुई Page 11 of 16थी. वहाँ भी मैं चुप रहता था. माँ की नाव में अभी तक पानी खत्म नहीं हुआ था. ट्रक वाला दोस्त था जिससे मैं अपनी सारी बातें कह देता था. पर वहाँ उस तरफ वो इसे पढ़ रहा है इस बात पर मुझे पहली बार संदेह हुआ. जूते घर के कोने में कई दिनों तक पड़े रहे वो कतई घर का हिस्सा नहीं लगते थे. बाद में घर ने उन्हें अपना हिस्सा बना लिया और ये नेक काम मेरी माँ ने ही किया. उन्होंने उन लम्बे हील वाले जूतों को दो गमले का रूप दे दिया. मैं देखता रहा. मुझे बहुत बुरा लगा. वो रघु के जूते थे. मेरे रघु के. पर मैंने कुछ नहीं कहा. क्योंकि जो संवाद हमारे बीच पहले ही तय हो चुके थे. मैं उन्हें अब तोड़ना नहीं चाहता था. (चींटियां दिखती हैं. वो चिंटियों के साथ खेलता है और फिर उठता है ) आप को लग रहा होगा कि मैं क्या कर रहा हूँ. मैं खेल रहा हूँ हाँ, सच में खेल रहा हूँ एक दिन क्या हुआ कि अचानक घर पे बैठे बैठे मैंने एक रेल देखी चींटियों की रेल जो एक के पीछे एक रिद्म में चली जा रही थी. मैं उनका पीछा करता गया कुछ समझ में नहीं आया कि वो कहाँ से आयी है और कहाँ को जा रही है. पर वो सब एक ही लाईन में चल रही थी. मैं शक्कर के पाँच दाने ले आया. फिर वो खेल शुरू हुआ. मैंने घर का दरवाजा बंद करके पूरे बाहर को बंद कर दिया तो भीतर की दुनिया मुझे साफ़ दिखने लगी. अब मैंने उस रेल के बगल में शक्कर के दाने जमाने शुरू किये पहले दो दाने पास पास तीसरा दूर चौथा और दूर पाँचवा सबसे आखिर में. दो तीन चींटियां उन शक्कर के दानों की ओर मुड़ने लगी रेल घूम चुकी थी जैसे ही चींटियां पाँचवे दाने पर पहुंचती थी मैं शुरू के दो दाने उठा लेता था और वो पाँचवे दाने के आगे रख देता था इस तरह मैं उन चींटियों की रेल को किसी भी तरफ घुमा देता था. बड़ा मजा आता था कि कोई है जो आपके इशारे पर घुम रहा है. सिर्फ शक्कर के पाँच दानों पर. ये मेरा सबसे पसंदीदा खेल था जो मैं रोज खेलता था. पुंडलिक जबसे हमारे यहाँ आया था बहुत कम ही कहीं जाता था. कभी कभी शहर में अपने दोस्त ताराचंद जैसवाल को मिलने जाता था और एक दिन में लौट आता था. मैं उसके सामने अपना चींटियों वाला खेल नहीं खेल पाता था ना, मैं कभी गाँव से बाहर नहीं गया. क्योंकि राधे ने मुझे बताया था कि गाँव के बाहर बहुत खतरा है. बाहर जाकर खाना भाषा लोग सब बदल जाते हैं. देखते नहीं हमारे गाँव के दोनों तरफ शहर है और उन शहरों की भीड़ कैसे हमारे गाँव की सड़क पे दौड़ती रहती है. पुंडलिक जब मेरे साथ बात करता था तो मुझे लगता था वो राजु मेरा नाम लेकर अपने से ही बात करता है. क्योंकि मैं कभी-कभी उठकर चला जाता था और जब वापिस आता था तो देखता था पुंडलिक अभी भी राजू नाम ले लेकर बात कर रहा है. वो अजीब से अकेलेपन का शिकार था. ये मैंने नहीं सोचा उसी को खुद से कहते हुए सुना है. एक बार वो एक अजीब सी चीज खुद को पढ़कर सुना रहा था – एक कुता अपनी ही दुम को काटने की कोशिश करता है. तब एक तरह का कुता – चक्रवात शुरू होता है. जो तभी खत्म होता हैजब इस तूफान से कुता कुते के रूप में निकल आता है. खालीपन – ये कुता मेरी और मैं उसकी आँखों में देखता हूँ. पुंडलिक बताता है कि वो घोषित कवि हुआ करता था. उसने हर तरह की कविता लिखने की कोशिश की दर्द भरी रोमाँस वाली, बच्चों पर, पर्यावरण पर, पत्थर पर, फूल पर पर किसी ने कौडी तक को नहीं पूछा. बाद बाद में तो लोग उसे देखकर भागने लगते थे. पुंडलिक चिल्लाकर कहता था. नहीं भाई अब मैं कोई कविता नहीं सुनाउंगा. पर कोई भी नहीं रूकता था. जो लोग रूक जाते थे पुंडलिक उन्हें घुमारिफराकर एक कविता सुना देता था. पुंडलिक बताता है कि लोग उसका मजाब उडड़ाने लगत थे. जिस घर में वो घुसता था. वहाँ से ची,ा पुकार की आवाजें लोगों को बाहर तक सुनाई देती थीं पुंडलिक ने बच्चों पर भी कविताएं लिखही थ्साी. सो मोहल्ले में बचें ने खेलना बंद कर दिया था. हर Page 12 of 16बच्चा पुंडलिक नाम से डरता थ .लोग उसके घर पर सब्जी, किराना सब पहुंचा देते थो क्योंकि कोई भी आदमी किसी भी बहाने से पुंडलिक की कोई भी कविता नहीं सुनना चाहता था छापना तो दूर की बात. आजकल पुंडलिक की कोई भी कविता नहीं सुनना चाहता था. छापना तो दूर की बात. आजकल पुंडलिक अपनी कविताएँ सुना कर मेरी तारीफ नहीं करता था बल्कि गुस्सा हो जाता था. एक बार कविता सुनाने के बाद उसने पूछा – क्यों कविता अच्छी नहीं लगी तुम्हें? मैंने कहा – नहीं अच्छी थी. उसने कहा – तो फिर गुस्से में क्यों देख रहे हो ………. अरे अजीब बात है. उसी ने मुझसे कहा था कि मैं तुझे गम्भीर श्रोता बनाना चाहता हूँ. वैसे भी आपको पता ही है कि गम्भीर शब्द मुझे कितना पसंद है. गम्भीर क्या शब्द है. पर भैय्या जब आप हतप्रभ भाव पर थोड़ा गम्भीर भाव लाने की कोशिश करते हैं तो आपका चेहरा थोड़ा ऐसा दिखने लगता है. पर मैं गम्भीर होने की पूरी कोशिश करता था. (चींटियां दिखती हैं, वो चींटियां के साथ खेलता है और फिर उठता है) एक दिन जब मैं अपना चींटियों वाला खेल खेल रहा था. तब अचानक मुझे लगना लगा कि मैं चींटी हो गया हूँ. मुझे अजीब लगने लगा. मुझे लगा कि कहीं खेलते खेलते मेरी अकल भी चींटिंयों जैसी तो नहीं हो गई. तभी मेरी नजर शक्कर के दानों पर पड़ी. तो देखता क्या हूँ, कि वो शक्कर के दाने, दाने ना होकर रघु, पुंडलिक, राधे, माँ और मेरा ट्रक वाला दोस्त हो गये हैं. और मैं उनके पीछे भागने लगा. इसका मतलब ये हुआ कि कोई है जो कोई है जो मेरे साथ खेल रहा है. जबकि मैं खेल नहीं रहा हूँ. जैसा कि मै चींटियों के साथ खेलता हूँ, जबकि चींटियां मेरे साथ नहीं खेल रही होती है. क्या पता शायद चींटियां भी किसी के साथ खेल रही हो, जबकि वो चींटियों के साथ नहीं खेल रहा हो. मतलब सभी, सभी के साथ खेल रहे हैं. इसका मतलब पुंडलिक भी मेरे साथ खेल रहा है. अब आपको मेरी समस्या समझ में आयेगी ………….. समस्या ……… मेरे लिये बहुत बड़ी समस्या है जिसके लिए मैं ये सब कर रहा हूँ. ये समस्या पुंडलिक के रूप में मेरे पास आई. दरअसल पुंडलिक अपना कविता संग्रह छपवाना चाहता था. शहर में कोई ताराचंद जैसवाल उसका दोस्त था जो संग्रह छपवाने में पुंडलिक की मदद कर रहा था. वैसे मैंने तो उसकी सारी कविताएँ सुनी थी. कुछ तो इत्ती बार कि आज भी मुझे जबानी याद है. समस्या की शुरूआत तब हुई जब पुंडलिक घर छोड़ के जा रहा था. जाते वक्त मैंने देखा उसके एक हाथ में उसकी डायरी जिसमें वो कविताएँ लिखता था और एक खत और दूसरे हाथ में मेरी माँ की फोटो और गीता थी. वो ये सब लेकर मेरे पास आया. मुझसे कहा अपने दोनों हाथ इस पर रखो और कसम खाओ …………… कसम खाओ ……… अपनी माँ की इस गीता की मेरी कविताओं की कि तुम मेरा कविता संग्रह जरूर छपवाओगे. मैं कसम खाउं. इससे पहले मैंने देखा कि उसने अपना सामान भी बांध लिया था. मैंने कहा – कहाँ जा रहे हो पुंडलिक? हमारे गाँव से शहर वैसे भी बहुत दूर नहीं था मतलब सामान बांधने जितना दूर तो बिलकुल भी नहीं था. मेरे सवाल का पुंडलिक ने कोई जवाब नहीं दिया. उसकी आवाज़ अज़ीब-सी होती जा रही थी. और वो कसम खाने पर जोर देता रहा सो मैंने कसम खा ली. विद्या माता की, धरती माता की, कविताओं की कसम, गीता की कसम ….. और भी दो तीन कसमें मैंने जोश में अपनी तरफ से और खा ली. मेरा क्या जाता था. कविता संग्रह पुंडलिक का था, ताराचंद जैसवाल उसे छापने वाला था. मैं कौन था? असल में मैं कोई भी नहीं था पर मेरी एक बात समझ में नहीं आई कि पुंडलिक मुझे कसम खाने की क्यों कह रहा है कि तुम मेरा कविता संग्रह छपवाना. असल में कसम खा कर मैं इस चक्कर में पूरी तरह से फंस चुका था. कसम की रसम पूरी होते ही पुंडलिक का चेहरा खिल उठा. उसने माँ की फोटो और गीता एक कोने में फेंक दी. और अपना सामान उठाकर निकल गया. दरवाजे पर पहुंचकार उसे ध्यान आया कि मैंने उससे कुछ पूछा था – कहाँ जा रहे हो पुंडलिक ? वो Page 13 of 16पलटा और बोला – पहले शहर जाकर तारचंद जैसवाल को ये कविताएँ और ये चिट्ठी दूंगा जिसमें मैंने इन कविताओं और तुम्हारे बारे में सब कुछ लिख दिया है. उसके बाद वहीं से सीधे तीर्थयात्रा और फिर सन्यास ये कहकर वो मेरे गले लग गया और कान में धीरे से बोला – मै तुम्हें कुछ देना चाहता था,मेरे जाने के बाद वो तुम्हें मिल जाएगा. धन्यवाद. नमस्ते. और वो चला गया. कविताओं के बारे में तो ठीक है पर मेरे बारे में चिठ्ठी में क्यों लिखा है ? मुझे वो क्या देना चाहता है और क्यों ?? मैने तो सिर्फ उसकी कविताऐं सुनी थी और आधी से ज्यादा तो समझ में भी नहीं आई. अगर सुनने वाले का चिठ्ठी विठ्ठी में जिक्र होता तो मुझे कोई आपत्ति नहीं थी, पर एैसा नहीं था मैं पूरी तरह फंस चुका था। कैसे पुंडलिक ने मुझे इस समस्या में फंसाया इसका पता कुछ दिन पहले आई ताराचंद जैसवाल की चिठ्ठी से लगा. मतलब पुंडलिक मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता है, मुझे यकीन नहीं हुआ. मैं मानता हूँ मैं बहुत उपयोगी आदमी नहीं हूॅं, पर मेरा उपयोग कोई ऐसे कर सकता है इसका विश्रवास मुझे नहीं हुआ. पता है पुंडलिक ने मेरे साथ क्या किया? ताराचंद जैसवाल की चिठ्ठी में क्या लिखा था? ? ये रही उनकी चिठ्ठी. वैसे चिठ्ठी तो काफी बड़ी है. पर मुख्य बातें आपको सुना देता हूँ। (पढ़ता है ) राजकुमार ……….. कवि हृदय महान कवि को मेरा नमस्कार. आपकी कविताएं पढ़कर काफी खुशी हुई. पुंडलिक आपकी कविताओं के बारे में पहले भी मुझे बता चुके हैं. सारे लोग आपकी कविताओं की तारीफ कर रहे हैं. अगले महीने तक संग्रह छप जाएगा पर एक परेशानी है, संग्रह में एक कविता कम पड़ रही है ऐसा मैं नहीं हमारे संपादक महोदय सोचते हैं. आप तो बड़े कवि हैं इस संग्रह के बाद तो आपका नाम बड़े बड़े कवियों के साथ लिया जाएगा. कृपया कर एक कविता जल्द से जल्द भेजने का कष्ट करें. मेरी बेटी आपकी कविताओं की दीवानी है. शादी करने के बारे में क्या विचार है आपका ? पुंडलिक आपकी काफी तारीफ़ करता था दर्शन कब होंगे. संग्रह में आप अपना नाम राजकुमार ही लिखेंगे या कोई उपनाम भी जोड़ेंगे. बता दीजिएगा. आपका अपना ताराचंद जैसवाल. मतलब अब समस्या एक भयानक रूप ले चुकी है मैंने कसम क्यों खाई. अब पछता रहा हूँ कसम की छोड़ो मैं तो खुद चाहता हूँ कि पुंडलिक का कविता संग्रह छपे. मगर इस तरह से ……….. नहीं … मैंने क्या क्या नहीं किया, मैं कई दिनों से पुंडलिक की किताबों की तलाशी ले रहा हूँ. कि कहीं वो चार लाईन – दो लाईन – एक लाईन लिखी छोड़ गया हो. पर कहीं कुछ नहीं मिला. फिर मैंने पेन उठा लिया और पुंडलिक की तरह सोचते हुए लिखना शुरू किया …………….. खर-खर, फर-फर, छर-छर ……… मैं इसके आगे बढ़ ही नहीं पाया ……………. असल में मेरे जीवन में ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ……… जिसके बारे में मैं लिखूं या जिससे लडूं. मुझे सब कुछ याद है जो अभी तक हुआ है पर यकीन मानिये – वो कुछ नहीं हुआ जैसा है. जैसा कि पुंडलिक कहता था कि कविता लिखने के लिए जरूरी है अपने जीवन अपने अनुभवों को याद करके, उनसे लड़के, उनका सामना करके जो बात कही या लिखी जाए वही कविता है. वाह ………. वाह ……….. ना तो ये बात मुझे तब समझ आयी थी ना अब समझ में आती है. मतलब कुश्ती अब समझ में आ जाती है पर कविता अभी भी मेरे लिए आश्चर्य है. क्या लड़ना ……………. किससे लड़ना …………….. भीतर की खुदाई ये मेरे समझ के परे की बात तब भी थी अब भी है. पर अब मेरे पास दूसरा कोई चारा नहीं. मुझे ये काम अब करना ही है. पर ऐसा नहीं है मैं लिखना शुरू कर चुका हूँ. चार दिन पहले ही मैंने वो खत जो ताराचंद जैसवाल को मुझे भेजना है उसकी शुरूआत और अन्त लिख दिया है. (पढ़ता है) शुरूआत – नमस्कार ताराचंद जी. नमस्ते. कैसे हैं आप ? मैं ठीक हूँ. आप अच्छे होंगे. मेरी कविता निम्नानुसार है - Page 14 of 16अंत – उपर्युक्त कविता ठीक है. मैं भी ठीक हूँ. गलती माफ़ ये कविता भेजने के बाद मैं ये घर, ये गाँव , ये शहर, ये देश छोड़कर जा रहा हूँ. मेरा पीछा करने की कोशिश मत करना. कविता संग्रह जरूर छापना, आपको कसम है. आपका आज्ञाकारी कवि राजकुमार “गम्भीर”. गम्भीर ……………….. गम्भीर ………………… शब्द मैंने जोड़ दिया वैसे तो मुझे समस्या शब्द भी अच्छा लगता है पर कवि राजकुमार समस्या गम्भीर ये नाम शायद अच्छा नहीं होगा. सो मैंने समस्या निकाल दिया. कवि राजकुमार गम्भीर नाम ठीक है. इतना काम मैंने तो कर दिया – कविता कैसे लिखूं ? लिखना ही है सभी रास्ते बंद है सीधी लम्बी सड़क है. छुपने के लिए कोई पगडंडी, गली, कुचा कुछ भी नही है. सो मुझे आगे बढ़ना है और लिखना है. अगर एक कसम खाई होती तो कसम से मैं वो कसम शायद तोड़ भी देता. पर जोश में खाई हुई सारी कसमें अब भूत बनकर मेरे ही पीछे पड़ गईं. अरे गाँधीजी मेरी रक्षा करो, ओ भगवान मेरी रक्षा करो ……… नहीं नहीं मेरी रक्षा ये नहीं कर सकते. एक कवि ही कवि की रक्षा कर सकता है. अब सिर्फ पुंडलिक ही मुझे बचा सकता है. उसने कहा थ्ज्ञा कि अपने से लड़ो सो मैं लड़ रहा हूँ. पुंडलिक ने जब मुझे अपनी माँ के बारे में बताया कि कैसे उनके अंतिम दिनों में उसने उनकी सेवा की तो मैं भी कल्पना करने लगा कि मैं माँ के अंतिम दिनों में माँ के लिए क्या क्या करूंगा. सबसे पहले तो मैं उनका मग्गा उनके हाथ से छीनकर कहीं दूर फेंक आऊंगा. और एक बार अपने हाथों से उन्हें लाल रिबन पहना कर फिल्म दिखाने ले जाउंगा. क्योंकि मेरी बड़ी इच्छा थी ये देखने की कि माँ फिल्म कैसे देखती होंगी. कैसे टिकट की लाईन में लगती होगी. इन्टरवल में क्या करती होगी और उनके लाल रिबन का फिल्म देखने से क्या ताल्लुक है. पर मेरी ये सारी इच्छाएँ, इच्छाएँ ही रह गई. क्योंकि एक सुबह जब मैं उठा तो देखा माँ अपने पलंग पर नहीं थी वो दरवाजे के पास जमीन पर औंधी पड़ी थी और उनके बालों में लाल रिबन बंधा हुआ था. मैंने कहा माँ – माँ पर वो उठी नहीं फिर मैंने मदर भी बोला पर वो हिली भी नहीं. मैं डर गया. मैं पुंडलिक को उठाने गया पर उसके पहले मैंने माँ के बालों से लाल रिबन निकालकर अपनी जेब में रख लिया. मैं नहीं चाहता था कि उनकी फिल्म देखनेवाली बात किसी और को पता चले. पुंडलिक आया. उसने घोषणा कर दी कि तैयारी कर लो तेरी माँ मर गई. ऐसा कैसे हो गया – कौनसी तैयारी और ये संभव कैसे हो सकता है. मुझे दुख नहीं आश्चर्य हो रहा था क्योंकि मुझे अपनी नहीं चिन्ता इस घर की थी. क्या ये घर कुछ नहीं कहेगा. क्योंकि माँ हमारे साथ नहीं इस घर के साथ रहती थी. शायद घर को पहले खत्म होना चाहिए था. शायद इसलिए माँ पलंग पे नहीं नीचे जमीन पर घर की गोद में मरी थी. तैयारी कर लो कहकर पुंडलिक चला गया. मुझे अकेला माँ के साथ छोड़ के. मैं क्या करता ? मैंने उन्हें पलटाया उनके सर के नीचे एक तकिया रखा और उनकी सूखी कड़क देह को देखने लगा ………………. इसी ने मुझे पैदा किया है – अजीब लगता है ना. पुंडलिक अर्थी का सामान और कुछ लोगों को लेकर आया. मैं रो नहीं रहा था पर सभी लोग मुझसे कह रहे थे. घबराओं नहीं ऐसा होता है – सब ठीक हो जाएगा वगैरह वगैरह. फिर मेरा सिर मुंडवाया गया और मैंने माँ को अग्नि दी. मैं अपनी माँ को जलते हुए देख रहा था. अचानक लकड़ियों के बीच मुझे उनका हाथ दिखा. मुझे लगा वो अपना मग्गा माँग रही है. मेरी इच्छा हुई कि उनका मग्गा लाकर उनके हाथों में पकड़ा दूं या कम से कम अपनी जेब से लाल रिबन निकालकर उनकी चिता में ही डाल दूं. पर मेरी हिम्मत नहीं हुई. मैं चुपचाप उनका जलना देखता रहा. वो जलती हुई लकड़ियों के बीच मेरी माँ है जो जल रही है. जब मैं घर लौट रहा था तो लगा शायद घर नहीं होगा. वो गिर चुका होगा या कहीं न कहीं कोई दरार तो जरूर पड़ी होगी. पर ऐसा कुछ नहीं था. सब कुछ सामान्य था. Page 15 of 16धूप चेहरा जला रही है परछाई जूता खा रही है शरीर पानी फेंक रहा है एक दरख्त पास आ रहा है उसकी आंचल में मैं पला हूँ उसकी वात्सल्य की साँस पीकर आज मैं भी हरा हूँ. आप विश्वास नहीं करेंगे पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है. मैं इसे माँ कहता हूँ. आजकल राधे काफी उदास रहता था. वो अपना काफी समय गाँधी पार्क में गाँधीजी के साथ बिताता था. कहता था आजकल वो और गाँधीजी काफी बातें करते हैं. पर गाँधीजी ने मेरी बात समझकर मुझे माफ भी कर दिया अब गाँधीजी वैष्णोदेवी जाने की जिद कम ही करते हैं. पर वो उदास था क्योंकि आजकल इस गाँव में वैष्णोदेवी जाने का मौसम था. लोग वैष्णोदेवी जा रहे थे वहाँ से लौट के आ रहे थे पर लोग राधे को भगा देते थे. राधे का भी एकदिन अचानक आना बंद हो गया था. घर के सामने धूल ही धूल जमा हो गई थी. राधे आ नहीं रहा था मुझे लगा इस धूल में राधे का कितना सारा सोना बिखरा पड़ा होगा. मैंने झाडू लगाकर वो सारी धूल इक्ट्ठी कर ली सोचा जब राधे आयेगा तो ये सारी धूल उसे दे दूगा. वो बहुत खुश होगा. पर राधे नहीं आया. फिर अचानक एक दिन वो आ गया मैंने पूछा राधे कहाँ थे इतने दिनों? वो कुछ नहीं बोला – चुपचाप बैठा रहा. मैंने कहा मैं गाँधी पार्क भी गया था. तुमको देखने पर तुम वहाँ भी नहीं दिखे तब भी वो चुप रहा. शायद वो जवाब नहीं देना चाहता था. सो मैं भी चुपचाप बैठा रहा. और मैंने जो इतने दिनों से धूल जमा करके रखी थी उसे लेने से भी राधे ने मना कर दिया. उसने कहा कि अब ये मेरे किसी काम की नहीं है. ये कहते ही वो एक सफेद पोटली बन गया और मेरे सामने लुढ़कने लगा. जब राधे इतने दिनों नहीं आया था तब मैंने पहली बार अपने जीवन में किसी का ना होना महसूस किया था. वैसे तो पुंडलिक भी चला गया था माँ भी नहीं रही. पर उनके जाने के बाद उनका ना होना मैंने कभी महसूस नहीं किया. जब तक राधे नहीं आया था मुझे ऐसा लग रहा था मानो मेरे अंदर इतनी खाली जगह छूट गई है कि मुझे अपनी ही आवाज़ गूंजती हुई सुनाई दे रही थी. बस यही है जो है. इसके अलावा मेरे जीवन में ऐसा कुछ नहीं हुआ है. जिसका जिक्र किया जा सके. कुछ छुटपुट बातें और है जैसे एक कुता घर के पिछवाड़े रोज मुझसे मिलने आने लगा. मैं भी शाम को उसके साथ समय बिताने लगा. अभी कुछ ही दिन हुए थे. मैं अभी उसका नाम रखने की सोच ही रहा था कि उसने अचानक आना बंद कर दिया. बस अब राधे है. मेरा ट्रक वाला दोस्त है और मैं हूँ. हम तीनों है और खुश हैं. लड़ाई खत्म. बस इतना ही मेरे साथ हुआ है. मतलब इतना ही हुआ है जो मुझे याद है जिसे सुनाया जा सके. पर इतने के बाद भी मेरी समझ में ये नहीं आया इसमें ऐसा क्या है जो कविता है . पुंडलिक कवि है कविता नहीं है. मेरी माँ भी मेरी माँ ही है. वो गोर्की की या पुंडलिक की माँ जैसी नहीं है. मेरी माँ के साथ घटनाएं हैं कविता नहीं है. राधे राधे है. जो गाँधी पार्क में लगी गाँधीजी की मूर्ति की लाठी है. उससे ज्यादा राधे कुछ नही है. ट्रक वाला दोस्त के बारे में मैं चुप रहना ही पसंद करता हूँ. रघु मेरे लिए चमत्कार था, चमत्कार है और चमत्कार रहेगा वो मेरा रघु है. पर कविता, वो तो कही नहीं है. मैं अपने से जितना लड़ Page 16 of 16सकता था लड़ा. ये कविता कहाँ छुपी है. इतनी सारी कसमें खा चुका हूँ. क्या होगा उनका ? ताराचंद जैसवाल वहाँ इंतजार कर रहा है. मैं यहाँ एक शब्द भी नहीं लिख पा रहा हूँ. पुंडलिक मुझे माफ कर देना. मुझसे नहीं होगा. कसम वसम चूल्हे में भसम ……………. सड़ी सुपारी बन में डाली सीताजी ने कसम उतारी. नहीं नहीं ये कुछ काम नहीं करेगा ये सब मैं अपने आपको बहलाने के लिए कर रहा हूँ. मैं एक तरह का खेल अपने साथ खेल रहा हूँ. ये खेल कब तक चलेगा. मुझे लिखना है और मैं अभी लिखकर रहूँगा. तैयार ………… अब ताराचंद जैसवाल ये रही आपकी चिट्ठी पूरी तरह पूरी. अब आपको जो समझना हो समझो. (पढ़ता है) शुरूआत – नमस्कार ताराचंद जी. नमस्ते. कैसे हैं आप ? आप अच्छे होंगे. मेरी कविता निम्नानुसार है …………… शक्कर के पाँच दानें जादू है जिनके पीछे चींटियां भागती है दो दानों पर पहुंचती है तीन आगे दिखती हैं. सारी चींटियों को बुला लेती हैं. पाँचवे दाने पर पहुंच जाती है पर पीछे के दो दानों को भूल जाती है फिर वही दो दाने आगे मिलते हैं. वो जादू में फंस जाती है. और घूमती रहती है. ये खेल कभी खत्म नहीं होता. क्योंकि चींटियां तलाश रही हैं खेल नहीं रही हैं. जादूगर एक है जो खेल रहा है. अंत - उपर्युक्त कविता ठीक है. मैं भी ठीक हूँ. गलती माफ, ये कविता भेजन के बाद मैं ये घर, ये गाँव , ये शहर, ये देश छोड़कर जा रहा हूँ. मेरा पीछा करने की कोशिश मत करना. कविता संग्रह जरूर छापना – आपको कसम है. आपका आज्ञाकारी कवि राजकुमार गम्भीर. ठीक है न ………….. ? (चींटियों का खेल खेलना शुरू करता है) ब्लैक आऊट Find in document शक्कर के पाँच दानेः मानव कौल.docx Open with Google Docs

सोमवार, 12 जनवरी 2015

SHAKKAR KE PAANCH DAANE (MARATHI) TRANSLATION- SHARVARI PATANKAR

“हल्ली बर का, मी एका विशिष्ट पद्धतीने स्मित करतो. आणि एका विशिष्ट पद्धतीने हसतो. हो हो, मी जिवंत रहायला शिकलोय. आता जे जसं दिसतं, मी ते तस्सच पहातो. जे दिसत नाही ते नसतच बर का माझ्यासाठी. मला काही फरक पडत नाही. मी आहे एक यशस्वी मध्यममार्ग...... रोज घरून निघतो, रोज घरी परततो. कश्शाचा परिणाम होत नाही माझ्यावर. किंवा माझ्या जिभेची चवच हरवलीये म्हणा ना... आता मला प्रत्येक गोष्ट एकसारखीच दिसते...शुभ्र! मला काही माहित नसतं बर का पण मला सगळं माहित्ये असा भाव मी आणतो चेहेऱ्यावर. प्रत्येक किश्श्यावर हसणं, उसासे टाकणं, येतं मला. मी आता खुश आहे...नाही नाही खुश नाही मी सुखी आहे...सुखी. कारण आता आहे काय? मला तर फक्त जिवंत रहायचय. आता मी उडत नाही, वाहत नाही, मी थांबलोय. तुम्ही काहीही समजा, मी आता तटस्थ झालोय. बर का! आता मी खरा आहे. बऱ्यापैकी खरा आहे. “माझ्या कल्पनेच्या कुशीत विसावून मला ते जग पाहूदे.. ज्याच्या प्रतिबिंबात मी जगतोय” हे सगळं आता खोटं वाटतं! माझा हा नवा नवा खरेपणा हसतोय बघा.. माझ्याच जुन्या जुन्या कल्पनांना... अरे हो, आजकाल मी ही बराच हसतो बर का. कधी कधी वाटतं मला हसण्याचा आजार झालाय. पण मग त्याचंही हसू येतं. आता सगळ्या गोष्टी आपापल्या जागी आहेत. हे सगळं बऱ्यापैकी आवडतंय मला. आवडतंय म्हणजे ठीक वाटतंय....हो, ठीक वाटतंय. पण......एक चिंता मात्र आहे.........आता काय सांगू... हल्ली मला रडू येत नाही....विचित्र आहे ना... सुख काय आणि दु:ख्ख काय मला कशामुळेच फरक पडत नाही. थोडं वैतागलं किंवा थोडं हसलं की झालं काम, दु:ख्ख ही खुश आणि सुखही खुश. विचित्र आहे की नाही ही गोष्ट.....नाही ही विचित्र गोष्ट नाहीये ही एक विचित्र जाणीव आहे. समजा तुम्ही मृत आहात पण कोणी त्यावर विश्वासच ठेवत नाही. नेहेमीसारखीच लोकं तुमच्याशी बोलतात, तुम्हांला चहा पाजतात, तुमच्याबरोबर फिरायला येतात. आणि फक्त तुम्हांलाच हे माहित्ये की तुम्ही जिवंत नाही. मला माहित्ये की अगदी रडू फुटावं असंच आहे हे सगळं... पण तुम्हांला आश्चर्य वाटेल, की तरीही मला हल्ली रडू येईनासं झालंय.” अहो नाही नाही....ही कविता मी नाही लिहिली....मी कुठला लिहितोय कविता-बिविता...माझी कुवतच नाही तेव्हढी... त्या जड जड शब्दांना एकमेकांशी लढवायच, मग त्यांना कुस्ती खेळायला लावायची आणि मग या भीषण हिंसेमधून काहीतरी एक गोष्ट अशी आपल्या समोर आणायची.....खरं तर हेच एक आश्चर्य आहे नाही? मला तर कविता वाचताना आणि ऐकतानाच घाम फुटतो. मुळात कुस्ती आणि कवितेमध्ये काही विशेष फरक आहे असं मला वाटत नाही.. मला अजूनही कळलेलं नाही की कुस्ती का खेळतात आणि कविता का लिहितात. मी जेव्हा हे पुंडलिक ला विचारलं, तेव्हा तो म्हणाला की कुस्ती ही बाह्यांगाने खेळली जाते तर कविता अंतरंगाशी कुस्ती करून लिहिली जाते... मला काहीच कळलं नाही. त्यामुळे माझ्या तोंडून फक्त एक असं “हुं....” निघालं. पुंडलिक समजला. तो म्हणाला, “ राजकुमारा, प्रॉब्लेम हा नाहीये की तू बेअक्कल आहेस...प्रॉब्लेम हा आहे की तुला जरा अक्कल कमी आहे. (प्रॉब्लेम हा नाहीये की तू बावळट आहेस...प्रॉब्लेम हा आहे की तुला जरा कमी कळत.) (त्याला मुंग्या दिसतात, तो मुंग्यांशी खेळायला लागतो...मग परत उठतो..) समस्या........मी नं समस्यारूपी एका मोठ्या डोंगरावर फिरतोय सध्या....काय बाबा काय......समस्या काय आहे? तीच तर भली मोठी समस्या आहे नं......एखादी समस्या समोर येते तेव्हा ती आपल्याबरोबर एक उत्तर घेऊन येते आणि ते उत्तर पुन्हा एक प्रश्न निर्माण करतं. म्हणजे आणखी एक समस्या.. असं म्हणतात की जर एखाद्याच्या आयुष्यात समस्या नसतील तर समाजाव की तो आयुष्य जगलाच नाही...अरे? म्हणजे आत्तापर्यंत मी जीवन जगलोच नाही म्हणायचं कारण माझ्या आयुष्यात कुठली समस्या कधी आलीच नाही...खरं तर “समस्या” हा शब्द मला इतका आवडतो नं.....माझी नेहेमीच अशी इच्छा होती की मला असं विविध समस्यांनी ग्रासाव ....माझ्या चारी बाजूंना समस्यांचे डोंगर असावेत म्हणजे मग त्यांना भेदून जात मी ते पार करू शकेन .....पण माझं इतकं नशीब कुठलं? नाही म्हणायला काही अडचणी आल्या पण त्यांना आपण “समस्या” हे भारदस्त नाव नाही देऊ शकत. पण आता मात्र मी खुश आहे हां, कारण या चिठ्ठीच्या रुपात माझ्याकडे अशी एक गोष्ट आलीये जिला आपण “समस्या” म्हणू शकतो.....आज मी ती सारी वाक्ये म्हणू शकतो जी मला केव्हापासून म्हणायची इच्छा होती...पण जरा गंभीर होऊन.... “मी आज, ....... तसा गंभीर हा शब्द ही मला आवडतो... “गंभीर”...काय शब्द आहे नं....नाही पण आधी समस्या... “आज माझ्यासमोर एक समस्या उभी आहे.....मी दु:खी आहे....कारण या भयानक समस्येने मला ग्रासून टाकलंय...काय होणार आता माझं? O ho, माझ्या मनात आत्महत्येचा विचार तर डोकावत नाहीये नं? ...ही तर समस्या आहे....कुठाय, माझा चाकू कुठाय?” झालं.....आता समस्येकडे वळूया.....नको नाही तर....समस्या नको, नाही का? .... तुम्हाला आत्ता माझी समस्या कळणार नाही.....तुम्ही म्हणाल की ही कसली समस्या....पण बाबांनो, माझ्यासाठी ही समस्या आहे...पण आत्ता समस्या नको तर पहिल्यापासून सुरुवात करुया.........लढण्यापासून! हल्ली मी लढतोय हो.. आत्ता सुद्धा माझी लढाई सुरु आहे. गेल्या अनेक दिवसांपासून माझी ही लढाई सुरु आहे. माझ्या असं लक्षात आलंय की ही लढाई जर स्वतःशीच असेल तर मग मी ही लढाई फारच पूर्वी सुरु केलीये. खरं तर जेव्हा मला अक्कलदाढ आली नं तेव्हाच मी लढायला सुरुवात केली. आता ही अक्कलदाढ सुद्धा साधारणपणे ज्या वयात उगवते, त्यापेक्षा दहा-एक वर्षं उशिराच उगवली. त्याच सुमारास माझ्या लक्षात येऊ लागलं की मी असा एक माणूस आहे जो फारच कमी लोकांना आवडतो. कमी म्हणजे अगदी २ – ४ जणांनाच. त्यातली एक आहे माझी आई. कारण तिला मला ओरडण्याची आणि माझ्यावर वैतागण्याची इतकी सवय झालीये की आता ती माझ्याशिवाय राहू शकत नाही. जेव्हा मी काही करतो......म्हणजे एखाद काम........ते झालं की मी हा असा तय्यार होतो....आईचे चित्र विचित्र चेहरे बघायला....त्या सुरकुतलेल्या चेहेर्यावरच्या आणखीन दाट होणाऱ्या सुरकुत्या आणि तिचा तो हात असे उंचावून आपला कृश देह विशाल करण्याचा प्रयत्न......आई चे हे सगळे नृत्यप्रकार आता माझ्या चांगल्या परिचयाचे झालेत. आम्ही दोघं एकमेकांना खूप आवडतो. तसं पाहिलं तर मी अगदी सामान्य शरीरयष्टीचा माणूस आहे...पण मनात आणलं तर मी थोडा उंच दिसू शकतो...जरा तंग कपडे आणि रघुचे हिल्सचे बूट घालून....अनेक जण म्हणतात की मी जेव्हा रघुचे बूट आणि लाल रंगाचा कचकचीत शर्ट घालून बाहेर पडतो तेव्हा मी तसा बरा दिसतो. तसं सर्वांनाच माहित्ये की मी प्रत्येक गोष्ट बरी करतो. शाळेत असताना जेव्हा परीक्षेचा निकाल लागायचा आणि लोक आईला विचारायचे, तेव्हा आई नेहेमी म्हणायची की बरा लागलाय त्याचा रिझल्ट! मी बरा जन्माला आलो, बरा वाढलो. खरं तर मी चांगलं आणि वाईट याच्या बरोब्बर मधे जो बिंदू असेल ना त्यावर असतो नेहेमी. ज्याला तुम्ही सगळे “शून्य” म्हणाल, मी त्याला “बरा” म्हणतो. एकदा तर शाळेच्या क्रिकेट टीममधे मला घ्यावं की न घ्यावं यावर चांगला २ तास वाद झाला. आयुष्यात पहिल्यांदाच मला मी खूप महत्वाचा आहे असं वाटलं. या वादात, एका बाजूचे लोक म्हणत होते की याला टीम मधे घ्यायला हरकत नाही कारण तो काही वाईट खेळत नाही. तर दुसऱ्या बाजूची मंडळी म्हणत होती की याला टीम मधे घेऊ नका कारण हा चांगला ही खेळत नाही. शेवटी मी उत्तर दिलं....म्हटलं, “सर....सर, मी बरा चं खेळतो.” कोणाला काही कळलंच नाही. अरे, त्यांना शब्द सापडत नव्हता मी कसं खेळतो हे सांगायला...म्हणून मी सांगितलं की “बरा”...मी बरा खेळतो...तर त्यावर सगळे जण माझ्यावर तुटून पडले...म्हणे बरा काय बरा...बरा म्हणजे कसा....बरा वगैरे असं काही नसतं...तेव्हापासून ते आजतागायत मी लोकांना क्रिकेट खेळताना फक्त पहात आलोय...माझी अंगयष्टी पाहून भले भले गन्डतात. अनेकांना असं वाटत असेल की याला नीट धावता तरी येईल का? पण मग मी सर्वांना आश्चर्याचा धक्का देतो...कुठलाही खेळ असुदे...नवा-जुना..मी बरा खेळून दाखवतो...पण माझ्या समस्येची सुरुवात इथूनच होते. मी त्या, मघाशी म्हटलं ना त्या बिन्दुपलीकडे जाऊच शकत नाही. मी पहिल्याचं दिवशी बरा खेळून दाखवतो आणि मग वर्षानुवर्षं मी तसाच खेळतो.....”बरा”. आई सांगते की लहान असताना मी चांगला गब्बू(जाडा) होतो. लोक म्हणायचे की जन्मल्या जन्मल्या आपल्या बापाला गिळला म्हणून एव्हढा गब्दुल आहे. मला जेव्हा जेव्हा ही गोष्ट आठवते नं तेव्हा तेव्हा मी खूप हसतो...आपल्या बापाला गिळला ....गुळूक्क...गुळूक......गुप्प आणि हुप्प... गब्बू....! पण मग नंतर हळू हळू मी बारीक होत गेलो...त्याचं कारण आई सांगते की मी लहानपणी रिन साबण खाल्ला होता...बिस्कीट समजून ...लपा लपा चाटला......मग चार पावलं चाललो न चाललो आणि धपकन खाली पडलो. तेव्हा आईच्या लक्षात आलं की हा बेशुद्ध पडलाय. आई सांगते, नेमका त्याच सुमारास तिने “मदर इंडिया” सिनेमा पाहिला होता. तिने मला कडेवर घेतलं आणि ती हॉस्पिटल च्या दिशेने धावत सुटली. मी मदर इंडिया नाही पाहिलाय पण आई धावत का सुटली? खरं तर माझ्या आईला “आई” ही भूमिका एकदा जीव तोडून साकारायची होती...तशी तिने ती तेव्हा साकारली...१.५ किलोमीटर अंतर ती माझ्यासारख्या ताज्या, तरारलेल्या जाडजूड मुलाला घेऊन धावली. घामाघूम झाली बिचारी. डॉक्टर तिला ओरडले. म्हणाले, तुम्ही धावल्यामुळे तुमच्या मुलाने खाल्लेल्या रिन साबणाचा फेस आता चहूकडून बाहेर येऊ लागलाय. आई सांगते, २ मग पाणी काढलं डॉक्टरांनी माझ्या पाठीमधून. मग ते म्हणाले की काळजी घ्या..खूप अशक्त झालाय हा.....अनेक वर्षं याला जपावं लागेल आता.....दहा वर्षांचा होईपर्यंत याच्या डोक्याला मार लागता कामा नाही...वगैरे... एक शक्यता अशी आहे की कपडे धुवायचा साबण खाल्ल्यामुळेच मला अक्कलदाढ उशिरा आली. बर, मला सांगा की कसं कळत की अक्कल आली? तो काय बल्ब आहे का की बटण दाबल आणि म्हटलं “अरे वा, आला लाईट – अरे वा, आली अक्कल! कसं कळत कसं, सांगा नं? हा प्रश्न एकदा पुंडलिक ने मला विचारला. मला वाटलं तो माझी अक्कल तपासून बघतोय. मी घाबरलो. मी फार विचार नाही केला, केला असता तर त्याला वाटलं असतं की मला अक्कल नाहीये. अगदी काही क्षणांत मी उत्तर दिलं, म्हटलं, की “जेव्हा तुम्हाला पूर्वी केलेल्या गोष्टी मूर्खपणाच्या वाटू लागतात तेव्हा असं समजावं की आपल्याला अक्कल आलेली आहे”. पुंडलिक हसला. मला लगेच वाटलं मी काहीतरी चुकीचं बोललो. मग मी घाईत पुढे म्हटलं की “आणि त्याची जाणीव आपल्याला दाढेच्या जवळ अशी एका कोपर्यात कुठेतरी होते”. बापरे, मी माझ्या संपूर्ण आयुष्यात इतका शरमिंदा कधी झालो नव्हतो. पण तो हसला, पुन्हा हसला आणि इतका हसला की मला दरदरून घाम फुटला. मग त्याने त्याचं उत्तर ऐकवलं, बाप रे...कसलं भारी उत्तर होतं ते...एक एक असा पाहेलवानासारखा जड शब्द माझ्या कमकुवत डोक्यावर पडत होता...धम धम धम.... तो साधारण २ तास सतत बोलतच राहिला. मला २ तास बोलणं अशक्य आहे पण तुम्हाला मुख्य मुद्दे सांगतो....तो म्हणाला.... (.....कविता...)... सुंदर फूल थर थर थरारलं... तुझ्या माझ्या कहाणीत, समजा एक भुंगा आला... समजा दाढ दुखू लागली. दातातून आला हात, पायांचा झाला थरकाप, थर थर थर थर थर थर थर थर. मग एक कलंदर, बसला सायकलीच्या चाकावर, चाक झालं पंक्चर... गुडघ्यात सगळी अक्कल. गुडघ्याच्या डोक्यात, फिरतोय जुनाट पंखा गर् गर् गर् गर् गर् गर् गर् गर्. नाकापेक्षा मोती जड बेडकाचा नातू हत्तीचा दात अकलेची दाढ तोंडातला घास रात्रीचा चंद्र सकाळचा सूर्य उगवला जेव्हा.... चिमण्या सगळ्या उडून गेल्या फर फर फर फर फर फर फर फर..... त्या दिवशी पुंडलिक माझ्यासमोरून कधी उठला, रात्र कधी झाली, सकाळ कधी झाली मला काहीही कळलं नाही. आता माझ्या आयुष्याचं एकमेव ध्येय होतं- पुंडलिकला असं काहीतरी बोलून दाखवायचं की तो चाट पडेल. मला त्याला घाम फुटलेल्या अवस्थेत पहायचं होतं. तसा हा पुंडलिक सुद्धा विचित्रच माणूस आहे बर का! तो स्वतःचा वाढदिवस साजरा करत नाही. कारण काय तर म्हणे “मी जन्मलो नाही, मी प्रकटलो.” माझ्या दृष्टिने तर तो प्रकटच झाला होता. तो माझ्या आईचा भाऊ...अचानक एक दिवस आमच्याकडे रहायला आला. माझा विश्वासच बसेना. अरे, इतकी वर्षं मी माझ्या आईला ओळखतोय, माझ्याशिवाय तिचं कोणी आपलं माणूस असू शकेल?माहित नव्हतं. हा पुंडलिक स्वतःला कवी म्हणवतो. महान कवी! आणि मला महान श्रोता. कारण मी एकटाच होतो नं. पण मी मात्र खुश होतो हां कारण त्याने त्याची पहिली कविता मला ऐकवली तेव्हापासूनच, त्याचं माहित नाही पण मी मात्र महान होत गेलो. पण आमच्यातलं हे कवी आणि श्रोत्याच नातं थोडं उलटं होतं. प्रत्येक कविता ऐकवून झाली की पुंडलिक माझं कौतुक करू लागायचा. कारण त्याला माझ्या चेहेऱ्यावरचा चाट पडल्याचा भाव फारच आवडायचा. माझ्यापाशी तशीही हावभावांची वानवाच होती पण हा चाट पडल्याचा हावभाव मात्र मी पुंडलिकाच्या समोर नेहेमी दाखवायचो. कारण तो जे काही बोलायचा त्यातलं ९० टक्के मला काही कळायचंच नाही. आणि जे काही कळायचं ते सांगायला मी घाबरायचो. पुंडलिक माझ्यासमोर अनेक वेळा रडलाय. देव जाणे काय पण काहीतरी दु:ख्ख होतं त्याला. पण जेव्हा तो माझ्यासमोर रडायचा तेव्हा मला जाम हसू यायचं. मला वाटतं पुंडलिकला स्वतःच रडणं खूप लाजिरवाणे वाटायचं. त्यामुळे तो आपलं रडू फारच विचित्र पद्धतीने दाबायचा. शरीर एका विशिष्ट प्रकारे घट्ट ताणून तो आपला चेहरा माकडासारखा मिचकावायचा आणि असा किरटा आवाज काढायचा इ...इ...इ... त्याचं त्याच्या आईवर फार प्रेम होतं. तो म्हणायचा की मी शेवटपर्यंत आईजवळ राहिलो. बहुदा माझ्या आईला तिची आई आवडत नसावी. काय माहित पण पुंडलिकनेच मला असं सांगितलं होतं. आईवर प्रेम असणं – हे काय असतं मी आजवर समजू शकलेलो नाही. मी जेव्हा माझ्या आईकडे पहायचो तेव्हा मला वाळलेल्या लाकडासारखी एक बाई दिसायची जी चुपचाप घरात काहीनाकाही काम उकरून काढून करत रहायची. विचित्र वाटतं नाही? हे असं एकाच घरात वर्षानुवर्षं सतत काम करत रहायचं...मला तर काही वेळा वाटायचं की हे घर म्हणजे घर नाहीच आहे – एक होडी आहे... तिला जागोजागी भोकं पडलीयेत. माझी आई या होडीच्या मधोमध भांडे घेऊन बसलीये आणि सतत पाणी काढून बाहेर फेकत्ये. (मुंग्या दिसतात, मुंग्यांबरोबर खेळतो, आणि परत उठतो.) पुंडलिक म्हणायचा, “तुझी आई खूपच आळशी आहे रे”. अरे? असं काय म्हणतोय हा? तो नेहेमीच असं काहीतरी बोलून निघून जायचा. आणि मी आपला विचार करत बसायचो. पण हळू हळू माझ्या लक्षात यायला लागलं की ती मदर इंडियाची घटना वगळता मला वाटत खरंच माझी आई आळशी आहे. माझ्या बारशापासूनच ही गोष्ट सिद्ध होत्ये. तिने माझं नाव राजू ठेवलं ... आता राजू हे नाव भारतातल्या साधारण दर तीसऱ्या माणसाचं असतं. आणि वर शाळेत नाव घालताना हिच वात्सल्य जागृत झालं आणि तिने राजूला पुढे वाढवून जोडलं “राजकुमार”..! आई सांगते की शाळेत नाव घालताना तो तिथला क्लार्क माझ्याकडे बघून सारखा हसत होता. तिचं म्हणणं होत की माझा चेहराच तसा आहे. माझं तर असं म्हणणं आहे की जगातल्या प्रत्येक माणसाला स्वतःचं नाव स्वतः ठेवण्याचं स्वातंत्र्य असलं पाहिजे. माझी आई ही एक गूढ स्त्री होती हे फक्त मलाच माहित्ये. तिने कपाटातून लाल रंगाची रिबीन काढली की समजावं ”आता वेळ झालेली आहे”. ती लाल रिबीन बांधून आई बाहेर निघून जायची. तिला एक छंद होता. तिला एकटीने जाऊन सिनेमे बघायला फार आवडायचं. आणि ते सुद्धा धार्मिक नव्हेत तर रोमान्स आणि मार-धाडीचे. रोमान्सचं माहित नाही पण बहुदा या मार-धाडीचा बऱ्यापैकी परिणाम तिच्यावर दिसू लागला होता. तसले सिनेमे पाहून वाढत्या वयाबरोबर ती पुरुषी दिसायला लागली होती. तिला चक्क दाढी-मिशा फुटल्या होत्या. नंतर नंतर तर ती मला ओरडताना म्हणायची, “ कुत्ते, मै तेरा खून पी जाऊंगी.” त्याच वेळी पुंडलिकाने मला एक पुस्तक दिलं.. माक्झीम गोर्कीच “मदर”. माझ्या आश्चर्याला पारावार उरला नाही. आत्तापर्यंत मला असं वाटायचं की जगातल्या सगळ्याच आया या एका विशिष्ट नियमाप्रमाणे एकसारखंच वागतात. अरे, पण हे – हे काय होतं? पुंडलिक म्हणाला की ही खरी गोष्ट आहे. मी विचार करायला लागलो..अशीसुद्धा आई असू शकते? मग मला आठवलं की पुंडलिक मला म्हणाला होता की त्याचं त्याच्या आईवर प्रचंड प्रेम होतं. त्यामुळे आता फक्त आणखी एका आईबद्दल मी जाणून घेऊ इच्छित होतो...पुंडलिकची आई. मी पुंडलिकला विचारलं की तुझी आईसुद्धा गोर्कीच्या मदरसारखी आहे का रे? तर या प्रश्नामुळे, पुंडलिकच्या पोटात धुमसत असणारा ज्वालामुखी एकदम जागृत झाला. तो बोलायला लागला...बोलतच राहिला. तो अशी काही उदाहरणं देऊ लागला आणि असे काही एकेक शब्द वापरायला लागला की त्याची ती गोष्ट मला मनोरंजक वाटत होती पण त्यातलं कळत मात्र काहीच नव्हतं. मग मी माझं ब्रम्हास्त्र काढलं...तोच तो चाट पडल्याचा भाव... तो बघून मात्र पुंडलिक जरा मंदावला आणि तो घोगऱ्या आवाजात हळू हळू बोलायला लागला आणि मला मग जरा कळायला लागलं. तो सांगत होता की “ मी आईच्या शेवटच्या दिवसांमध्ये वाचन-लेखन, घराबाहेर जाणे सगळं बंद केलं होतं. मी फक्त आईजवळ असायचो, तिला गीता वाचून दाखवायचो, अनेक वर्षं मी घराबाहेर पडलो नाही. गीता ऐकता ऐकताच तिचा मृत्यू झाला. ती अचानक गेली. मला एकदम विचित्र वाटलं. मी रिकामा झालो. मला काही कळलच नाही. अचानक तिचा हसरा चेहरा माझ्या डोळ्यांसमोर आला आणि त्या चेहेऱ्याचं एक झाड झालं.... त्याच झाडाखाली बसून मी लिहायला सुरुवात केली.” (कविता) उन्हाच्या काहिलीने चेहरा करपला, सावली तळपायाखाली सरकली.. शरीर पाणी ओकायला लागलं... आणि तो वृक्ष जवळ आला.. त्याच्याच पदराखाली वाढलो मी. त्या मायेच्या ओलाव्याने तरारून हिरवा झालो मी ही. तुमचा विश्वास नाही बसणार, या जंगलातल्या एका झाडाने मला पाणी घातलं. “आई” म्हणतो मी त्याला. जेव्हा रात्रीत कोलाहल शांत होतो.. भीतीमुळे झोप रात्रीपेक्षा छोटी होते. आपलाच डरपोकपणा आपली सुंदर स्वप्नं मोडायला लागतो... तेव्हा तिची बोटं कपाळावर फिरतात...हलकेच... आणि मला झोप येते... हलकेच...! आणि तो झोपला. मी अवाक झालो. बर झालं तो झोपला ते, कारण मला त्याच्यासमोर रडायचं नव्हतं. मी धावत त्याच्या खोलीबाहेर आलो आणि मला “ती” दिसली. तीच ती, वाळलेल्या लाकडासारखी दिसणारी स्त्री जी आता पुरुषी दिसू लागली होती. ती हातात भांडं घेऊन सतत बाहेर पाणी फेकत होती. मी वरपासून खालपर्यंत थरथरायला लागलो. मला वाटतं पहिल्यांदा मला माझी आई दिसली. मी धावत तिला जाऊन मिठी मारली आणि एकदम माझ्या तोंडून निघालं....... “पेलागेया निलोबना - माय मदर”... सटाक - आवाज आला. माझ्या डोळ्यासमोर काजवे चमकले.... पुढे अनेक दिवस तिची माझ्या गालांवर उमटलेली, वात्सल्याने भरलेली बोटं मला जाणवत राहिली. पण या घटनेने मी हरलो नाही. मी काही तिला मदर म्हणायचं सोडलं नाही. अर्थात, मी मदर मनात म्हणायचो आणि आई मोठ्ठ्याने म्हणायचो. मदर आई मदर आई असं...आणि तसंही माझ्या आणि आई मधले संवाद अनेक वर्षांपूर्वीच ठरून गेलेले होते. कोणत्याही घटनेचा आमच्यातील या ठरलेल्या संवादांवर परिणाम होत नसे. एकदा पुंडलिक म्हणाला होता की तुझं गाव आणि तू एकसारखेच...तुमच्यात काही फरक नाहीये. आणि तो निघून गेला. अरे? असं काय म्हणाला हा? मी विचार करायला लागलो आणि बऱ्याच वेळाने माझ्या लक्षात आलं की खरंच आहे हे.. माझं गाव हे तसं गाव पण नाहीये आणि पूर्णपणे शहर पण नाहीये. म्हणजे इथे श्रीमंती वाहत नाहीये पण कोणी भुकेकंगाल पण नाही. हे इतकं महत्वाचं नाहीये की त्याला देशाच्या नकाशात स्थान मिळेल पण म्हणून हे नाहीच आहे असंही नाहीये. तसं पाहिलं तर इथले लोक काही करू इच्छित नाहीत पण सगळे शेवटी काही नं काही करतातच. या गावाचं बर चाललंय...म्हणजे माझ्यासारखं..मी कसा आहे...बरा. पुंडलिक म्हणतो की हे गाव सांडलेल्या लोकांचं आहे. म्हणजे रेतीचा ट्रक जाताना कशी थोडी थोडी रेती सांडते मागे...तशा मागे राहिलेल्या,सांडलेल्या लोकांचं मिळून हे गाव तयार झालंय. माझं गाव हायवे आणि जंगलाच्या बरोब्बर मधे होतं. पण माझं घर हायवेच्या बाजूला होतं. रस्त्याच्या पलीकडे एका धाब्यावर चित्र-विचित्र चेहेर्यांची माणसे जोरजोरात हसत-खिदळत जेवायची. असं वाटायचं की या माणसांचे आवाज आता त्यांच्या गाड्यांसारखे झालेत. मी दिवसा कधी तिथे फारसा जातच नसे. माझं काम तर पहाटे ५ वाजता असायचं. मी खरं तर ट्रकच्या मागे काहीतरी लिहायला जायचो. मला इतकंच माहित होतं की हे ट्रक्स संपूर्ण देशातल्या प्रत्येक गावात आणि प्रत्येक शहरात जागोजागी जातात. मी ट्रक्सच्या मागे छोट्या छोट्या अक्षरात लिहीत असे. कोणासाठी माहित नाही. माझ्या दृष्टिने ते मी अंतराळात संदेश पाठवल्यासारखं होतं. मला अगदी खात्री होती की कोणी राजू, राजकुमार, बंटी, पिंटू, छोटू, चिंटू, राकेश सारखा सामान्य मुलगा माझ्यासारखाच सक्काळी पाच वाजता उठून ते वाचत असणार. कारण मी लिहिलेलं कधीच माझ्याकडे परत आलं नाही. याचा अर्थ सरळ आहे, कोणीतरी आहे जे मी लिहिलेलं वाचून मग खोडून टाकत, दुसऱ्या कोणी ते वाचू नये म्हणून. आमची मैत्री बऱ्यापैकी वाढली होती. मी त्याला माझं सगळं काही सांगत असे पण अर्थात थोडक्यात आणि चलाखीने शब्द फिरवून. उगाच कोणीतरी वेगळाच हे वाचून हसला तर? आणि पोलीस वगैरे घरी आले तर? कारण मी नं रघू, आई, पुंडलिक आणि राधे बद्दलची सगळी गुप्त माहिती यात लिहिली होती. आणि पोलिसांना कळू नये म्हणून मी हुशारीने खूप आधीच ट्रक वर लिहिलं होतं की मित्रा, आता रघु = हिरो, पुंडलिक = कवी, राधे = गांधीजींची लाठी आणि आई = भांडे वाली बाई. मी पहाटे ५ वाजता का उठायचो याची २ कारणे आहेत..पहिल म्हणजे ट्रकवरून संदेश पाठवायचा आणि दुसरं म्हणजे राधेशी भेट कारण राधे रोज सकाळी ५ वाजता माझ्या घरासमोर यायचा. त्याचं नाव खरंच राधे आहे की नाही हे सुद्धा मला माहित नाही. कारण माझ्याकडे पाहिलं की तो राधे राधे म्हणायचा आणि मी सुद्धा मग त्याला उत्तर म्हणून राधे राधे म्हणायचो. आम्ही दोघंही एकमेकांसाठी राधे होतो. मी त्याला सोनेवाला बाबा म्हणायचो...कारण तो सोन वेचायचा. आमच्या घरात सोन्या-चांदीची २ छोटी दुकानं होती. आम्हांला त्यांचं भाडं मिळायचं. राधे रोज आपल्या जवळच्या लोखंडाच्या दात्याने सोनं वेचत बसायचा. ते करत असताना त्याच्या शरीराच पांढर गाठोडं व्हायचं. आणि मला आपलं ते सारखं डूगु डूगु हलताना दिसायचं. काम तो अगदी गप्प राहून करायचा. मला तर त्याच्या फक्त श्वासांचा आवाज यायचा. राधेला मी अनेक वर्षं ओळखतोय. मला वाटतं त्याचं वय थांबलंय ... बहुदा ते वाढायची शक्यताच नाहीये. तो अनेक वर्षं वृध्दचं आहे. माझा तर विश्वासच नाहीये की राधे कधी लहान मूल असला असेल. तो गावाबाहेर एकदाच गेला होता आणि तो त्याचा पहिला आणि शेवटचा प्रवास होता. तो गांधीजींना पहायला - फक्त पहायला साबरमती आश्रमात गेला होता. हेच त्याच्या आयुष्यातलं एकमेव कर्तुत्व होतं आणि त्याबद्दल त्याने मला जवळ जवळ ५० वेळा तरी ऐकवलं होतं. प्रत्येक वेळी जेव्हा तो गांधीजींना भेटल्याची घटना सांगतो तेव्हा त्या प्रत्येक गोष्टीत, गांधीजी राधेशी वेगळं बोलतात. बऱ्याच वेळा गांधीजींनी फक्त नमस्ते म्हटलं आणि राधे परत आला. अनेकदा राधे गांधीजींबरोबर बसून जेवलाय. अनेकदा गांधीजींना त्याला काहीतरी सांगायचं होतं पण त्याला गावी लौकर पोचण्याची घाई होती... आणि एकदा तर गांधीजी त्याला म्हणाले की “राधे, मी आता थकलोय रे, आता तूच गांधी हो” सोनं वेचत असताना मी राधेशी फार नाही बोलायचो. पण एकदा मी त्याला विचारलं की तू सोन का वेचतोस तर तो म्हणाला की त्याला मरण्यापूर्वी आयुष्यात एकदा वैष्णोदेवीच्या दर्शनाला जायची इच्छा होती. मी विचारलं किती पैसे लागतील तुला तिथे जाऊन यायला. तर तो म्हणाला कमीत कमी हजार तरी लागतील. मग मी म्हटलं की तुझ्याकडे हजार रुपये नाहीयेत का तर तो म्हणाला आहेत नं....अरे? हे काय, गंमतच आहे. मी त्याला म्हटलं की जर तुला वैष्णोदेवीला जायचंय आणि तुझ्याकडे पैसेही आहेत तर मग तू का जात नाहीयेस? राधे गप्प झाला. विचित्र वाटलं मला त्याचं ते गप्प बसणं म्हणून मग मी काही बोललो नाही. राधे सावकाश सांगू लागला, “मी गांधीजींना भेटल्यानंतर थोड्याच काळात त्यांचं निधन झालं आणि मला फारच दु:ख्ख झालं. आमच्या गावात गांधी पार्क आणि गांधीजींच्या दगडी पुतळ्याची स्थापना झाली नं तेव्हा मला वाटलं की मरते वेळी गांधीजींनी नक्कीच म्हटलं असणार की माझा पुतळा राधेच्या गावी जरूर उभारा. मी तासंतास त्यांच्या पुतळ्यासमोर उभा राहायचो, गांधीजी सुध्दा तासंतास माझ्याकडे पाहत राहायचे. मला वाटायचं की ते मला काही सांगू पहातायत पण पार्क मधे गर्दी असल्यामुळे ते सांगू शकत नाहीयेत. मग एका रात्री ते माझ्या स्वप्नात आले...म्हणजे खरं तर ते नाही आले, त्यांनी मलाच त्यांच्या आश्रमात बोलावून घेतलं. मी पाहिलं, गांधीजी होते आणि खूप गर्दी होती. त्यांनी मला पाहिलं आणि म्हणाले, “राधे.....,” मी नमस्कार केला. त्यांनी मला छातीशी कवटाळलं आणि माझ्या कानात हळूच म्हणाले की “बेटा, मी नाही जाऊ शकलो पण तू एकदा वैष्णोदेवीला जा आणि देवीमां ला भेटून ये. मी थक्क झालो. हे काय सांगतायत गांधीजी मला? मी त्यांच्याकडे पाहतो तो काय..गांधीजी कबुतर होऊन उडायला लागले.”.....अचानक मला जाग आली, मी पार्क मधे गेलो आणि पाहिलं की तेचं कबुतर गांधीजींच्या पुतळ्याच्या डोक्यावर बसलंय. स्वप्नं खरंच होतं. अगदी खरं. तोपर्यंत मी फक्त एकदाच गावाबाहेर गेलो होतो त्यामुळे जरा भीती वाटत होती. त्या वेळी नाही जाऊ शकलो आणि आता मला जायचं नाहीये. कारण मी माझं आयुष्य कसंही जगलो असेन पण एका आशेवर जगलो की मी एकदा तरी वैष्णोदेवीला जाऊन येईन. अगदी नक्की जाईन. पण आता जर मी गेलो नं तर मग उरलेले दिवस कसे काढू? ज्या आशेवर मी जगलो ती आशा आता इतकी मोठी झालीये की जणू माझा मुलगाच आहे ती......आता या वयात माझ्या या तरण्याबांड झालेल्या मुलालाच मारून टाकणं कसं शक्य आहे मला? (मुंग्या दिसतात, मुंग्यांबरोबर खेळतो, आणि परत उठतो.) मला आठवतंय आमच्या शाळेत मी गांधीजींविषयी वाचलं होतं. आमचे मास्तर – गावी सरांना मास्तर म्हणतात ना...ते इतकं निरस शिकवायचे. गांधीजींबद्दल आम्हांला शिकवण्यात ना त्यांना मजा यायची आणि शिकण्यात ना आम्हांला... विशेष करून मला...कारण तोपर्यंत मी रघूच्या विशाल आणि चमचमणाऱ्या विश्वात प्रवेश केलेला असायचा. रघु...रघु....रघु....रघु नाहीच तो एक चमत्कार होता. तो खूप देखणा होता आणि सगळे त्याला घाबरायचे कारण सगळ्यात पहिल म्हणजे त्याचे वडील पोलीस होते आणि आमच्या गावी बदली होऊन आले होते आणि दुसरं म्हणजे अख्ख्या गावात फक्त रघुलाच थोडं-फार इंग्रजी बोलता यायचं. आमचे मास्तर सुद्धा त्याला घाबरायचे कारण त्याच्या इंग्रजीला हिंदीच्या मास्तरांकडे उत्तर नसायचं. माझ्यासाठी रघु इयत्ता ९ वी ते ११वी “कृष्ण” होता ज्याच्या बासरीमुळे माझ्यासारख्या अनेक गायी त्याच्या मागे मागे जायच्या. माझ्यासाठी तो हरीण, सिंह आणि घोडा याचं एक अजब मिश्रण होता. एक तर तो नेहेमी वर्गात उशीरा यायचा आणि तो यायच्याआधी त्याचा आवाज यायचा....घोड्यासारखा....टाप टाप टाप...त्याचे हिल्सचे उंच बूट....ते घालून तो असा वर्गाच्या दरवाजात प्रकट झाला की सिंहाच्या आयाळीसारखे त्याचे लांब केस बघून मास्तर स्वतःच उठून उभे राहायचे.... तो एकदम कडक कपडे घालायचा. वेगळाच होता तो. सांर गाव एकीकडे आणि रघु एकीकडे...तो एकदम रंगीला होता. आणि माहित्ये, तो कुणा भारतीय नाही तर एका परदेशी देवाला मानायचा. त्याने त्याच्या घरात चारी बाजूंना या देवाच्या तसबिरी लावून ठेवल्या होत्या. तो सारखं म्हणायचा....हा देव आहे....हा देव आहे...! एकदा तो सांगत होता की त्याच्या या देवात अशी शक्ती आहे की ते झोपायला जाताना जेव्हा दिव्याचं बटण बंद करतात तेव्हा त्यांना झोप आधी लागते, दिवा नंतर बंद होतो. एकदा मी त्याला त्याच्या कळपातल्या एका गायीसारख हंबरून विचारलं की रघु, तुझ्या देवाचा धर्म कुठला आहे? यावर तो हसला, खूप हसला...बराच वेळ हसून झाल्यावर त्याने एक इंग्रजी शब्द उच्चारला...मला नाहीच कळला. रघूच आणि माझं नातं हे कृष्ण आणि त्याच्या गाईसारखंच होतं. आम्ही कधीच एकमेकांशी समोरासमोर बोललो नाही. माझी हिम्मतच नव्हती तेव्हढी. मी माझ्या त्या ट्रकवाल्या मित्राला रघुबद्दल बरंच लिहिलं होतं. त्या काळात मी घरी फक्त झोपायला जायचो. तहान-भूक विसरलो होतो. मी फक्त रघूच्या मागे मागे जायचो. त्याच्याकडे एक मस्त लाल रंगाची सायकल होती. आपले हिल्सचे बूट आणि लाल रंगाचा कचकचीत शर्ट घालून जेव्हा रघु ती सायकल चालवायचा ना...तेव्हा काय दिसायचा माहित्ये...! त्याच्या सायकलीची घंटा ऐकायला मी सारखा त्याच्या मागे धावायचो. तो आपली सायकल लावून कुठे गेला की मी हळूच ती घंटा वाजवायचो. वेगळीच वाजायची ती...आमच्या गावातल्या इतर सायकलींसारखी “टंग टंग” नाही, “ट्रिंग ट्रिंग” अशी वाजायची. पण एक दिवस त्याने शाळेत घोषणाच करून टाकली की तो शाळा सोडून चाललाय. कारण त्याच्या बाबांची बदली शहरात झालीये. मी तर वर्गातच रडायला लागलो आणि चांगला मोठ्याने...ओरडून ओरडून म्हणत होतो...की “नाही रघू नाही .....तू मला सोडून नाही जाऊ शकत. तू असं कसं वागू शकलास माझ्याशी? नाही नाही”....मी गप्प झालो तेव्हा माझ्या लक्षात आलं की अख्खा वर्ग माझ्याकडे पाहून फिदीफिदी हसत होता. मला सहन नाही झालं. मी सरळ वर्गाबाहेर गेलो. पण जाण्यापूर्वी एकदाच मला रघुचा चेहरा पहायचा होता. तो पण मला हसत असला तर? पण माझी हिम्मत नाही झाली. मला माझं हे वागणं फारच वाईट आणि लाजिरवाणे वाटू लागले. सकाळीच सकाळी मी राधेला मिठी मारून खूप रडलो. राधेने समजावलं मला. म्हणाला...”उगी उगी, जाऊदे रे. होतं असं कधी कधी, रडायचं नाही.... मी जेव्हा गांधीजींचा निरोप घेत होतो तेव्हा त्यांनासुद्धा सहन होईना माझं जाणे...त्यांच्या डोळ्यात अश्रू होते”. अरे हे काय? म्हणजे राधेला कळलंच नव्हतं मला काय म्हणायचंय ते...मला पहिल्यांदाच राधेचा राग आला आणि मी तडक रस्त्याच्या पलीकडे निघून गेलो आणि एका ट्रकजवळ उभा राहिलो...कितीतरी तास मी तसाच उभा होतो. मी शाळेत जाणे बंद केलं. काही दिवसांनी एक हवालदार आला घरी. मी घाबरलो. माझ्या डोक्यात लगेच माझी ट्रकवाली गंमत आली...गंमत कसली...चूकच ती. मला वाटलं की झालं, मी आता पकडला गेलोय. आता सर्वांना कळणार की मी त्यांच्याबद्दल काय विचार करतो, मला काय वाटतं....मला तुरुंगात जायची भीती नव्हती वाटत पण हे असं सगळ्यांना समजणे की आपल्याला त्यांच्याविषयी काय वाटतंय...हेच किती भीतीदायक आहे. सर्वांसमोर अगदी नागडं झाल्यासारखंच नाही का? मी घाबरत घाबरत त्या हवालदारासमोर गेलो...म्हटलं.. “मीच तो..राजकुमार..” तो हसला. त्याने मला एक बेग दिली आणि म्हणाला.. “रघुसाहेबांनी जाण्यापूर्वी ही तुम्हाला द्यायला सांगितली होती. अच्छा, येतो” तो गेला. मी ती बेग उघडून बघतो तर काय ... “रघुचे हिल्सचे बूट आणि त्याच्या देवाचा फोटो.” (राजकुमार ब्रूस ली चा फोटो काढतो आणि त्याला साष्टांग नमस्कार करतो) रघुचे बूट मी फार वापरू शकलो नाही कारण मला चावायचे ते. पण माझे पाय सुजेपर्यंत मी ते वापरणं सोडलं नव्हतं. माझे सुजलेले पाय एकदा पुंडलिकने पाहिले. मला वाटलं त्याला वाईट वाटेल आणि तो विचारेल की काय झालं बाबा...पण छे.. त्याने काहीही विचारलं नाही. त्याने माझ्या पायांकडे पाहिलं, हसला, आणि वळून खिडकीच्या दिशेने पहायला लागला...मग हळूच पुन्हा वळला, हसला आणि म्हणाला.... “चपला चावतात ना तेव्हा हे आयुष्य सुद्धा आपल्याला चावत रहातं, आणि चपला चावणं बंद झालं की आपला वेळ जाणंही बंद होतं”. त्या दिवशी पहिल्यांदाच मला खूप एकाकी वाटलं. कारण इथे कोणीच “माझ्याबरोबर” रहात नव्हतं. मला असा एकही प्रसंग आठवत नाही जेव्हा मी काही बोलतोय आणि कोणी ते ऐकतंय. माझ्याकडे बोलण्यासारखं कधी काही नव्हतंच ही गोष्ट वेगळी. पण पुंडलिकसुद्धा कधी माझ्याबरोबर नसायचा. मीच त्याच्याबरोबर असायचो नेहेमी. राधेचं गांधीजी पुराण अजून संपलं नव्हतं. तिथेही मी गप्पच असायचो. आईच्या होडीमधलं पाणी अजून संपायचंच होतं. एक तो ट्रकवाला मित्र मात्र होता ज्याला मी सगळं काही सांगायचो पण तो खरंच तिथे ते वाचत असेल याबद्दल माझ्या मनात पहिल्यांदाच शंका आली. बूट घराच्या एका कोपऱ्यात अनेक दिवस पडून होते. ते कधी आमच्या घराचा एक भाग वाटलेच नाहीत. मग आमच्या घरानेच त्यांना स्वीकारलं...आपला एक भाग म्हणून...आणि हे सत्कार्य माझ्या आईनेच केलं..तिने त्या दोन्ही बुटांच्या कुंड्या केल्या.. मी बघतच राहिलो. मला खूप वाईट वाटलं. अरे ते रघुचे बूट होते, माझ्या रघुचे..पण मी काही बोललो नाही. इतकी वर्षं आमच्यात जे काही संवाद ठरून गेले होते ते उगाच मला मोडायचे नव्हते. (मुंग्या दिसतात, मुंग्यांबरोबर खेळतो, आणि परत उठतो.) तुम्हाला वाटत असेल ना की मी काय करतोय......मी खेळतोय. हो, खरंच मी खेळतोय. एक दिवस काय झालं, असंच घरी बसल्या बसल्या मला एक आगगाडी दिसली...मुंग्यांची आगगाडी..सगळे डबे एकामागून एक, एका तालात चालले होते. मी तिचा पाठलाग केला पण कळतच नव्हतं ही कुठून आलीये आणि कुठे जाणार आहे. पण सगळ्या मुंग्या एका रांगेत चालत होत्या. मी साखरेचे पाच दाणे घेऊन आलो. मग खेळाला सुरुवात झाली. मी घराचा दरवाजा बंद केला ज्यामुळे बाहेरचं जग बंद झालं आणि मी आता खोलीतलं आतलं जग नीट पाहू शकत होतो. मी त्या आगगाडीच्या जवळ साखरेचे दाणे पेरायला सुरुवात केली. पहिले २ दाणे जवळ जवळ, मग तिसरा लांब, चौथा आणखी लांब आणि पाचवा सर्वात शेवटी... दोन-तीन मुंग्या त्या २ दाण्यांजवळ वळल्या तशी ती आगगाडी वळली. मुंग्या पाचव्या दाण्यापाशी पोचल्या की मी आधीचे २ दाणे उचलायचो आणि पाचव्या दाण्याच्या पुढे ठेवायचो. अस मग मी ती मुंग्यांची रेलगाडी कशीही वळवायचो आणि फिरवायचो. खूप मज्जा यायची, वाटायचं की कोणीतरी आहे जे तुमच्या इशाऱ्यावर फिरतंय...फक्त साखरेचे ५ दाण्यांवर......! हा माझा फारच आवडीचा खेळ होता. मी तो रोज खेळायचो. पुंडलिक जेव्हापासून आमच्याकडे आला होता, फारच कमी वेळा बाहेर पडायचा. कधी कधी त्याचा एक मित्र ताराचंद जयस्वाल ला भेटायला शहरात जायचा आणि एका दिवसात परतायचा. मी त्याच्या समोर मुंग्यांचा खेळ खेळू नाही शकायचो. मी गावाच्या बाहेर जात नसे कारण मला राधेने सांगितलं होतं की गावाबाहेर जाण्यात खूप धोका आहे. बाहेर गेलं की जेवण-खाण, माणसं सगळंच बदलतं. पाहिलं नाहीस का तू आपल्या गावाच्या दोन्ही बाजूला शहरं आहेत आणि त्या शहरांतली गर्दी कशी आपल्या रस्त्यावरून धावत असते. पुंडलिक जेव्हा माझ्याशी बोलायचा तेव्हा मला वाटायचं की तो “राजू” असं नाव घेऊन स्वतःशीच बोलतोय. कारण मी कधी कधी मधे उठून जायचो आणि परत यायचो तर काय..हा पुंडलिक आपला राजू राजू म्हणत अजूनही बोलतोच आहे. तो एका विचित्र एकटेपणाचा बळी होता. आणि हे मी नाही म्हणत आहे. मी त्यालाच हे स्वतःशी बोलताना ऐकलंय. एकदा तो एक अजब गोष्ट स्वतःलाच वाचून दाखवत होता. “एक कुत्रा आपलीच शेपटी चावायचा प्रयत्न करतोय. तेव्हा एक कुत्रा-चक्रीवादळ सुरु होतं. जेव्हा या वादळातून कुत्रा कुत्र्याच्या रुपात परत येतो तेव्हाच ते शमता. रिकामपण – तो कुत्रा माझ्या आणि मी त्याच्या डोळ्यात पाहतो”. पुंडलिक सांगतो की एके काळी तो स्वयंघोषित कवी होता. त्याने प्रत्येक प्रकारची कविता लिहिण्याचा प्रयत्न केला. दुखी, प्रेमकविता, बालकविता, पर्यावरणावर, दगडांवर, फुलांवर...पण कोणी हिंग लावून विचारलं नाही. नंतर नंतर तर लोक त्याला पाहून पळून जायला लागले. पुंडलिक ओरडून सांगायचा की अहो नाही, मी कविता नाही ऐकवणार...तरी लोक थांबायचे नाहीत आणि जे थांबायचे त्यांना पुंडलिक इकडचं – तिकडचं बोलत एखादी कविता ऐकवायचाच. तो सांगायचा की लोक त्याची चेष्टा करायला लागले होते. ज्या घरात तो घुसायचा तिथून किंकाळ्या, ओरडण्याचे आवाज बाहेरपर्यंत यायचे. पुंडलिकने लहान मुलांसाठीही कविता लिहिल्या होत्या. त्यामुळे गल्लीत मुलांनी खेळणं बंद केलं होतं. प्रत्येक मूल पुंडलिक या नावाला घाबरायचं. त्याच्या घरी भाजी, धान्य परस्पर पोचवलं जायचं कारण कोणालाच कुठल्याही निमित्ताने त्याची कविता ऐकायची नसायची...ती छापणं तर दूरच राहिलं. हल्ली, आपली कविता ऐकवल्यानंतर पुंडलिक माझं कौतुक नाही करायचा उलट चिडायचा माझ्यावर. एकदा आपली कविता ऐकवल्यावर मला विचारलं...काय?, आवडली नाही ना तुला कविता? मी म्हटलं... “नाही, छान आहे”. म्हणाला..मग चिडून का बघतोयस?..... अरे? हाच मला म्हणाला होता की मला तुला एक गंभीर श्रोता बनवायचं आहे. आणि तुम्हाला माहित्ये ना की मला गंभीर हा शब्द किती आवडतो. गंभीर...काय शब्द आहे.....पण जेव्हा तुम्ही चाट पडलेले आहात असं दाखवता आणि मग त्यात थोडा गंभीरपणा आणायचा प्रयत्न करता तेव्हा चेहरा हा असाच दिसतो. मी बाबा मनापासून गंभीर व्हायचा पूर्ण प्रयत्न करायचो. (मुंग्या दिसतात, मुंग्यांबरोबर खेळतो, आणि परत उठतो.) एक दिवस मी मुंग्यांबरोबर खेळत होतो आणि अचानक मला असं वाटलं की मी एक मुंगी झालोय. मला विचित्र वाटू लागलं. मला वाटलं की खेळता खेळता माझी बुद्धीसुद्धा मुंग्यांसारखी नाही ना झालीये? त्याच वेळी मला ते साखरेचे दाणे दिसले. बघतो तर काय...ते साखरेचे दाणे आता दाणे नव्हते राहिले....ते पुंडलिक, राधे, आई, रघू आणि तो ट्रकवाला मित्र झाले होते. आणि मी त्यांच्या मागे धावायला लागलो. याचा अर्थ काय? कोणी असं आहे जे माझ्याशी खेळ खेळतंय. पण मी नाही खेळत आहे. म्हणजे मी मुंग्यांशी खेळतो पण मुंग्या माझ्याशी खेळत नसतात. देव जाणे, कदाचित त्याही कोणाशी तरी खेळत असतील पण ते कोणीतरी त्यांच्याबरोबर खेळत नसेल. याचा अर्थ सगळेच सगळ्यांशी खेळतायत. म्हणजे पुंडलिकदेखील माझ्याशी खेळतोय. आता कळेल तुम्हांला की माझी समस्या काय आहे............समस्या........माझ्यासाठी फारच मोठी समस्या आहे आणि त्यासाठीच तर मी हे सगळं करतोय. तर ही समस्या माझ्यासमोर “पुंडलिक”च्या रुपात आली. पुंडलिकला खरं तर आपला एक कविता संग्रह छापायचा होता. कोणी एक ताराचंद जयस्वाल नावाचा शहरातला त्याचा मित्र त्याला या कामात मदत करत होता. मी तर त्याच्या सगळ्या कविता ऐकल्या होत्या. काही काही तर इतक्या वेळा की आजही मला त्या तोंडपाठ आहेत. समस्या खरी सुरु झाली ती पुंडलिक घर सोडून निघाला तेव्हा. तो जाताना मी पाहिलं की त्याच्या एका हातात त्याची कवितांची डायरी, एक पत्र आणि दुसऱ्या हातात माझ्या आईचा फोटो आणि गीता होती. ते सगळं घेऊन तो माझ्याकडे आला. म्हणाला...याच्यावर तुझे दोन्ही हात ठेव...आणि शपथ घे ... घे पाहू शपथ... तुझ्या आईची, या गीतेची, आणि माझ्या कवितांची...की तू माझा कविता संग्रह नक्की छापशील. मी शपथ घेणार त्यापूर्वीच मी पाहिलं की त्याने आपलं सामानही बांधलं होतं. मी विचारलं,” तू कुठे जातोयस पुंडलिक?” कारण आमच्या गावापासून शहर तसं लांब नव्हतं. म्हणजे इतकं सामान बांधण्याइतकं तर नक्कीच नव्हतं. माझ्या प्रश्नाचं पुंडलिकने उत्तर दिलं नाही. त्याचा आवाजही विचित्र होऊ लागला होता. तो सारखा शपथ घे, शपथ घे म्हणत होता म्हणून मी शपथ घेऊन टाकली. विदयेची, धरतीमातेची, कवितांची, गीतेची शपथ....शिवाय स्वतःच्या मनाने आणखी ३-४ जणांच्या शपथा मी उत्साहात घेऊन टाकल्या. माझं काय बिघडणार होतं? कवितासंग्रह पुंडलिकचा...तो छापणार ताराचंद जयस्वाल. मी कोण होतो? खरं तर मी कोणीच नव्हतो पण मला एक गोष्ट कळेना की हा पुंडलिक मला का शपथ घ्यायला लावत होता की तू छाप कवितासंग्रह म्हणून? मुख्य म्हणजे ही शपथ घेऊन मी आता पूर्णपणे या प्रकरणात अडकलो होतो. शपथ घेण्याचा सोपस्कार आटपला तेव्हा पुंडलिकचा चेहरा उजळला. त्याने माझ्या आईचा फोटो आणि गीता एका कोपऱ्यात फेकून दिली. आणि आपलं सामान घेऊन निघाला. दरवाज्यापाशी आल्यावर त्याच्या लक्षात आलं मी त्याला काहीतरी विचारलं होतं...कुठे जातोयस तू पुंडलिक? तो वळला आणि म्हणाला..आधी शहरात जाऊन ताराचंद जयस्वालला हे पत्र, ज्यात मी माझ्या कवितांबद्दल आणि तुझ्याबद्दल सगळं काही लिहिलंय, ते देईन, मग तीर्थयात्रा आणि मग संन्यास. असं म्हणून त्याने मला मिठी मारली आणि हळूच कानात म्हणाला, “ मला तुला काहीतरी द्यायचं होतं, मी गेल्यावर तुला ते मिळेल. धन्यवाद. (येतो म्हणायला जाईल आणि थांबेल..).... नमस्ते.....आणि निघून गेला तो. कवितांबद्दल ठीक आहे पण माझ्याबद्दल का लिहिलंय त्याने पत्रात? त्याला मला काय द्यायचंय? आणि का? मी तर फक्त त्याच्या कविता ऐकल्या होत्या आणि त्यातल्या अर्ध्या तर मला कळल्याच नव्हत्या. ऐकणाऱ्या माणसाचा पत्रात वगैरे उल्लेख करत असतील तर ठीके पण मी तर अडकलोच होतो या प्रकारात. मला या प्रकरणात कसं काय गोवलं पुंडलिकने याचं उत्तर मला काही दिवसांपूर्वी ताराचंद जयस्वालकडून आलेल्या पत्रातून मिळालं. माझा विश्वासच बसेना की पुंडलिक माझ्याशी असा कसा वागला? मान्य आहे मला की मी काही फार कामाचा माणूस नाही..पण मला आशा तऱ्हेने कोणी “कामी आणेल” यावर माझा विश्वास बसेना. (मान्य आहे की मी काही फार उपयोगाचा माणूस नाही पण म्हणून माझा असा उपयोग कोणी करेल यावर माझा विश्वास बसेना). तुम्हांला माहित्ये पुंडलिकने काय केलं? त्याने पत्रात ताराचंद जयस्वालला काय लिहिलं? हे पहा त्यांचं मला आलेलं पत्र. तसं मोठं आहे ते पण मी त्यातले मुख्य मुद्दे सांगतो.......(वाचतो..) “राजकुमार, कवीहृदयाच्या या महान कवीला माझा नमस्कार. तुमच्या कविता वाचून फारच आनंद झाला. पुंडलिकने तुमच्या कवितांबद्दल यापूर्वीच मला सांगितलंय. सगळे जण तुमच्या कवितांची खूपच स्तुती करतायत. पुढच्या महिन्यात संग्रह छापून होईल पण जरा एक अडचण आहे. या संग्रहात एक कविता कमी पडत्ये असं मला नाही आमच्या संपादक महोदयांना वाटतंय. आपण मोठे कवी आहात. हा संग्रह छापला गेल्यानंतर तर मोठ्या मोठ्या कवींबरोबर आपलं नाव घेतलं जाईल. कृपा करून लौकरात लौकर आपण एक कविता लिहून पाठवावी. माझी मुलगी तुमच्या कवितांची दीवानी आहे. लग्नाबाबत आपला काय विचार आहे? पुंडलिक आपलं फारच कौतुक करायचा. मग आता प्रत्यक्ष दर्शन कधी? कवितासंग्रहात आपण आपलं नाव राजकुमारच लिहिणार की काही टोपणनाव जोडणार? जरूर कळवा. आपला, ताराचंद जयस्वाल.” म्हणजे या समस्येने आता भयानक रूप धारण केलेलं आहे. मी का घेतली शपथ?पश्चात्ताप होतोय मला. शपथेचे जाऊदे, माझी स्वतःची अशी इच्छा होती की पुंडलिकचा कवितासंग्रह छापला जावा. पण हा असा? नाही...मी काय नाही केलं म्हणू सांगू....गेले अनेक दिवस मी पुंडलिकच्या पुस्तकांत शोधतोय ...कुठेतरी काही ४ ओळी, २ ओळी, निदान एक ओळ .. काही लिहून ठेवलं असेल....पण छे. मग मी पेन हातात घेतलं आणि पुंडलिक सारखं लिहायचा प्रयत्न केला.....थर थर, फर फर, कर कर....यापलीकडे मी जाऊच शकलो नाही. खरं तर माझ्या आयुष्यात असं काहीही घडलेलं नाही ज्याबद्दल मी लिहावं किंवा त्यासाठी लढावं....आत्तापर्यंत घडलेलं मला सगळं आठवतंय पण खरंच सांगतो ते सगळं काहीही न घडल्यासारखंच आहे. पुंडलिक म्हणायचा की कविता लिहायची असेल तर आपलं आयुष्य, आपले अनुभव आठवून, त्यांच्याशी भांडून, त्यांना सामोरे जाऊन मग जे काही सांगावसं किंवा लिहावंसं वाटेल ती कविता...वा वा ... ही गोष्ट मला तेव्हाही कळली नव्हती आणि आजही कळली नाहीये...तरी आता मला कुस्ती तशी समजते पण कविता हे माझ्यासाठी अजूनही एक आश्चर्य आहे. कसलं लढायचं?.... कोणाशी लढायचं?......आपल्या आतलं देवपण वगैरे हे सगळं तेव्हाही माझ्या कुवतीपलीकडचं होतं आणि आजही आहे. पण आता माझ्यासमोर काही पर्याय नाहीये. मला हे काम केलंच पाहिजे. मी लिहायला सुरुवातही केलीये. चारच दिवसांपूर्वी मी ताराचंद जयस्वालला पाठवायच्या पत्राची सुरुवात आणि शेवट लिहिलाय....(वाचतो..) सुरुवात : नमस्कार ताराचंदजी, कसे आहात? मी बरा आहे. तुम्हीही बरेच असाल. माझी कविता खालीलप्रमाणे... शेवट: वरील कविता बरी आहे. मी ही बरा आहे. चूक-भूल द्यावी घ्यावी. ही कविता पाठवल्यानंतर मी हे घर, हे गाव, हा देश सोडून जातोय. माझा पाठलाग करायचा प्रयत्न करू नका. कवितासंग्रह नक्की छापा, माझी शपथ आहे तुम्हांला. आपला आज्ञाधारक, कवी राजकुमार गंभीर. गंभीर......गंभीर शब्द मी जोडून टाकला...तसा मला “समस्या” हा शब्द देखील आवडतो. पण कवी राजकुमार समस्या गंभीर हे नाव कदाचित तितकं चांगलं नाही वाटणार. म्हणून मग मी समस्या काढून टाकला. कवी राजकुमार गंभीर नाव बरं आहे. आता इतकं काम तर मी केलंय पण कवितेचं काय करू? ती तर लिहायचीच आहे. सगळे रस्ते बंद आहेत. लांबच लांब सरळ रस्ता आहे. कुठे लपायला एखादी गल्ली, दरी, कोपरा काही नाही. त्यामुळे मला पुढे जायचं आहे आणि लिहायचं आहे. एकच शपथ घेतली असती तर खरंच शपथ घेऊन सांगतो मी ती तोडली असती. पण उत्साहाच्या भरात इतक्या शपथा घेतल्या की आता त्या भूत बनून माझ्या मानगुटीवर बसल्या आहेत. अहो गांधीजी, माझं रक्षण करा. हे देवा, माझं रक्षण कर. नाही पण हे कोणी माझं रक्षण नाही करू शकणार. एक कवीच दुसऱ्या कवीचं रक्षण करू शकतो. आता पुंडलिकच मला वाचवू शकतो. तोच म्हणायचा स्वतःशी लढ...आणि मी लढतोय. पुंडलिकने जेव्हा मला आपल्या आईबद्दल सांगितलं होतं की कसं तिच्या शेवटच्या दिवसांत तो तिची सेवा करायचा...तशी मी ही कल्पना करू लागलो की माझ्या आईच्या शेवटच्या दिवसांत मी आईसाठी काय काय करेन. सगळ्यात आधी मी तिच्या हातातलं ते भांडं काढून घेऊन दूर कुठेतरी फेकून येईन. आणि एकदा तिला स्वतः लाल रिबीन बांधून सिनेमा बघायला घेऊन जाईन. कारण माझी खूप इच्छा होती हे बघायची की आई कशी बघत असेल सिनेमा? ती तिकिटाच्या रांगेत कशी दिसत असेल? इंटरवलमधे काय करत असेल? मुख्य म्हणजे त्या लाल रिबिनीचा सिनेमा बघण्याशी काय संबंध असेल? पण माझ्या या इच्छा पूर्ण नाही झाल्या. एके दिवशी सकाळी मी उठलो तर मला ती तिच्या पलंगावर दिसली नाही. ती दरवाजापाशी जमिनीवर उपडी पडलेली दिसली...तिच्या डोक्याला लाल रिबीन होती. मी हाक मारली...आई....आई...पण ती उठली नाही. मग मी “मदर” पण म्हणून पाहिलं. पण ती हलली सुद्धा नाही. मी घाबरलो. मी पुंडलिकला उठवायला गेलो पण जाण्यापूर्वी तिच्या केसांमधली लाल रिबीन काढून मी ती माझ्या खिशात ठेवली. तिची ही सिनेमावाली गोष्ट कोणाला कळावी अशी माझी इच्छा नव्हती. पुंडलिक आला. त्याने घोषणा करून टाकली की तयारीला लाग. तुझी आई मेली. अरे असं कसं झालं? कसली तयारी? आणि हे कसं शक्य आहे? मला दुख्ख नाही आश्चर्य वाटत होतं कारण मला माझी नाही तर घराची चिंता होती. हे घर काही म्हणणार नाही का? कारण आई आमच्याबरोबर नाही तर या घराबरोबर रहात होती. कदाचित या घराने आधी नष्ट व्हायला हवं होतं. बहुतेक म्हणूनच आई पलंगावर नाही तर खाली जमिनीवर, या घराच्या कुशीत गेली होती. तयारी कर म्हणून पुंडलिक निघून गेला. आईजवळ मला एकट्याला सोडून. मी काय करणार? मी तिला पाठीवर झोपवलं, तिच्या डोक्याखाली उशी ठेवली आणि त्या सुकलेल्या कडक देहाकडे पाहत राहिलो.......हिनेच मला जन्म दिला होता...किती विचित्र वाटतं ना... पुंडलिक अंत्यसंस्काराचं सगळं सामान आणि काही लोकांना घेऊन आला. मी रडत नव्हतो पण सगळे जण मला म्हणत होते की घाबरू नकोस. होतं असं...सगळं ठीक होईल वगैरे वगैरे....मग माझं मुंडण केलं गेलं आणि मी आईला अग्नी दिला. माझ्या आईला जळताना मी पहात होतो. अचानक त्या लाकडांमध्ये मला तिचा हात दिसला. मला वाटलं की ती तिच भांडं मागत्ये. माझ्या मनात आलं की तिचं ते भांडं तिच्या हातात द्यावं किंवा निदान तिची लाल रिबीन तरी तिच्या चितेत टाकावी पण माझी हिम्मत नाही झाली. तिला जळताना मी गुपचूप बघत राहिलो. या समोर धगधगणार्या लाकडांमध्ये माझी आई आहे...जी जळत्ये....घरी परत येताना वाटलं की कदाचित घर नसेलच आता...ते पडलं तरी असेल किंवा एखादी चीर तरी गेली असेल त्याला...पण असं काहीच झालं नव्हतं. सगळं काही नेहेमीसारखेच होतं. उन्हाची काहिलीने चेहरा करपला, सावली तळपायाखाली सरकली.. शरीर पाणी ओकायला लागलं... आणि तो वृक्ष जवळ आला.. त्याच्याच पदराखाली वाढलो मी. त्या मायेच्या ओलाव्याने तरारून हिरवा झालो मी ही. तुमचा विश्वास नाही बसणार, या जंगलातल्या एका झाडाने मला पाणी घातलं. “आई” म्हणतो मी त्याला. हल्ली राधे फारच उदास दिसायला लागला होता. तो बराच वेळ गांधी पार्कमध्ये गांधीजींबरोबर घालवायचा. म्हणायचा की हल्ली तो आणि गांधीजी खूप गप्पा मारतात. पण गांधीजींनी मला समजून घेतलंय, माफ केलंय आणि आता ते मला वैष्णोदेवीला जायचा फार आग्रह करत नाहीत. पण तो उदास होता कारण हल्ली गावात वैष्णोदेवीला जायचा सिझन सुरु झाला होता. लोक वैष्णोदेवीला जात होते...दर्शन घेऊन येत होते. पण राधेला सगळे हाकलायचे. राधेही अचानक एक दिवस यायचा बंद झाला. घरासमोर धूळच धूळ साठली होती. राधे येत नव्हता. मला वाटलं या धुळीत राधेचं किती सोनं विखरून पडलं असेल. मी केरसुणीने ती सगळी धूळ एकत्र केली. म्हटलं जेव्हा राधे येईल तेव्हा ही सगळी धूळ त्याला देईन. खुश होईल तो. पण तो आलाच नाही. मग एक दिवस अचानक आला. मी म्हटलं राधे कुठे होतास तू इतके दिवस? तो काही बोलला नाही. गप्प बसून राहिला. मी म्हटलं की अरे मी गांधी पार्कमधे गेलो होतो तू भेटशील म्हणून पण तू तिथेही नव्हतास. तरी हा गप्पच. बहुतेक त्याला उत्तर द्यायचं नव्हतं. मग मी ही गप्प बसून राहिलो. आणि मी इतके दिवस जी धूळ जमा करून ठेवली होती ती सुद्धा घ्यायला राधेने नकार दिला. म्हणाला की आता माझ्या कामाची नाहीये ही. असं म्हणताच त्याचं एक पांढरे गाठोडं झालं आणि माझ्यासमोर हलायला लागलं. इतके दिवस राधे येत नव्हता तेव्हा आयुष्यात पहिल्यांदाच मला कोणाच्या तरी नसण्याची जाणीव झाली. तसं पाहिलं तर पुंडलिक सुद्धा गेला होता. आई देखील गेली. पण तरी अशी जाणीव मला त्यांच्या नसण्यामुळे नव्हती झाली. जोपर्यंत राधे येत नव्हता ना तेव्हा मला वाटायचं की माझ्या आत खूप अशी जागा रिकामी झालीये आणि त्यात माझाच आवाज घुमतोय. बास, हे एव्हढंच आहे. यापलीकडे माझ्या आयुष्यात असं काहीही घडलेलं नाही ज्याचा मुद्दाम उल्लेख करावा. काही चिरी-मिरी गोष्टी आहेत जसं एक कुत्रा घराच्या मागच्या बाजूला रोज मला भेटायला यायला लागला होता. मी संध्याकाळी त्याच्याबरोबर वेळ घालवायला लागलो होतो. अगदी थोडेच दिवस झाले होते..त्याचं नाव ठेवावं या विचारांत असतानाच अचानक तो यायचा बंद झाला. आता फक्त राधे आहे, माझा तो ट्रकवाला मित्र आहे आणि मी आहे. आम्ही तिघे आहोत आणि खुश आहोत. लढाई संपली. हे एव्हढंच घडलंय माझ्या आयुष्यात...म्हणजे इतकंच जे मला आठवतंय आणि जे सांगण्यासारखं आहे. पण इतकं सगळं झाल्यावरही मला एक कळत नाहीये की यात असं काय आहे की जे कविता होऊ शकेल. पुंडलिक कवी आहे, कविता नाही. माझी आई ही माझीच आई आहे. ती गोर्कीच्या किंवा पुंडलिकच्या आईसारखी नाहीये. माझ्या आईबरोबरच्या घटना आहेत...कविता नाही. राधे हा राधे आहे. तो गांधी पार्क मधल्या गांधीजींची लाठी आहे. त्यापेक्षा तो आणखीन काही नाही. ट्रकवाल्या मित्राबद्दल मी गप्प राहणंच पसंत करतो. रघू हा माझ्यासाठी चमत्कार होता, आहे आणि राहील. तो माझा रघू आहे. पण कविता? ती कुठेच नाहीये. मी स्वतःशी जितकं लढू शकलो, लढलो. कुठे लपलीये ही कविता? मी इतक्या शपथा घेतल्यात. त्याचं काय? तिथे तो ताराचंद जयस्वाल वाट बघतोय. मी इथे एक शब्ददेखील लिहू शकत नाहीये. पुंडलिका मला माफ कर. नाही होणार हे माझ्याच्याने. शपथ वगैरे सगळं गेलं चुलीत..... “आटली बाटली कचकन फुटली”....मी घेतलेली शपथ फटकन सुटली... छे, छे याने काहीही होणार नाहीये. हे सगळं मी माझ्या मनाच्या समाधानासाठी करतोय. मी एक प्रकारचा खेळ खेळतोय..स्वतःशीच. कधीपर्यंत चालणार आहे हा खेळ? मला लिहायचं आहे आणि मी ते लिहिणारच. चला, तय्यार.........ताराचंद जयस्वालसाहेब, हे घ्या तुमचं पत्र...पूर्ण केलेलं पूर्ण पत्र. आता तुम्हांला जे काही समजायचं असेल ते समजा. (वाचतो...) सुरुवात : नमस्कार ताराचंदजी, कसे आहात? तुम्ही बरेच असाल. माझी कविता खालीलप्रमाणे... जादू पहा जादू...साखरेच्या पाच दाण्यांची जादू.... मुंग्या धावतात, धाव धाव धावतात.. दोन दाण्यांजवळ पोचतात, मग आणखी तीन दाणे दिसतात.... “या गं या सगळ्या जणी या...” सगळ्या जणी येतात, पाचव्या दाण्याजवळ पोचतात, मग मागचे दोन विसरून जातात! मग तेच दोन दाणे पुन्हा पुढे दिसतात... मुंग्या धावतात, धाव धाव धावतात... मुंग्या हरवतात ....जादूत हरवून जातात.. अशा फिरतात, तशा फिरतात, फिरतच रहातात. हा खेळ संपतच नाही. पण त्या तर फक्त शोधतायत.... त्या खेळ कुठे खेळतायत... खेळणारा तो कोणी वेगळाच आहे......एक जादुगार! शेवट: वरील कविता बरी आहे. मी ही बरा आहे. चूक-भूल द्यावी घ्यावी. ही कविता पाठवल्यानंतर मी हे घर, हे गाव, हा देश सोडून जातोय. माझा पाठलाग करायचा प्रयत्न करू नका. कवितासंग्रह नक्की छापा, माझी शपथ आहे तुम्हांला. आपला आज्ञाधारक, कवी राजकुमार गंभीर. ....बराय ना? (मुंग्यांशी खेळायला लागतो..)

सोमवार, 24 सितंबर 2012

गोरख...

गोरख... Scene-1 (यह नाटक.. "रामसजीवन की प्रेम कथा" (उदय प्रकाश) और गोरख पाण्डे के जीवन, उनकी और अन्य कवियों की कविताओं को मिलाकार किया गया एक प्रयास है... जो पूरी तरह काल्पनिक है।) मंच पर अँधेरा है. प्रकाश होता है. कुछ कुर्सियां एक दुसरे को पीठ दिखाते हुए पड़ी हैं. (Music) एक एक करके कुछ लोग गोगल्स लगाये हुए मंच पर आते हैं. सभी रोबोट की तरह चल रहै हैं. सब ने अपने अपने हाथ में कुछ रोज़मर्रा की इस्तेमाल होने वाली चीज़ें उठा रखी हैं. जैसे की, घडी, छाता, सूटकेस, लैपटॉप बैग, फूल, इत्यादि. एक-एक करके सभी धीरे-धीरे अपने अपने प्रोप को प्रोसीनीयम की दीवार पर टांग देते हैं. सब आकर एक एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं. कुर्सी पर बैठते ही उन सब में जान फूट पड़ती है. पहली कुर्सी- टन्न्नन्न्न्नन्न… क्लास है क्या बे ?
 दूसरी कुर्सी- साला फिर फेल
 तीसरी कुर्सी- घूर रहा है साला
 चौथी कुर्सी- कैंटीन चलो
 पांचवी कुर्सी- प्रेसेंट
 छठी कुर्सी- बरगर एंड फ्राइस 
 सातवी कुर्सी- साइलेंस पलीस
(ये सभी एक साथ हो रहा है और रोबोटिक मुद्रा में ही हो रहा है. तभी लेफ्ट विंग से गोरख भागता हुआ आता है. उसके हाथ में एक सूटकेस है, गले में गमछा है और उसने सफ़ेद कमीज़ और काली पैंट पहनी हुई है. वो हांफता हुआ मंच पर घुसता है और मंच पर पड़ी एक मेज पर जा खड़ा होता है.)
 गोरख (चिल्लाते हुए)- हमारा नाम गोरख है. हम देवरिया से हैं. रेलगाड़ी आने में देरी हुई तो लेट हो गए. हमारी जगह कौनसी है?
 (कोई चुप नहीं होता. गोरख नीचे उतर कर सभी कुर्सी वाले रोबोट्स के पास जा जा के उनको अपना परिचय देने कि कोशिश करता है. कोई उसकी मौजूदगी को एहमियत नहीं देता और सब वही चीज़ें बोले जा रहै हैं जो वे बोल रहै थे.)
 गोरख(चिल्लाते हुए)- गोरख!!! ( सब चुप हो जाते हैं. भगदड़ मच जाती है. सब एक दूसरे की कुर्सी लूट लेते हैं. इसी भगदड़ में गोरख भी एक कुर्सी लूट लेता है और अब उसके गले में गमछा नहीं है. उसने भी औरों कि तरह चश्मा पहना हुआ है. रोबोट्स में से एक से कुर्सी छिन जाती है और उसने गमछा पहना हुआ है)

 पहली कुर्सी वाला- 
उसकी नज़र कुर्सी पर थी,
कुर्सी लग गई थी उसकी नज़र को,
उसको नज़रबंद करती है कुर्सी,
जो औरों को नज़रबंद करता है.
 (फिर से भगदड़. लोग कुर्सियां बदल लेते हैं. इस बीच एक आदमी उठता है और एक कुर्सी कम कर देता हैं और अपने पास रख लेता है. बीच में दो लोग बच जाते हैं. एक के गले में गमछा है. जिसके गले में गमछा नहीं है वो सभी कुर्सी पे बैठे लोगों के पैर पड़ता है. शोर फिर से शुरू हो जाता है.)
 गमछे वाला (चिल्लाते हुए) – गोरख!!
(सब शांत हो जाते हैं)

 दूसरी कुर्सी वाला-
मेहैज़ ढांचा नहीं है लोहै या काठ का,
कद है कुर्सी,
कुर्सी के मुताबिक,
वो बड़ा है छोटा है, स्वाधीन है या अधीन है,
खुश है या ग़मगीन है,
कुर्सी में जज़्ब होता जाता है एक अदद आदमी.
 (फिर से शोर होता है और गमछे वाला फिर से गोरख चिल्लाता है. सभी वापस अपनी अपनी जगह से उठ कर एक दूसरे की कुर्सी लूट लेते हैं. दुबारा एक आदमी गमछे के साथ छूट जाता है और दो बिना गमछे वाले पैर छू रहै हैं.)
 तीसरी कुर्सी वाला-
कुर्सी खतरे में है, 
तो प्रजातंत्र खतरे में है,
कुर्सी खतरे में है तो देश खतरे में हैं,
कुर्सी खतरे में है तो दुनिया खतरे में है,
न बचे कुर्सी तो भाड़ में जाये प्रजातंत्र, देश और दुनिया.
 ( एक बार फिर से सब अपनी अपनी जगह से उठ कर खड़े हो जाते हैं और कुर्सियां लूटने लगते हैं. अब तक चौथी कुर्सी वाले ने सभी कुर्सियां उठा ली हैं और बस एक बेंच बची है जिसपर एक व्यक्ति बैठ सकता है. बाकी सब ने कुर्सी मिलने की आशा छोड़ दी है. सब सोचने की मुद्रा लेके स्टेज पर फ्रीज़ हो जाते हैं.)

 चौथी कुर्सी वाला- 
कुर्सी कि महिमा बखानने का,
ये थोथा प्रयास है,
चिपकने वालों से पूछिए,
कुर्सी भूगोल है,
कुर्सी इतिहास है.
 Scene-2 अनुराग(गोरख) - मुझे नही चाहिए कुर्सी. (वो अपना सूटकेस उठाता है और थोड़ा सा आगे बढ़ता है तो कल्याण उसको रोक लेता है) कल्याण- Hey Chap! कैसे? अनुराग(गोरख) - पढ़ने कल्याण- हैं? अनुराग(गोरख) - पढ़ने… कल्याण- और हम? कहाँ के born & brought up हो? Ugly… मूह छुपाओ. अब्बे बदसूरत घूम जाओ... १,२... (अनुराग घूम जाता है) कल्याण- अभी सीधे भागो पहला लेफ्ट लो पेड़ मिलेंगे पेड़ो के पैर छूओ आशीर्वाद लो और वापस आओ शिरीष- छोड़ बे. नाम क्या है तेरा? अनुराग(गोरख) - गोरख. असलम- अबे पूरा नाम बता? अनुराग(गोरख) - पूरा नाम गोरख है. असलम- गाँव? अनुराग(गोरख) - देवरिया शिरीष- विषय? अनुराग(गोरख) - हिन्दी साहित्य असलम- हिन्दी साहित्य? क्या उखाड़ लेगा तू हिन्दी साहित्या पढ़ के? अनुराग(गोरख) - जो बन पड़ेगा करेंगे,पर चुप नहीं बैठेंगे कल्याण(अपनी जगह से उठकर गोरख के पास आते हुए) - ये फटा ज्वालामूखी!!!! असलम-आग है भैया आग… शिरीष- आग नही है भाई लावा है लावा… अनुराग(गोरख) - जाएँ? शिरीष- कहा जाए बे? (नाराज़ होते हुए) हम बात कर रहै हैं ना तुमसे अनुराग(गोरख) - हॉस्टिल जाना है कल्याण- हॉस्टिल जाओगे? ले चले हॉस्टिल? शिरीष- कौन से हॉस्टिल जाओगे बे? लड़को वाले जाओगे या लड़कियों वाले? (तीनो गोरख के काफ़ी नज़दीक जाते हैं वो थोड़ा सा घबरा जाता है. अचानक कल्याण,शिरीष,असलम ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगते हैं ) कल्याण- देख देख इसकी शकल देख असलम- अरे डर मत, हम भी जूनियर्स हैं, सीनियर्स नहीं. आराम से., ये कल्याण ,ये शिरीष शिरीष- सॉरी यार असलम- और मैं असलम... कल्याण- साँस लेले असलम- ये रहा तेरा कॉलेज और वो देखो हॉस्टिल अनुराग(गोरख)- बड़ा सही कॉलेज है यार, काफी बड़ा है ना असलम- पता है कौन कौन पढ़ता है यहाँ पे? शिरीष- प्रधानमंत्री की बहू,रक्षामंत्री की नातिन,किर्लोस्कर जी की बेटी और बाटाजी का बेटा. कल्याण- और जो देश का सबसे बड़ा साहित्यकार है उसका सबसे छोटा साला यही पढ़ता है… अबे यहा के ज़्यादातर स्टुडेंट्स जो है वो हैलो हाइ संप्रदाया से आते है फक चीक असलम- और जो लड़किया हैं न लड़किया एकद्म टॉट है टॉट... माशा अल्लाह कल्याण- असलम भाई उनकी जीन्स देखी,ये कसी कसी जीन्स,ये खुली खुली बाहै, मुलायम खुशबूदार… अनुराग(गोरख) - (गुस्से मे) कैसी बातें कर रहै हो यार (तीनो दोस्त कुछ देर के लिए चुप हो जाते है,उन्है बड़ी हैरानी होती है) शिरीष- शर्मा गये (तीनो दोस्त प्रस्थान करते है) SCENE – 3 रूपा(गोरख)- प्रिय कार्ल मार्क्स, चरण स्पर्श, आज तुम्है पत्र लिखने का खूब मन कर रहा था (पत्र बोलते बोलते वो अपना कमरा ठीक कर रही है) वैसे मन तो काफ़ी समय से कर रहा था पर स्याही खत्म हो गयी थी(इसी बीच प्रतीक मंच पर आकर लेट जाता है ) आज लाल स्याही ले आया हूँ… पता है, मैं एक बड़ी जगह आ गया हूँ. यहाँ पे लोगों की मानसिकता को छोड़कर सबकुछ काफी बड़ा है. पता है मार्क्स कभी कभी जब आँख खुलती है तो कुछ पलों के लिए सोचना पड़ता है की वाकई में रात है या मैं ही आँख बंद करके अँधेरे में सो गया था. मेरे टेरीकॉट के कपडों से लेकर मेरा रंग यहाँ तक की मेरा अतीत सबकुछ मुझे मैला मैला सा लगता हैं. लेकिन फिर भी इन ऊँची बिल्डिंगों, इन चौड़ी सड़कों और इस कान फाडू शोर के बीच गली कूचों में छुपी हुई वो ज़िन्दगी अब भी दिखती हैं चिथड़ों में लिपटी हुई भूखी अपने नंगेपन को ढाँकने की कोशिश में जिसे मार्क्स तुम और मैं बेहतर पहचानते हैं. मेरा कद छोटा हो गया है. शायद घिस गया हूं. अपने बौनेपन का एहसास अभी अभी हुआ है मुझे. असमंजस में हूं मैं मार्क्स. क्या मैं अपने कपड़ों की तरह अपना चश्मा भी बदल दूं. या फिर वो करूँ जो तुमने कभी सोचा था, उनका चश्मा तोड़ दूं. गोरख 
 [चिट्ठी ख़त्म करने के बाद गोरख अपने कमरे से निकल के ज़मीन पर लेट जाता है. अब चार लोग ज़मीन पर हैं. सभी के गले में गमछा है. (म्यूजिक फेड इन) चारो गोरख अलग अलग मुद्राएं ले रहै हैं] 
 (मंच पर लेटे हुए गोरख परेशान होकर करवटे बदलते हैं और अचानक घबराकर उठ जाते हैं.) सुहेल (गोरख)- "वो डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन दौलत गोला बारूद पुलिस फ़ौज के बावजूद? वे डरते हैं की एक दिन निहत्थे और गरीब लोग उनसे डरना बंद कर देगे" प्रतीक(गोरख) "कही चीख उठी हैं अभी कही नाच शुरू हुआ हैं अभी कही बच्चा हुआ हैं अभी कही फौजे चल पढ़ी हैं अभी" मनोज(गोरख) "कला कला के लिए हो जीवन को खूबसूरत बनाने के लिए न हो रोटी रोटी के लिए हो खाने के लिए न हो मजदूर मेहनत करने के लिए हो सिर्फ मेहनत " [जब एक गोरख कविता बोल रहा है, तब बाकी 3 गोरख सोचने की अलग अलग मुद्राए ले रहे है] सुशांत(गोरख) - ये तो हम सब जानते हैं [मनोज,प्रतीक,सुहेल तीनो सुशांत को देखने लगते हैं मनोज और प्रतीक सुशांत को एक सोचने वाली मुद्रा में सोचने लगते हैं. सुहेल उठता हैं पेपर में जो लिखा हैं उसको पड़ता हैं और फाड़ के फेक देता हैं और वहा से चला जाता हैं और अपने तीनो दोस्त कल्याण,असलम और शिरीष से मिलता हैं] कल्याण- ऐ दत्ता मैं इसको चाय नहीं बोलूँगा फिर भी दे दो असलम- जो भी हैं ले आ यार कल्याण- लीजिये साहब सरकारी चाय, ज़हर है {सुहेल(गोरख) वहां आता है. कल्याण उसको देख लेता हैं} अरे गोरख… हैल्लो! रुक चाय लता हु सुहेल(गोरख)- नहीं चाहिए चाय… कल्याण - अरे डार्लिंग रुक लाता हु चाय सुहेल(गोरख) (गुस्से में)- अरे नहीं चाहिए चाय असलम- अरे नाराज़ क्यों होते हो कल्याण- मत पियो चाय सुहेल(गोरख)- ये जूते बड़े बढ़िया हैं आपके .कितने के लिए आपने? कल्याण- बारह सौ सुहेल(गोरख)- बारह सौ !! आपको पता हैं क्या पहना हैं आपने दो कुंटल गेहू पहना हैं आपने कल्याण- मतलब? सुहेल(गोरख)- अरे बारह सौ दो कुंटल गेहू की कीमत होती हैं और इन्होने पैर में पहन रखा हैं देखो… कल्याण- अच्छा ये बताओ ये साहब जो बेठे हैं (एक दर्शक की तरफ इशारा करता है) इनका लगाओ हिसाब किताब सुहेल(गोरख)-इनका (एक दर्शक की तरफ इशारा करते हुए) कल्याण-हाँ सुहेल(गोरख)- साहब ने इकोनोमिक्स की थेओरी वेलू के हिसाब से… तीन कुंटल धान पहन रखा हैं. शिरीष-मतलब घर का हर महीने का किराया हुआ 3.5 कुंटल गेंहू सुहेल(गोरख)-और बिजली पानी अलग कल्याण(मज़े लेते हुए )-ये जो अमीर और गरीब की जो खाई हैं न हमारे देश को ले डूबेगी शिरीष-इस देश की 70 % जनता को जिंदा रहने के लिए जितनी कैलोरी शक्ति की ज़रुरत हैं उतना अन्न तो मिल नहीं पाता हैं और दूसरा 3.5 कुंटल गेहू की शराब 1 बैठक में पी जाता हैं असलम-और गाँव के मिडल क्लास किसान की हालत शहर के लोवर मिडल क्लास लोगो से बददतर हैं और यहाँ शहर का छोटे से छोटा बाबु भी चमक धमक में रहता हैं शिरीष-और जो किसान अपनी खून पसीने की मेहनत से देश की जनता का पेट पाल रहा हैं वो कर्जे में डूबकर अपनी जान दे रहा और यहाँ पिज्जा बर्गेर बेचने वाले शीश महल पर शीश महल बनाये जा रहै हैं… कल्याण -और ये नेता क्या कर रहै हैं नोट बटोर रहै हैं, योजनाये बना रहै हैं पर सब फाइलओ में बंद और आप जाओ वहा पुरानी दिल्ली में जामा मस्ज़िद के फूटपाथ पर पुलिया के नीचे जाओ गाँव का आदमी भूखा हैं, गरीब हैं ,नंगा हैं पहनने को बदन पर कपड़ा नहीं हैं… सुहेल(गोरख) - अरे चुप (गुस्से से ) झूठी…फर्जी… किताबी बातें चुतियापा है ये सब असलम -अरे हम भी तो यही कह रहै हैं की गलत है ये सब सुहेल(गोरख) - क्या गलत है? कौन गलत है? ये गरीब गलत है? गरीब गलत नहीं है, अमीर भी गलत नहीं है, गलत हो तुम और में शिरीष- अरे हम कैसे गलत हो गए? हम भी तो यही कह रहै हैं की गलत है ये सब सुहेल(गोरख) - यही तो चुत्यापा हैं . हम सब कह रहे हैं की ये सब गलत है फिर भी न तुम कुछ कर रहे हो और न साला मैं (गुस्से में)… क्रांति की ज़रुरत हैं क्रांति की... (ये कहते हुए सुहेल आगे बढ़ता है और विंग्स से एक्ज़िट लेता है. उसी के साथ मनोज,सुशांत ,प्रतीक भी खड़े हो जाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं . ) सृष्टि(गोरख) आती है और उन्ही के साथ खड़ी हो जाती है) (सुहेल(गोरख) विंग्स से अपने कमरे में आता है) सुहेल(गोरख)- हवा का रुख कैसा हैं हम समझते हैं , हम उससे पीठ क्यों दे देते हैं हम समझते हैं , हम समझते हैं खून का मतलब ,पैसे की कीमत हम समझते हैं क्या है पक्ष में ,विपक्ष में क्या हैं हम समझते हैं हम इतना समझते की समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं वैसे हम अपने को किसी से कम नहीं समझते हैं हर स्याह को सफ़ेद और सफ़ेद को स्याह कर सकते है हम चाय की प्याली में तूफ़ान खड़ा कर सकते है करने को तो हम क्रांति भी कर सकते है अगर सरकार कमज़ोर हो और जनता समझदार लेकिन हम समझते है हम कुछ नहीं कर सकते है हम क्यों कुछ नहीं कर सकते ये भी हम समझते है हवा का रुख कैसा है हम समझते हैं..... (जब सुहेल (गोरख ) ये कविता बोल रहा होता है तब 4 गोरख, गुस्से और दर्द को दर्शाते हैं, अलग-अलग मुद्राओं से) (कविता समाप्त होते ही वो 4 गोरख जिस गति से गुस्सा और दर्द दर्शा रहै थे वो गति बढ़ जाती है) (Black out) Scene-4 दूरदर्शन म्यूजिक सृष्टि न्यूज़ पढ़ती है… “ब्रेअकिंग न्यूज़ लड़का और लड़की अब साथ हॉस्टल में रहैगे प्रधान मंत्री ने बेहद उत्सुकता जताते हुए कहा की बोयस हॉस्टल के ठीक सामने बनने वाले इस गर्ल्स हॉस्टल में पारदर्शी खिड़कियाँ होगी जिनपर पर्दा अलग से लगाया जायेगा सरकार की इस पहल को विदेश मंत्री ने एक बड़ा कदम बताया हैं उन्होंने कहा की इस प्रकार की प्रक्रिया से भेदभाव की भावना दूर हो जाएगी उन्होंने ये भी कहा की साथ में बन रहै कॉमन मेस से दोनों ही सेक्स एक साथ खाना खा पायेगे जिससे पुरुष महिलाओं को पछाड़ने वाले हीन बर्ताव से अपने को दूर कर पायेगे बताया जा रहा हैं की स्टुडेंट'स उनियन ने सरकार के इस क्रांतिकारी फैसले का स्वागत किया हैं एक छात्र से बातचीत के अंश "अब आप कैसा महसूस कर रहै हैं ?" "अच्हा महसूस कर रहा हु .पहले पढ़ाई में मन नहीं लगता था अब बालकोनी में जा जा कर पढने लगा हु" देश को मज़बूत बनाने के लिए सरकार की सहवास की योजना आ आ ... माफ़ कीजियेगा सह आवास की योजना कारगर साबित होगी. क्रांति आने वाली नहीं है क्रांति आ चुकी हैं ये थे अब तक के मुख्य समाचार, नमश्कार.” [म्यूजिक lipstick song] ब्लैक आउट (ब्लैक आउट के बाद जब स्टेज पर रौशनी होती है तो देखते हैं की स्टेज पर 5 गोरख १ लाइन में खड़े है, वो आगे बढ़ते है और "हवा का रुख" कविता बोलने लगते है . पहले तो उनकी आवाज़ सुनाई देती है पर कुछ देर के बाद सुनाई देना बंद हो जाती है और सारे गोरख अपनी आवाज़ पहुंचाने की बहुत कोशिश कर रहै है पर कुछ आवाज़ नहीं आ रही ) (ब्लैक आउट) Scene- 5 (जैसे ही रौशनी आती है स्टेज पर कुछ लोग धीमी गति से नाच रहै होते है उन लोगो में से गोरख के दोस्त कल्याण,शिरीष और असलम भी होते है ) कल्याण - दिस इस बिग्गर रेवोलुशन डैन फ्रेंच रेवोलुशन !! सभी- वू... हू... (ख़ुशी से) असलम- सोशल एकुँलटी आ गयी है यार सभी - वू... हू... (ख़ुशी से) शिरीष -अबे! अब लड़कियां और लड़के रहैगे साथ-साथ, खायेंगे भी साथ-साथ सभी - वू... हू... (ख़ुशी से) असलम- ओई गोरख नीचे आजा कल्याण- ओई! कॉम्रेड (मनोज(गोरख) देखता है और वापस कमरे में चला जाता है ) (थोड़ी देर में शिरीष ,कल्याण ,असलम चले जाते है ) ……………………………………………………………………………………………............................ …………………………………………………………………………………………………………………. मनोज(गोरख)- प्रिय कार्ल मार्क्स, ये अस्सी प्रतिशत भुक्खड़ों और बैलगाड़ियो का देश अब प्रगति कर रहा है, नाच नाच के… मेरे तुमसे कुछ सवाल हैं. 
 ये चिल कैसे मारा जाता है? और इसका क्या मकसद है?
 भूख किसी कि स्थिति है या फिर उसकी नियति?
 क्या भूख को महसूस किये बिना भी भूख के बारे में लिखा जा सकता है?
 बहुत पेट भरा हुआ हो तो नाचा नहीं जाता. भूखे पेट भी नाच नहीं सकते. तो फिर ये कौन हैं जो नाच रहे हैं?
 कार्ल मार्क्स, ये मार्क्स क्या है? बंद करो.... (अनीता आती है +म्यूजिक मनोज(गोरख)उसे देखने लगता हैं ) (सब बेठ जाते हैं ) अनुराग-हाँ तुम मुझसे प्यार करो, जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं, जिनको वह गहराई तक दबा नहीं पाती.. जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं तुम मुझसे प्यार करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ आईनो रोशनाई मैं घुल जाओ और आसमान में मुझे लिखो मुझे पढ़ो आईनो मुस्कराओ और मुझे मार डालो आईनो मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ कुंदन- अपनी नज़रे नाज़ारो मैं खोने लगीं, चांदनी उंगलियों के पोरों पे खुलने लगी उनके होठ, अपने होठों में घुलने लगे और पाजेब झन झन झनकती रही हम पीते रहै और बहकते रहै जब तलक हर तरफ बेखुदी छा गयी हम न थे, तुम न थे, एक नगमा था पहलु में बजता हुआ एक दरिया था सेहरा में उमड़ा हुआ बेख़ुदी थी की अपने में डूबी हुई (अनीता चली जाती हैं) (सुहेल और सृष्टि स्लो डांस) मनोज(गोरख)- tonight… tonight… Tonight I can write the saddest lines Right For example, the night is shattered and the blue stars shiver in the distance The night wind revolves and sings I loved her and sometimes she loved me too Tonight! I can write the saddest lines (टूटी फूटी अंग्रेजी में) (सृष्टि चली जाती हैं ) (सुहेल अकेले ही नाचता रहता हैं) म्यूजिक धीरे धीरे बंद होता हैं ब्लैक आउट ) SCENE-6 कुंदन(गोरख) (बालकनी की तरफ देख रहा हैं) चौकीदार -कौन है ? कौन है बे ? भोसड़ी के ......कौन है ? कुंदन(गोरख)-अरे भैया हम हैं हम गोरख .क्या भैया डरा दिया आपने चौकीदार-गोरख भैया!!यहाँ क्या कर रहै हो? कुंदन(गोरख)-अरे बस ऐसी ही हवा खाने आये थे चौकी-बीड़ी पिलाये क्या? कुंदन(गोरख)-नहीं नहीं ठीक हैं (चौकीदार वापस जाने के लिए मुड़ता हैं ) अरे भाई ये जो कमरा हैं रूम ३१६ उसके बारे में आप कुछ जानते हो ? चौकी-अरे उसको कौन नहीं जानता लन्दन से आई हुई ठहरी यहाँ कुंदन(गोरख)-लन्दन से? चौकी -पिता केन्या में बहुत बड़ी फैक्ट्री चलाने वाले हुए,सात साल बेबी लन्दन में रह कर आई है. कुंदन(गोरख)-सात साल.. चौकी-लेकिन स्वाभाव की बड़ी मीठी है हमसे भी हैल्लो कहती हैं कुंदन(गोरख)-हैं !! चौकी -सी.पि.स में रिसर्च कर रही है कुंदन(गोरख)-अच्हा !! अरे भैया सुनो न नाम पता है उसका? चौकी- ह्म्म्म.इरादे तो तुम्हारे नेक ही लग रहै है, नाम हुआ उसका अनीता चांदीवाला.गुजराती है लेकिन गुजराती आती नहीं है हिंदी भी अटक अटक के बोलती है अच्छा चलते हैं (जाते जाते रुक जाता है और वापस पलट के बोलता है) वैसे माल एकदम मस्त कन्तास ठहरी प्रतीक,मनोज,सुहेल,[गोरख] (तीनो एक साथ)- अबे ओई ! मनोज(गोरख)- प्रिय कार्ल मार्क्स, आज में जिस फूहड़ सोच से टकराया उसने मुझे पूरी तरह से झकझोड़ के रख दिया प्रतीक (गोरख)- वोर्किंग क्लास के लोगो में कांशियसनेस पैदा करने के लिए अभी और गहरी शिक्षा की ज़रुरत है सुहेल(गोरख)- भारत की कोम्मुनिस्ट पार्टियाँ यही काम तो नहीं कर पा रही है मनोज(गोरख)-इसलिए तो मजदूरों,किसानो और छोटे कर्मचारियों के बीच उनका सप्पोर्ट नहीं है प्रतीक(गोरख)- अब इसी फौर्थ ग्रेड कर्मचारी को ही देखो सुहेल(गोरख)- इसका ये एंटी फेमिनिस्ट रुख फयूद्ल्स्टिक और कपिठ्लिस्टिक सोसाइटी की 
वेलु सिस्टम की देन है (रूपा एंड सृष्टि मंच के दोनों विंग्स से आती है) [music ] प्रतीक(गोरख)-नहीं नहीं ...... भारत की कोम्मुनिस्ट पार्टियाँ सुहेल(गोरख)- तुम्हारा सरनेम चांदीवाला उसमे चाँदी जैसी खनक है प्रतीक (गोरख)-इसलिए तो इनको मजदूरों,छोटे कर्मचारियों का सप्पोर्ट नहीं हैं मनोज(गोरख)-अनीता आई … प्रतीक और सुहेल- आई वांट………. मनोज- अनीता आई भौन्त्त टु …….. अनीता- व्हाट डू यू वांट? मनोज- आई वांट टु नो अबाउट दी ब्रिटिश राज नौस्टालजिया (टूटी फूटी इंग्लिश में) अनीता -औ........... अनीता (सृष्टि)- The British? The British are so stuck up with their imperialistic past and they are so nosalgic about their entire British history that they call themselves the British Raj nostalgia. (with accent)-dekho na anghoote barabar desh he aur apne ko the Great Britain bolta he. isn't that funny (प्रतीक और सुहेल हँसते है "हैहैहैहैहैहै:) and they are so proud of the fact that they have ruled the world unlike Germans........ रूपा(अनीता)मनोज के बाल बनाते हुए - they do not even feel guilty about it.in fact they redefine the Indian history so as to glorify their own part, isn't this interesting? ठिफ्फिन कहा है तुम्हारा?(मनोज इधर उधर देखने लगता है ) . Have you heard about this film transfer of power? मनोज(गोरख)- हाँ आई हव सीन इट सुहेल(गोरख)- आई हव सीन इट प्रतीक (गोरख)- आई हव सीन इट सृष्टि(अनीता)-hello that is under production (तीनो गोरख अपना सर पीटते है) रूपा(अनीता) -कोई बात नहीं. उस फिल्म में उन्होंने ये दिखाने की कोशिश की है की इंडिया को फ्रीडम लोर्ड Mountbatten ने दिलाया है नाकि गांधी ने,या फिर नेहरु या फिर सुभाष चन्द्र बोस ने (मनोज अपने बाल बना रहा है और उसको देख कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो आईने को देख कर बाल बना रहा हैं) बाल ठीक करो वरना बच्चे फिर हसेंगे मनोज(बाल बनाते हुए)- अन्नी यू नो वाट दे हव डन? दे हव टर्न्ड आर लीडर्स इंटो फन्नी पोलिटिकल जोकर्स (दोनों अनीता हँसती है ) सृष्टि(अनीता ) जोकर [गोरख पलट जाता है. वो अनीता से पूछने वाला है कि अब बाल बना के वो कैसा लग रहा है. लेकिन वो देखता है कि वो कमरे में नहीं है. वो प्रेम से अनीता कहता है और उसके प्यार में खो जाता है.]
 सुहेल(गोरख)-अनीता की बातो में कितनी जागरुकता है प्रतीक(गोरख)-हमारे समाज को देखने का कितना सही नजरिया है सुहेल(गोरख)-उसे हमारे समाज के मौजूदा हालत की कितनी समझ है प्रतीक(गोरख)-वो हमारे संगठन में एक अहैम रोल अदा कर सकती है सुहेल(गोरख)-अनीता की सोच कितनी सुन्दर है प्रतीक(गोरख)-वो खुद कितनी खूबसूरत है सुहेल(गोरख)-अनीता.. प्रतीक(गोरख)- चांदीवाला… मनोज(गोरख)-अन्नी आई लव यू एंड I bhaunt to.. सुहेल(गोरख)- अबे bhaunt नहीं चूतिये want… want… WANT… व्… व्… प्रतीक(गोरख)-मुझे अपनी अंग्रेजी ठीक करनी होगी [मनोज(गोरख) उठता है और तभी सामने से कल्याण आता है ) मनोज(गोरख) कल्याण से- अन्नी, among the रुस्सियन राइटर्स ,dostobisky एंड chekhob are maii phabourite .... कल्याण -कौन साहब? [मनोज(गोरख) ये बोलकर बाहर चला जाता है] सुहेल(गोरख)- phabourite nahi favourite फ फ (मनोज बाल नोचता हुआ चला जाता है) (मंच के दांये तरफ से शिरीष आता है और प्रतीक उसको अपनी बात बताने लगता है ) प्रतीक(गोरख) शिरीष से- अनीता यू क्नो आई कम फ्रॉम अ वैरी small billage ..... सुहेल(गोरख)- अरे billage nahi village व् व् प्रतीक(गोरख)- अनीता माय phather इस ... सुहेल(गोरख)- अबे phather नहीं father... father पिताजी… पिताजी father प्रतीक(गोरख)-माय father इस अ वैरी progressive man कल्याण- गोरख! असलम-क्या गोरख (प्रतीक(गोरख) तीनो को देखता है और घबरा सा जाता है ) में में अपनी अंग्रेजी ठीक कर रहा था(ऐसा कहते हुए वहा से भाग जाता है ) शिरीष-ये कोनसा तरीका है अंग्रेजी सुधारने का?( हँसते हुए ) Scene-7 (स्कूल की घंटी बजती है.मंच के दोनों विंग्स से छात्र आते है और अपनी अपनी जगह पर बैठ जाते है सभी छात्र दर्शको की तरफ पीठ करके बेठे है) कुंदन (टीचर)-साइलेंस ! कल जो कुछ पढ़ा था उसको revise करते है चलो बताओ कल्याण- स्ट्रेट लाइन अनुराग- सॉरी मैम असलम- टाइम टेबल सृष्टि - मैम वाटर रूपा- गेट आउट सुशांत- यूनिट टेस्ट शि रीष- पास प्रतीक- मुर्गा बनो कल्याण-नकल के लिए भी अकल चहिये अनुराग - ट्राई एंड ट्राई अंटिल यू डाये.... असलम- एजुकेशन र्रूइन्द मी...... सृष्टि-में तो पक्का फेल हो जाउंगी रूपा -आंसर तो टैली हो रहा हैना मेथड कोई भी हो सुशांत-में रोज़ सुबह ५ बजे उठके पढता हु शिरीष-पास प्रतीक-मंगल पर जीवन है क्या? कल्याण- गौड हैल्प डोस हू हैल्प देम्सेल्व्स अनुराग-चरित्र ही सर्व्श्रेष्ट्र पूंजी है असलम-होनेस्टी इस द बेस्ट पोलिसी सृष्टि-माता पिता के चरणों में स्वर्ग है रूपा -प्रक्टिस मेक्स मैन परफेक्ट सुशांत-घृणा पाप से करो पापी से नहीं शिरीष-पास प्रतीक.एस यू कैन ...सर कुंदन -शाबाश (अटेंडेंस लेता है) प्रतीक- प्रेसेंट सर सुशांत -प्रेसेंट सर सृष्टि -प्रेसेंट सर गोरख (कोई आवाज़ नहीं) ..गोरख अब्सेंट सर कुंदन-अब्सेंट है? यह तो पहले भी अब्सेंट था तुम(कल्याण को देखता है ),और तुम (असलम को देखता है ) तुम दोनों दोस्त हो न उसके ?कहा है वो ? (असलम और कल्याण खड़े होते है ) असलम: सर वोह कैंटीन में है. टीचर: कैंटीन में क्यूँ है? कल्याण: चूत्या क्लास है यह. (सब स्टुडेंट्स हँसते hain) टीचर: क्या! असलम : ऐसा गोरख कहता है. टीचर: कर क्या रहा है वो कैंटीन में? कल्याण: सर सार्त्र पढ़ रहा है. टीचर: वो कौन है? (स्टुडेंट्स हँसते है) कल्याण : सर! jean paul सार्त्र. असलम: सर वोह क्रन्तिकारी प्रेम कवितायेँ लिख रहा है. कल्याण: नहीं सर वो सार्त्र पढ़ रहा है. असलम: नहीं वो क्रन्तिकारी प्रेम कवितायेँ लिख रहा है. कल्याण : सार्त्र पढ़ रहा है! असलम: क्रन्तिकारी प्रेम कवितायेँ लिख रहा है! कल्याण: मुझे पता है! असलम: मुझे पता है ! कल्याण: मे दोस्त हूँ की ये ? टीचर: चुप! बैठों दोनों. सार्त्र पढ़ रहा है ,क्रन्तिकारी कविता मे सुनाता हूँ कविता : बगुला बैठा ध्यान मैं, प्रात : जल के तीर, जैसी तपसी तप करे, मलकर भस्म शरीर, तीर जो देखी मछली, काहै मीर, ग्रासी चोंच समूची फ़ौरन निगली (कविता की चौथी लाइन के बाद) (सभी स्टुडेंट्स पलट जाते है और शिरीष और असलम की बातें सुनने लगते है,टीचर कविता बोल तो रहा है पर उसकी आवाज़ नै आ रही और बोलते बोलते वो निकल जाता है ) कल्याण: ओये वो कैंटीन में नहीं, रूम पर है. असलम: क्या! कल्याण: हाँ मे गया था उसके रूम पर. असलम : हाँ तो रूम पर बैठ कर क्रन्तिकारी कवितायेँ लिख रहा है. कल्याण: नहीं वो सार्त्र पढ़ रहा है. असलम: क्रन्तिकारी कवितायेँ... कल्याण: सार्त्र पढ़ रहा है! असलम: अच्छा पर रूम से बाहर to आये कल्याण: हाँ तू तू बात कर उस से. असलम: तू बात कर. कल्याण: तू बात कर. असलम: मै क्यों बात करू. कल्याण: तू दोस्त है ना उसका! असलम: तू कर ना बात. कल्याण: तू कर ना, तेरी आवाज़ में रूतबा भी है. देख वो आ रहा है, आ रहा है, आ रहा है, आ गया! (अनुराग(गोरख)पलटता है और असलम से बात करने लगता है ,जैसे ही अनुराग पलटता है क्लास में मौजूद दोनों लड़कियां खड़ी हो जाती है और चली जाती है) असलम-अरे गोरख तुम यहाँ? अनुराग (गोरख) असलम से- अरे सुन देख लोगों तक पहुचने का प्रेम ही एक रास्ता है. हम प्रेम से लोगों तक क्रांति का सन्देश पहुचाएंगे. मैं अब से सिर्फ क्रांतिकारी कवितायेँ ही लिखूंगा . जिसके लिए प्रेम होना बहुत ज़रूरी है. जो आजकल मुझे महसूस भी कर रहा हु.असलम मुझे प्रेम हो गया है ये सुन मेरी नयी कविता प्रतीक(गोरख)-शिरीष आजकल न में एक विशेष परिवर्तन महसूस कर रहा हु, लगता है अनीता इस संवादहीनता से ऊब रही है और उसकी उम्र भी तो मेरे से पांच छेह साल कम है इतनी परिपक्वता कहा से आ सकती है इतनी जल्दी.और लड़कियां पहल तो सिर्फ मुम्बैया फिल्म्स में करती है इसलिए आई हैट हिंदी फिल्म्स.पता है आज हर शहर और कसबे का मध्यम वर्ग्य लड़का कंघी वँघी करके सजधज के किसी हीरो डुप्लीकेट करता है सुशांत(गोरख) कल्याण से- तुमने अनीता एक चीज़ पिछले पांच छेह दिनों में नोट की है? वो आजकल इतना ज्यादा स्लीवेलेस पहनती है की बाहै और बगलों के नीचे का काफी हिस्सा दिखाई देता है .और आज जो उसने हरे रंग का टॉप पहना था उसका गला इतना खुला हुआ था इतना खुला हुआ की समझो मोड लड़कियां भी ऐसा दुसाहस नहीं करेंगी. अब तुम इससे अनीता की बेशर्मी कहोगे ,लेकिन ऐसा हैं नहीं. ये उसका एक संकेत है,ये उसकी खीज और बेचैनी की अभिव्यक्ति है. इतना उत्तेजक कपड़ा पहनकर अपने शरीर को इतना खोल कर वो मुझसे कहना चाहती है की में अपनी मौजूदा निर्णयहीनता को तोडू ,में उससे साफ़ साफ़ बात करू. आखिर लड़की अपने शरीर के माध्यम से ही मौन को भाषा में बदलती है. कल्याण-हाँ तो लड़की से जाकर बात करो,उससे कहो मुझे आपसे एक ज़रूरी बात करनी हैं ,जो बैठे कर मकड़जाल बुनते रहते हो उससे बंद कर दो . शिरीष-ज्यादा से ज्यादा करेगी क्या मन ही तो करेगे जाकर बोल दो लड़की से और खत्म करो किस्सा अनुराग(गोरख)-यही..यही बात अनीता ने कितने अनोखे तरीके से अपने सुन्दर युवा शरीर से मौन को भाषा में बदलते हुए कहा था और तुम कितने भौंडे और फूहड़ तरीके से कह रहै हो ...छी... शिरीष-अनीता जी मेरा नाम गोरख है और में आपसे प्यार करता हु यार ये छोटी सी बात कहने में आपको तकलीफ किस बात की है प्रतीक(गोरख)-अरे नहीं है यार,में तो बस एक सही मौके का इंतज़ार कर रहा हु वैसे बाय द वे हमारे इस प्यार को जैसा तुम समाज रहै हो वैसा वो है नहीं,गुरु ये एक अलग और अजब तरह का खेल है,इसमें कोई कपट नहीं है हम दोनों एक दुसरे के लिए बिलकुल पारदर्शी है ट्रांसपेरेंट कुछ भी छुपा हुआ नहीं है कल्याण-अरे यार तो में भी तो यही कह रहा हु की लड़की से जाकर बात कर सुशांत(गोरख)-यार बात करना कोई बड़ी चीज़ नहीं है .जो जो तुम चाहते हो वो सब हो जायेगा प्रतीक(गोरख)-देख लेना सब हो जायेगा अनुराग(गोरख)-देख लेना सब हो जायेगा (सुशांत,प्रतीक,अनुराग चले जाते है ) …………………………………………………………………………………………………………………… ............................................................................................................................................................ Scene-8 (नींद न मुझको आये गाना) (गाना सुनते ही जहाँ असलम और कल्याण मस्ती करने लगते है वही शिरीष को गुस्सा आ रहा है.शिरीष उठने को होता है तो दोनों उसको रोक लेते है .लेकिन आखिरकार शिरीष से रहा नहीं जाता और वो सुहेल(गोरख के कमरे में आ जाता है ) ............................................................................................................................................................. ............................................................................................................................................................. शिरीष -गोरख [सुहेल(गोरख) सुनता नहीं है )] शिरीष-(ज़ोर से)-गोरख (सुहेल अपनी दुनिया में खोया हुआ है ) शिरीष-(और ज़ोर से ) गोरख! [गाना बंद हो जाता है.सुहेल(गोरख) शिरीष को देखता है ) सुहेल(गोरख)- शिरीष इधर आओ ,देखो अनीता अपनी खिड़की खुली छोड़ गयी है खिड़की खुली छोड़ के वो ज़रूर मुझसे कुछ कहना चाहती है… वो कहना चाहती है...... शिरीष(गुस्से में )- अरे कुछ नहीं कहना चाहती ये सब आपका भ्रम है अपने कभी पुछा है जाकर की वो लड़की आपको जानती भी है,आपका नाम भी मालूम है उसको? कुछ करते तो है नहीं दिनभर काल कोठरी में बैठे रहते है,जाईये जाकर बोलिए उनसे मैडम मेरा नाम गोरख है और में आपके प्यार में पागल हो रहा हु (चिल्लाते हुए) (असलम और कल्याण शिरीष को खीच कर ले जाते है) कल्याण- गोरख मैं आता हूँ… सुहेल(गोरख)-शिरीष मिश्र….. तुम नहीं जानते, इतिहास में खुली रह गयी एक अकेली खिड़की का क्या अर्थ होता है. लेकिन मैं जानता हूँ, खुली खिड़की का एक भविष्य होता है. जिसमें से प्रतिज्ञाओं और संकल्पों की रौशनी फूटती है, ये प्रेम की वो खिड़की है जिसका एक पल्ला पूरब तो दूसरा पशचिम की ओर खुलता है. यह विचारों का पूरब पशचिम है. ये वो खिड़की है जिसमे बहती हवा कभी निराशा का दीमक नहीं लगने देती. शिरीष मिश्र कैसे जानोगे तुम खुली खिड़की का अर्थ (Shift to teacher’s table) Scene-9 कुंदन(teacher )- नाम? कल्याण-कल्याण......अ अ गोरख कुंदन-क्या किया उसने? कल्याण-सर वो अपने कमरे में ही रहता है कुंदन- तुम कहा रहते हो, गार्डेन में? कल्याण-सर उसने दाढ़ी बहुत बड़ी कर ली हैं कुंदन- तो तुम्हें दाढ़ी से दिक्कत है ? कल्याण- सर वो सारा टाइम बालकोनी में खड़ा रहता है कुंदन- तो मैं ये कंप्लेंट लिखूं की वो बालकोनी में खड़ा .. कल्याण- सर कंप्लेंट तो है ही नहीं. हम तो बस उसकी हालत आपको बता रहे हैं. कुंदन- ज़रूरी काम कर रहा हूँ. तुम बहार निकलो, चलो निकलो… कल्याण - सर बस स्टॉप. कुंदन-क्या बस स्टॉप? कल्याण- सर कल शाम को गोरख बस स्टॉप पे खड़ा था (सुशांत(गोरख) तेज़ी से आता है और खड़ा हो जाता जैसे बस का इंतज़ार कर रहा हो ) कुंदन- अकेला खड़ा था? कल्याण- नहीं सर मैं भी था, और भी लोग थे (जैसे ही कल्याण ये बोलता है और कई लोग जल्दी से आते है और सुशांत के आगे आकर खड़े हो जाते है सब अपनी अलग अलग पोसिशन मे फ्रीज्ड हैं ) कल्याण- और सर बहुत देर से बस नहीं आ रही थी कुंदन- कौनसी बस थी? कल्याण- सर आप समझ नहीं रहे हो आप देखो (कल्याण बस के लिए इंतज़ार कर रहै लोगों के पास जाकर खड़ा होता है) बस स्टॉप (जैसे ही कल्याण उनके साथ खड़ा होता है बस स्टॉप का म्यूजिक बजता है और सारे लोग जो फ्रीज्ड थे अपनी अपनी क्रिया करने लगते है ) पहला यात्री -अरे मानव भाई रीलैंस नु किट्टू गब्भ्रेउ (गुजराती भाषा मे ) दूसरा यात्री- एक सौ ने छविस पॉइंट्स पहला यात्री- एक सौ ने छविस! मारी नाखिया… कल्याण -भाईसाहब बस नंबर 316 चली गयी क्या ? दूसरा यात्री - आवे छे आवे छे कल्याण -अनीता एंट्री Anita-(अनीता भागती हुई आती है ) रिकक्षा, रिकक्षा एक्स्कीउस मी एक्स्कीउस मी बस नंबर 666 चली गयी क्या ? (कोई उसकी बात नहीं सुनता सब अपने काम मैं लगे हुए हैं) (अनीता परेशान होकर रिकक्षा रिकक्षा चिल्लाती हुई वहा से चली जाती हैं.तभी भीड़ को हटाते हुए सुशांत(गोरख) आगे आता है ) सुशांत(गोरख)-इट इज इस येट टू कम(पर तब तक अनीता जा चुकी होती है ) [म्यूजिक बंद होता है और सब लोग fir से फ्रीज्ड हो जाते है ) कल्याण -सर ये हुआ था कुंदन -तो इसमें गलत क्या है? क्यों टाइम वेस्ट कर रहै हो बहार निकलो कल्याण -सर ये हुआ था पर गोरख ने जो इनको (शिरीष और असलम) बताया वो कुछ और था (कल्याण शिरीष और असलम को धक्का देता बस स्टॉप की तरफ ) कल्याण-अब ये कल्याण है कुंदन-कल्याण कौन है? कल्याण-सर कल्याण मैं हु कुंदन-तो अब ये कौन है? कल्याण -सर अब ये कल्याण है कुंदन-तो तुम कौन हो ? कल्याण - सर में तो कल्याण ही हु कुंदन-तो मैं कौन हु? कल्याण- सर आप भी कल्याण (झल्लाते हुए) अरे तुम कहै के कल्याण हुए अरे आप देख लो न सर (शिरीष और असलम कल्याण की नक़ल करते हुए बस स्टॉप की तरफ जाते है ) [music ] (बस स्टॉप पर खड़े लोग फिर से अपनी अपनी क्रिया करने लगते हैं) पहला यात्री -अरे मानव भाई रीलैंस नु किट्टू गब्भ्रेउ (गुजराती भाषा मे ) दूसरा यात्री-एक सौ ने छविस पॉइंट्स पहला यात्री-एक सौ ने छविस !!!!! मारी नाखिया असलम और शिरीष(जो कल्याण है)-भाईसाहब बस number 316 चली गई क्या? दूसरा यात्री -आवे छे आवे छे तीसरा यात्री-भाईसाहब अखबार देगे (तभी अचानक अनीता आती है और बड़े प्यार से नाचती हुई "रिक्शा रिक्शा" चिल्लाती है ) सब लोग उसी को देखने लगते है और बस देखते ही रह जाते है ) अनीता-एक्स्कीउस मी (सब लोग अपने हाथ खड़े करते है ) "मैं" अनीता(हँसते हुए)-नॉट यू (इशारा करते हुए) him .. चौथा यात्री-हम पहला यात्री-हम नहीं हिम (सब हटते है और पीछे गोरख अपनी कविता हलके से बोल रहा होता है ) अनीता गोरख से - बस नंबर 666 चली गयी क्या? सुशांत(गोरख) (एकदम हीरो की तरह)- नो इट इस येट टू कम अनीता- हाउ स्वीट (अनीता बहुत खुश हो जाती है और "taxi.. taxi.. " चिल्लाती हुई चली जाती है ) (जैसे ही अनीता चली जाती है बस स्टॉप की भीड़ पीछे चली जाती है और खड़ी हो जाती है )
 कल्याण (असलम और शिरीष से)- अच्हा किया यार 
 (तीनो दोस्त कुंदन(टीचर ) के पास जाते है. कुंदन अनीता को देख कर खुद कही खो जाता है )

 कल्याण-सर 
(कुंदन ध्यान नहीं देता )
 कल्याण-सर 
 कुंदन-हाँ !

 कल्याण-सर ये वो था जो नहीं हुआ था 
 कुंदन-तो वो क्या था?
 कल्याण -सर वो हुआ था 
 कुंदन-है?
 कल्याण - सर यही तो गोरख को लग रहा है की साड़ी भीड़ में अनीता ने सिर्फ उसी से पुछा "क्या बस नंबर 666 चली गयी है क्या ?

 कुंदन-अच्हा .तो बस चली गयी थी या नहीं चली गयी थी 
 शिरीष कल्याण से -अरे छोड़ न मंध्बुधि हैं इसको नहीं समझ आयेगा
 कुंदन-ऐ क्या बोला तू ?किसको नहीं समझ आयेगा समझाओ मुझे 
 कल्याण -एक और बात सर लैटर वाली
सर एक दिन अनीता अपनी बालकनी में आई …………उसी वक़्त सुहेल( गोरख) भी अपने कमरे की खिड़की पर आया 
 सुहेल(गोरख)- कविता 
 उगने दो ये पेढ़, ये पौधे ये धरती उगने दो 
 (अचानक सुहेल(गोरख) की नज़र बालकनी पर खड़ी अनीता पर जाती है सुहेल अचानक बोलने लगता हैं "ये इश्क हैं मेरा इश्क हैं" अनीता के हाथ में एक कागज़ है वो उसमे से कुछ पढ़ती है और फिर फ़ेक देती है, उसके बाद वहां से चली जाती है सुहेल(गोरख) अपनी तरफ के मंच के विंग से निकल कर दूसरी तरफ के विंग से आने के लिए दौड़ता है, उसके आने से पहले पीछे खड़ी बस स्टॉप की भीड़ बहुत सारे कागज़ गिरा देती है, जैसे ही सुहेल(गोरख)मंच पर आता है, वो इतने सारे कागज़ देखता है [music] और उन्हैं उठाने लगता है और अनीता का लिखा हुआ कागज़ ढूँढने लगता है, वो कागज़ उठा रहा है और कल्याण प्रवेश करता है , गलती से उसका पैर एक कागज़ के टुकड़े पर पड़ जाता है)

 सुहेल(गोरख)- पीछे हट पीछे हट ,पैर नहीं 
(कल्याण को उसके लिए बुरा लगता है और वो भी कागज़ उठाने लगता है, जैसे ही कल्याण कागज़ उठाने में व्यस्त हो जाता है सुहेल(गोरख) अपने इकट्ठे किये हुए कागज़ लेकर अपने कमरे की तरफ चला जाता हैं )
 [अनुराग,सृष्टि प्रस्थान करते हैं और प्रतीक(गोरख), सुशांत(गोरख), मनोज(गोरख) अपने अपने स्थान से आगे बढ़कर सुहेल को देखते हुए अपनी-अपनी कवितायेँ कहते हैं... ऐसा करते हुए वो अपनी जगह पर खड़े होकर घूमने लगते हैं...] 
 प्रतीक(गोरख) – अरे अनु कल शाम जो तुमने मेरे लिए चिट्ठी फेंकी थी,वो नीचे कागज़ के हज़ार टुकडो मे खो गई ,मेने बहुत ढूंढा रात २ बजे तक ढूंढ़ता रहा लेकिन नहीं मिली वैसे मे जानता हूँ की तुमने चिट्ठी मे क्या लिखा होगा उस चिट्ठी का जवाब मेने लिखा हैं सुशांत(गोरख ) की कविता- हाँ, तुम मुझसे प्यार करो,
 जैसे हवाएं मेरे सीने से करती हैं,
 जिनको वो गहराई तक दबा नहीं पाती,
 जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं,
 तुम मुझसे प्यार करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ,
 आइनों रोशनाई में घुल जाओ,
 और आसमान में मुझे लिखो और मुझे पढो,
 आइनों मुस्कुराओ और मुझे मार डालो,
 आइनों मैं तुम्हारी ज़िन्दगी हूँ... 
 मनोज की कविता- Tonight i can write the saddest lines,
 Write, for example, that the night is shattered, and the blue stars shiver in the distance,
 the night wind revolves and sings,
 I loved her, and sometimes, she loved me too.

 [इतने में अनीता गोरख के कमरे में आती है और उसके ऊपर कागज़ के टुकड़े गिराने लगती है.. ये सब देखकर गोरख फूट फूट के रोने लगता है... अनीता कमरे से बहार चली जाती है. अनीता के जाते ही मनोज, सुशांत और प्रतीक चुप हो जाते हैं. लेकिन उनका अपनी अपनी जगह पर घूमना भी जारी है. तभी चौकीदार लेफ्ट विंग से आता है]
 Scene-10 चौकीदार- अब्बे हटो भोसड़ी वालो... 
[राईट विंग की तरफ से वो अनीता और उसकी दोस्त को आते हुए देखता है]
 चौकीदार- आ जाइये मैडम, भगा दिया सबको.
 [विंग से अनीता और उसकी दोस्त की आवाज़ आती है] दोस्त- Come on Anita let's go. It's important. अनीता -Let it be. I don't want to get into it. I am scared. Leave it. दोस्त- You wait here I'll talk to him.
 दोस्त (चौकीदार से)- क्या है ये?
 चौकीदार- क्या है?
 दोस्त- खुद ही देखो न क्या है ये?
 चौकीदार- चिट्ठी है । 
 दोस्त- चिट्ठी नहीं प्रेम पत्र है । 
 चौकीदार- किसका है? दोस्त- नाम पता दोनों लिखा है... कोई गोरख है। रूम नंबर 306 चौकीदार- अरे वो...(रुक जाता है और झूट बोलता है) आ... हम नहीं जानते... अनीता (बहुत डरे हुए है)- This guy is really weird. He has such big scary eyes, long beard, he wears this long dirty t-shits and keeps on staring. Say it in hindi Bhoomi. दोस्त(चौकीदार से)- उसकी डरावनी आँखें हैं. लम्बी सी दाड़ी है. और गंदे से कुरते पेहैनता है और घूरता रहता है. अनीता (बिलखते हुए बोलती है) - I'm not safe here. I need security. What's his name? दोस्त- इसका नाम नोट करते हैं. तेरा नाम क्या है?
 चौकीदार- अरे रे रे, हमारा नाम क्यूँ नोट कर रहै हैं?
 दोस्त- वो तो हम नोट करेंगे ही. तू बस अपना नाम बता.
 चौकीदार (बिलकुल बुरी तरह डर चूका है) - अरे हम कह रहै हैं न....
 दोस्त( बात काट देती है)- तू अपना नाम बता (चिल्लाते हुए)
 चौकीदार- अरे हम कह रहै हैं हम पक्का कुछ करेंगे. आप हमारा नाम मत लिखिए. हम पक्का कुछ न कुछ करेंगे....
 दोस्त- ठीक है खुद ही कुछ कर वरना अगर हम करने पर आये तोह बहुत भारी पड़ेगा.
 
 [दोस्त और अनीता राईट विंग से चले जाते हैं। चौकीदार बहुत डर जाता है और राईट विंग से तीनो दोस्तों की आवाज़ आती है। वो लोग चाय की दुकान पर बात कर रहै हैं। चौकीदार उनकी ओर बढ़ता है। इतने में तीनों दोस्त भी मंच पर आते हैं।] कल्याण- दत्ता, दूध पता है क्या होता है? वो चाय में डलता है । 
 शिरीष- छोड़ यार, ये कैंटीन थोड़ी ना है । 
 कल्याण- हाँ, अस्पताल है। [चौकीदार उनकी ओर बढता है]
 चौकीदार- अरे कल्याण भैय्या...
 कल्याण- ज़हर पिलाते हैं 
 चौकीदार- कल्याण भैय्या इधर आइये... ये देखो गोरख बाबू क्या किये हैं । 
 [चिट्ठी कल्याण के हाथों में देता है। कल्याण असलम को चिट्ठी दिखाते हुए बोलता है] कल्याण- ये तो लव लैटर है?
 चौकीदार- हाँ लव लैटर है और चूतिये ने अपना नाम पता, दोनों लिख दिया है। लड़की बहुत डर गई है। हमारी नौकरी ले लेगी। कुछ करो... असलम- हाँ ठीक है यार, करते हैं कुछ
 चौकीदार- हाँ! कुछ करो... अगर हमारी नौकरी पर आई तो तीनों को घसीटेंगे। गाँव भेजो उस साले पागल को... [कहता हुआ चला जाता है]
 कल्याण- अरे, चौकीदार भैय्या..(चौकीदार लेकिन रुकता नहीं हैं )ये क्या मुसीबत है.. कहाँ है ये मेंटल? 
शिरीष- मैं उसके रूम पे गया था। दरवाज़ा अन्दर से बंद था अन्दर से अजीब-अजीब सी बडबड़ाने की आवाजें आ रही थीं। असलम- कल रात दो बजे वो मेरे कमरे में आए। आँखें चौड़ी और लाल थीं। कुछ फ्रेंच जैसी भाषा में बहुत देर तक बोलते रहै। बीच में हकलाते थे और मुंह में लार आ रही थी। और फिर बहुत देर तक हँसते रहै। कल्याण- भाई इनको हो गई है बीमारी, स्चिज़ोफोबिया 
 असलम(चौंकते हुए)- स्किजोफ्रेनिया !
 [म्यूजिक आता है। राईट विंग से सुशांत और रूपा आते हैं और लेफ्ट विंग से सुहेल आता है। उन तीनों की झोली में बहुत सारे कागज़ के टुकड़े हैं। तीनों चलते-चलते मंच के बीच में आके बैठ जाते हैं और कागज़ ज़मीन पर रखकर उनमें से चिठ्ठी ढूँढने लगते हैं। तभी तीनो दोस्त अपने-अपने गोरख की ओर बढ़ते हैं और उनके सामने खड़े हो जाते हैं] कल्याण- गोरख! 
 [तीनो गोरख अपने कागज़ के टुकड़ों को छुपाने की कोशिश करते हुए एक दूसरे को पीठ करके बैठ जाते हैं और अपने कागज़ के टुकड़ों को अपने अपने पीछे छुपा लेते हैं। कल्याण के पुकारने पर तीनो गोरख पलटते हैं] शिरीष- आप जिस लड़की के पीछे पागल हो रहै हैं मजनू की तरह, क्या उसे ये भी मालूम है कि आपका नाम क्या है?
 असलम- और ये भी सच हैं की आप बिना कुछ किये सोचते ही सोचते पागल हुए जा रहै हैं… चलिए गोरख बाबू हम आपको उस लड़की से मिलवाते हैं । 
 (तीनो गोरख एकसाथ कविता बोलते हैं ) उसे चहिये प्यार, चहिये खुली हवा. लेकिन बंद खिडकियों से टकराकर अपना सर , लहुलोहान गिर पढ़ी है वो. कल्याण -ओये गोरख . चल उठ मुंह हाथ धो .दाढ़ी ढूढ़ी बना जब ऐसी लड़की से प्यार किया हैं तो बन उसके जैसा ) (तीनो फिर कविता बोलते हैं ) गिरती है आधी दुनिया, सारी मनुष्यता गिरती है, हम जो जिंदा हैं हम सब अपराधी हैं, हम दण्डित हैं. (अचानक हर गोरख अपने सामने खड़े दोस्त को उसके collar से पकड़ता है और गिब्बेरिश बोलने लगता है. सभी गोरख हैरान होते हैं की वो क्या बोल रहे हैं. तभी उनके शरीर में बहुत दर्द होने लगता है और वो ज़मीन पर गिर जाते हैं. तीनो दर्द में तड़प रहे हैं और ज़मीन पर लगातार दर्द की चार मुद्राएं बना रहे हैं) कल्याण - अरे गोरख! होश में आ… होश में नहीं आयेगा तो पागल हो जायेगा… गोरख! मनोज (गोरख )- ये आखें हैं तुम्हारी, तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समंदर. इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चहिये (यही कविता प्रतीक (गोरख ) भी बोलता हैं और मंच के पीछे से भी यही कविता बोली जा रही हैं ) (बोलते बोलते प्रतीक और मनोज आगे बढ़ते हैं और रूपा (गोरख ) और सुशांत (गोरख ) को सँभालने की कोशिश करते हैं उन्हैं गले लगाते हैं , लेकिन सुहेल (गोरख ) अब भी तड़प रहा हैं बहुत तकलीफ़ में हैं .धीरे धीरे रूपा और सुशांत शांत हो जाते हैं और उन दोनों के शांत होते ही सुहेल(गोरख) दर्द से करहाते हुए तेज़ी से चारों मुद्राएं करता है और बेहोश हो जाता है. वो तीनो निढाल से ज़मीन पर पड़े हैं . तभी चौकीदार आता हैं कुंदन (टीचर) के साथ ) Scene-11 चौकीदार- साहब ये देखो ये रहा गोरख कुंदन (अपनी छड़ी से 2-4 बार सुहेल (गोरख) के पैर पे मारता है) - गोरख! गोरख… उठ कुंदन (कल्याण से )- ए! क्या हुआ इसको ? कल्याण - वो… कुंदन (बीच में काटते हुए )- चुप! बहार अमबुलंस खड़ी है लेके चलो इसको कल्याण -सर इसके गाँव में बात हो गयी है ये गाँव जायेगा. शिरीष इसका सामान ला कुंदन- तुम तीनो इसको लेके जाओ कल्याण टीचर से (बेहद गुस्से में ) हाँ! लेके जा… लेके जा… अरे तू लेके जा ना , हाथ लगा इसको तू… जा यहाँ से (कुंदन को धक्का देते हुए, असलम सर को संभालता है और बहार जाने की लिए कहता हैं ) कल्याण -शिरीष सामन ला इसका (शिरीष मंच के उस हिस्से में जाता है जहा गोरख का कमरा हैं ) (music) मनोज (गोरख )- तुम वहाँ से बहुत आगे निकल आये हो जहाँ से चले थे, मगर तुम्हें अभी और भी आगे जाना था. अभी कल ही तो नाग भूषण पटनायक से मिलना था, और मौत के खिलाफ उनकी लड़ाई में शामिल होना था. करने थे सुख दुःख के हज़ार चर्चे, घट्नाओ को अपने विवेक के चरखे पर कातना था (कविता के बीच में रूपा और सुशांत उठ जाते है और पीछे आकर खड़े हो जाते हैं ) प्रतीक (गोरख )- बच्चों में बांटना था नए विचारों का पराग,
 पीड़ित लोगों में विद्रोह का राग बांटना था.
 लेकिन तुम नहीं हो,
 हमने अपना एक सेनापति खो दिया है,
 हमारी एक मशाल बुझ गई है,
 हमारे गीतों की एक प्यारी कड़ी टूट गई है.

 एक गहरे सदमे में तुम्हारी यादों से घिरे हुए,
 हम यहाँ खड़े हैं,
 जहाँ दूर से आती हुई एक धीमी ललकार सुनाई पड़ती है ------------------------------- (सब अपने गमछे उतार लेते हैं ) (इसी बीच शिरीष गोरख के कमरे मे जाता हैं अपने दोस्त के कमरे मे आकर शिरीष को बहुत बुरा लगता है वो रोने लगता है (कविता के चलते शिरीष सुहेल (गोरख ) का suitcase लाकर उसके पास रख देता है) मनोज (गोरख )- आगे बढ़ो दोस्तों,
 इस तरह कैसे चल सकता है?
 इतनी भूख है, इतनी गुलामी है, इतनी मौत है,
 जीवन को चारों ओर से दबोचती इतनी मौत,
 आखिर इस तरह कैसे चल सकता है?

 दोस्तों आगे बढ़ो,
 कि ये अछोर अँधेरा छट जाये,
 की ज़िन्दगी जीते और मौत डर के सामने न आ पाए,
 और कभी आये भी तो तुम्हारा आदेश लेकर आये,
 गरज ये,की जीना आसान हो, मरना कठिन हो जाये. (कविता समाप्त होते-होते सुहेल (गोरख ) धीरे-धीरे उठता है और खड़ा होता है अपने गमछे को ऊपर की ओरे जोर से खींचता है और खुद को फ़ासी लगा लेता है सब लोग एक कदम आगे बढ़ते हैं पर रुक जाते हैं और चुप चाप गोरख को देखते रहते हैं (म्यूजिक तेज़ होता हैं और धीरे धीरे फेड आउट होता है) -x-x-x-