बुधवार, 4 नवंबर 2026

एक हारे हुए कवि की सफल कविता.. (नाटक) लेखक- मानव कौल.. Ek haare hue kavi ki safal kavita

  









aRANYA 

 

 

 

 

 

 

 

 

एक हारे हुए कवि की सफल कविता…

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

                                                                                लेखक- मानव कौल 

 

 

 

 

 

 

 

(स्टेज पर अंधेरे में ये कविता सुनाई देती है। )

 

सभी अपने-अपने तरीक़े से रात के साथ सोते हैं

हर आदमी का रात के साथ एक संबंध होता है.. 

अगर यह संबंध अच्छा है

तब आपको नींद आ जाती है

पर अगर यह संबंध ख़राब है

तब आपके जीवन के छोटे-छोटे अँधेरे

रात के अँधेरे में घुस आते हैं

और आपको सोने नहीं देते।

 

(धीरे धीरे लाइट स्टेज पर आती है। हमे दिखता है मध्य में एक कवि अपनी बहुत सारे पन्नों के साथ बैठा है और लिखने की कोशिश कर रहा है। उसके दोनों तरफ दो कविताएँ (हार और जीत)  दिख रही हैं। सभी के सामने एक झींना सा कपड़ा टंगा हुआ है। कपड़े के ऊपर इसी नाटक की कुछ लाइने लिखी हुई हैं। जीत गाने के बाद एक आलाप लेती है.. और आलाप के अंत में कहती है...)
जीत- कवि!
कवि- कविता? 
हार- क्या है? 
कवि- तुम नहीं... मुझे लगा कि मेरी नई कविता आ गई है। 
हार- तुमने नई कविता लिख ली?
कवि- नई कविता!!!... हम्म..  
(कवि अपने लिखे पन्नो को उठाकर पूछता है..)
कवि- ये देखो? 

(हार के हाथों में अलग से पन्ने हैं... वो उन्हें देखकर जवाब देती है..। और बाहर आकर बैठ जाती है।)

हार- न 

(कवि दूसरा पन्ना निकालकर देता है, हार उस पन्ने को फेंककर दूसरा हाथ में लेती है।) 

हार- न, न..

(वो अगला पन्ना हवा में उछालता है।) 

हार- ये तो बिलकुल भी नहीं। 

(कवि अगला पन्ना देता है।) 

कवि- ये लो.. ये पढ़ो 

हार-  बकवास 

कवि- अरे पूरा तो पढ़ो  

हार- डबल बकवास 

कवि- फिर तो बस ये ही है.. .. जब खाना खाने के बाद, थाली में तुम उँगलियों से चित्र बनाती हो… तो उस वक्त तुम क्या सोच रही होती हो? 

हार- नहीं..  


कवि- बताओ?


हार- न 


कवि- क्यों..? 


हार- ये मेरी कविता नहीं है… मैं नहीं बताऊँगी.. ख़ुद लिखो।


कवि- मैं हार चुका हूँ… नहीं लिख पा रहा हूँ।

(कवि हारकर अपना सिर झुका देता है।) 

हार- पानी ?


कवि- न 

हार- चाय?

कवि- न 

हार- दारू? 

(दारू सुनकर वो खड़ा होता है और बाहर आता है।) 

कवि- नहीं.. क़सम खाई है, अगर कविता नहीं लिख पाया तो… No Daru. 

(हार उठती है, अपने लिए एक पेग बनाती है।) 

हार- चीयर्स। (एक सिप लेती है।) आह! आनंद.. आंनद। 

कवि- ये आनंद कौन है? 

हार- what? 

कवि- कुछ नहीं.. 


हार- इतना क्या चिढ़ रहे हो?

कवि- तुम कविताओं पर अब मुझे भरोसा नहीं रहा। 

हार- अरे अरे, मुझपे क्यों ब्लेम कर रहे हो?, तुमने ही ने कहा था कि, अब मैं कविता नहीं लिखता, वो झूठ है, खुद को धोखा देना, मैं अब बस कहानियाँ और उपन्यास लिखता हूँ। तो मैंने भी कहा कि ठीक है। 

कवि- और बस ये सुनकर तुम चली गई। 


हार- कहाँ चली गई..?

कवि- उस आनंद के पास.. 


हार- अरे कौन आनंद? 


कवि- मैंने पढ़ी हैं... सारे यंग लोगों की नई कविताएँ, वो इतनी मेरे जैसी थीं कि मुझे तुम्हारी उपस्थिति उनके बिस्तरों में साफ दिखाई दे रही थी... छी.. 

हार- छी..  
कवि- छी.. 
हार- छी.. 

कवि- छी क्या? सही है,  मैं नहीं लिख पा रहा था तो ठीक है तुम चली गई आनंद को आनंद देने।

हार- मैं हमेशा सोचती हूँ कि कवि इससे नीचे तो नहीं गिर सकता पर तुम मुझे हमेशा सरप्राइज कर देते हो। 

कवि- जब इतनी ही तकलीफ है तो क्यों छोड़कर नहीं चली गई तुम, उसकी तरह


हार- “मैं इस.. बहुत बड़ी दुनियाँ में.. 

बस एक छोटी सी कविता होना चाहती हूँ..

इस थमें हुए तालाब के किनारे पड़े पत्थरों में 

एक छोटे से कंकर सी कविता।“ (अपने पास से आपनी कविता निकालती है।)

इसे पूरी लिख दो... मैं चली जाऊँगी.. 
कवि- मैं इस तरह की कविताएँ अब नहीं लिखता..  

हार- किस तरीके की?

कवि- ये जो… जय जवान जय किसान... क्रांति वाली कविता.. 

हार- ये ही आज की कविता है.. अभी की ..  जिसकी ज़रूरत है? 


कवि- कविताओं से कोई क्रांति नहीं होती। 


हार- क्रांति न सही..  पर जब क्रांति हो रही होगी तो ये कविताएँ ही मदद करेंगी। 

कवि- तो जाओ अपने उन्हीं जवान कवियों के पास जो ये लिख रहे हैं… आनंद से.. 

हार- पिछली बार जब मैं जा रही थी तो कैसे रोने लगे थे.... (हार चुटकी बजाती है.. एक स्पाट आता है। कवि चुटकी बजाता है.. और स्पाट चला जाता है। हार फिर चुटकी बजाती है और लाईको घूरते हुए रोना शुरु करती है...। कवि चुटकी बजाता रहता है पर लाइन नहीं जाती)  मैं कवि हूँ... तुम कैसे मुझे छोड़कर जा सकती हो.. help me... help meeeee.. please. Please.. मैं पैर पड़ता हूँ.. 

कवि- ठीक है.. ठीक है…. मैं समझ गया। ये हार जीवन में पीछा ही नहीं छोड़ती है..

हार- क्या कहा? 


कवि-  Sorry 

(कविता नाराज होकर बैठ जाती है... कवि उसे मनाने जाता है... sorry कहने को होता है पर तभी उसे टेबल पर एक अधूरी कविता दिखती है.. वो कविता उठाता है और हार को छोड़कर भीतर चला जाता है।) 

हार- क्या कोई कविता, कभी अपना कवि चुन सकती है? हाँ… कविताओं को भी अधिकार होना चाहिए कि उन्हें कौन लिखेगा। कविता लिखे जाने के बहुत पहले.. ख़याल में तो रहती है न? तो वो किसके ख़याल में आएगी.. ये अधिकार तो कविता का होना चाहिए?

कवि- तो तुमने इस दुनियाँ के सारे महान कवियों में… मुझे चुना है? 

हार- हर पुरुष इसी मुग़ालते में अपना जीवन गुजार देता है। 


(कवि को एक कविता मिलती है.. वो उसे लेकर हार के पास आता है।) 

कवि- आह.. ये सुनो… ताज़ी कविता, तुम्हारे लिए लिखी है.. 

‘मुझे कविता का बस ‘क’ पसंद है.. 

पूरी कविता नहीं। 

‘क’ से… बात कहीं भी जा सकती है,

‘क’ से कहानी हो सकती है, 

कृत्रिम, कला, कामना, करुणा,  

कुछ भी हो सकता है… 

पर जीवन में ‘क’ से आता है

क्रूर (हार की तरफ इशारा करता है) 
कोमल (खुद की तरफ इशारा करता है।) 
कट्टर (हार की तरफ इशारा करता है) 

कमज़ोर (खुद की तरफ इशारा करता है) 

और कविता इसी क्रूरता और कट्टरता की बली चढ़ जाती है।’   

हार- सुनो… ये भेज दो और अपने पब्लिशर से कह दो कि नहीं हो पा रहा मुझसे.. मैं अब कवि नहीं रहा।

कवि- मैं कवि हूँ... हार नहीं मानूँगा। 


हार- जिस तरीके की कविताएँ आजकल तुम लिख रहे हो उससे लगता तो नहीं कि तुम कवि हो.... 

कवि- अच्छा! ... जब खाना खाने के बाद, तुम थाली में अपनी उँगलियों से चित्र बनाती हो.. 

तो क्या सोच रही होती हो? बता दो… please 

हार-  “मैं इस.. बहुत बड़ी दुनियाँ में.. 

बस एक छोटी सी कविता होना चाहती हूँ.. (जेब से अपनी कविता निकालती है।)

इस थमें हुए तालाब के किनारे पड़े पत्थरों में 

एक छोटे से कंकर सी कविता।“ 

इसे लिख दो न.. please. 
कवि- ठीक है लिख दूँगा.. पर तुम लिखते ही चली जाओगी। 
हार-
  तो तुम जानबूझकर इसे पूरा नहीं कर रहे हो? 


कवि-  तुम चली गई तो मैं यहाँ अकेला क्या करुँगा..? मैं पागल हो जाऊँगा। तुम चाहती हो मैं पगला जाऊँ?
ओ तुम चाहती हो मैं पागल हो जाऊँ!!!

हार- नहीं.. 
कवि- तो वापस अंदर रखो ये कविता... 
(वो कविता वापस रख देती है।)  

कवि- और वैसे भी मैं हारी हुई क्रांति वाली घटिया कविताएँ नहीं लिखना चाहता.. 

हार- मैं तुम्हें एक बार न.….. (वो गुस्सा होना चाहती है… कवि भागकर अपनी जगह पर वापस जाता है। कवि बुदबुदाता है...) 
कवि-  जब खाना खाने के बाद... थाली में.. तुम ..
Think. feel .. feel.. 

हार- अब ऐसी कविता लिखना तुम्हारे बस में नहीं है। 

कवि- क्यों?


हार- क्योंकि तुम्हारे अंदर अब वो नहीं रह गया है... वो

कवि- वो क्या? 


हार -प्रेम…. प्रेम नहीं रहा तुम्हारे पास।


कवि- अरे कितना प्रेम है। क्या बोल रही हो? 

हार- तुम्हारे भीतर जितना प्रेम था वो उसके साथ चला गया। तुमने देखा है न उसके जाने के बाद तुम ऐसा कुछ भी नहीं लिख पाए। 

कवि- ऐसा नहीं है। 

हार- बता दो.. एक भी अच्छी कविता तुमने लिखी हो? 
(कवि जमीन पर पड़े हुए पन्ने बीनता है... और एक एक करके हार को पकड़ाता जाता है।) 

कवि- ये देखो.
हार- छी
कवि- ये
हार- yaak 
कवि- ये.. इसमें तो दिल भी बना है.. 
हार- इसे तुम अच्छी कविता कहते हो?  
(हार कविता पढ़ती है और उसकी आँखे फटी की फटी रह जाती है।) 

कवि- मैं असल में... अच्छी कविताएँ लिखना ही नहीं चाहता हूँ, अच्छी कविताएँ मुझे बोर करती हैं.. 


हार- तो क्या लिखना चाहते हो? ये?


कवि- हाँ ये... गज़ब की कविता लिखना चाहता हूँ।


हार- ऐसी गजब की कविता लिखकर, उसे बताना चहते हो कि तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ा है उसके जाने का.. कि तुम अभी भी सही जी रहो हो, बढिया लिख रहे हो... 

कवि- हाँ... और बढिया नहीं... गजब जी रहा हूँ... गजब लिख रहा हूँ।  

हार- (हार हाथ में रखा हुआ पन्ना पढ़ती है) 

दुखों का एक पहाड़ हूँ, रोना चाहता हूँ,

बहुत थक चुका हूँ, अब मैं सोना चाहता हूँ। 

कवि- छी.. ये लाइन किसकी है?
हार- 
ये है तुम्हारी गज़ब की कविता?
कवि- नहीं.. दिखाओ.. ये मेरी नहीं है.. ये मेरे दोस्त ने लिखी है.. सच में..  दिखाओ?
हार- ये एक थोड़ी हैं.. और भी हैं..  ये देखो..  ‘
दर्दो गम के साये में कहता हूँ- खुश हूँ, और खुशी में भी दर्द ढ़ूढ़ता हूँ।‘

(कवि हारकर बैठ जाता है।)

कवि- तुम मुझसे इतना चिढ़ती क्यों हो?
हार- तुम कवि लोगों की प्राब्लम है कि… 
कवि- मेरी कोई प्राब्लम नहीं है... बता चुका हूँ मैं.. 
हार- okay.. okay.. दिक्कत? 
कवि- हाँ दिक्कत चलेगा.. 



हार-  तुम कवि लोगों की दिक्कत है कि.. तुम लोग कभी उन बेचारी हारी हुई कविताओं के बारे में नहीं सोचते जिन्हें अपने खराब कवियों को झेलना पड़ता है।
कवि- मैं खराब हो गया अब... ठीक है.. खराब ही हूँ.. अब लिख नहीं पा रहा हूँ तो .. सही है.. खराब ही हूँ...
हार- ये क्या हुआ? 

कवि- तुम्हीं एक कविता हो जो मेरे पास बची रह गई है.. इसलिए.. बेवफा कविता..  अरे मत बनो इतनी क्रूर,  एक वाक्य की ही तो गुहार कर रहा हूँ... बता दो.. अरे तरस खाकर ही बता दो.. प्लीज़... 

हार- ठीक है एक शर्त पर

कवि- जो तुम कहो


हार- क्या हाल बना रखा है रखा है इस घर का और खुद का.. 


कवि- एक हारा हुआ कवि ऐसे ही तो रहता है। 

हार- हारा हुआ कवि नहा तो सकता है न? आखरी बार कब नहाए थे...? 
कवि- वो पिछले.. बुधवार.. नहीं.. शुक्रवार.. नहीं.... 
हार- रहने दो.. चाय बनाते हो और पीना भूल जाते हो
, सूरज जब अस्त हो रहा होता है तुम्हे लगता है सुबह हो गई, सिगरेट तुम उल्टी जला लेते हो, अखबार की नीरस ख़बरो में तुम्हें कविता दिखती है, दाल में शक्कर डाल रहे हो और चाय में नमक, कोई अच्छा चुटकुला सुनाता है तो तुम रोने लगते हो?

कवि- Thank you… thank you.. 

हार- क्या Thank you? 

कवि- चाय बनाते हो.. और पीना भूल जाते हो.. सूरज जब ...क्या था? क्या था? क्या कविता है ये.. 

हार- अगर तुम इसे कविता बोलोगे तो मैं आत्महत्या कर लूँगी। 

(हार कुर्सी पर चढ़ जाती है.. कवि चुप हो जाता है..)

कवि- रहने दो.. रहने दो... मरने की जरूरत नहीं है.. मुझे पता चल गया ...  जब खाना खाने के बाद, तुम थाली में अपनी उंगलियों से चित्र बनाती हो.. तो तुम मेरे बारे में सोच रही होती हो…..  हाँ और किसके बारे में सोचोगी.. या आनंद? नहीं.. मेरे बारे में सोचती हो.. 

हार- तुम न .. कविता का ‘क’ भी नहीं लिख पाओगे..
कवि- लिख रहा हूँ मैं.. 

हार-  अरे नहीं.. कैसे होगा.. वो अभी भी तुम्हारे दिमाग में है न… 
कवि- कौन?
हार- वो... 
कवि-
 अरे... क्या बोल रही हो.... न.. न... मैं तो कब का भूल चुका हूँ उसे... Ex है वो मेरी।

हार-  अरे… नहीं.... नहीं होगा तुमसे..  ये दुख बहुत बुरा है...

कवि- कोई दुख-पुक नहीं है तुम्हारी कसम।


हार- मेरी कसम मत खाओ... वैसे ही ऐसी कविताएँ लिखकर आधा तो मार ही दिया है।

कवि- मैं सच कह रहा हूँ...  देखो.. देखो... मुस्कुराहट देखो मेरी... दिख रहा है रत्ती भर भी दुख... Ex है.. याद भी नहीं है वो कैसे दिखती थी अब तो... वो past है..  and past is dead. 

हार- हाथ दिखाओ.. 

कवि- क्या? तुम्हें हाथ देखना आता है? 


हार- कविता हूँ... आत्मा देख लेती हूँ.. ये तो हाथ है.... दिखाओ...

(गाती है)  

तुम्हारे हाथों की रेखाएँ देखो 

उसके होने की गवाही देती हैं।

 देखो तुम्हारे माथे की रेखा

उसके बारे मे सोचते ही 

अनशन पर बैठी है।

 देखो ये जीवन रेखा

उसके घर की तरफ़ मुड़ी हुई है।

 तुम्हारी हृदय रेखा

उसके रहते तो ज़िंदा हैं पर 

उसके जाते ही धड़कना बंद कर देती है।

 बाक़ी जो इधर-उधर बिखरी ये रेखाएँ हैं

उनमें कभी…कभी उसकी आँखें 

कभी तिरछी नाक

और कभी उसके घुंघराले बाल नजर आते है

 देखो…देखो… देखो तुम्हारे हाथों 

की रेखाएँ तुम्हारा भविष्य नहीं बतातीं

वो उसी का चेहरा बनाती हैं।

 ओह! भाग्य रेखा

 कवि- वो तो हैना?

 हार- है पर उसे…..उसे पाने की भाग्य-रेखा

तुम्हारे हाथों में नहीं है।

सॉरी 

(हार गुनगुनाती रहती है.. कवि उठकर जाता है अपनी लिखने की जगह पर जाने लगता है।) 

हार- अरे इसे लिख दो… मेरे हाथों की रेखाएँ... ये तो सही कविता है.. तुम्हारा पब्लिशर ख़ुश हो जाएगा। 

कवि-  नहीं।


हार- क्यों? सच है? गजब भी है...  और क्या चाहिए


कवि- अपनी ही बेइज़्ज़ती करवाने वाली कविता मैं नहीं लिखता.. अगर वो पढ़ेगी तो क्या सोचेगी कि... मैं उसकी याद में यहाँ आँसू बहा रहा हूँ। 

हार- अब आँसू तो बहा रहे हो.. इसमें ग़लत क्या है? 

कवि- एक काम करो, तुम जाओ.. उन.. नए जवान कवियों के पास, उन्हीं के बिस्तर गर्म करो जाकर... 

हार- you are cheap and sick. जा रही हूँ मैं। 

कवि- Thank you. 

हार- मैं अब आऊँगी नहीं.. चाहे कुछ हो जाए..


कवि- मेहरबानी होगी। मुझे लगने लगा है कि मैं तुम्हारी वजह से ही नई कविता नहीं लिख पा रहा हूँ.. 

हार- what! ठीक है.. ये मेरा Final bye.. 
कवि- bye.

(हार वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाती है। तभी जीत गाती है और एक छोटी धुन के अंत में कहती है..।) 

जीत- कवि!!!

कवि-  कविता.... (कवि पुकारता है।)
हार- हाट!!! 
कवि- गोदो... गोदो.. 
(कवि को हंसी आ जाती है.. उसे लगता है कि उसकी नई कविता उसके दिमाग में बज रही है।) 

कवि- एक उम्र में मुझे लगता था कि मैं ही गोदो हूँ। मैं बस वहाँ नहीं पहुँच पा रहा हूँ जहाँ मेरा इंतज़ार हो रहा है। लगता था बस एक बार वहाँ पहुँच जाऊँ, जहाँ पहुँचते ही लोग मुझसे कहें कि.. अरे कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे। पर अब लगता है कि इंतज़ार तो मैं कर रहा हूँ और गोदो तो कोई और है। वो कभी भी आ सकता है.. इस इंतज़ार में पूरी उम्र कट गई। 

(तभी जीत अपनी जगह से, कवि की तरह, बोलना शुरु करती है।) 

जीत- अब लगता है कि वो शायद आया था.. पर मैं उसे पहचान ही नहीं पाया.. या शायद किसी ने गोदो नाम से मुझे पुकारा था.. पर मैं पलटना ही भूल गया।
कवि- ओ भाईसाब

हार- ये क्या बकवास है? 

कवि- सुना न... तुमने भी सुना न..।

हार- क्या था ये? 

कवि-  ये उसकी आवाज़ थी.. ये मेरी नई कविता.. यहीं कहीं है वो.. सुनो.. अब तुम बस चुप रहना.. मैं उसे लिख सकता हूँ.. वो आस पास ही.. yes .. yes.. yes... 

(कवि नए पन्ने पर लिखने की कोशिश करता है।) 

हार- एक कवि ऐसे ही पागल हो जाता है। 

(तभी जीत एक अंगड़ाई लेकर पहली बार अपनी जगह से उठती है और बाहर आती है। वो कवि का कमरा देखती है.. बिखरी हुई कविताएँ उठाकर पढ़ने लगती  है। हार, दबे पाओं बाहर आती है.. और देखती है कि कि कमरे में कोई घूम रहा है।) 

हार -शशश…
जीत- आअअअ.... ( जीत डर जाती है। हार भी डर के मारे वापस अपनी जगह पर भागती है फिर रुक जाती है।) 
हार- कौन हो तुम?

जीत- (डरी हुई) तुम कौन हो?


हार - मैं…. मेरी छोड़ो.. तुम कौन हो? 


जीत- दिखता नहीं है क्या? मैं कविता हूँ। 


हार -ओ….what!  रिप्लेसमेंट। 


जीत- अरे अरे.... तुम भी कविता हो? 

हार- हाँ.. दिखता नहीं क्या? 
(जीत न में सिर हिलाती है।) 
हार- मैं हूँ वो कविता जो क्रांति लाती है.. जिससे देश बदलता है.. लोग बदलते हैं
… 

जीत- वो सब तो ठीक है… पर ये क्या हालत कर ली अपनी?

हार- जैसी देश की हालत है… वैसी मेरी हालत है.. 

जीत- तभी.. 

हार- तभी.. क्या? 

(हार भागकर आईने के पास जाकर अपनी शकल देखती है..)

हार- ओ! हमारे देश की इतनी वाट लग गई है!

(जीत फिर गुनगुनाना शुरु करती है और पन्नों को उठाकर पढ़ने लगती है। हार, आइने के सामने, अपने बालों को, अपने कपड़ों को ठीक कर रही होती है।)  
जीत- कितनी सारी कविताएँ है.... 

हार- ये सब पुरानी कविताएँ हैं.. उससे कुछ भी नया लिखते नहीं बन रहा है आजकल।  

(जीत फिर गुनगुनाती है।) 
जीत- वाह.. क्या बात है.. (कविता पढ़ते हुए) 

हार- मैं इन कवियों को अच्छे से जानती हूँ... मेरी मानो...मत फँसो इसके चक्कर में..  निकल लो यहाँ से..  

जीत- तुम फँसी हुई हो न इसके चक्कर में.... 

हार-  अरे अब क्या बताऊँ अपना दुख बहन... हुआ क्या न.. कि ये पहले थोड़ा क्यूट टाइप था… 

जीत- शशशशशशश 


हार- Don’t Shush me. 


जीत- ओ.. सेंसटिव old क्रांति poem. 


हार-  मैं पुरानी हूँ.. तो तुम्हारा कवि कौन सा नया है? 


जीत- पर नई कविता तो लिखना चाहता है न…

हार- पहले देख तो लो वो आजकल क्या लिख रहा है.. दुख:, पीडा, जलन, तकलीफ़, बदला, धोखा, selfpetty,.. 

जीत- मैं तो प्रेम कविता हूँ। 


हार- awwww... एक और cute प्रेम कविता…  एकदम गलत जगह आ गई हो बहन। 


जीत- तुम झूठ बोल रही हो.. 


हार-  हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या.. (हार चुटकी बजाती है और उसका स्पाट आता है... वो उसमें जाकर एक दुखी कवि का अभिनय करती है।)   ये सुनो…

कहीं रख दिया जाऊँ तो पड़ा रहूँ,


किसी और के छू लेने तक।


कुछ कहने की हरकत न हो,


मेरे सब कुछ सह लेने तक।


तुम आओ तो घर कर जाओ,



वरना पड़े रहने दो मुझे मेरे न होने तक।


हर कोशिश की थकान से ऊब है,


मैं डूब जाऊँ
और डूबा ही रहूँ... नदी होने तक।

जीत-  क्या हो गया है इसे?

हार- Bad break up…

जीत - ये ब्रेक वाले कवियों से तो मैं भागती हूँ। 

हार- bad break up कभी तो लोगों को लेखक बना देता हैं और कभी अच्छे लेखक को खराब कर देता है। 

कवि- अब कोई काम नहीं है.. बस जाम है

शहर की आवाज़े हैं, और दिल नाकाम है। 

जीत- छी  


हार- मैं तो शुरु से ही कह रही थी... मेरी मानो समय है निकल लो... तुरंत। 

जीत- हैं… जाऊँ क्या?
हार- हाँ मतलब.. जाना तो चाहिए.. देख लो.. 
(जीत चली जाती है। हार को विश्वास नहीं होता कि उसने सच में नई कविता को भगा दिया। वो खुशी खुशी अपनी जगह पर चली जाती है। जीत.. की बेक-स्टेज से गुनगुनाने की आवाज आती है। कवि बाहर निकलता है... पर उसे कोई नहीं दिखता। वो दूर एक कोने में देखता है.. मानो अपनी Ex को देख रहा है.. मुस्कुराता है और उससे बात करता है।) 

कवि- मैं अब वैसा नहीं रह गया हूँ, जैसा तुमने मुझे छोड़ा था। मैं वहीं हूँ, पर उस पगडंडी पर अब डामर की सड़क बिछ गई है। आस-पास का सारा हरा स्याह हो गया है। लगातार गिरने का डर बना रहता है, सो मेरी जड़ें निकल आई हैं। पर जहाँ हम मिला करते थे, वे कुछ जगहें अब भी हरी हैं। तेज़ धूप में जब भी उन छायाओं से गुज़रता हूँ तो हिचकी आ जाती है। 

क्या तुम कभी प्राग गई हो? अगर जाओ तो वहाँ काफ़्का की क़ब्र पर ज़रूर जाना और वहाँ सुनना उस ख़ामोशी को जो बहुत थक कर चूर हो जाने से, गहरी नींद के बाद बिस्तर की सलवटों में रह जाती है। वहाँ सपने नहीं हैं, वहाँ बस एक ठंडी चुप है। तुम उस क़ब्र पर कुछ छोड़ आना। 

सुना है छूटी हुई चीज़ों की जड़ें उग आती हैं!

(कवि की बात सुनते हुए…. जीत वापस आ जाती है..)

जीत- सुना है छूटी हुई चीज़ों की जड़ें उग आती हैं!

कवि- गोदो.... कविता... तुम हो मेरी नई कविता....?

जीत- हाँ, तुम्हारे सामने ही तो हूँ।


कवि- तुम कितनी सुंदर हो। 


जीत- अरे, चलो। 

हार- इसकी बातों में मत आना, मुझसे भी यही कहा था।

जीत- what!


कवि- तुम्हें देखकर जलन हो रही है उसे.. सुनो तुम जाओ 


हार- अरे ऐसे कैसे... जहाँ कवि वहाँ कविता।


कवी- मेरे पास है कविता।

जीत- (हार से) हटो बहन..


हार- (कवि से) ये!!!!  


जीत- (हार से) excuse me. 

हार- (जीत से) you are good... प्राब्लम इनमें है। 

कवि- (जीत से) मैं पहले भी कह चुका हूँ.. मुझमें कोई प्राब्लम नहीं है। 

हार- ये एक कवि कह रहा है... वाह!

जीत- (कवि से) इसे छोड़ो तुम वो बोलो न जो कह रहे थे, वो मैं कितनी सुंदर हूँ वाली बात, 

कवि- (हार से) देखो.. इसके तो घुँघराले बाल हैं... इसकी तो नाक भी तिरछी है... ये तो.. 

हार- ये तुम्हारी ex नहीं है।  

कवि- ये कितनी उसके जैसी दिखती है न.... ये पूरी कर सकती है मेरी कविता... 

(कवि सीधा जीत के पास जाता है।) 
कवि- जब खाना खाने के बाद तुम थाली में अपनी उँगलियों से चित्र बनाती हो.. तो क्या सोच रही होती हो?
(जीत.. चकित होकर कवि को देखती रहती है।... कवि हारकर वापिस  जाने लगता है.. हार अपनी हंसी रोक रही होती है। तभी जीत गाने लगती है।)  

हार-  जब भी मैं खाना खाने के बाद में

थाली में अपनी उँगलियों से चित्र बनाती थी.  

कवि- तो उस वक़्त तुम किसके बारे में सोच रही होती थीं? 

हार- मैं उस समय बादलों के बारे में सोचती हूँ

जीत, हार- उस समय एक चुप्प रहती है चुप्प…बहुत लंबी चुप्प।
(कवि लिखने बैठ जाता है।) 

हार- क्या तुम्हें पता है तुम क्या बना रही हो?

पर मैं उन बादलों को देख रही हूँ

जिन्हें कभी तुम घना करती हो

और कभी एक भी बादल तुम्हारी थाली में नहीं होता फिर…
जीत- फिर

कवि- फिर.. तुम एक गहरी साँस भीतर लेती हो 

और उसे छोड़ देती हो

जीत- ‘चुप ही रहूँ’

      ‘या कुछ कह दूँ’

 हार,जीत- जैसे हाथी और ख़रगोश

बादलों में बनते-बिगड़ते रहते हैं। 

हार- तभी तुम बादलों को अकेला छोड़कर

थाली के किनारों को ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने लगती हो, 

कवि- जैसे (कवि अचानक संजीदा हो जाता है।) 

हार- जैसे.. जो बादल अभी-अभी तुमने बनाए थे 

वे बस बरसने ही वाले हैं।

तभी एक बूँद थाली में आकर गिरती है

और सारे के सारे बादल… भीग जाते हैं। 
(कवि जो कविता लिख रहा है उसे फाड़ देता है।) 
हार- ये क्या किया कविता क्यों फाड़ दी?
कवि- ये नहीं लिखना था.. ये ठीक नहीं है। 
हार- क्यों? ओ... मैं समझ गई... ये कविता तुम्हें तब सूझ रही थी जब वो तुम्हें छोड़कर जा रही थी। 
कवि- नहीं.. तुम नहीं समझोगी.. कुछ कविताएँ नहीं लिखी जानी चाहिए। 
हार- बहाने मत बनाओ... मैं थी वहाँ... तुम अंत में हर चीज़ का इस्तेमाल ही कर रहे होते हो न? 

जीत- कितनी अच्छी कविता है ये... 


हार- क्या? ये तुम्हारी नहीं है.. वैसे भी इसने तो अब फाड़ दी वो कविता।  


जीत- मुझे भी लिख दो.... ऐसा ही कुछ


हार- क्या अच्छा लगा तुम्हें?


जीत- प्रेम… ये कितनी अच्छी प्रेम की कविता है।


हार- ये प्रेम नहीं है। ये तो सीधी सीधी पीड़ा......ओह!  नई कविताओं की यही समस्या है इन्हें प्रेम और दुख में अंतर ही समझ नहीं आता। 

जीत- आता है मुझे सब समझ में... तुम रहने दो, (कवि से) सुनो न, चलो ऐसी सरल सीधा प्रेम कविता लिख दो मेरे लिए।  
कवि- नहीं.. ये मुझे नहीं लिखना था..  गलती हो गई?
हार- ये बहाने बनाता रहेगा.. इससे नहीं होगा। 

जीत- क्यों नहीं होगा.... प्लीज़ लिख दो.. 
हार-  ये प्रेम जैसी कविता लिखता है.. ठीक प्रेम नहीं.. क्योंकि इसे लगता है कि, इसका प्रेम तो छूटा पड़ा है किसी के इंतज़ार में है.. कहीं और..। 

जीत- हो तो गया इंतज़ार खत्म.. मैं आ गई हूँ.. घुँघराले बाल.. तिरछी नाक.. लिख दो और जाने दो मुझे कवि- हाँ... पर क्या है न.. मैं..  
जीत- मैं इसकी तरह यहाँ सड़ना नहीं चाहती।


हार- ओए..ओए.. क्या कहा..

जीत- sorry… पर्सनली मत लो।

हार- ये पर्सनल प्रहार नहीं है तो क्या है? और तुम कुछ नहीं बोल रहे हो?
जीत- अरे बोला न Sorry 
हार- पता है मैं कौन हूँ.. मैं हार हूँ..हार!  और ये कौन है? कौन है ये?
जीत- तुम हार हो तो मैं... मैं... जीत हूँ।
कवि- हाँ जीत.. ये जीत है।
हार- ये जीत कैसे हो गई? 
जीत- अरे तुम हार हो तो मैं जीत हो गई।
हार- नहीं नहीं... ये गलत है। 


कवि- अरे चुप चुप हो जाओ.. ये फालतू प्रेम और क्रांतिया छोडो ....हम तीनों मिलकर कुछ निजी लिखते हैं.. कांप्लेक्स, कुछ पागलपन.. Ocean Vuong, Tony Hoagland, Richard Siken जैसा कुछ

जीत- ये लोग कौन है? 

हार- जैसा ये होना चाहता है।

जीत- अरे मुझे.. रमेश राकेश दिनेश जैसी कविताएँ भी चलेगीं.. लिखो और जाने दो।
कवि- ये क्या है.... कौन है ये रमेश राकेश दिनेश... 
हार- ये इंस्टेंट कविता है.. आजकल लोगों के पास वक्त नहीं है… पट-पट लिखो.. 

जीत- और फ़टाक से पोस्ट कर दो।

कवि- पब्लिश.. पब्लिश करते हैं, ये पोस्ट क्या होता है पगली।  
जीत- पोस्ट ही करते हैं.. ये पब्लिश क्या है पगले?

कवि- तो क्या लेटर लिखकर कहीं .. लेटरबाक्स में पोस्ट कर दूँ? 

जीत- तुम तो सच में बहुत पुराने हो…लेटरबाक्स! सोशल मीडिया पर पोस्ट करो... मैं एक आइडिया दूँ। कवि- नहीं 
हार- प्लीज़.. i am loving this..  

जीत- (कवि से) तुम्हारे पास फ़ोन है?

कवि-  मैं एक कवि हूँ.. फोन नहीं रखता। 
हार- हाँ है.. 
(हार तुरंत फ़ोन लेकर आती है)
कवि- बेवफा कविता।
(हार.. जीत को फोन पकड़ाती है। जीत एक बटन दबाकर फोन हार को पकड़ा देती है।)  


जीत- तो AI को बोलो… इसकी स्टाइल में एक कविता लिख दे.. बोलो.. 

हार- ऐ AI.. एक हारे हुए.. धोखा खाए..क्रूर.. कट्टर.. रोंदड़ू कवि की स्टाइल में एक प्रेम कविता लिख दो… 

कवि- कोई भी कंप्यूटर एक कवि की तरह नहीं लिख सकता

हार- आ गई कविता.. 
कवि- इतनी जल्दी लिख भी दी। 
जीत- पढ़ो. 

हार – आँसू मेरे पी जाओ,
उधड़ गया हूँ... सी जाओ
पीठ पीछे कवि के, क्यों किया वार?
सुबकता हुआ आया वापस,
गोरेगाँव TO खार!!! 
कवि- yaak 
हार- Fuaaak 
(हार हंसने लगती है।)
कवि- अरे ये क्या है.. कुछ भी.. 


जीत- ये आजकल कवियों की अब उतनी importance नहीं है।

कवि- क्या मान लूँ?

जीत- यही कि.. कवियों की अब कोई औक़ात नहीं है… 

हार- मैं भी अपने लिए लिखवा लेती हूँ.. रुको.. ए Ai Ai Ai… 
(कवि फ़ोन छीन लेता है।) 
कवि- ये कविता दस मिनिट से ज्यादा टिकेगी? 
जीत- दस मिनिट से ज्यादा टिकना किसे है.. वक्त किसके पास है
? 
कवि- सच में.. (हार से) लोगों के पास कविताएँ सुनने का वक्त नहीं है? और तुम दोनों को ये बात ठीक लगती है..? अरे...  कविता एक जीती जागती जिंदा चीज़ है.. वो लोगों की जिंदगी में साँस भरती है। कविता की सुंदरता उसकी कमियों में है.. उसकी संभावना में है
… कविता प्यार है.. अच्छी कविता सुनते ही लगता है कि ये क्रूर दुनिया.. अब जीने योग्य है। ऐसे तो मैं लिख सकता हूँ तुम्हारी कविता...  दस मिनिट बाद किसी को याद ही नहीं रहेगा कि तुम एक कविता थीं। तुम ऐसी कविता होना चाहती हो?
हार- नहीं। 
कवि- तो.. 
हार-  मैं तो बस चाहती हूँ कि जैसा तुम बोलते हो वैसा लिखो... जैसे गोदो वाली बात.. छूटे हुए लोगों की जड़े उग जाती है.. वाली बात..  जब तुम बोलते हो तो कविता सुनाई देती है.. पर लिखने बैठते हो तो पता नहीं क्या हो जाता 
कवि- बोलना सरल है.. लिखना कठिन.. तो क्या.. जो बोलता हूँ वो लिख दूँ.. ?
जीत- हाँ
हार- हाँ
कवि- अरे.. ऐसे थोड़ी कविता लिखाती है.. कविता होती है.. कठिन.. कांप्लेक्स, एकदम जटिल.. . जैसे 
Ocean Vuong, Tony ......  
जीत- कविता किसी के जैसी कैसे हो सकती है? 
हार- हाँ कविता किसी के जैसी नहीं होती
जीत- हाँ.. वो ही तो कहा न मैंने भी
हार- हाँ वो ही तो मैं भी कह रही हूँ।
जीत- वैसे भी.. मेरे जैसी कोई कविता नहीं है। 
हार- हाँ... और मैं भी किसी के जैसी नहीं होना चाहती हूँ.. मैं आज की कविता हूँ.. 
जीत- मैं प्रेम हूँ।
हार- मैं युवाओं की कविता हूँ.. जो सड़कों पर निकले हुए हैं.. जो थक गए हैं..हिंदू या मुस्लमान होकर.. वो बस अच्छे इंसान होना चाहते हैं। और उन्हें सरल सीधी कविताओं की जरूरत है। 
जीत- और इस दुनिया में चल रही सारी हिंसा के खिलाफ.. मेरा प्रेम कविता होना मेरा प्रोटेस्ट है। 
हार- अरे.. प्रोटेस्ट मेरा है।
जीत- मेरा भी प्रोटेस्ट है.. 
हार-  ओ..  Cute प्रोटेस्ट.. 
जीत- मैं.. मैं... मैं पूरी शिद्दत से इस दुनिया में बस प्रेम फैलाना चाहती हूँ। 
हार- प्रेम क्रांति
जीत- क्रांति क्रांति
(दोनों चुप हो जाते हैं।)
कवि- यहाँ कवि कौन? just asking.. कौन है कवि?
हार- तुम हो? 
जीत- just asking.. 
कवि- हाँ
जीत- कवि कहीं का... 
हार- लिख नहीं रहे हो तो कहे के कवि!
जीत- नहीं..  नहीं, तुम लिखो मत.. वो सही कह रही है... बोल दो..  मैं लिख लूँगी.. और मेरे जाने के बाद.. फिर तुम आपस में अपना
… सुलटा लेना.. क्या बोलते हो?
कवि- मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी कोई मदद.. मैं समझ गया मैं क्यों नहीं लिख पा रहा हूँ.... मुझे अभी कविता नहीं.. दारू चाहिए..

(कवि जाता है और दारू की बोतल उठा लेता है। हार और जीत भागकर उसके सामने खड़ी हो जाती हैं।) 
हार- दारू की बोतल दो... 
जीत- पीना नहीं.. तुम पीने लगोगा तो कविता कौन लिखेगा.. तुम मुझे पहले मेरी कविता दो.. 
कवि- अभी नहीं है कविता मेरे पास.. और दारू नहीं दूँगा।
जीत- कोई तो होगी.. पुरानी पड़ी हुई तुम्हारे पास.. मैं मान लूँगी कि ये तुमने मेरे लिए लिखी है.. 
हार- दारू नहीं.. दारू दो.. 


कवि- ऐसे नहीं होता है… मुझे तुम्हें लिखना पड़ेगा। दारू नहीं दूँगा..  

जीत- मैं नहीं जानती.. कुछ होगा तुम्हारे पास..

कवि- अरे नहीं है..

जीत-  अपनी जेब में देखो..

हार- अरे कवि कोई जेब में कविता लिए घूमता है क्या?

जीत- होगी.. कुछ तो होगा.. दो... 
(दोनों कवि पर लपकते हैं। वो नीचे गिर जाता है। हार दारू की बोतल छीनती है... और जीत कवि की जेब से एक कविता निकाल लेती है।) 
हार- अगर कविता नहीं.. तो दारू नहीं।  
जीत- जो हमारे जैसे नहीं है.. क्या हम उन सबको मार देंगें.. तो क्या रह जाएगा..? एक ही रंग.. एक ही भाषा.. एक ही स्वाद! ... 
ये कविता नहीं है... ये क्या है?
कवि-   नहीं लिख पा रहे हैं कविता... कोई नहीं लिख पा रहा है। जबकि, हम सब जानते हैं कि, इस वक्त हमें सबसे ज्यादा ज़रूरत कविताओं की ही है..  पर क्या करें.. हम सब डरे हुए हैं... हम आज की कविताएँ लिख ही नहीं पा रहे हैं..  क्योंकि हमें हमारा भविष्य ठीक से दिख नहीं रहा है… 
हार- क्योंकि तुम लोग अतीत का चश्मा लगाकर, भविष्य देखने की कोशिश कर रहे हो.. क्या ख़ाक दिखेगा भविष्य.. !
कवि- हाँ.. तभी... तभी हमें हमारे देश का भविष्य किसी मुर्झाए हुए फूल की तरह हमें दिखाई देता है...  और हमें लगता है कि
, यही मुर्झाया हुआ फूल हमारे देश की आज की कविता है। क्या सारे पुराने लोग.. बस, खुद बचना चाहते हैं.. जबकि हमें तो बचाना था इस दुनिया को..  और एक बहत्तर दुनिया नए लोगों को देना था। हम क्यों लड़ते रहे.. हम क्यों नहीं बचा पाय कुछ भी? क्या हर पुरुष की अमर हो जाने की छिछली इच्छा ही इस दुनिया के अंत का कारण बनेगी? शायद इसलिए हम सबको लग रहा है कि सारा कुछ बहुत जल्दी खत्म होने को है।  
इसलिए
, मैंने, हमारी हार और जीत दोनों कविताओं को ..मंच पर एक साथ खड़ा कर दिया है.. और मैं इस नाटक में लगातार कविता, कविता चिल्ला रहा हूँ, ताकि हमारे भीतर मुरझा चुकी कविता को वापिस जगा सकूँ..  और शायद हम सारे डरे हुए लोगों के चेहेर पर पड़ा अतीत का चश्मा हटा जाए। 
हार/जीत- हम सबकी डरी हुई चुप
और हमारे वक्त का मुर्झाया हुआ समय 
उतनी ही कविताएँ अपने भीतर पाले बैठा है
जीतनी 
तड़पती, दबी कुचली गई हमारी ये... आजादी। 
हार- ये लिख दो.. 
जीत- पर ये मेरी कविता नहीं है.. 
हार- ये मेरी कविता भी नहीं है.. मैं चाहती हूँ ये जो बोलता है वो लिख दे.. 
कवि- नहीं.. 
हार- नहीं.. क्यों.. डर लगता है
कवि- नहीं... मुझे.. मुझे... 
हार- क्या चाहिए? 
कवि- दारू। 
(हार दारू लाती है और कवि को दारु देती है।)
हार- ये लो.. पीयो.. और लिखो.. 
कवि- ग्लास.. ग्लास भी दे देती। 
(जीत उससे दारू की बोतल छीन लेती है। कवि जीत के पैर पकड़ लेता है ताकि वो दारू की बोतल उससे दूर न ले जा सके। जीत आगे बढ़ती है और कवि पीछे घसिटता जाता है।)  
जीत- सुनो मेरे पास सोल्युशन है.... मैं बताऊँ?
(कवि रुक जाता है) 
हार- किसका... 
जीत- इसकी प्राब्लम का.. 
कवि-  मैंने कहा न मेरे पास कोई प्राब्लम नहीं है...
(वो फिर घसिटना शुरु करता है।)
हार- नहीं है प्राब्लम.. वाह... देखो खुद को.. नहीं है प्राब्लम। 
कवि- पर मैंने कहा न.. 
हार- चुप.... कवि को ऐसा लगता है कि कविताएँ है प्राब्लम.. पर असल में कविताओं की प्राब्लम है.. कवि.. तुम हो प्राब्लम.. अब चुप चाप सुनो जो वो कह रही है.. बोलो बहन।   
जीत-  तो ये तुम्हारी हार है.. जिसे तुम लिखना नहीं चाहते हो.. 
हार- अरे, पूरा नहीं लिखा है। 
जीत- हाँ .. वो ही... और मैं हूँ तुम्हारी जीत.. जिसे तुम लिख नहीं पा रहे हो। 
कवि- तो..  
जीत- तो इसकी आधी कविता से तुम मुझे पूरा कर दो.. सल्यूशन। 
कवि- अरे इससे अच्छा तो दारू ही दे देती.... अगर ऐसे लिख दूँगा तो वो किसी कविता होगी? तुम्हारी या इसकी... तुम लोग फिर लड़ने लगोगी। 
जीत-  फिर वो हम दोनों की कविता होगी... 


हार- हाँ. एक तीर से दो शिकार..
जीत- देखो मेरी तिरछी नाक है.. घुंघराले बाल हैं।
कवि- हाँ.... (हार से)  पर इसकी वैसी तिरछी नाक नहीं है न.. और कहाँ है इसके घुंघराले बाल?
हार- अरे यार.. ये कवि है... ये डिनायल में तो रहेगा ही। एक काम करो.. तुम दारू ही पियो.. वो ही ठीक है। 
(हार, जीत से दारू लेती है और कवि को दे देती है।)
कवि- ग्लास भी दे देती... 
(हार गिलास उठाने जाती है..  तभी जीत कहती है।) 
जीत- तुम सीधा मुझे उसके नाम से पुकारो.. नाम से पुकारोगे तो तुम्हें मुझमें वो दिखने लगेगी.. बात खतम.. तब ये लिखने लगेगा।

हार- नहीं नहीं… नाम नहीं ले पाएगा उसका। 

जीत- क्यों? 

(हार इशारे से कहती है कि.. दिल दुखता है उसका) 

जीत- अरे बेचारा.. 

कवि- कवि कभी बेचारा नहीं होता.. 

जीत- तो बताओ उसका नाम..

हार-  वो नहीं बता पाएगा..

जीत- नाम तक तो बता नहीं पा रहे हो… क्या कविता लिखोगे?

कवि- अच्छा बताता हूँ.. 

हार- Wow.. 

जीत- बताओ? 
हार-  अब तो बताना पड़ेगा
कवि – तो बताता हूँ उसमें क्या है... उसका नाम
……. 
(बहुत मुश्किलों से.. अंत में कह देता है।) सफलता है
(कवि कहते ही अपनी स्पेस में चला जाता है।)

जीत- व्हाट 

हार- Yes 
जीत- सफलता याने
हार- Success .. 

जीत- तो इसकी ex….. success है?

हार- yes 

जीत- success,  ex कैसे हो गई? (जीत कवि के पास जाकर पूछती है पर तब तक कवि अंदर जा चुका है। तो वो हार के पास वापस जाती है।)  अरे यार ये,, success,  ex कैसे हो गई?  प्लीज समझाओं मुझे.. 

हार- क्योंकि इसे ऐसा लगता है कि अगर कवि सफल है तो वह mediocre है

जीत- पर सफलता तो इसकी ही थी ना? 

हार- हाँ पर कविता सफल थी... कविता हो सकती है सफल, पर कवि नहीं। 

जीत- ओ…अच्छा.. समझी..  तो कविता Success  पाते ही  कवि को छोड़कर चली गई

हार- नहीं.. 
जीत- What.. 
हार- ये थोड़ा 
complicated है

जीत- अब क्या Complicated है?
हार- सक्सेसफुल
 हो गई… इसलिए कवि ने उसे छोड़ दिया। 

जीत- यार इससे अच्छा तो मैं open mic में चली जाती… 
(जीत हारकर कुर्सी पर बैठ जाती है।) 

हार-  दारू? (जीत से पूछती है।)
जीत- हम पी सकते हैं?
हार- कविताओं को तो हमेशा मदहोशी में ही रहना चाहिए.. ये कवि रहे होश में... 
जीत- तुम थक नहीं गई हो इंतजार करके.. 
हार- मैं गई नहीं थी कभी.. 
जीत- जैसे मैं आई भी नहीं थी कभी... 

(हार, दारू देती है। जीत पहला सिप लेकर कहती है। )
जीत- आनंद... आनंद
हार- ये आनंद कौन है?
जीत- क्या?
हार- कुछ नहीं। 
जीत- एक बात पूछूँ?
हार- हाँ।

जीत- ये कविताएँ स्त्री क्यों होती हैं..?  
हार- हाँ
… और औरतें हमेशा प्रेरणा ही क्यों दे रही हैं सबको.. नहीं देना हमें प्रेरणा किसी को.. Muse  क्यों हैं औरतें?
जीत- इसलिए मैं चाहती हूँ कि ये लिखे मुझे ... और मैं छूट जाऊँ इस दुनिया में.. 
हार-  मैं तो कभी कभी सोचती हूँ कि...काश मैं कविता नहीं.. कवि होती..


जीत- हाँ.. अगर मैं कवि होती तो मैं बहुत छोटी बातें लिखती.. 

हार- मैं हार की बातें बताती.. और तुम जीत की 
जीत- नहीं नहीं... जीत की कहानियाँ तो बहुत बोरिंग होती है... मैं साधारण इंसानों के आपसी प्रेम की बातें बताती। 
हार-  मैं वो बातें बताती.. जो सच में लोगों को चाहिए.. 

जीत-  जैसे लोगों को जनना है, मानना नहीं

हार-   उन्हें दो कान चाहिए, लगातार मार्गदर्शन देता, एक बोलता मुँह नहीं

जीत- लोग जीने के लिए पैदा हुआ है, काम करने के लिए नहीं..

हार-  लोगों को एक अच्छा इंसान चाहिए जो नेता हो, उन्हें वो नेता नहीं चाहिए जो ख़ुद को भगवान कहे।

जीत- उन्हें वो भगवान भी नहीं चाहिए, जिसकी आड़ में लोग पत्थर चला रहे हैं, 
हार- उन्हें वापस अपना वो भगवान चाहिए जिससे उनकी नानी/दादी घंटों बातें करती थीं।


जीत- उन्हें बस, मुस्कुराते हुए घर से जाना चाहिए, 
हार- और हंसते हुए
, घर वापस आ जाना चाहिए।
जीत- और ये सब कैसे होगा?
हार- प्रेम कविताओं से... 
जीत- क्रांति क्रांति से.. 
हार- अच्छा!
जीत- हाँ.. 
हार- सच में?
जीत- हाँ.. 
हार- देखो लड़की हो... पछताओगी 
जीत- देखो.. घर की चौखट मत लांघना.. 
हार- और ये क्या कपड़े पहने हैं?
जीत- हमारे लड़कों को बिगाड़ रही हो?
हार- लोग छी छी करेंगे
जीत- थू थू करेंगे
हार- हाथ से छूट रही हो.. 
जीत- खालिस्तानी.. 
हार- नक्सली 
जीत- पाकिस्तानी
हार- एंटी नेश्नल 
जीत- दिमागी नक्सल 

( और दोनों हंसने लगते हैं। उन दोनों के बीच में कवि.. अवाक सा देर से खड़ा था।) 


कवि- ये क्या था? किसकी कविता थी ये?.... कहाँ से पढ़ रहे थे तुम दोनों ये?
जीत- अरे ये तो हम ऐसे ही बकवास कर रहे थे।
कवि- नहीं ये... ये बकवास नहीं थी... ये ही तो है जो मैं हमेशा से लिखना चाहता था..  ये कैसे कह रहे थे तुम लोग... 
हार- अरे हम तो बस इँतजार कर रहे थे।
कवि- पर ये .. ये ही तो... 
जीत- कविता नहीं है ये.. 
हार- और तुम हमारी बातें सुन रहे थे या कविता लिख रहे थे?
कवि- अभी तक तो मैं लिख रहा था... पर आज पहली बार सुना है मैंने.... बोलना, लिखना सरल है.. पर सुनना कठिन..  अब मुझे पता चला है असल में कविता क्या है? मुझे लिखना है अभी.... 
(कवि सामने पड़े पेपर और पेन उठाने जाता है पर जीत वो उससे पहले उठा लेती है।) 

जीत- पहले मुझे बताओ कि सफलता का क्या हुआ? 
कवि- क्या? (कवि हार से पूछता है, क्या कह रही है ये) 
हार- सक्सेस... 
कवि- अरे...  नया लिखने के लिए पुराना छोड़ना पड़ता है.. फिर चाहे वो आपकी सक्सेस ही क्यों न हो। 
जीत- फिर इसे हार क्यों कहते हो तुम?  ये हार क्यों है? क्योंकि तुम इसे लिख नहीं पाए?

कवि- नहीं.. मैं लिख रहा हूँ इसे... वो जानती है कि मैं लिख रहा हूँ इसे।

हार-  मैं हार कैसे हो गई? मैं हार क्यों हूँ?..मुझे तो लिखा भी नहीं गया अभी तक.. 
कवि- तुम मेरी हार हो क्योंकि..  हमें हार के साथ रहने की आदत है... तुम मेरी आदत हो.. मेरी हार.. 
जीत- और सफलता
? 

कवि-  हार के साथ तो रहना हम सबको आता है, हम सबको पता उसके साथ कैसे रहा जाता है… पर सफलता.. उसका क्या करें?  उसके साथ कैसे रहना चाहिए ये कभी सीखा ही नहीं।  अब प्लीज मुझे लिखने दो.. 
जीत- तुम मुझे लिख रहे हो न 
? 

कवि- हाँ.. (जीत को हाँ बोलने के पहले कवि एक बार हार को देख लेता है।) 
(कवि लिखने बैठता है।) 
हार- ये मुझे क्यों नहीं लिख रहा है? 
जीत- अरे लिखने दो उसे..
हार- क्या लिख रहा है..  
(हार एक पन्ना उठाती है...)
हार- ये क्या लिख रहे हो?... हम कविता नहीं लिख पा रहे हैं.. हम नहीं लिख सकते कविता.. 
कवि- अभी मत पढ़ो... मत पढ़ो
हार- क्योंकि हम इंसानों की असल समस्या है कि.. जब तक हम दूसरों की आजादी छीन न लें हमें खुशी नहीं मिलती है।
जीत- What... ये प्रेम कविता है? 

कवि- हाँ ये.. ये ही तो मैं लिखने जा रहा था... ये सच है.... । जैसे... क्यों हम पिंजरे में बंद पक्षी से अपेक्षा रखते हैं कि वो हमारे बच्चों के नाम बोलना सीख जाए? जबकि उसे खुले आसमान में उड़ना चाहिए? लुप्त होते जानवरों को, जिन्हें जंगल में होना चाहिए वो Zoo में हमारे बच्चों का मनोरंजन कर रहे होते हैं? सर्कस में जब तक हाथी स्टूल पर न बैठ जाए.. और शेर आग के गोले से छलाँग न मार दे हमें खुशी नहीं मिलती। इस धरती पर सारे जनवरों की आजादी छीनकर जो हमने हमारे बचपन में खुशी पाना सीखा है... ये .. ये.. ये हमारी समस्या है। अब हम इंसान... जब तक हम दूसरों की आजादी छीन न लें हमें खुशी नहीं मिलती है। मुझे इस, खुशी पाने की लत से आजादी चाहिए। 
हार- ये कविता है.. इसे लिख दो..  
कवि- नहीं... मैंने असल में जो भी कविताएँ लिखी हैं वो ख़राब कविताएँ हैं।
हार-  
I know.. 
कवि- तुम दोनों के सुनने के बाद आज पहली बार मैं समझा हूँ कि, कवि जब कहता है कि मैं कविता लिख रहा हूँ... वो खराब कविता ही लिखेगा..  पर जब वो कविता को सुनता है
… जब वो अपनी कविताओं को आजादी देता..   जैसा तुमने कहा था…. कविता कवि चुनती है.. वो सच है। उसे बस उस कविता को सुनना होता है…ध्यान से… एकाग्र होकर… बस सुने.. और चुप चाप बैठकर उसे दर्ज करे.. 
जीत- तो तुम बस एक टाइपिस्ट हो.. 


कवि- हाँ.. उससे ज्यादा कुछ नहीं। 
हार- मैं इससे कह रही हूँ कि जो बोलते हो लिख दो.. ये कह रहा है कि जो ये सुनेगा वो लिखेगा... मैं अब और इसकी बातों में नहीं फँस सकती, मैं जा रही हूँ।
(हार कवि की स्पेस में जाने लगती है..  पर उस स्पेस में घुसने के पहले रुक जाती है।)  

कवि- जाओ... जाओ.. तुम मेरी हार हो... तुम कैसे जा सकती हो.. 
(हार पलटकर कवि को देखती है) 
कवि- क्योंकि.. तुम गई नहीं थी कभी, जैसे तुम आई नहीं थी कभी.. देखो.. तुम दोनों ने ही तो मुझे सुनना सिखाया है। 
हार- अगर सुन रहे हो..  तो लिखो मेरी कविता।
कवि- मैं लिखूँगा नहीं.. सुनुँगा... सुनाओ.. 
हार- पर ये तो अधूरी है.. 
(कवि चुटकी बजाता है और हार का स्पाट आता है। हार अपनी कविता लेकर अपने स्पाट की तरफ जाती है।) 
कवि- (जीत से) तुमने ही कहा था न कि, मेरी हार को तुम पूरा कर सकती हो।
जीत- हाँ... पर मैं तो... 
कवि- तुम जीत हो.. हार को तुम नहीं पूरा करोगी तो कौन करेगा? 

(हार अपने स्पाट पर खड़ी है.. चुपचाप) 
कवि- कविता
हार- हाँ.. 
कवि- पानी? (हार चुप रहती है।)
कवि- चाय? (वो चुप रहती है।)
कवि- दारू? 

(हार मुस्कुराती है.. एक गहरी साँस लेती है।) 

हार- 

मैं इस.. बहुत बड़ी दुनियाँ में.. 

बस एक छोटी सी कविता होना चाहती हूँ..

इस थमें हुए तालाब के किनारे पड़े पत्थरों में 

एक छोटे से कंकर सी कविता। 

मैं अपनी कविता में सिर्फ सच कहूँगी, 
जैसे, दुख असल में हमें पास लाता है.. 

और सुख अकेला कर देता है

इस दुनिया में, राजा का बेटा भी एक दिन राजा ही बनेगा, 

इस बात पर हमारा विश्वास ज्यादा है, 

पर हमेशा लगता है कि, 

पर हमेशा लगता है कि...... 
कवि- (जीत की तरफ देखते हुए..) हमेशा लगता है कि... 
(जीत हार को देखती है.. और कहती है।)

जीत- पर हमेशा लगता है कि... घर में काम कर रही ताई हमें ठग रही है। 

(हार और जीत दोनों मुस्कुराते हैं। कवि अपने लिखने वाली जगह जाकर बैठता है और लिखना शुरु करता है।) 

हार- दुख, हमारे वो पुराने कपड़े हैं, 

जिन्हें हम फेंक नहीं पाते, 

जीत- और सुख के कपडे हमारे शरीर पर हमेशा बड़े लगते हैं। 

हार- हंसते हुए मैं अपने पिता के जैसी दिखती हूँ, 

और रोते हुए अपनी माँ जैसी, 

जीत- इसमें पहला वाक्य हमें दिखाई देता है, 

और दूसरा वाक्य कभी सुनाई नहीं देता। 

मैं चाहती हूँ कि बच्चे मुझे पढ़े 

और वो अपनी पूरी ताक़त से उछाल दें मुझे आसमान में 

और मैं युद्ध में गिर रहे आग के गोलों की तरह नहीं..

बल्कि पतझड़ में, 
पेड़ से गिर रहे टूटे हुए पत्ते सी..  

इस थमें हुए तालाब में गिर पड़ूँ 

कविता क्रांति नहीं ला सकती है.. 

पर वो थमें हुए तालाब में उतनी देर तक हलचल पैदा कर सकती है.. 

जहाँ से एक दिन एक बड़ी क्रांति की लहर जन्म ले सके.. 

मैं वो छोटी कविता होना चाहती हूँ.. 

जिससे इस थमें पड़े तालाब को

एक दिन नदी हो जाने का सपना आए। 

(कवि चुटकी बजाता है.. और पहली बार जीत के ऊपर स्पाट आता है। जीत अपने स्पाट को देखती है और पीछे से कवि उसकी कविता लेखर उसके पास आता है।) 

कवि- कविता.. 
(जीत पलटती है और कवि से अपनी कविता लेकर पढ़ने लगती है। कवि दारू के पास जाता है.. हार इशारे से उसे कहती है.. पी लो। वो दारू बानाता है और पीते हुए अपनी आँखे बंद कर लेता है।) 

जीत-  (गाना शुरु करती है।) 

बोलना सरल है, पर सुनना कठिन… 
भीड़ में अकेला महसूस करना सरल
हार/जीत- पर अकेले में, अकेले रहना कठिन
हार- जैसे कहते रहना है सरल 
हार/जीत- पर कर देना कठिन
जीत- जैसे रात भर जागना सरल 
हार/जीत- पर छक्कर सोना कठिन
हार/जीत- जैसे कई बार जिंदगी छोटी लगती है
हार- पर उसमें शाम का बीतना, 
जीत- इस शाम का बीतना कठिन
जीत- जैसे गुरु सरल हैं 
हार- पर चैले कठिन
हार/जीत- जैसे दुख का होना सरल 
हार- पर सुख को पचाना कठिन
हार/जीत- जैसे दूसरों से नफरत सरल 
जीत- पर अपने ही साथ रहना कठिन
हार- जैसे प्रेम में ढूबकर मरना है सरल 
हार/जीत- पर इसमें बहते रहना है कठिन 
हार/जीत- जैसे कविता सरल है ...पर कवि कठिन 
जीत- जैसे ये सारा लिखना सरल 
हार/जीत- पर इसको जीना बहुत कठिन 

the End. 

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