शनिवार, 12 दिसंबर 2009

पार्क.... (हिन्दी नाटक)

aRANYA pRESENTS.

(अंधेरे में उदय की आवाज़ आती है, वह किसी बच्चे से बातें करता है... उस बच्चे का नाम हुसैन है।(आयू-१५ वर्ष)... ।)

उदय- सुनों... यह बताओ...इसमें यहाँ छिपे रहने की क्या ज़रुरत है ? आप को अपने पापा से सीधे कहना चाहिए कि... मैं स्कूल नहीं जा पाया।

हुसैन- ना... ना।

उदय- नहीं कहोगे?.. अच्छा यह बताओ तुम्हारी exams कैसे गए?

हुसैन- नहीं दिये...। यहीं छुपा था।

उदय- क्या? परीक्षा नहीं दी?... चलो मैं तुम्हारे पापा से बात करता हूँ।... अरे! क्या हुआ...। ..अरे बेटा सुनो... रुको... हुसैन... हुसैन?

(हुसैन हाथ छुड़ा कर भाग जाता है... तब तक इति वहाँ आ जाती है।)

इति- क्या हुआ? कौन था वह?

उदय- वो... हुसैन.... क्या हुआ कि मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था... वह यहाँ छिपा हुआ बैठा था...। मैंने उससे बात करना चाहा तो वह भागने लगा..। थोड़ा दिमाग़ी रुप से कमज़ोर है। रिज़ल्ट के डर से छिपा बैठा था।

इति- रिज़ल्ट है उसका?

उदय- हाँ... पर उसने परीक्षा ही नहीं दी। अपने बाप से डरा बैठा है... वह आज स्कूल में रिज़ल्ट लेने आएगें।

इति- कहाँ गया वह...?

उदय- मैंने बोला चलो मैं तुम्हारे पापा से बात करुगाँ, तो भाग लिया।

(इति की निग़ाह घड़ी की तरफ जाती है.. उदय चुप हो जाता है। दोनों थोड़ी देर शांत रहते हैं...।)

उदय- आओ.. वहाँ बेंच पर बैठते हैं...।

इति- नहीं... मैं यहीं ठीक हूँ। तो.... क्या हाल है तुम्हारी बीमारी के।

उदय- काफी समय से तो ठीक ही थी, पर अभी, कुछ ही दिन पहले, एक मंदिर में, उसकी मूर्ति को देखकर मुझे फिर बुखार गया।

इति- क्यों..? क्या था उस मूर्ति में...?

उदय- साधारण ही थी... पर जैसे ही मुझे बुखार आया, मुझे वह मूर्ती एकदम बेचारी लगी... इतने भक्तों की भीड़ में एक बेचारी मूर्ती... कोई पैसा चढ़ा रहा है... कोई नारियल फोड़ रहा है...कोई घंटो ध्यान लगा कर कुछ मांग रहा है। और वह मूर्ती चुपचाप खड़ी हैमुझे अचानक लगा कि वह मुझे कह रही है किउसके हाथ में कुछ नहीं है..मैं तुरंत वहाँ से भाग लिया... जब मंदिर की सीढ़ियाँ उतर रहा था तो मुझे लगा कि शायद, यह इतने सारे लोगों की आस्था ही है... जो रोज़ यहाँ आते हैं... जिनकी वजह से उस पत्थर की मूर्ती में इतनी जान तो आई कि वह कह सके कि... ’उसके हाथों में कुछ नहीं है।

इति- फिर...?

उदय- फिर क्या?... तुम्हें ढूँढ़ा, तो पता लगा तुम्हारा ट्रांसफर हो गया है। बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता मिला।

इति- कब तक मेरे पीछे भागोगे?

उदय- अरे तुम मेरी डॉक्टर हो!! और मुझे तुम्हारी कंस्लटन्सी की ज़रुरत है।

इति- तुम्हें मेरी कंस्लटंसी की ज़रुरत नहीं है। तुम्हें आम होने से डर लगता है...।

उदय- नहीं, मैं जानता हूँ कि मैं एक आम आदमी हूँ।

इति- तुम आम आदमी हो, पर तुम मेरे सामने आम आदमी होने से डरते हो।

उदय- मतलब?

इति- मतलब, अब यह बीमारी महज़ तुम इसलिए पाले बैठे हो कि तुम मेरे सारे पेशेन्टों के बीच ख़ास बने रहो।

उदय- ये झूठ है.. जो भी मैं महसूस करता हूँ... वह मैं तुम्हें सच-सच बता देता हूँ।

इति- मैं इसी बीमारी की बात कर रही हूँ... अगर तुम मुझसे रोज़ मिलते रहोगे तो तुम्हें कभी दौरे नहीं पड़ेगें... पर ज्यों ही मिलना बंद कर देते हो, दौरे शुरु हो जाते है।

उदय- तो आप कहना क्या चाहती हो?

इति- यही कि... इसका इलाज़ मेरे पास नहीं है, और ना ही मैं इसका इलाज अब करना चाहती हूँ... इसीलिए मैंने तुम्हें अपने क्लीनिक में भी नहीं बुलाया... चलो मुझे देर हो रही है.. मैं जाती हूँ।

उदय- अरे! मैं इतनी दूर से आपको ढूँढ़ता हुआ आया हूँ... और आप मुझसे बात भी नहीं करेगी।

इति- कोई फायदा नहीं है... अगर तुम्हें बीमारी की इतनी चिंता है तो दूसरा डॉक्टर ढूँढ लो।

उदय- आप जानती है, मैंने कोशिश की है.... पर कोई फायदा नही हुआ।

इति- फायदा होगा भी नहीं... खैर मैं इस बारे में अब तुमसे कोई बात नहीं करना चाहती हूँ... मुझे देर हो रही है... मैं जाती हूँ।

उदय- पर मैं यहाँ आपसे ही मिलने आया हूँ।

इति- मिल लिए ना...।

उदय- देखिये जब तक मैं आपसे बात नहीं कर लूँगा मैं यहाँ से नहीं जाऊगाँ... मैं आपको आपकी कंस्लटेंसी के पैसे देता हूँ... तो आपको क्या एतराज़ है?

इति- मुझे नहीं चाहिए आपके पैसे... और आप चले जाईयेगा.. मैं आपसे अब नहीं मिलूगीं।

उदय- मैं नहीं जाऊगाँ।

इति- ज़िद्द मत करिये... मैं नहीं आऊँगी।

उदय- मैं आपका इंतज़ार करुँगा।

इति- तो करते रहिए इंतज़ार... चलती हूँ।

(इति चली जाती है... उदय गुस्से मैं अपना बैग़ पटक देता है... फिर उसे धीरे से उठाता है.. सामने की तरफ तीन पार्क बेंच पड़ी हुई हैं... वह उनमें से एक पार्क बेंच पर बैठता है पर वहाँ धूप है तो बैठ नहीं पाता है... फिर दूसरी पार्क बेंच पर बैठता है जिसके सिर्फ एक कोने में ही छाया है..... वह वहाँ बैठता है और एक किताब निकाल कर पढ़ना शुरु करता है। तभी वहाँ नवाज़ आता है। वह भागता हुआ अंदर आता है... और उदय को, छाया वाली जगह पर बैठा देखकर दुखी हो जाता है।)

नवाज़- आप बैठें हैं...?

उदय- हाँ... मतलब बैठा हूँ!!!

नवाज़- आप बैठेंगें ना...???

उदय- हाँ... बैठूगाँ... ही... अभी...!!!

नवाज़- तो ठीक है... क्या आप... आप वहाँ बैठेगें...?

उदय- क्यों...?

नवाज़- मुझे सोना है।

उदय- अरे! आपको सोना है.... तो मैं धूप में बैठूँ?

नवाज़- अरे! दस-पंद्रह मिनिट में वहाँ छाया जाएगी... बस थोड़ी देर की तो बात है...

उदय- हाँ... बस थोड़ी देर की बात है.... फिर आप वहाँ सो जाईएगा?

नवाज़- अरे अजीब ज़िद्दी आदमी हो.... देखों मैंने एकदम गले-गले तक खाना खाया है.... अगर जल्दी से सोऊगाँ नहीं तो यही उल्टी कर दूगाँ।

उदय- तो कर दो....

नवाज़- नहीं कर सकता...

उदय- क्यों?

नवाज़- उल्टी करना, यहाँ के रुल्स के खिलाफ है।

उदय- अरे आदमी को उल्टी करने की भी आज़ादी नहीं है।

नवाज़- जब आपके ऊपर उल्टी कर दूगाँ तब देखता हूँ आप कितनी आज़ादी की बात करते हैं।

उदय- आप मुझे डरा रहे हैं?

नवाज़- मैं डरा नहीं रहा हूँ... देखिए...देखिए... मुझे पसीना आने लगा है।

उदय- तो..?

नवाज़- बस थोड़ी ही देर में मेरे कान लाल होने लगेगें... फिर समझ लीजिए कि समय हो गया.... और अगर मैंने फिर भी खुद को रोकने की कोशिश की तो मेरी आँखों से पानी आने लगता है... और तब मेरे बस में कुछ नहीं होता... आज का, कल का, परसों का सारा खाना बाहर...

उदय- अच्छा आप यहाँ बैठ जाईए... वहाँ छाया आ जाएगी तो मैं वहाँ चला जाऊँगा...

नवाज़- धन्यवाद.... पर देखिए मैं बैठ पाने की हालत में भी नहीं हूँ... मेरे लिए सोना बहुत ज़रुरी है।

उदय- अरे! थोड़ी देर बैठे रहेंगे तो मर नहीं जाएगें...

नवाज़- आपको पता नहीं, मैंने आज सूअर की तरह ठूस-ठूस कर खाना खाया है... दोपहर का सोना मेरे लिए बहुत ज़रुरी है... मान जाईए...?

उदय- मैं नहीं मानता...

नवाज़- मान जाइए ना...?

उदय- अरे आप क्या मेरे ऊपर ही लेट जाईएगा? सीधे बैठिए... सीधे..

नवाज़- देखिए मेरे कान लाल हो रहे है.... अब बस आँखों से पानी गिरेगा और आप कहीं भी बैठने लायक नहीं बचेगें।

उदय- ठीक है...ठीक है....

नवाज़- धन्यवाद!

(उदय जाकर दूसरी बेंच पर बैठ जाता है.... वह एक किताब निकालता है और धूप बचाने की कोशिश करता है जो उसके सिर पर ही पड़ रही है।फिर वह एक सिगरेट निकालता है, माचिस ढूँढ़ता है... पर उसे मिलती नहीं है।)

उदय- आपके पास माचिस होगी।

नवाज़- सिगरेट पीना यहाँ के रुल्स के खिलाफ है।

उदय- यहाँ कहीं लिखा तो नहीं है...

नवाज़- इधर-उधर लिखना भी allow नहीं है।

उदय- आप यहाँ रोज़ आकर सोते हैं?

नवाज़- हं!!!

उदय- आपने अपना आधा जीवन सोने में गुज़ार दिया है....। ज़रुर आप सरकारी मुलाज़िम होगें? ठीक पहचाना ना... ज़िद्दी, खडूस सरकारी मुलाज़िम?

नवाज़- मैं सो चुका हूँ!!

उदय- अगर मैं अभी जाकर आपकी शिकायत कर दूँ तो आपको नौकरी से निकाला जा सकता है?

नवाज़- आप मेरे सपने में आकर मुझे धमकी दे रहे हैं... कोई फायदा नहीं है मैं सो चुका हूँ।

(उदय चुपचाप बैठ जाता है.... तभी वहाँ छाया आ जाती है... और उदय किताब अपने सिर से हटा लेता है...। और आराम से बैठ जाता है, किताब पढ़ने लगता है। तभी मदन पार्क में आता है।वह उदय को बैठा हुआ देखता है, तो थोड़ा नाराज़ सा हो जाता है... फिर थोड़ा इधर-उधर धूमने के बाद... उदय के पीछे खड़ा हो जाता है, उदय उसे नज़रअंदाज़ कर देता है।)

मदन- मैं सालों से इस पार्क में आ रहा हूँ.... पहले मैं रोज़ इसे बस बाहर से देखते हुए निकल जाता था....सोचो रास्ते में पार्क है, पर नहीं आता था। घर जाने की हमेशा जल्दी लगी रहती थी.. जब से इस पार्क में मैं आने लगा हूँ यूं समझिए कि.... आदत सी लग गई है। अच्छा है यह पार्क...छोटा सा... क्यों? .... अरे ठीक ही तो है? नहीं तो और पार्क कैसे होते हैं? जब आप आ ही गए हैं पार्क में तो खुश रहिये, थोड़ा घूम लीजिए। आप यहीं काफ़ी समय से, एक ही जगह बैठे हैं इसिलिए शायद आपकों यह पार्क अच्छा नहीं लग रहा है। थोड़ा टहल लीजिए... पीछे की तरफ देखिए... हिरण, खरगोश... सब हैं यहाँ...।

उदय- पता है मुझे...।

मदन- अच्छा आप पीछे की तरफ हो आए हैं... तभी नाराज़ हैं.... मुझे भी पार्क का यह ही हिस्सा अच्छा लगता है.... पीछे क्या रखा है... हिरण!!! और खरगोश बस? और हिरण भी काहे के हिरण... गाय जैसे दिखते हैं... सच ऎसे कोई हिरण होते है। जब देखो जुगाली करते रहते हैं... ना उछलते है, ना कूदते हैं...गाय हैं यह.... मतलब एकदम गाय भी नहीं दिखते, बछड़े जैसे लगते है... गाय के बछड़े... देखें होगें आपने महोल्लों में घूमते हुए?

उदय- हाँ।

मदन- हाँ बस वैसे ही दिखते हैं। और खरगोश.. खरगोश तो जनाब क्या बताएं?

उदय- वह तो आपको चूहे जैसे लगते होगें।

मदन- नहीं... खरगोशो को देखा जा सकता है...क्योंकि वह तो एकदम खरगोश जैसे लगते हैं। मगर कोई कितनी देर तक खरगोशों को देख सकता है। अब खरगोश, बंदर तो होते नहीं है कि... उछले कूदें आपका मनोरंजन करें... मेरे हिसाब से हर पार्क में बंदरों का होना ज़रुरी है... आप क्या कहते हैं?

उदय- मैं आपकी बात से सहमत हूँ, बंदरों का होना भी ज़रुरी है और उनको पिजरे में बंद भी रखना ज़रुरी है... यू खुला छोड़ दो तो... पार्क में शांत बैठे लोगों के लिए काफ़ी परेशानी खड़ी कर सकते हैं।

मदन- बंदरों को पार्क में कोई खुला छोड़ता है, यहाँ तो हिरण को भी.... आप मुझे बंदर कह रहे हैं... आपकी हिम्मत कैसे हुई... देखिए आप जानते हैं मैं कौन हूँ... ... मैं संगीत और साईस टीचर हूँ सामने के स्कूल में.... और अपनी उम्र देखिए, मुझे लगा आप कुछ परेशान हैं, तो आपसे बात करुं.... और आप तो मेरी बेइज़्ज़ती कर रहे हैं.... आप ... मैं चाहूँ तो अभी आपको इस पार्क से बाहर निकलवा सकता हूँ... आप... ऎ... कोई है... कोई है... ?

नवाज़- ऎ चिल्ला क्यों रहे हो? चुप... एकदम चुप.. यहाँ कुछ लोग सो रहे हैं, दिख नहीं रहा ।

मदन- माफ करना... पर उन्होंने मुझे बंदर कहा?

नवाज़- आप बंदर हैं क्या?

मदन- नहीं।

नवाज़- फिर क्यों बुरा मान रहे हैं।

मदन- अरे लेकिन...!

नवाज़- अच्छा मैं आपसे कहता हूँ... बंदर ... बंदर...

मदन- आप?

नवाज़- आप नहीं है ना... बात खत्म हो गई बस... मुझे सोने दो।

(मदन थोड़ा सँभलता है.... एक बार घड़ी देखता है... फिर चुपचाप बैठ जाता है वह जैसे ही उदय को देखता है, उसे गुस्सा आने लगता है।)

मदन- वह तो अच्छा हुआ आप बीच में आ गये वरना.... आप तो जानते ही होगें पहले इस पार्क में, दोपहर को जवान लोगों का आना मना था... सही था क्यों?... आपको नहीं लगता।

नवाज़- मैं सो चुका हूँ।

मदन- मैं तो खुद यहाँ आता हूँ कि दोपहर को थोड़ी देर इस पीपल के पेड़ की छाया तले बैठूगाँ पर....

उदय- sorry...|

मदन- क्या? आपने मुझसे कुछ कहा क्या?

उदय- मैंने कहा sorry... गलती से मेरे मुँह से निकल गया... माफी चाहता हूँ।

मदन- सुना आपने...सुना.... सॉरी बोल रहा है.... चलिए ठीक है जाने दीजिए। वैसे आप जहाँ बैठे हैं वह पार्क की सबसे अच्छी जगह है।

उदय- तीन तो बेंच है इस पार्क में वो भी एक साथ यही इसी जगह पर हैं.... इसमें क्या ख़ास है?

मदन- वहाँ से view थोड़ा ज़्यादा अच्छा है।

उदय- जो यहाँ से मुझे दिख रहा है... वो वहाँ से आपको भी दिख रहा है... और देखने को है भी क्या? सामने एक बिल्डिंग खड़ी है उसे आप view कहते हैं।

मदन- यही तो मैं कह रहा हूँ... इस बेंच के ठीक सामने बिल्डिंग है... जबकि आपकी बेंच से बिल्डिंग ठीक सामने नहीं दिखती है।

उदय- मुझे यहाँ से वह सामने वाली बिल्डिंग की कुछ एक बालकनी दिख रही है जो आपको नहीं दिख रही है, इससे फ़र्क क्या पड़ता है?

मदन- फ़र्क है आसमान का... आपको वहाँ से ज़्यादा आसमान देखने को मिलता है और मुझे कम।

उदय- मुझे आसमान में कोई दिलचस्पी नहीं है।

मदन- तो आप यहाँ आ जाईए... मुझे आसमान में बहुत दिलचस्पी है... चलिए उठिए।

उदय- अरे! मैं क्यों उठूँ? जो भी आता है मुझे मेरी जगह से उठा देता है। आप जाईए अपनी जगह पर, मुझे नहीं उठना।

मदन- अरे आप ही ने कहा था कि आपको आसमान में दिलचस्पी नहीं है?

उदय- नहीं है... पर मुझे इस जगह बैठे रहने में दिलचस्पी है.. अजीब ज़बरदस्ती है?

मदन- आपको पता है वह मेरी जगह है?

उदय- क्यों आपका नाम लिखा है इस जगह पर..?

मदन- यह क्या बात हुई.? जब तुम स्कूल में अपनी class में जाते थे... तो क्या टीचर की कुर्सी पर उसका नाम लिखा होता था? नहीं ना..? पर तुम जाकर टीचर की कुर्सी पर तो नहीं बैठ जाते थे? बैठते तो तुम अपनी ही जगह पर थे।

उदय- यह क्या बात हुई?

मदन- कौन से स्कूल में पढे हो? उदाहरण नहीं समझते...?

उदय- अरे! यह क्या उदाहरण हुआ? पार्क का class room से क्या संबंध है?

मदन- अच्छा, अब तुम संबंध की बात कर रहे हो तो यह बताओ...इस गाँव से तुम्हारा क्या संबंध है?

उदय- मतलब?

मदन- क्या तुम इसी गाँव में पैदा हुए हो?

उदय- नहीं।

मदन- तो मेरा ज़्यादा हक़ बनता है इस जगह पर... मैं यही पैदा हुआ हूँ... यहीं पला बढ़ा हूँ।

उदय- अगर यह बात है तो... मैं इसी देश में पैदा हुआ हूँ... तो इस हिसाब से मेरा भी बराबर का हक़ है।

मदन- पर तुमसे पहले मैं इस दुनियाँ में आया हूँ। मेरा हक़ ज़्यादा है।

उदय- मैं हिन्दू हूँ.. अब बोलो।

मदन- मैं ब्राह्मण..। और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सदस्य भी.... क्यों बोलती बंद हो गई?

उदय- तो अब क्या आप मुझे मेरे कम हिन्दू होने पर मारेगें।

मदन- यह गाँधी पार्क है। और वैसे भी यह तीनों बेंच जिन्होनें इस पार्क को दान की थी वो केलकर हैं.... पंडित हरि केलकर।

उदय- तो..?

मदन- और मैं उसगाँवकर हूँ।

उदय- मी पूण्यात शीक्लो आहे। मला मराठी येते।(मैं पूना में पढ़ा हूँ.. मुझे मराठी आती है।)

मदन- क्या?...

उदय- कॉय ज़ाला...? तुला मराठी येत नाही का? हाँ...हाँ...हाँ...। (क्या हुआ? तुम्हें मराठी नहीं आती।)

मदन- मेरी माँ मराठी नहीं है... और पिताजी, मेरे बचपन में ही चल बसे थे... सो... मैं मराठी नहीं जानता हूँ... पर.. मैं मराठी हूँ, मेरा ज़्यादा हक़ है बस।

उदय- काय करायचे आहे ते कर, मी इक्डूंन उठनार नाही...।(अब आप कुछ भी कर लें, मैं यहाँ से नहीं उठने वाला हूँ।)

मदन- क्या?

उदय- मैं... नहीं... उठूगाँ...।

(मदन कुछ देर शांत बैठता है.. पर उससे रहा नहीं जाता।)

मदन- जब तुम यहाँ आए होगें तो दोनों बेंचे खाली होगी?

उदय- तीनों खाली थी।

मदन- तो आप यहाँ इनसे भी पहले आए हैं....?

उदय- और अब मैं यहाँ से नहीं उठूगाँ।

मदन- तो आप वहीं बैठे रहेगें?

उदय- जी हाँ।

मदन- मैंने human सायक्लॉजी पढ़ी है... हर आदमी सामान्य परिस्थिती में हमेशा बीच में बैठना चाहता है... पर तुम कोने में बैठे हो.... इसका मतलब?

उदय- इसका मतलब है कि मैं पागल हूँ।

मदन- नहीं इसका मतलब तुम्हारे भीतर कुछ डर है... डर है पकड़े जाने का... इसलिए तुम कोने वाली बेंच पर बैठे हो...।

उदय- चुप रहिए...।

मदन- वैसे तो मैं सांईस का टीचर हूँ पर human साईकी को जानना, समझना मेरी hobby रही है... पकड़ लिया ना बच्चू।

उदय- बच्चू?...

मदन- अरे बच्चू को छोड़ो....पकड़ा गये ना.. अब मान लो...।

उदय- अरे! क्या मान लूं? आप कुछ भी कहते रहेगें और मैं मान लूगाँ?

मदन- आप मेरी हॉबी पर शक़ कर रहे हैं?

उदय- आपको जो समझना है समझो?

मदन- अच्छा यह सुनो- तुम यहाँ पहली बार आए हो।.... तुम यहाँ के नहीं हो।... तुम बाहर किसी शहर से आए हो। बताओ यह तीनों बातें सही हैं?

उदय- यह तो एक ही बात हुई....।

मदन- थोड़ा रूक जाओ... तुम तेज़ हो तुम्हें पकडना आसान नहीं है... अब समझा... तुम अपनी ज़िन्दगी से बोर हो चुके हो.... सब कुछ छोड़कर कहीं भाग जाना चाहते हो... फिर से शुरु से अपनी एक नयी ज़िन्दग़ी शुरु करना चाहते हो...। जहाँ तुम वापिस उछलो-कूदो बच्चे हो जाओ... बोलो सही है?

उदय- बक़वास...।

मदन- तुम एक निहायती ज़िद्दी आदमी हो, जिसने अपनी ज़िद्द की वजह से अपनी ज़िन्दगी बरबाद कर ली... वही ज़िद्द है जिसकी वजह से तुम मेरी जगह बैठे रहना चाहते हो। अब बोलो... सही है?

उदय- बक़वास...।

मदन- तुम्हें लगता है कि भगवान ने तुम्हारे साथ इंसाफ नहीं किया.... इसलिए तुम मंदिरों में जाकर सेक्स के बारे में सोचते हो जिससे भगवान से बदला ले सको।

उदय- क्या...?

मदन- तुम यहाँ suicide करने आए हो...?.... तुम्हें एक बीमारी है जिसका इलाज असंभव है... तुम्हें ज़िन्दा काकरोच खाना अच्छा लगता है... तुम प्रेम में धोखा खाए एक बेचारे प्रेमी हो?... बस..बस... बस...।

उदय- हार गए...?

मदन- क्यों तुम मेरी हॉबी का खून कर रहे हो? मैंने एक बात तो सही कही होगी....? एक... एक भी नहीं... एक भी नहीं...?

उदय- एक बात सही है।

मदन- हाँ...हाँ...हाँ... (मदन एक ग़हरी सॉस छोड़ता है...।)... कौन सी?

उदय- वो वाली....वो... पर आधी सही है।

मदन- आधी-सही बात क्या होती है।

उदय- मतलब, आधी सही, आधी ग़लत।

मदन- कौन सी... भगवान वाली..?

उदय- नहीं...नही... वो..।

मदन- कॉकरोच वाली...?

उदय- अरे नहीं... वो वाली..।

मदन- suicide वाली?

उदय- नहीं... अरे! वो वाली.....?

नवाज़- तो कौन सी...? कौन सी बात सही है... यार बता दो और मुझे भी सोने दो.... सच तुम लोगों की बातों के चक्कर में मैं सो नहीं पा रहा हूँ... कौन सी बात सही है... कौन सी?

उदय- मुझे.. एक बीमारी है।

मदन- पर....!

नवाज़- (मदन से...) ठीक है उसे एक बीमारी है। सुन लिया तुमने.... एक बीमारी है... बात खत्म...अब मैं सो रहा हूँ।

(कुछ देर में...)

मदन- ऎसी बीमारी, जिसका इलाज असंभव है..?

उदय- नहीं, इसिलिए मैंने कहा कि आधी बात आपकी सही है... शायद संभव है।

मदन- कौन सी बीमारी है?

(नवाज़... उठके बैठ जाता है..।)

मदन- अब आप क्यों उठ गए...?

नवाज़- कौन सी बीमारी है... कौन सी है.. जल्दी बता दो और बात खत्म करो..।

उदय- मुझे दिमाग़ की बीमारी है।

नवाज़- बस... सुन लिया... अब तुम कुछ नहीं पूछोगे...ठीक है।

मदन- हाँ...।

(नवाज़ वापिस सो जाता है... मदन थोड़ी देर चुप रहता है..फिर धीरे से इशारे से उदय से पूछता है... कौन सी ....?)

उदय- मुझे लगता है कि मैं जीनियस हूँ।

नवाज़- ठीक है... ठीक है... मैं समझ गया... जब तक तुम पूरा सुन नहीं लोगे,,, और जब तक तुम पूरा बता नहीं दोगे... तुम दोनों मुझे सोने नहीं दोगे... अब बोलो जल्दी से सब कुछ बोल दो...।

उदय- मैंने कह दिया बस...।

नवाज़- कि तुम जीनियस हो... ऎसा क्या काम किया है तुमने कि तुम्हें लगता है कि तुम जीनियस हो?

उदय- मैंने कोई काम नहीं किया है.. इसलिए मैंने कहा है कि ... यह मेरी बीमारी है कि मुझे लगता है कि मैं जीनियस हूँ... जिसका इलाज चल रहा है।

मदन- मैं पूछूं...? एक सवाल...?(मदन नवाज़ से पूछता है..।)

नवाज़- पूछो...?

मदन- कुछ तो कारण होगें जो तुम्हें सोचने पर मजबूर करते होगें कि तुम यह सोचो कि तुम जीनियस हो..?

उदय- हाँ.. मुझे बुखार आने लगता है... पूरा शरीर ठंड़ा पड़ जाता है... जब कभी मैं वह सब देखने लगता हूँ जो असल में वहाँ नहीं है।

मदन- दिग़भ्रम...?

नवाज़- क्या..?

मदन- Hallucination....|

नवाज़- आ... अच्छा..। तो यह कैसे शुरु हुआ था... यह दिगभ्रम तुम्हें?

उदय- हाँ.....यह कहाँ शुरु हुआ ?.... यह शुरु हुआ उस रात जब मैं मेरी माँ को अस्पताल लेकर जा रहा था..उनकी अचानक तबियत बिगड़ गई थी। तभी शहर में दंगे शुरु हो गए... मैं उनको लेकर एक छोटी सी मोची की दुकान में जाकर छुप गया....। दो दिन और दो रात मैं उनको लेकर वहीं बैठा रहा...। अस्पताल मेरे सामने था पर मैं रोड क्रास ही नहीं कर पा रहा था। कहते हैं कि वह इलाक़ा सबसे ज़्यादा दंगा ग्रस्त इलाक़ा था।... मैंने एक रात, उस दुकान के छेद में से झांककर देखा कि कुछ लोग, कुछ लोगों को मार रहे हैं, काट रहे हैं.. बुरी तरह। तब यह पहली बार हुआ, मुझे बुखार सा आने लगा,पूरा शरीर ठंड़ा पड़ गया... और मैंने देखा कि यह सब लोग बच्चे हैं.... छोटे बच्चे... जो चोर-पुलिस, या हिन्दू मुसलमान खेल रहे हैं...।. और मुझे लगने लगा कि, अभी कहीं से इनके माँ-बाप निकलकर आएगें और सबको डॉट लगा देंगें कि- ’चलो बहुत रात हो गई है, अब बंद करो यह खेल....।’ और सारे बच्चे खेलना बंद कर देगें, वह भी जिसने अभी-अभी बहुत से लोगों को काटा था और वह सारे भी जो मरे कटे पड़े हुए थे.... सभी उठेगें और अपने-अपने घर चले जाएगें।

नवाज़- और तुम्हें लगने लगा कि तुम जीनियस हो...?

उदय- नहीं ... मैं तो एक डाँक्टर को दिखाने गया था बहुत पहले... तो उसने यह शब्द कहा था कि...’तुम्हें लगता है कि तुम जीनियस हो?’... तो मुझे लगा कि शायद मैं ऎसा ही सोचता हूँ और यह ही मेरी बिमारी है...। तब से मेरा इलाज चल रहा है...।

नवाज़- इलाज से कुछ फायदा हुआ।

उदय- हाँ... हुआ तो... पर अभी एक मंदिर पर घटना हुई थी जिससे मैं थोड़ा डर गया सो....।

मदन- मंदिर पर क्या हुआ था? कौन सा मंदिर...?

नवाज़- यार तुम एक बार में अपनी पूरी बात क्यों नहीं कह देते...?

उदय- मैं कह चुका हूँ। बस मुझे और कुछ नहीं कहना।

मदन- अरे! वह मंदिर वाली बात..।

नवाज़- यह कह दी तुमने अपनी बात....। जैसे कोई तुमसे पूछे कि तुम्हारा नाम क्या है तो तुम्हारा जवाब होना चाहिए कि मेरा नाम फला-फला है। बस बात खत्म हो गई... पर तुम कहते हो मेरा नाम फलॉ-फलॉ है पर... या लेकिन? अरे! यह लेकिन का क्या मतलब है।

उदय- लेकिन अभी बहुत दिनों के बाद अपने डाँक्टर को छोड़कर किसी और से यह बात कहीं है तो मुझे अच्छा लग रहा है।

(नवाज़ घड़ी देखता है.... और परेशान हो जाता है।)

नवाज़- हे भगवान! आधे घंटे हो गये और मैं अभी तक सोया नहीं हूँ, मेरा सोना बहुत ज़रुरी है। चार बजे से पहले नहीं उठूगाँ।

मदन- आप अगर इतना परेशान हो रहे हैं तो वहाँ पीछे की तरफ क्यों नहीं चले जाते...?

नवाज़- पीछे की तरफ कहाँ...? वह हिरणों और खरगोशों के बीच... या वह बच्चों के झूलों में दुबककर सोऊं...। देखिए मुझे सोना है और मैं यहीं सोऊगाँ...अगर आप लोगों को यह बेहूदा बातें करनी है तो आप दोनों क्यों नहीं पीछे चले जाते हैं। अगर यहाँ बैठना है तो एकदम चुपचाप बैठिए... मैं सो रहा हूँ।

(नवाज़ वापिस सोने चला जाता है। मदन कुछ देर चुप रहता है।)

मदन- मुझे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं तो बस अपनी जगह बैठना चाहता हूँ, जहाँ यह जीनियस महाश्य चिपककर बैठ गये हैं।

उदय- आप यहीं क्यों बैठना चाहते हैं?

मदन- मैं नहीं बता सकता।

उदय- अजीब पागलपन है? मुझे तो लगता है कि यह पागल है, इन्हें इलाज की ज़रुरत है। क्या कहते हैं आप?

मदन- अरे! हम दोनों की बात में आप उन्हें क्यों घसीट रहे हो? उन्हें सोने दो..।

उदय- अरे वाह! आप लड़कर यह जगह लेना चाहते हैं? उन्हें फैसला करने दो?

मदन- ठीक है जो यह फैसला करेगें मैं भी मान लूगाँ।

उदय- जी... कहिए? आप जो कहेगें हम वो ही करेगें।

(नवाज़ उठता है...और वहाँ से चला जाता है। मदन और उदय एक दूसरे को देखते रह जाते हैं।)

मदन- एक भला आदमी यहाँ सो रहा था आपने उसे भी भगा दिया... बस वहाँ बैठे रहने की ज़िद्द में।

उदय- देखिए असल में...?

मदन- रहने दो अब माफ़ी मत माँगना मुझसे, पहले ही एक बार मैं माफ़ कर चुका हूँ... बेशरम कहीं के... अरे! अजीब शैतान हो कम-से-कम देख तो लीजिए कि वह बेचारा कहाँ गया है। स्कूल में कभी पढ़ा नहीं यहाँ पढ़ने का नाटक कर रहे हो..।

(उदय उठके जाता है... और पीछे आवाज़ लगाता है... तब तक मदन उदय की जगह बैठ जाता है... बेंच के एकदम किनारे पर... ऊपर देखकर मुस्कुराता है फिर आँखे बंद कर लेता है। तब तक उदय वापिस आ जाता है।)

उदय- अरे! कैसे हो तुम.... उठो... उठो मेरी जगह से...।

मदन- रुको... रुको...।

उदय- अरे उठो मेरी जगह से... मेरी जगह हथियाना चाहते हो।

(उदय, मदन को ज़बरदस्ती उठा देता है।)

मदन- यह क्या ज़बरदस्ती है। बाहर से हमारे गाँव में आए हो और हमें हमारी ही जगह से उठा रहे हो?

उदय- अरे... यह तुम्हारा चहरा गीला क्यों है?

मदन- मैं नहीं बता सकता। मुझे बस थोड़ी देर और बैठने दो... बस थोड़ी देर और...।

उदय- नहीं हटो.. यह क्या पागलपन है.. हटो... हटो।

(दोनों में हाथा पाई होने लगती है.... तभी नवाज़ अंदर आता है, उसके हाथ में एक डंड़ा है। वह अपनी जगह पर बैठता है और ज़ोर से एक ड़ंड़ा ज़मीन पर मारता है.. दोनों डर जाते हैं।)

उदय- मैं आपको बुलाने गया था... और यह मेरे जाते ही यहाँ मेरी जगह बैठ गए... इतने बेशरम है कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे हैं।

नवाज़- दोनों इस तरफ चलो... चलो..।...
(दोनों दूसरी तरफ आ जाते हैं.... नवाज़ उस जगह को देखता है ध्यान से... ।)

क्या है इस जगह मैं ऎसा... और सामने भी बस ये एक पेड़ है...और...(थोड़ा झुकता है) और....

(तभी उसकी निग़ाह सामने की बालकनी पर खड़ी एक लड़की पर पड़ती है, जो अपने बाल सुखा रही है।)

ओह! तो इस जगह के यह फायदे...।

उदय- क्या... क्या फायदे हैं?

(उदय भी झुक्कर देखता है,उसे वह लड़की दिखती है।)

मदन- आप जो समझ रहे हैं... वह एकदम ग़लत है।

नवाज़- इसके अलावा क्या समझा जा सकता है? आप बता दो हम वही समझ लेगें।

(उदय भी आकर उस लड़की को देखता है...तभी वह चली जाती है।)

उदय- ओह!... अरे वह तो चली गई।

मदन- चली गई...?

(मदन उसे देखने जाता है... वह दोनों उसे धक्का दे देतें हैं।)

मदन- वह अभी वापिस आएगी। अभी उसने सिर्फ अपने बालों को धोया है... अभी वह उसे शेम्पू करेगीं फिर कंडिशनर लगाएगी और फिर वापिस आएगी।

नवाज़- आप टीचर हैं... आपको यह सब शोभा देता है। शर्म आ रही है मुझे मेरा बेटा आपके स्कूल में पढ़ता है।

मदन- जी मैं ऎसा ही टीचर हूँ...बच्चे मुझे स्कूल में गब्बर सिंह कहकर बुलाते हैं। आप चाहें तो अपने बच्चे को स्कूल से निकाल सकते हैं।

नवाज़- मेरा बच्चा क्यों निकलेगा स्कूल से, मैं आपकी शिक़ायत करुगाँ... आप निकाले जाएगें स्कूल से।

मदन- क्या दोष है मेरा..? कि मैं इस जगह बैठना चाहता हूँ।

(यह कहकर वह वापिस उदय की जगह पर बैठ जाता है.. उदय उसे उठा देता है।)

उदय- दोष है कि आप इस जगह बैठकर उन्हें ताड़ रहे हैं, जो एक तरह से लड़की छेड़ना है।

मदन- आप इसे जो भी समझे...।

उदय- और आपका चहरा गीला क्यों हैं?

मदन- यह मैं नहीं बता सकता।

नवाज़- आपका चहरा गीला क्यों है।

मदन- ठीक है मैं आपको पूरी बात बताता हूँ... अगर इस बात को सुनने के बाद भी... आपको लगे कि यह लड़की ताड़ना या छेड़ना है तो आप जो कहेंगें मैं करुगाँ और अगर नहीं तो यह जगह मेरी। बोलो मंज़ूर...।

नवाज़- पहले तुम अपनी बात तो बताओ।

मदन- सुनो....वह हमारे स्कूल की गणित की टीचर हैं... वह सामने के घर में रहती है... यहाँ, सिर्फ इस जगह से उसके घर की बालकनी दिखती है।

नवाज़- छी... अपने ही स्कूल की गणित की टीचर के साथ।

मदन- आप पूरी बात सुनेगें..... मैं पहले भी, बिना किसी वजह के, यहाँ आया करता था...। एक दिन.. मैं यहीं बैठा हुआ था... काफ़ी भीड़ थी इस पार्क में, वरना मैं कभी यहाँ नहीं बैठता था, मेरी जगह तो वह थी, जहाँ अभी आप बैठे हुए हैं।

उदय- अरे! बात पर आओ ना।

मदन- वही बता रहा हूँ.... उसी दिन वह आई अपनी बालकनी पर... नहाने के बाद अपने बाल सुखाने... मैं उसे देख रहा था.... तभी उसके बाल झटकने के साथ ही उसके पानी के छीटे उड़ते हुए सीधे मेरे मुँह पर आए... जबकि उस दिन हवा भी नहीं चल रही थी...। मैंने सोचा यह मेरा वहम होगा। उस वहम की जॉच के लिए मैं बार-बार यहाँ आने लगा। आप आश्चर्य करेंगें, वह पानी के छीटे ना तो दाँए जाते हैं ना ही बाँए... वह उसके बॉलों से निकलकर सीधे मेरे चहरे पर आते हैं।

नवाज़- उसे यह बात पता है?

मदन- नहीं...। अभी तो मुझे भी नहीं पता कि यह बात क्या है?

उदय- और ..?

मदन- और क्या, मैंने बता दिया... बस यह ही है, और इसकी मुझे आदत लगी हुई है।

उदय- तुम इसका इलाज कराना चाहोगे।

मदन- नहीं... बस यही तो एक चीज़ है जिसके कारण मैं खुद को थोड़ा विशेष महसूस करता हूँ। वर्ना टीचरी करते तो दिन गुज़र ही रहे हैं। अब बताओ... क्या यह लड़की ताड़ना या छेड़ना है?

नवाज़- नहीं...पर।

मदन- तो मुझे मेरी जगह पर बैठने दो... चलो हटो।

उदय- मैं अपनी जगह से नहीं उठूगाँ बस।

(मदन ज़बरदस्ती उसे उठाने लगता है।)

नवाज़- सुनों भाई... यह लड़की छेड़ना या ताड़ना तो नहीं है... लेकिन यह, लड़की, नहीं छेड़ना या नहीं ताड़ना भी नहीं है।

उदय- अरे, यह यहाँ बैठकर ताड़ ही तो रहे हैं।

नवाज़- पर यह लड़की छेड़ने के दायरे में नहीं आता।

मदन- सुनों अब बहस का कोई फायदा नहीं है... यह जगह मेरी है.. उठों यहाँ से..।

नवाज़- नहीं रुको... अभी उसने अपनी बात नहीं कही है। उसे अपनी बात भी तो कहने दो...। फिर तय करेगें कि यह जगह असल में ज़्यादा किसकी है।

मदन- अरे! यह तो वजह बता चुके हैं.. इनकी बिमारी है... एक बार आप अपने आपको जीनियस समझ लो तो बस खेल खत्म... फिर तो आपको लगने लगता है कि पूरी दुनियाँ पर आपका ही अधिकार है। हिटलर को भी तो यह ही बिमारी थी।

उदय- आप मेरी बिमारी का मज़ाक उड़ा रहे है?

मदन- अरे तो आप बीमार है तो....!!!

नवाज़- दोनों चुप... चलिए अब आप इस जगह पर अपना अधिकार सिद्ध करिए?

(उदय गंभीर हो जाता है... उसे अपनी जगह जाती हुई दिखती है।)

उदय- अरे यह क्या है.. मैं क्या अधिकार सिद्ध करुँ..? यह जगह मेरी है.. और आप इसके गवाह है।

नवाज़- तुम तो पहले यहाँ आकर बैठे थे ना...?

उदय- तो आप ही ने मुझे वहाँ से उठा दिया? अब मैं यहाँ बैठा हूँ.. और यह मेरी जगह है।

नवाज़- नहीं तुम समझ नहीं रहे हो... उस जगह से उनका इतिहास जुड़ा है, अब। और हम दोनों इस बात के गवाह भी है कि वह झूठ नहीं बोल रहे हैं.... इतिहास जिनका जगह उनकी...।

उदय- मैंने अभी-अभी LAW पास किया है.. मुझे कानून पता है...। किसी भी सार्वजनिक जगह से उठाने का हक़ किसी को नहीं है।

नवाज़- पर वक़ील साहब, इस वक़्त इस जगह की समस्या को लेकर कानून तो मैं ही हूँ... और मेरे हाथ में डंड़ा भी है। आप ही ने यह अधिकार मुझे दिया हुआ है...फैसला करो? फैसला करो? सो अब कर रहा हूँ मैं फैसला... कानूनन। जहाँ तक सार्वजनिक शब्द का प्रश्न है, इस देश में इसका कोई महत्व नहीं है।.. यहाँ सब सार्वजनिक है और कुछ भी सार्वजनिक नहीं है। वक़ील साहब और कुछ है आपके पास कहने को...।

उदय- वाह! यह तो ऎसा हो गया कि मेरा घर था... जिसमें मैंने आपको सुस्ताने का मौक़ा दिया...आप वहाँ पसर गए.. अब जब मैं यहाँ आकर बैठा हूँ तो आप किस्से कहानियाँ बनाकर मुझे यहाँ से.. मतलब इस घर से निकाल निकाल रहे हैं।

मदन- अरे यह पार्क है... घर का इससे क्या संबंध.. कुछ भी दलील दे रह हैं यह।

उदय- टीचर हो? उदाहरण नहीं समझते, क्या होता है?

(तभी मदन गुस्से में उसके पास जाता है।उदय और गुस्सा हो जाता है।)

उदय- सुनों तुम इधर आने की सोचना भी नहीं, वरना मैं... मैं... अपनी जगह के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

मदन- यह देखिए मुझे मारने की धमकी दे रहे हैं?

नवाज़- देखिए यह गाँधी पार्क है... यहाँ यह सब नहीं चलेगा।

मदन- गोड़से कहीं के....।

उदय- sorry... sorry... ठीक है अब यह सुनों....उदाहरणार्थ!!!

नवाज़- क्या? क्या..?

उदय- ...अब मैं इस जगह पर अपना अधिकार सिर्फ इसी तरीक़े से सिद्ध कर सकता हूँ. ..उदाहरणार्थ....! आशा करता हूँ आप सब पढ़े-लिखे होगें., यह सुनिये...उदाहरणार्थ....। उस बेंच को अगर फिलिस्तीन मान ले तो आपने तो मुझे अरब बना दिया.... मैंने इन(नवाज़) यहूदी को अपने यहाँ पनाह दी, और इन्होंने मुझे अपने ही घर से निकाल दिया। अब मैं अपनी इस छोटी जगह के लिए लड़ना चाहता हूँ तो आप मुझे ही कह रहे हैं कि यहाँ यह सब नहीं चलेगा।

मदन- यह क्या बात कर रहे हैं?

नवाज़- मैं इसका जवाब देना चाहता हूँ...।भईया, लेकिन ईश्वर के फरिश्ते से.. अब्राहिम के बेटे याक़ूब को इज़राईल की उपाधि मिली थी..॥ यह असल में यहूदियों का ही शहर था..। यह फिलिस्तीन नहीं इज़राईल ही था।.यह अलग बात है कि यहूदी.. वह वहाँ कभी रह नहीं पाए, पर था तो उनका ही..... सो एक दिन वह आ गए वहाँ रहने...’भाई यह हमारी जगह है, हटो यहाँ से...’..बात खत्म..। अब इसमें कोई क्या कर सकता है कि अरबी (उदय की तरफ इशारा करके...) भाषा में इज़राईल का अर्थ... यमराज है, मौत का देवता।

उदय- पर उन बेचारो(अरब लोगों) का क्या जो उसे अपना घर समझे बैठे थे? अचानक आप ईश्वर की बातों को कोट कर-करके उनसे सब कुछ छीन लो?

मदन- यार यह क्या बात हो रही है?

उदय- वही जो उनके साथ वहाँ हुई, आप लोग मेरे साथ यहाँ कर रहे हो... यहूदी कहीं के।

मदन- यहूदी? अरे, मैं तो बस इस पार्क बेंच के इस कोने पर बैठना चाहता हूँ...? इसमें आपको इतनी समस्या क्यों है। बहुत हो गया आप उठिये यहाँ से...।

उदय- मैं आपको यह जगह तो नहीं दूगाँ चाहे कुछ हो जाए....पर अगर आप इस जगह के लिए इतने ही पगला रहे हैं तो मैं एक काम कर सकता हूँ... अगर यह मुझे अपनी जगह दे दें, तो वहाँ चला जाऊगाँ...चूकि शुरु में मैं वहीं आकर बैठा था...और फिर आप उनसे यह जगह माँग लेना?

मदन- यह तो एकदम ठीक है... चलो उठो?

उदय- ठीक है चलो.... लेकिन पहले आप उन्हें उठाईये।

मदन- चलिए साहब यह तो सारी समस्या ही सुलझ गई। उठिए...?

नवाज़- मुझे कोई आपत्ती नहीं है... रुको मुझे ज़रा सोचने दो?

मदन- इसमें क्या सोचना है... सीधी बात तो है।

नवाज़- बात जितनी सीधी आपको दिख रही है उतनी सीधी नहीं है.... मुझे यह जगह आपको देने में कोई आपत्ति नहीं है.. पर मुझे, मेरी जगह से उठा दिये जाने से एतराज़ है।

मदन- भाई आपको आपकी जगह से कोई नहीं उठा रहा है... आपको बस इस जगह के बदले वह जगह दी जा रही है।

नवाज़- और फिर उसके बाद आप मुझे वहाँ से भी उठा देगें... और कहेगें कि आप इधर आ जाओ, मुझे वहाँ बैठ जाने दो?

मदन- हाँ।

नवाज़- मतलब... आप लोगों की वजह से मैं दो बार अपनी जगह से उठाया जाऊगाँ, जबकि मैं तो महज़ यहाँ सोना चाहता था।

मदन- पर आप यह क्यों नहीं मान लेते कि आपकी असल में जगह यह है।

नवाज़- कैसे मान लूँ... मैं यहाँ बैठा हूँ, मेरी यह जगह है, बस।

मदन- मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप लोग इतनी छोटी सी बात को इतना तूल क्यों दे रहे हैं... अरे यहाँ पार्क में हम तीन हैं, तीन बेंचे रखी है, कोई कहीं भी बैठे क्या फर्क़ पड़ता है... आप लोगों ने तो, इसे एक मुद्दा बना लिया है और इस सबमें, बस मैं पिस रहा हूँ...। अरे आप लोगों को तो बस समय काटना है पर मेरे लिए वह जगह ज़रुरी है।

(मदन गुस्से में बैठ जाता है....। तीनों शांत बैठे रहते हैं।)

नवाज़- तुम कभी कश्मीर गए हो?

मदन- नहीं...।

नवाज़- मैं भी कभी नहीं गया। मैंने हमेशा उसे अपने भारत के नक्शे में ही देखा है... पर अगर कोई दूसरा देश हमसे कहता है कि कश्मीर तुम्हारा नहीं हमारा है... तो मुझे बड़ी बेचेनी महसूस होती है। मुझे अच्छा नहीं लगता। भले ही कश्मीर, या इस जगह से, मेरा कोई सीधा संबंध नहीं है... पर मुझे पता है कि यह जगह अभी हमारी है.... हमारा देश है... हमसे कोई नहीं छीन सकता।

मदन- आप क्या कहना चाहते हैं? मैं आपसे कश्मीर मांग रहा हूँ?

उदय- अरे उनके कहने का मतलब वह नहीं है...। अरे यह सब उदारणार्थ चल रहा है।

मदन- अरे! पर इस बेंच की इस जगह का कश्मीर से क्या संबंध है?

उदय- संबंध बेंच का नहीं है संबंध जगह का है... और जगह से उठा दिये जाने का है।

मदन- पर मैं उन्हें दूसरी जगह दे रहा हूँ... मतलब यह और उसके बाद यह..।

उदय- (नवाज़ से...)लोगों को जब उनकी जगह से निकालकर दूसरी जगह फेंक दिया जाता है.. तो वह.. कभी भी उसे अपनी जगह के रुप में स्वीकार नहीं कर पाते। वह, उनकी पुश्ते पूरी ज़िदगी इंतज़ार करते है, इस आशा में कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा और उन्हें वापिस बुलाकर उनकी जगह दे दी जाएगी। जैसा चाईना ने तिब्बत के साथ किया है।

नवाज़- (उदय से...)पर ऎसा कभी होता नहीं है... कोई किसी को निकाल दिये जाने के बाद, जगह वापिस नहीं देता...। जब तक आप उस जगह पर हो, तभी तक वह जगह आपकी है। बाद में तिब्बत, उनके लामा कितना ही चिल्लाते रहें....कि ’यह जगह हमारी थी’, ’यह जगह हमारी थी’... पर कोई सुनने वाला नहीं है।

मदन- अरे कौन तिब्बत है और कौन सुनने वाला? किसकी बात कर रहे हैं आप लोग?

उदय- जैसे तुम्हारा इतिहास इस जगह से जुड़ा है वैसे ही ’जगह से उठा दिये जाने का इतिहास’ मुझ से जुड़ा है।

मदन- यह क्या इतिहास है? ऎसा कोई इतिहास मैंने तो नहीं पढ़ा है?

उदय- यही दिक़्कत है कि हमें कभी इस इतिहास के बारे में पता ही नहीं होता। वह जगह मेरी थी... जहाँ से इन्होने मुझे उठाया था...अब वह सारा पुराना इतिहास भूलकर, देखो कैसे उस जगह के लिए आपसे लड़ रहे हैं... मानो यह उन्हीं की जगह है।

नवाज़- अरे आप यह, छोटी सी बात भूल क्यों नहीं जाते?

उदय- मैं क्यों भूलूगाँ... जगह से उठा दिया जाना एक तरह का ह्यूमिलेशन है...। अगर आपको ऎसा नहीं लगता है तो दे दीजिए अपनी जगह?

नवाज़- (उदय से...)आईये आप अपनी जगह ले लीजिए।

उदय- नहीं आप बात को समझे नहीं, आप अभी जगह मुझसे बदल रहे हैं...यह आसान है... मैं जगह से उठा दिये जाने की बात कर रहा हूँ...। सो आप इनके कहने पर वह जगह छोड़िये तो मैं आपको यह जगह दूगाँ।

नवाज़- कान ऎसे पकड़ो या ऎसे, बात तो एक ही है ना।

उदय- बात एक नहीं है... आप कान वैसे पकड़िये जैसे मैं कह रहा हूँ। तब देखता हूँ आप कैसे पकड़ते हैं कान?

मदन- अरे भाई पकड़ क्यों नहीं लेते अपने कान... जैसे यह कह रहे हैं.. पकड़ लो अपने कान।

नवाज़- मैं क्यों पकडू अपने कान।

मदन- भाई आप मुझे बताईये कैसे पकड़ने है कान.... इनके बदले मैं पकड़ लेता हूँ अपने कान।

उदय- तुम बात को नहीं समझ रहे हो।

मदन- अच्छा... मैं यह जगह चाहता हूँ.. और मैं ही बात को नहीं समझ रहा हूँ?

नवाज़- भाई यह सब उदाहरणार्थ चल रहा है।

मदन- अरे भाई यह क्या उदाहरणार्थ है? आप मुझे अभी समझाईये क्या है यह उदारणार्थ...?

नवाज़- समझाऊँ?

मदन- जी।

नवाज़- तो सुनिये.... अकड़, बकड़ बाम्बे बो...ठीक है... अस्सी नब्बे पूरे सो... सो में लगा धागा... चोर निकलकर भागा.... वह भागा और यह जगह मेरी... समझे?

मदन- (अपनी तरफ उंगली करके...) बाम्बे... नब्बे.. चोर.. नहीं नहीं.. यह क्या है... यह गलत है...आप मुझे सीधी बात बताईये कि आप उनके साथ यह जगह बदल रहे हैं कि नहीं?

नवाज़- अब सीधी बात तो यह है कि, मैं बदलने को तो तैयार हूँ पर अब यह ही नहीं मान रहे हैं।

मदन- आप तैयार है ना.. बस रुकिये..(उदय के पास जाकर)अब आप क्यों अपनी बात से मुकर रहे हैं...।

उदय- मैं नहीं मुकर रहा हूँ मैं कह रहा हूँ पहले आप उन्हें उनकी जगह से उठाईये, तब मैं वहाँ जाकर बैठूगाँ।

मदन- पर यह बात तो एक ही है ना? क्यों??? अरे देखिए... आप ही उठ जाईये, उठिये..उठिये ना।

उदय- आप ही जैसे लोगों की वजह से आदिवासी नक़्सल बनते जा रहे हैं।

मदन- क्या मतलब है मेरी वजह से..?

उदय- अगर उन्हें बार-बार अपनी जगह से उठाओगे तो उनके पास हथियार उठाने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं बचेगा।

मदन- यह उदाहरणार्थ मेरी समझ में आ रहा है.. यह सुनो जीनियस...। अगर आदिवासियों को उनकी जगह से उठाकर दूसरी जगह नहीं दोगे तो वह तो हथियार उठाएगें ही। पर मैं तो इन्हें दूसरी जगह दे रहा हूँ। हाँ... हाँ... हाँ... मज़ा आ गया.. अब बोलो...उदाहरणार्थ?

उदय- जब आप समझ ही गए हैं तो... आप यह भी समझ गए होगें कि... मैं क्यों कह रहा हूँ कि आप, उन्हें उनकी जगह से उठाईये..?

मदन- हाँ में समझ गया... आप आदिवासी नहीं बनना चाहते है।

नवाज़- आप रहने दीजिए... मैं समझ गया यह क्या करवाना चाहते है...। मुझे फर्क़ नहीं पड़ता.. आईये आप मुझसे कहिए, ’कृप्या यहाँ से उठो..”, मैं यहाँ से उठ जाऊगाँ।

मदन- ठीक है... ’कृप्या यहाँ से उठिये...?’

(नवाज़ उठता है...।)

उदय- नहीं... ऎसे नहीं... कोई भी अपनी जगह, इतने प्यार से नहीं छोड़ता। अपनी जगह छोड़ने में तकलीफ है.... । आपको आपके स्वर में, ज़बरदस्ती का भाव लाना पड़ेगा।

मदन- अरे! वह उठ तो रहे हैं? कैसे उठ रहे है.. इससे क्या फर्क़ पड़ता है?

उदय- फर्क़ पड़ता है... क्योंकि उठना महत्वपूर्ण नहीं है... महत्वपूर्ण है उठाया जाना। उन्हें कोई फर्क़ नहीं पड़ता है ना... तो आप कहिए... और ऎसे कहिए, मानों आपके घर में किसी ने ज़बरदस्ती कब्ज़ा कर लिया है और निकलने का नाम नहीं ले रहा है।

नवाज़- हाँ मुझे फर्क़ नहीं पड़ता है पर मैंने किसी के घर पर कब्ज़ा नहीं किया है।

उदय- मैं सिर्फ भाव समझा रहा था। बोलो...

मदन- उठिये आप बस.. अभी...।

उदय- नहीं, वाक्य में अभी भी बहुत इज़्ज़त है। गुस्से में...

नवाज़- अरे सुनो... एक बार में बोलो ना जो भी भाव-वाव से बोलना है और बात खत्म करो... चलो।

मदन- उठो मेरी जगह से.. अभी... इसी वक़्त.. वरना मैं कुछ भी कर सकता हूँ।(बहुत गुस्से में नवाज़ की गिरेबान पकड़ लेता है।) उठ.. तेरी समझ में नहीं आ रहा है क्या? बहरा है क्या तू.... उठ... वर्ना मैं तुम्हें धक्के मारते हुए उठाऊगाँ.. उठता है कि नहीं? चल उठ....

(नवाज़ अवाक सा उसे देखता रह जाता है...मदन गिरेबान से हाथ हटाता है... नवाज़ खड़ा हो चुका है... नवाज़ और उदय दोनों एक साथ चलना शुरु करते है... उदय उठके नवाज़ की जगह पर आकर बैठता है... और नवाज़ उदय की...)

मदन- माफ करना वह जोश-जोश में मेरे मूँह से निकल गया... मेरा इरादा इतना ऊँचा बोलने का नहीं था। (उदय से...) क्यों क्या ज़्यादा जोर से बोल दिया मैंने।

उदय- नहीं, ठीक बोला।

मदन- अभी तो उन्हें वहाँ से भी उठाना है। बोलू उन्हें?

(उदय उसे देखता है, मदन खुद ही चुप हो जाता है।)

नवाज़- कितना वक़्त हो रहा है?

उदय- साड़े तीन बज रहा है।

नवाज़- बस आधे घंटे में मेरे बेटे का रिज़ल्ट है। सोचा था पहले सोते हुए समय गुज़ार दूगाँ... पर तुम लोगों की बक़वास के चक्कर में सो नहीं पाया... फिर सोचा तुम लोग सोने तो दोगे नहीं... चलो साथ बक़वास करता रहूगाँ..तो समय गुज़र जाएगा।

उदय- हाँ देखो.. साढ़े तीन तो बज ही गए हैं।

मदन- क्या आप अब चार बजे तक वहीं बैठे रहेगें? वह बस आती होगी।

उदय- शू...शू...।

नवाज़- मेरे बेटे के साथ मैं दस साल इसी पार्क में खेला हूँ... उसे यह पार्क उसके घर से भी अच्छा लगता है।

उदय- क्या उम्र है आपके बेटे की..?

नवाज़- पंद्रह साल का है वो...।

मदन- पर आज रिज़ल्ट तो सिर्फ पाचवीं क्लास का खुलने वाला है?

नवाज़- वह पाचवीं क्लास में ही पढ़ता है। वह दिमाग़ी रुप से थोड़ा कमज़ोर है।

मदन- हाँ मैं उसे जानता हूँ... वह मेरी संगीत क्लास में भी आया था... वह तो विकलांग है, क्या नाम है उसका...?

नवाज़- विकलांग नहीं है वह... आप जैसे लोगों की वजह से वह पास नहीं हो पा रहा है...

मदन- देखिए मैं ऎसा सोचता हूँ कि....

नवाज़- आप क्या सोचते हैं इससे मुझे कोई मतलब नहीं है.... मैं आपको मुँह ज़बानी पाँचवीं कक्षा का पूरा पाठ सुना सकता हूँ.... हर साल उसे तैयार करता हूँ.... पिछले चार सालों से... उसका पास होना हम दोनों के लिए बहुत ज़रुरी है।

मदन- मैं उस लड़के को जानता हूँ यह पुत्र प्रे में पगला रहे हैं।

उदय- आप चुप नहीं रह सकते?

नवाज़- हाँ मैं पगला गया हूँ। तुम्हें पता है मैंने उसे दो साल पहले ही साईकल दिला दी थी? पर उसने उसको छुआ भी नहीं, वह जानता है कि वह पास नहीं हुआ है...। जब आप जैसे गब्बर सिंह जैसे टीचर... स्कूल में उसका मज़ाक उड़ाते हैं तो वह रात मैं खाना नहीं खाता...अब हम दोनों ने तय किया है कि हम जैसे ही पाचवीं पास होगें, हम खुद स्कूल छोड़ देगें... और इस सॉल मुझे पूरा विश्वास है कि वह पास हो जाएगा। मुझसे यह चार बजे तक का वक़्त ही नहीं कट रहा था, इसलिए मैंने सूअरों कि तरह ठूस-ठूस कर खाना खाया था.... कि पूरी दोपहर सोते हुए निकाल दूँ.... सीधा चार बजे उठूँ और मुझे रिज़्लट पता लग जाए.... मैं यह धीरे-धीरे रैंगता हुआ समझ बरदाश्त नहीं कर सकता

(तीनों कुछ देर चुप-चाप बैठे रहते है...)

उदय- आप उससे नकल करवा रहे हैं... यह ठीक नहीं है।

नवाज़- क्या...? मैं उसे पढ़ा रहा हूँ।

उदय- मैं उस नकल की बात नहीं कर रहा हूँ, हम सबकी इस कहानी में अपनी-अपनी भूमिकाएँ है... कोई व्यक्ति अगर ज़बरदस्ती किसी और की भूमिका निभाता है तो वह जी नहीं रहा है.. नकल कर रहा है...। हुसैन जीना चाहता है, नकल नहीं करना चाहता।

नवाज़- तुम्हें कैसे पता कि उसका नाम हुसैन है?

उदय- वही मेरी बिमारी, मुझे लगता है कि मैं जीनियस हूँ।

(नवाज़ उठकर उदय के पास आता है....।)

(मदन उठकर उदय की जगह पर जा ही रहा होता है कि... उदय बोलता है।)

उदय- (मदन से...) मेरी डॉक्टर ने मुझे एक बात बताई थी.. कि मेरी बिमारी का संबंध मेरे बचपन से है...। मैं जब पैदा हुआ था तो मेरे माँ बाप को लगा कि मैं एक special child हूँ। बस यही मेरी बिमारी बन गया,उस स्पेशल चाईल्ड की भूमिका ही मैं आज तक निभा रहा हूँ, जबकि मैं एक आम आदमी हूँ...और मज़े की बात है कि आपका बेटा एक स्पेशल चाईल्ड है... जबकि आप उसे आम आदमी बनाना चाहते हैं।

(मदन उठकर वापिस अपनी जगह पर बैठ जाता है। अब उदय और नवाज़ एक बेंच पर बैठे हैं... मदन बीच वाली बेंच पर और जिस बेंच की जिस जगह के लिए लड़ाई चल रही थी... वह खाली पड़ी हुई है।)

नवाज़- क्या हुआ? अब आपको अपनी जगह नहीं चाहिए? मैं आपसे बात कर रहा हूँ.. आपको सुनाई नहीं दे रहा है क्या?

उदय- सुनिये... अब आप अपनी जगह पर क्यों नहीं जा रहे हैं? जाईये वह खाली पड़ी है।

मदन- मैं यहीं ठीक हूँ।

नवाज़- नहीं, अब आप ’संत’ मत बनिये.... आपकी जगह खाली पड़ी है.. आप जाईये वहाँ पर...।

मदन- अरे रहने दीजिए... नहीं जा रहे हैं तो ना जाए?

नवाज़- क्यों... क्यों नहीं जाएगें वह... हमारी नाक़ में दम कर रखा था... कि यह मेरी जगह है... यह मेरी जगह है.... अब खाली पड़ी है जगह.. तो उन्हें जाना पड़ेगा... उठिए... उठिए आप...।

(नवाज़ ज़बरदस्ती उसे उठाने की कोशिश करता है..उदय रोकता है... पर मदन नहीं उठता है।....)

उदय- अरे सुनिये वह नहीं जाना चाहते है तो... रहने दीजिए... देखिए... रहने दीजिए...।

नवाज़- यह ऎसे नहीं मानेगें....

(नवाज़ सामने जाकर गणित की टीचर को आवाज़ लगाता है... उदय रोकता है।)

नवाज़- सुनिये... ओ गणित की टीचर... मेडम.. बाहर आईये... ओ.. टीचर जी....

उदय- अरे! यह आप क्या कर रहे हैं?

नवाज़- आप शांत रहिए....मेडम...टीचर जी...... सुनिये...मिस... मिस.. टीचर जी....।

मदन- चिल्लाईये... बुलाईये उनको...मैं भी आपका साथ देता हूँ... (चिल्लाता है...) मेडम.. सुनिये... मिस..बाहर आईये..। अरे आप क्यों चुप हो गए। चिल्लाईये... अब मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है....आप लोगों ने सब खत्म कर दिया है।

उदय- क्या? हमने...? हमने क्या किया?

मदन- यहाँ इस जगह में वह गणित की टीचर महत्वपूर्ण नहीं है... उसका वहाँ खड़े रहना, बाल सुखाना, कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है... जो महत्वपूर्ण था वह आज आपने खत्म कर दिया।

नवाज़- अरे, आप तो ऎसे इल्ज़ाम लगा रहे हैं मानो... हमने किसी का खून कर दिया हो?

मदन- खून ही हुआ है। मैं गब्बर सिंह हूँ...अपने स्कूल में.. घर में.. बाज़ार में... सब जगह...सारी जगह मैं विलेन हूँ.. बुरा आदमी। सिवाय इस जगह के... यहाँ इस बेंच पे.. मैं हीरो हूँ... अच्छा हूँ, सच्चा हूँ... मैं बस यहाँ पर ही मैं हूँ।आप लोगों ने अभी, इस मैं का खून कर दिया।... मुझे यहाँ भी आप लोगों ने विलेन बना दिया। अब मैं सब जगह गब्बर सिहं हूँ।

(उदय, मदन के पास जा रहा होता है... नवाज़ उसे रोकता है....। नवाज़, मदन के पास जाता है।)

नवाज़- देखो... मैं अपनी जगह के लिए कुछ भी कर सकता हूँ... तुम्ही ने मुझे यह जगह दी है... आप वहाँ अपनी जगह पर बैठीए....। जाओ भाई...।

(मदन उठता है..)

हुसैन- अब्बा !!!

( नवाज़ देखता है कि पीछे हुसैन खड़ा है।)

नवाज़- अरे बेटा... कितना बज गया... अरे! चार बज चुका है... रिज़ल्ट निकल गया होगा। बेटा तू यहीं रुक मैं अभी रिज़ल्ट लेकर आता हूँ।

हुसैन- अब्बा... रिज़ल्ट...?

( हुसैन डरा हुआ है.. नवाज़ रिज़ल्ट उससे छीनता है।)

नवाज़- रिज़ल्ट ले आए...? क्या हुआ?

हुसैन- सॉरी अब्बा...।

(हुसैन उदय से डर के मारे चिपक जाता है... उदय, हुसैन को संभालता है।)

उदय- अरे... क्या अभी भी रिज़ल्ट की ज़रुरत हे?

(नवाज़ हुसैन को देखता है... वह उदय से डर के मारे चिपका हुआ है...नवाज़ यह डर बर्दाश्त नहीं कर पाता और रिज़ल्ट फाड़ देता है। हुसैन को अपने पास खीचता है और गले लग जाता है... दोनों चले जाते है।)

(उदय देखता है कि मदन अभी भी बीच वाली जगह पर बैठा है... वह दूसरी बेंच पर जाता है तभी उसे गणित की टीचर बालकनी पर दिखती है।)

उदय- अरे... वह आपकी गणित की टीचर... आ गई।

(मदन उठने को होता है... पर कुछ सोचकर वापिस बैठ जाता है। उदय उसकी तरफ मुस्कुराकर देखता है... और उसे यहाँ आने का इशारा करता है। मदन वहाँ बैठता है वह उस लड़की को देखता है आँखें बंद करता है...। कुछ देर में आँखें खोलता है.. धीरे से उठकर मदन, उदय के पास आता है। उसके गाल छूता है...जो गीले हैं... दोनों मुस्कुरा देतें है... मदन चला जाता है।)

(उदय अकेला समय काट रहा होता है। वह हर बेंच पर मदन, नवाज़ बनकर.... अलग-अलग तरीके से बैठता है। अकेले बहस करके टाईम काटने की भी कोशिश करता है, पर उससे यह अकेलापन बर्दाश्त नहीं होता है। कुछ देर में वह अपना सामान उठाता है और चला जाता है।)

(कुछ ही देर में इति पार्क में आती है... वह चारों तरफ देखती है... उसे उदय दिखाई नहीं देता... उसे अपने आने पर ही हंसी आने लगती है.. वह SMIRK करके चली जाती है।)

इति सिद्धम्‍

2 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
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