शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

“हाथ का आया?... शून्य।“





अरण्य....
“हाथ का आया?... शून्य।“





Scene-0

(तीसरी घंटी बजते ही...जैसे ही हाऊस लाईट जाने को होती है, दर्शकों में बैठा अरुन अपनी जगह से उठता है और दूसरी तरफ बैठी हुई लड़की शशी... को आवाज़ लगाता है।)
अरुन- अरे...शशी... शशी..... (शशी के अगल बगल वालों से...) अरे भाईसाब... वह जो साड़ी में हैं... वह.... शशी... अरे मैंने तुम्हारे लीए यहाँ जगह रोकी है... शशी इधर... शशी.....।
(शशी पलटकर नहीं देखती हैं..... ब्लैक आऊट हो जाता है। ब्लैक आऊट में अरुन की आवाज़ आती है...”वह मेरे साथ नहीं बैठी है।“....) और नाटक शुरु हो जाता है।..........
Black out…


Scene-1

(हमें लोरी की आवाज़ सुनाई देती है। निधी और पूरब एक बक्सा खोल रहे है... निधी लोरी गा रही है... वह दोनों धीरे-धीर सामान निकालते हैं... उस बक्से से कुछ कप..प्लेट्स निकलती हैं।)
(जोकर प्रवेश करता है।)
जोकर- goooooooood moooorning sir, मेडम… how are you?........ hope you are fine… HAVE A GREAT DAY… BE HAAAAPY & STAY HAAAAPY… BYE.. BYE..

(यह कहकर वह चला जाता है। निधी और पूरब एक दूसरे को देखते रहते हैं।)
Black out…

Scene-2
(सर्कस मल्टी नेश्नल का बॉस जो कि बहुत ऊपर कहीं बैठा है… जोकर की सुंदर वेश-भूषा में…..)

बॉस- कहानी जो कभी खत्म नहीं होती... एक और कहानी...... हाँ यही है इसी का तो इंतज़ार था। हज़ारों तरीक़े से जी लेने के बाद यह था असल जो जीना था। इसे जी लो... फिर बस.... खत्म... इसके बाद सो जाना... चुप हो जाना.... इसे सह लो... कह लो... यही है वह...। नहीं, यह नहीं है... वापिस शून्य... कुछ ओर है... वह कहीं और है... यह नहीं है। हाँ यह वाली... इसे ही जीना है... कहना है.. कह देता हूँ... यही तो है वह जिसका इंतज़ार था... यही है.. इसे कह लूं... फिर बस... कोई नया शब्द नहीं.. कोई दूसरे अर्थ नहीं... सब चुप.. सो जाना... आँखें बंद कर लेना... फिर कुछ नहीं कहना... जीना... सहना...। अरे ना..फिर शून्य... यह कहाँ... यह तो बहुत ही... ना...ना...ना... इसमें तो कुछ नहीं है... मांस नहीं है.. कुछ चबाने को भी नहीं है... कब से जी रहा हूँ... चालीस साल.. पचास साल... फिर भी पहचाना जाता हूँ.... लोग शुरु से पहचान लेते हैं... देखते ही नाम से पुकार लेते हैं... मैं बदला नहीं... पैदा होने के बाद से वैसा का वैसा ही हूँ...। यह देखो इसके बाद बदलूगां... यही है वह... इसे जी लूं बस.. लोग देखेंगें... कहेंगें.. यह वह नहीं है... मैं भी चुप रहूंगा... कहूगां.. ऎसा ही तो जीना था.. यही है वह... इसे ही कह लू... सह लू.. जी लू... फिर चुप.. सो जाऊंगा.. चुप हो जाऊंगा.. कोई नया शब्द नहीं... कोई दूसरे अर्थ नहीं... बस यह.. एक बार... बस एक बार.... जी लू... । ना..यह तो वही है...वही, वैसा का वैसा... फिर लोगों ने मुझे पहचान लिया... मैं वही हूँ... बदला नहीं.. हर बार पहचाना जाता हूँ। फिर-दौबारा-वापिस शून्य.. शून्य.. शून्य।
शून्य की परिधी पर भागता रहता हूँ...। परिधी को लांगते ही प्लस वन पर पहुच जाता हूँ... वहाँ पहुचते ही अंको के जाल में फस जाता हूँ। प्लस वन... प्लस 5, +15, +85, +100 पर जितना भी आगे बढ़ता जाता हूँ उतना ही माईनस वन, -5, -15, -85, -100 दिमाग़ में धूमता रहता है। यह क्या है... positive में जाते ही negative दिमाग़ में घर बना लेता है। मैं भागकर वापिस शून्य की परिधी पर चक्कर लगाने लगता हूँ। भागते रहने से एक महात्मा दिखता है... वह कहता है शून्य के आगे-पीछे भागते रहोगे तो हमेशा प्लस-माईनस में फसे रहोगे... शून्य के ऊपर नीचे देखो पूरा संसार फैला पड़ा है। मैं खुद को गाली देता हूँ कि मैंने पहले यह क्यों नहीं सोचा... ’अरे पर वहाँ तो अंधेरा है.. अननोन है।’ तब तक महात्मा जी ग़ायब हो चुके है... मैं अननोन में कदम बढ़ाने जाता हूँ तो फस जाता हूँ वहाँ तो भीड़ है... धर्म... कॉनसेप्ट... नियम... भगवान... इंसान से वह भरा पड़ा है। अननोन में कुछ भी अननोन नहीं है। मैं भागकर वापिस शून्य पर आ जाता हूँ।


Scene- 3

(निधी और पूरब बैठे हैं एक जोकर भीतर प्रवेश करता है... दोनों उसे देखते रहते हैं...)
जोकर- goooooooood moooorning sir, मेडम… how are you?........ hope you are fine… HAVE A GREAT DAY… BE HAAAAPY & STAY HAAAAPY… BYE.. BYE..
पूरब- अरे ऎ.. ओए... सुनों..।
निधी- अजीब है...
पूरब- अगली बार आने दो...
निधी- रोज़ यही कहते हो...
पूरब- क्यों यह रोज़ नौ बजे चला आता है....।

Black out…

Scene-4

(अरुन और शशी जो कि दर्शको के बीच बैठे हैं और बात-चीत ऎसे ही शुरु होती है मानों वह दर्शक ही हों.....। अरुन और शशी दूर-दूर बैठें हैं।)
अरुन- वह मेरे साथ नहीं बैठी है... वह दूर है... कितनी दूर है? हम दोनों के बीच कितने लोगों का फासला है? कितने लोग..... एक, दो, तीन, चार, पांच....... सात... दस....? वह आप दस लोगों के उस तरफ है, सिर्फ दस लोग... बस.. इतनी सी दूरी वह तय नहीं कर पाई..।
(वह भागता हुआ लोगों के बीच से उसके पास पहुंचता है.... उसके सामने बैठ जाता है पर वह उसे नहीं देख पाती.... वह लगातार नाटक देख रही होती है।)
मैं नहीं देख पा रहा हूँ सामने क्या हो रहा है। तुम यहाँ क्यों बैठी हो? चलो मेरे साथ वहाँ... मत बात करना मुझसे... मैं तुमसे कुछ भी नहीं पूछूगाँ पर हम यूं अलग नहीं बैठ सकते हैं...। चलो....
(अचानक वह रुक जाता है... खडा होता है... और वापिस अपनी जगह जाने लगता है...।)

Scene-5

(पूरब बाहर से अखबार लेकर अंदर आते है।)
पूरब- अरे निधी जी... निधी जी मिल गया अखबार..। चाय ले आओ।
निधी- अजीब हरकतें हो रही है आजकल? कहाँ मिला..पूरब जी?
पूरब- किसी बच्चे की कारिस्तानी थी शायद... पढ़कर बाहर फेंक दिया था। चाय ले आओ।
निधी- गरम करने रखी है। क्या लिख रहे हो?
पूरब- लिखा है कि अगर अखबार पढ़ना है तो आपका स्वागत है। इसे बाहर चिपका दूंगा...।
निधी- क्यों उसे शर्मिदा कर रहे हो।
पूरब- चाय समेत..। चाय समेत आपका स्वागत है। अब मैं सबका ऎसे ही स्वागत करुगां।
निधी- मैं नहीं बनाऊगी किसी के लिए चाय... इसे पढ़कर अगर पूरा मोहल्ला आ गया तो?
पूरब- निधी जी आप ऎसा क्यों सोचती हैं कि यह पूरे मोहल्ले वाले आपसे चाय बनवाना चाहते हैं।
(निधी अंदर चाय लेने चली जाती हैं। तभी घंटी बजती है।)
पूरब- कितना बज गया?
निधी- ठीक नौ...।
(पूरब अंदर से एक डंडा निकालकर लेकर आता है।
(एक आदमी सूट-टाई पहने अंदर आता है... उसके चहरे पर मुस्कुराहट है... वह अपना सूटकेस नीचे रखता है।..दोनों को कुछ देर मुस्कुराता हुआ देखता है... अति-उत्साह में अपनी बात शुरु करता है।)
जोकर- goooooooood moooorning sir, मेडम… how are you?........ hope you are fine…
(अवस्थी जी और निधी जी उसे देखते रहते है... कुछ देर वह मुस्कुराता हुआ खड़ा रहता है। फिर वापिस उसी सुर में शुरु करता है।)
जोकर- HAVE A GREAT DAY… BE HAAAAPY & STAY HAAAAPY… BYE.. BYE..
(तभी निधी उठती है।)
निधी- ऎ...ऎ.. रुको, यह सब क्या है? हे... क्या है यह?
जोकर- क्या मेडम... कुछ problem है?
निधी- problem? यह देखिए क्या पूछ रहा है कि कोई problem है।
पूरब- मैं समझाता हूँ। देखो भाई तुम रोज़ सुबह नो बजे चले आते हो... जबकि हमने तुम्हें बुलाया नहीं है। हे ना? तो यह तो गलत है ना?
जोकर- इसमें क्या गलत है सर?
निधी- इसमें क्या गलत है? अरे? सुनों हम पुलिस को फोन कर देंगें।
जोकर- जी बिल्कुल कर दीजिए... लेकिन क्या कहेंगें आप उनसे कि मैं क्या करता हूँ? क्या मैं चोरी करने आता हूँ?
पूरब- अरे.. नहीं.. नहीं...
जोकर- क्या मैं आपको ज़बर्दस्ती कुछ बेच रहा हूँ?
पूरब- नहीं भाई...
जोकर- देखिए मेरा तो सूटकेस भी खाली है।
निधी- अरे.. तो तुम यहाँ क्या करने आते हो?
जोकर- आपका दिन अच्छा करने। एक सुंदर मुस्कुराहट के साथ यह कहने कि “have a nice day…” अब इस बात के लिए क्या आप मुझे जेल में ठूस देंगें?
पूरब- अरे नहीं भाई... सुनों.. चाय बन गई है.. आओ एक चाय पी लो... आओ बैठो... (निधी से..) अरे सुनों.. इनके लिए एक चाय ले आओ।
निधी- जी.. सॉरी हें... हम समझे आप... बिस्कुट भी लाती हूँ।

Scene-6
(अरुन.... अपनी जगह वापिस आ चुका है..... शशी को देखते हुए।)
अरुन- !! वह कैसे यहाँ आती..?. मैं सोच रहा था मुझे उसके पास जाना चाहिए.... मैं बस सोच रहा था, मैं वहां गया ही नहीं। मैं वहां नहीं गया उससे कहने कि चलो.. यहां मेरे साथ चलकर बैठो...। मैं यहीं से उसे ताकता रहा........
(कुछ देर उसको देखते हुए.....)
कोई नहीं बता सकता कि वह इस वक्त क्या सोच रही है? उसे पता है मैं यहाँ हूँ... उसने मुझे देख भी लिया है शायद...पर चहरे पर कोई हरक़त नहीं है... जब हम कभी कैफे में मिला करते थे तो मैं छुपकर उसे मेरा इंतज़ार करता हुआ देखता था... मजाल है कि किसी को पता चल जाए कि वह किसी का इंतज़ार कर रही है.. उसका चहरा देखकर कभी पता नहीं चलता कि वह क्या सोच रही है..? वह कहती है कि मैं बहुत ज़्यादा प्रकट हूं... मुझे तुम्हें इतना नहीं जानना है... वरना मैं बोर हो जाऊंगी.... वह बोर हो चुकी है मुझसे.... बोर...।
वह बहुत सुंदर है...। बहुत कुछ मेरी माँ जैसी लगती है... हाँ..। पर अगर उसने सुन लिया तो चिड़ जाएगी। उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता जब मैं उसे कहता हूँ कि तुम बिल्कुल मेरी माँ जैसी लगती हो.... सुंदर.....। मेरे लिए तो सुंदर is equal to माँ ही है... माँ जैसी सुंदर.... हा.. हा... हा.....।
लडकी- shut up…
अरुन- उसने सुन लिया क्या.... shit… सुन लिया ना... सुना उसने.. हे ना... ओह नो... शिट.. ।
शशी- just shut up……
(black out…)



Scene-7

(जोकर कुछ देर तक दोनों की तस्वीरे खींचता है... फिर केमरा रखकर....)
जोकर- जी बहुत मज़ा आया आप लोगों के साथ कितने सुंदर हैं आप लोग... लेकिन बड़े ही दुख के साथ कहना पढ़ रहा है.. कि यह मेरा आखिरी दिन है.. अब से मैं नहीं आऊंगा।
पूरब- अरे.. ऎसे कैसे...? आप क्यों नहीं आएगें? हम आपको पसंद करते हैं.. आप हमें पसंद करते हैं... सुबह नौ बजे हम एक दूसरे को “have a nice day” पिछले एक साल से कह रहे हैं... भई अब क्यों नहीं आएगें?
निधी- क्या आपकी शादी तय हो गई है?
जोकर- ना।
निधी- ट्रांसफर?
जोकर- ना।
निधी- हमसे कोई ग़लती हो गई?
जोकर- ना। हमारी कंपनी ने अब डोर-टु-डोर सर्विस बंद कर दी है।
जोकर- क्या?
निधी- कंपनी?
जोकर- जी, अब अगर आपको “have a nice day” कहना है तो आप सुबह नौ बजे हमारे ऑफिस आकर कह सकते हैं... यह रहा मेरा कार्ड... उसी में पता लिखा है... यहीं तीन सड़क छोड़कर है... हमारा ऑफिस..।
निधी- हम क्यों ऑफिस आकर “have a nice day” कहेंगें.. ना, हम नहीं आएगें।
पूरब- हाँ भाई हम क्यों आएगें।
जोकर- जी जैसी आपकी मर्ज़ी... वैसे सुबह walk करते हुए आप आ सकते हैं।
निधी- नहीं हम नहीं आएगें।
पूरब- ना... हम क्यों walk करें?
जोकर- कार्ड के पीछे देखिएगा.. अगर आप walk करते हुए अपने कुछ दोस्तों को भी “have a nice day” करने के लिए लाएगें... तो आपको स्पेशल प्राईज़ मिलेगा।
निधी- अरे कहा ना हमें नहीं आना है।
पूरब- नहीं आएगें हम।
जोकर- 0k sir….HAVE A GREAT DAY… BE HAAAAPY & STAY HAAAAPY… BYE.. BYE..

(पूरब जोकर का कार्ड उठाता है उसे फेंकने को होता है पर फेंक नहीं पाता...निधी को देता है... निधी फाड़ना चाहती है पर फाड़ नहीं पाती... उसे अपने बग़ल में रख लेती है।)

Scene-8

(जोकर शशी के बग़ल में बैठा हुआ है... कभी उसके गाल कभी उसके बालों को छूता रहता है।)
शशी- जब बचपन में माँ मेरे बाल बनाया करती थी तो हमेशा उन लड़को की बात करती थी जिनकी मैं संभावित पत्नि हो सक्ती थी....। उन लड़को में राजा.. राजकुमार से लेकर फिल्म अभिनेता अफसर सब आते जाते रहते थे। हर दिन माँ को पिछले दिन से बहतर कोई मिल जाता...। उनको नकुल-सहदेव.... या भरत-शत्रुघन से बहुत चिढ़ थी... बार-बार कहती थी नकुल-सहदेव, भरत-शत्रुघन से बचना... शादी करना तो अर्जुन से या राम से... बस, सीधी बात। ऎ क्या कर रहे हो? प्लीज़ मत करो... अरे....don’t touch me…
(यह देखकर अरुन खड़ा हो जाता है...।)
अरुन- ऎ क्या कर रहा है? ऎ क्या कर रहा है....?
जोकर- यह कौन है?
अरुन- तू कौन है? ऎ? यह कौन है?
जोकर- तू कौन है?
अरुन- तू कौन है? यह है कौन?
जोकर- यह कौन है?
अरुन- मैं? अरे यह क्या कर रहा है? छोड़ उसको... छोड़... शशी.. शशी....
(तभी जोकर अपना एक छोटा एक्ट करता है... जिसपर शशी हंस पड़ती है, पर अरुन उन्हें देखते हुए अपनी जगह वापिस चला जाता है। जोकर उसे कुछ गिफ्ट करता है... शशी के साथ नाचना शुरु करता है... नाचते-नाचते दोनों स्टेज पर जाने लगते है कि शशी मना कर देती है।)
शशी- नहीं मैं नाटक देखने आई हूँ... । मैं नाटक देखने आई हूँ... मैं.....
वह बहुत अच्छा गाता है... सुन्दर...।
मैं वहाँ (मंच पर..) नहीं जा सकती। वह झूठ है... सरासर झूठ.. यह सब लोग कुछ ओर जीने की कोशिश कर रहे है.. जो वह नहीं है... और हम लोग वही जी रहे है जो हम हैं...। फिर भी हम उन्हें देखने आते है.. हर बार। मैं उस तरफ नहीं जा सकती... नहीं... मैं इस तरफ रहकर ही नाटक खेल लेती हूँ....।
क्या मैं खेल रही हूँ? क्या मैं खेल रही हूँ?
अरुन- मैं हरामी हूँ... कूड़ा भरा है मेरे दिमाग़ में... मैं नहीं देख सकता यह... तुम वहाँ क्यों बैठी हो? क्या करण है?
शशी- क्या कारण चाहिए तुम्हें...।
अरुन- तुम यहाँ आ जाओ.. मेरे पास...।
शशी- तुम यहाँ क्यों नहीं आते...?
अरुन- मैं नहीं आ सकता वहाँ...
शशी- मैं वहाँ आ सकती हूँ... मैं जानती हूँ... तुमने मेरे लिए एक जगह भी रोक रखी है... मेरे बग़ल में भी एक जगह खाली है... और तुम्हें इसी बात की तक़लीफ है कि यहाँ कोई भी आकर बैठ सकता है।
अरुन- क्या मैं खेल रहा हूँ?
शशी- हा... हा... हा... हा.... मैं थक गई हूँ...मुझे वही कहानी बार-बार नहीं सुननी है।
अरुन- काश यह कहानी नहीं होती...नहीं.. यह नाटक होता-नाटक... और मैं अपना पात्र चुन सकता... काश मैं तुम्हें चुन सकता...
शशी- काश मैं तुम्हें चुन सकती...।
अरुन- मैं तुम्हें बचपन से जानता हूँ, हमने एक दूसरे को बड़ा होते देखा है... फिर अब हम अलग-अलग क्यों बैठे हैं?
शशी- बचपन खेल नहीं था... हे ना? जबकि हम खेल रहे थे... क्या हम अभी भी खेल रहे हैं???
(black out...)




Scene-9

निधी- जी हेलो... सर्कस मल्टिनेशन? हेलो? हेलो?... जी हाँ मैं बोल रहे हूँ... हाँ.. हाँ... good morning… जी... हाँ भाई... have a nice day… be happy, stay happy…. जी... मेरे पति walk पर चले गए... “WALK पर...”.. वह अपने साथ अपने कुछ दोस्तों को भी लेकर गए हैं “WALK” करने... समझी आप... अरे Walk..Walk… ओफ हो!!! अजी हम वह कांट्रेक्ट साईन करने को तैयार हैं... हाँ। हमें Free Gift मिलेगा ना? जी धन्यवाद... वह बस वहाँ पहुचते ही होगें। जी... ओके.. जी... have a nice day… जी be happy, stay happy….


Scene-10

(अमल,विमल और कमल तीनों भागते हुए आते है एक लाईन में और टिकट खरीदते हैं.... इसमें अमल विमल कमल तीनॊं जोकर है... जो बाक़ी कहानीयों में भी आते-जाते रहते हैं... इन्हें अलग भी किया जा सकता है। )
अमल- मैं अमल, एक 9.30 की लोकल का टिकिट देना।
विमल- मैं विमल. एक 9.35 की लोकल का टिकिट देना।
कमल- मैं कमल, एक 9.40 की लोकल का टिकिट देना।
(तीनों एक अजीब सा डाँस करते हुए एक साथ... आकर प्लेटफाम पे खड़े हो जाते हैं।)
अमल- मेरी नौकरी पक्की है।
विमल- मेरी नौकरी भी पक्की है।
कमल- हाँ..हाँ, मेरी नौकरी.. पक्की है।
अमल- क्योंकि आज मैंने रास्ते में एक अर्थी देखी...।ये शुभ है।
विमल- बस!!! क्योंकि आज मैंने एक गर्भवति महिला की अर्थी देखी... ये बहुत शुभ है।
कमल- बस!!! क्योंकि आज मैंने एक परिवार देखा...जो कभी भी मर सकता है... अति शुभ है।

(तीनों फिर एक तरह का डाँस करते हैं... और ट्रेन में चढ़ जाते हैं।)
अमल- कम्पनी बहुत बड़ी है...।
विमल- सर्कस मल्टीनेश्नल कम्पनी।
कमल- उसका एक विश्व बांस आज हमारा इंटरव्यूह लेगा।
अमल- तुम्हें कैसे पता?
कमल- मैंने अपनी पूरी तैयारी की हुई हैं।
अमल-विमल- हमने भी।
अमल- मुझे पता है असल में उसे तो बस ’विचार मज़दूर’ चाहिए।
विमल- ग़लत! एकदम ग़लत...। मुझे पता है... वो कहते हैं कि हमारी धरती मजदूर है... और सारे विचारों के अधिकार उनके पास सुरक्षित हैं। हम अगर चाहे भी तो अपने विचार अपनी धरती पर उगा नहीं सकते... वह कहते है यह वायूमंडलिय दोष है।
कमल- ग़लत! क्योंकि history उन्होने ही लिखी है, इसलिए वो हमारे बारे में, हमसे ज़्यादा जानते हैं। इसलिए पहले वो हमें किसी भी चीज़ के लिए तैयार करते हैं, फिर हमें वो चीज़ देते हैं... वह हमारा भविष्य तय करते हैं।
अमल- ग़लत.... वह हमें भविष्य दिखाते हैं।
विमल- अरे! वह हमें भविष्य सुंघाते है!! उससे क्या फर्क़ पड़ता है।
अमल- वह रहा मेरा भविष्य.... ।
विमल- वह रहा मेरा भविष्य...।
कमल- मेरा भविष्य????
(black out)


Scene-11

(जोकर exit कर रहा होता है तो अरुन रोक लेता है।)
अरुन- सुनो मुझे तुमसे बात करनी है।
जोकर- कौन हो तुम?
अरुन- अरे अभी मिले थे ना?
जोकर- मिले थे? हम? कहां?
अरुन- वो वहाँ... उस तरफ...?
जोकर- अच्छा..? क्यों मिले थे?
अरुन- तुम उन्हें.... छेड़ रहे थे।
जोकर- मेरी entry आने वाली है... मैं चलता हूँ।
अरुन- सुनों... सुनो.... रुको।
शशी- उससे कुछ मत पूछो वह कुछ नहीं बता पाएगा।
जोकर- मैंने कुछ नहीं किया सच में.. कसम से...।
अरुन- मैं बस यह पूछना चाहता हूँ तुम उसको कैसे जानते हो?
जोकर- मैं नहीं जानता उसे..।
शशी- तुम जानते हो मुझे?
(जोकर भागकर शशी के पास जाता है और उससे गले लग जाता है।)
जोकर- तुम मुझॆ बहुत अच्छी लगती हो। वह ना... वह तुम्हारे बारे में पूछ रहा था। मुझे पकड़ लिया.. परेशान कर रहा था। वह पागल है क्या?
अरुन- तुमने कहा था हम गांव नहीं शहर में जाकर रहेगें। हम शहर में आ गए...। मैं शहर सहन नहीं कर सका... लोग तुम्हें बिना बात के छूते हैं... गले लग जाते हैं.. तुम हाथ पकड़े किसी का खड़ी दिखती हो.. चलो गांव वापिस चलते हैं।
जोकर- यह सच में पागल है। तुम चलो मेरे साथ...
(जोकर उसे स्टेज के कोने की तरफ ले जाता है.... उस वहाँ उसे खड़ा करता है... जोकर भागकर लड़के की तरफ आता है उसकी जेब से चॉक निकालता है। फिर शशी को खड़ा करके उसके शरीर के edges draw करता है.... पूरा ड्रा कर लेने के बाद वह शशी को हटाता है फिर उस Draw edges में वह शरीर के दूसरे अंग बनता है जिसमें शशी नग्न दिखती है... और फिर वह उस drawing के साथ सेक्स करना शुरु करता है।)
शशी- तुम क्यों अपनी जेब में चॉक लिए घूमते हो?
अरुन- मेरे पास कोई चॉक नहीं है... कसम से...
शशी- अभी भी तुम्हारी जेब में चॉक हैं... मुझे पता है।
अरुन- नहीं है।
(वह ज़बरदस्ति उसके जेब की तलाशी लेती है... जेब से चॉक निकलती है... वह रोने लगता है।)
अरुन- चलो गांव वापिस चलते हैं।
शशी- तुम्हें गांव जाने की ज़रुरत है... मुझे नहीं। वहां गाव में जाना और जहाँ-जहाँ से यह चॉक बटोरकर लाए हो उन्हें वहीं दफ़नाकर आना।
अरुन- चलो गांव वापिस चलते हैं।
शशी- फिर से शुरु से शुरु करने से कुछ नहीं होगा हम यहीं पहुंचेगें... तुम जाओ अपनी जगह जाकर बैठो... जाओ अपनी जगह जाकर बैठो..
अरुन- नहीं मैं यहीं बैठूगां.. मैं यहीं बैठूगां...
(शशी उसे खींचकर अलग करना चाहती है पर वह बार-बार वहीं आकर बैठ जाता है वह उसे मारती भी है पर वह नहीं मानता... जोकर सेक्स करता रहता है.. उसकी आवाज़ बढ़ती जाती है... । अंत में जोकर के सेक्स खत्म करने पर शशी उठकर अरुन की जगह जाकर बैठ जाती है।)

Scene-12

निधी- ये बहुत सुंदर है... एकदम... वाह! हे ना?
पूरब- हाँ... मैंने हमेशा ऎसा कुछ अपने घर के लिए लेना चाहा था... वाह!.. मज़ा आ गया।
निधी- इच्छा तो हो रही है कि बस इसी के सामने दिन भर बैठे रहो।
पूरब- कितना वैसा ही है ना ये.... जैसा इसे होना चाहिए।
निधी- ऎसा लग रहा है कि... सालों से ये किसी घोड़े में, या टटू में लगा था और आज तुम इसे खरीद लाए।
पूरब- पर ऎसा नहीं है...उन्होने कहाँ है कि ये कम से कम पाँच हज़ार साल पुराना है, तभी तो ये इतना महंगा है।
(दोनों खड़े होते है एक दूसरे के हाथों में हाथ डालकर एक मुद्रा बनाते हैं)
निधी- मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ...।
पूरब- मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ...।
निधी- तुम्हें भिड़ी अच्छी लगती है ना!
पूरब- हाँ मुझे भिंड़ी अच्छी लगती है।
निधी- आज मैं भिंड़ी बनाऊगीं।
पूरब- आज मैं भिंड़ी ही खाऊगाँ।
(निधी उठके जाने लगती है।)
पूरब- अरे कहाँ जा रही हो?
निधी- भिड़ी बनाने।
पूरब- अरे पहले ये तो तय़ कर लो कि इसे हम रखेगें कहाँ?
निधी- हाँ पहले ये तो तय कर ले कि इसे हम रखेगें कहाँ?
( दोनों घर के चारों तरफ धूमते है.. कुछ जगह रुकते है.. सोचते हैं,फिर अपनी जगह पर वापिस आ जाते हैं)
पूरब- किसी ऎसी जगह कि लोगों की धुसते ही इसपर नज़र पडे।
निधी- हाँ धुसते ही नज़र पड़े... जैसे.. जूतों के रेक के पास.. हे ना।
पूरब- नहीं.. इतनी महगीं चीज़ जूतों के पास? नहीं.. टी.वी. के ऊपर..।
निधी- नही, वहाँ मेरी माँ की तस्वीर लगी है।
पूरब- दरवाज़े के बाहर...।सुना है बहुत शुभ होता है।
निधी- अरे! इतनी महगीं चीज़ है कोई चुरा के ले गया तो! नहीं वहाँ नहीं ... फ्रिज के ऊपर।
पूरब- बेड़रुम में...।
निधी- किचिन की छत पर...।
पूरब- गोदरेज की अलमारी के ऊपर...।
निधी- मिक्सी के पास...।
पूरब- खिड़की पे...।
निधी- पलंग पे...।
(पूरब मुस्कुराता है और निधी का हाथ पकड़ लेता है...।)
पूरब- हम इसे यही पर रखेगें... यहीं इसी जगह पे... इस कमरे के एकदम बीच में... जो भी आएगा उसे इसी के चारों तरफ बेठना पड़ेगा, जब उसके सामने यही होगा तो वो इसी के बारे में बात करेगा। हे ना।
(निधी की आँखों में पानी आ जाता है... वो दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, वापिस वो ही मुद्रा बनाते हैं...।)
निधी- मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ...।
पूरब- मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ...।
निधी- तुम्हें भिड़ी अच्छी लगती है ना!
पूरब- हाँ मुझे भिंड़ी अच्छी लगती है।
निधी- आज मैं भिंड़ी बनाऊगीं।
पूरब- आज मैं भिंड़ी ही खाऊगाँ।
(पूरब बाहर जाने लगता है।)
निधी- अरे कहाँ जा रहे हो?
पूरब- लोगों को बुलाने।
निधी- अरे पहले ये तो तय कर लो कि जब लोग पूछेगें, कि इसे क्यों लाए हो? तो हम क्या कहेगें?
पूरब- हाँ! जब लोग पूछेगें कि इसे क्यों लाए हो तो हम क्या कहेगें?
(दोनों वापिस उठकर कमरे में चारो तरफ सोचते हुए धुमने लगते हैं।.. फिर कुछ देर में वापिस उसी जगह पर आ जाते हैं।)
निधी- हम कहेगें... कि...।
पूरब- कि.. ये कितना पुरातन हैं।
निधी- ये हमारी सभ्यता है।
पूरब- हमने ना जाने कितने जंगलीयों को नाल पहनाकर... Domestic, धरेलू बनाया है।
निधी- नाल धर्म.. परम धर्म है।
पूरब- असल में हम सब जंगली हैं... जब तक नाल है, तभी तक हम इंसान है।
निधी- सबसे पहले इसी ने हमें domestic, धरेलू बनाया था...।
पूरब- एक खोज में पता चला है कि जब इस देश में कुछ भी नहीं था... तब यहाँ घोड़े हुआ करते थे। .ये देश असल में महनतकश घोड़ों का ही देश था।फिर आर्य आए, तुर्की,मुगल आए.क्रिश्चयन आए,सभी अपने-अपने घोंड़े लाए, और हमारे घोड़ो को खच्चर कहने लगे।
निधी- हमें बचाना है..... आआअ... हमें...!!! घोड़ो को बचाना है... हर घर में घोड़ा रखे... अगर घोड़ा नहीं रख सकता तो... छोटा लकड़ी का घोड़ा भी चलेगा... अगर वह भी नहीं रख पाया तो कम से कम घोड़े की पूछ का एक बाल भी चलेगा... जो बहुत काम आता है।.. हे ना..।
पूरब- और नाल..?
निधी- हाँ... असल में..नाल को बचाना ज़रुरी है।
पूरब- लोग शेर बचाने की बात करते हैं?, किसानों को बचाने की बात करते हैं?
निधी- नागालैंड़ बचाओ..?. पेड़ बचाओ...?
पूरब- फिलिस्तीन बचाओ, इज़राईल बचाओ...?
निधी- पानी बचाओ.. खेत बचाओ...?
पूरब- ये सब झूठ है.. सबसे बड़ा धर्म है..नाल.. हमें नाल बचाना हैं।
तेरा वर्दान है.... मेरा दान...।
हमारी नाल ही है, हमारा भगवान...।
(वो दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, वापिस वो ही मुद्रा बनाते हैं...।)
निधी- मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ...।
पूरब- मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ...।
निधी- तुम्हें भिड़ी अच्छी लगती है ना!
पूरब- हाँ मुझे भिंड़ी अच्छी लगती है।
निधी- आज मैं भिंड़ी बनाऊगीं।
पूरब- आज मैं भिंड़ी ही खाऊगाँ।

Scene-13
बॉस- अमल?
अमल- प्र्ज़ेटं सर।
बॉस- विमल?
विमल- प्र्ज़ेट सर।
बॉस- कमल?
कमल- प्र्ज़ेट सर।
बॉस- हाँ... तो तुम लोग पूरी तैयारी से आए हो?...
सभी- हाँ, सर।
बॉस- अमल,विमल,कमल...?
सभी- जी..?
बॉस- इंद्रजीत कहाँ है...?
कमल- इंद्रजीत..?
बॉस- इंद्रजीत.. तुम्हारा इंद्रजीत जो सवाल करता है, जिसे हर चीज़ का कारण चाहिए... वो कहाँ है?
अमल- वो तो बहुत पहले ही सन्यासी हो गया था...।
विमल- नहीं वो संन्यासी नहीं हुआ था.. वो चोरी के इल्ज़ाम में पकड़ा गया था, सो एक दिन गांव से भाग गया।
कमल- नहीं सर... अमल,विमल,कमल यहाँ है... एवंम इंद्रजीत मर चुका है।
बॉस- वो सन्यासी है, चोर है और वो मर चुका है...।hmmmmm.. सन्यासी और चोर नहीं चलेगा... अपने इंद्रजीत को अगली बार मार कर आना... good कमल।
कमल- thank you sir...

बॉस- नौकरी मिलने के बाद तुम क्या करोगे?
अमल- महनत... बहुत महनत..।
विमल- सर I am confident that… I’ll deliver. And make sure that this company…
बॉस- हाँ...हाँ मैं समझ गया। मुझे झूठे जवाब नहीं चाहिए... यह miss world का काम्पटीशन नहीं है... मुझे सही जवाब चाहिए।
कमल- sir I’ll work sir… work.. work and work.
बॉस- जैसे?? कैसे काम करोगे...?
विमल- सर मैंने कभी किसी भी काम के लिए किसी को भी मना नहीं किया, जब से मैं पैदा हुआ हूँ मैं काम करने में हमेशा व्यस्त हूँ। जो लोग मुझे जानते हैं वह मुझे अपना काम करने को नहीं कहते थे.. वह उसके बदले ’एक ज़रुरी काम की पर्ची..’ मेरी जेब में डाल देते हैं, जिसे मैं समय रहते पूरा करता चलता था। मेरे पास एक जेब की कई सारी शर्टे हैं... सर दो जेब वाली शर्ट पनने से मैं घबराता हूँ। सर, मैं अपने घर के कामों की भी पर्चियाँ बनाकर जेब में रख लेता हूँ। मैं अपने खुद के काम भी बाक़ी ज़रुरी कमों की तरह करता हूँ... समय रहते। इन पर्चियों के बीच मेरा एक खेल भी है...। बताऊं.. बतांऊ... सर मैं कई बार कोरी पर्चियाँ अपनी जेब में, किसी महत्वपूर्ण काम की तरह रख लेता हूँ... जब मैं महत्वपूर्ण काम के लिए कोई पर्ची निकालता हूँ और वह कोरी निकालती है तो मैं खुश हो जाता हूँ... मैं उस वक़्त कुछ भी नहीं करता हूँ। काम के वक्त काम नहीं करने की आज़ादी बहुत बड़ी आज़ादी...... oh.. sorry sir…
बॉस- ह्म्म्म्म्म्म।
कमल- सर... मेरे काम करने का तरीक़ा सामान्य है सर... मैं जब भी सो कर उठता हूँ.. तो मुझे मेरे कपड़े पड़े दिखते हैं.. या कोई कपड़े दे देता है। मैं जैसे ही उन कपड़ों को पहनता हूँ मैं वह हो जाता हूँ....
बॉस- वह मानी?
कमल- वह जिसके लिए वह कपड़े होते... तब कोई अगर मुझे विमल नाम से पुकारता तो मैं विमल की तरह काम करना शुरु कर देता हूँ। सर मैं अमल विमल कमल कुछ भी हो सकता हूँ... आप जिस नाम से मुझे पुकारेगें मैं.... मैं बिलकुल वैसा ही काम करना शुरु कर दूंगा। अमल विमल कमल.. एंवम इंद्रजीत... oh… sorry sir… इंद्रजीत तो मर चुका है।
बॉस- हम्म्म्म्म्म्म्म।
अमल- सर मैं अमल हूँ...
बॉस- I know.. I know…
अमल- no sir.. मैं अमल करता हूँ... मेरे हिसाब से दुनियाँ में दो ही किस्म के लोग है, पहले जो यह मानते हैं कि दो किस्म के लोग होते हैं और दूसरे जो यह नहीं मानते....मैं मानता हूँ...। हम्म्म्म्म्म.. उन दो किस्म के लोगों में पहले वह होते हैं जो काम करवाते हैं और दूसरे जो काम करवाते हैं... मैं काम करने की श्रंखला में आता हूँ...।
बाँस- तुम्हें कैसे पता?
अमल- सर बचपन में जब हम स्कूल में थे तो हमें पढ़ाई भी एक काम की तरह कराई जाती थी। हम मजदूर है सर... अब जो भी काम मुझे मिलता है वह काम नहीं धर्म है... मैं उसे करने में अपने प्राण भी दे सकता हूँ...। मुझे बचपन से एक परिश्रमी मज़दूर के रुप में तैयार किया गया है।
बॉस- तो प्राण देकर बताओ?
अमल- जी?
बॉस- कंपनी ने तुम्हें अपने प्राण देने का काम दिया है...प्राण दो?
अमल- sorry sir…
(विमल और कमल हंसते हैं।)

बॉस- बहुत पहले की बात है, ऎसा मैंने सुना है... कि एक गड़रिया हुआ करता था। उसके पास बहुत सारी भेंड़े थी.... वो उनका मांस बेचा करता था। हर बार वो उन्हीं भेड़ों में से एक भेड़ को निकालता और उन्हीं के सामने काट देता। धीरे-धीरे भेंड़ों को समझ में आने लगा कि हम सब कटने वाले हैं। गडरिये कि समझ में आ गया कि भेंड़ों में वहाँ से भाग जाने की फुस-फुसाहट हो रही है। तो अब बताओ वह गड़रिया अपनी भेंड़ें बचाने के लिए क्या करेगा?
अमल- गड़रिया, एक अच्छे dictator की तरह... सरी भेंड़ों को ज़ंजीरों से बांधेगा और बहुत सारे कुत्ते पालेगा... जो भी भेंड़ भागेगी कुत्ते उसे चीर देंगें।सर Dictatorship … its proved.
विमल- नहीं... गड़रिया, पहले एक भेड़ को भगवान बनाएगा... फिर भेड़ों से कहेगा कि यह तुम्हारे ही भगवान की मांग है कि एक बली उसे रोज़ चाहिए... और वो रोज़ भेड़ काटता जाएगा। sir religion ..
कमल- नहीं गड़रिया, सारी भेड़ों को अपने बच्चे की तरह प्यार करने लगेगा... और भेंड़ को काटने से पहले उससे कहेगा कि-’देखो यह मेरे पेट का सवाल है, मुझे माफ कर दो... और फिर वह उस भेड़ को काट देगा ।sir Love....
बॉस- यह सब गड़रिया सौ साल पहले कर सकता था, अभी बाज़ार पूरी तरह बदल चुका है। अभी तो गड़रिया... हर भेड़ के पास जाएगा और उनसे कहेगा कि... तुम असल में भेड़ नहीं हो शेर हो...। बस फिर वह रोज़ भेड़ काटेगा... और हर भेड़ यही सोचेगी कि वो तो भेड़ है इसलिए कट रही है... मैं तो शेर हूँ... मैं कभी नहीं कटूगाँ।
(अमल, विमल और कमल तीनों कहते है... वाह! सर!.. वाह! )
बॉस- इन्टरव्यूह कौन देने आया है? मैं या तुम।
(तीनों कहते है... साँरी सर!!!)
बॉस- अगर बंदर हमारे पूर्व्ज हैं तो... क्या हमारी history बंदरों का future हैं?
अमल- हैं!!!
विमल- pass
कमल- सर..आआआअ।
बॉस- I want an answer... अगर बंदर हमारे पूर्व्ज हैं तो... क्या हमारी history, बंदरों का future हैं?

(ब्लैक आऊट..)

Scene-14

निधी- कह आए सबको, कौन-कौन आ रहा है।
पूरब- पता नहीं..?
निधी- पता नहीं.. मतलब?
पूरब- उन्होंने कहा कि ये जानने का अधिकार हमको नहीं है।
निधी- मतलब, तो ये अधिकार किसको है, अरे खाना बना है... तो पता तो होना ही चाहिए कि कितने और कौन-कौन आ रहा है।
पूरब- यह तो मैंने भी कहा पर उन्होने कहाँ कि पेज 90 पे,rule 23(d) में लिखा है कि अगर आप सोशल कम्यूनिकेशन में एनरोल करते हैं तो फिर वो ही लोग तय करेगें कि हमारे यहाँ कौन आएगा और कौन नहीं आएगा।

(दोनों एक अजीब मुद्रा बनाकर दुखी हो लेते है,दोनों के मूहँ से एक साथ आह! निकलती है...फिर दोनों वापिस अपनी जगह पर आकर..)
निधी- पर कुछ तो पता होगा?
पूरब- बताऊ?
निधी- हाँ।
पूरब- सर्कस मल्टीनेश्नल का बॉस... खुद।
निधी- वाह! और..और..।
पूरब- और वही, जानने का अधिकार हमको नहीं है... और ये भी हम किसी को नहीं बता सकते कि बॉस खुद आ रहे हैं.. ओह! मुझे तो तुम्हें भी नहीं बताना था.. सुनों तुम सरप्राईज़ हो जाना वरना वो हमपर फाइन लगा देगें....।
(दोनों हाथ मिलाते है और थोड़ा सा दुख जी लेते है... ’ओह!’ कहकर... फिर वापिस आकर।)
निधी- ओह! हमने ये सोशल कम्यूनिकेशन साईन ही क्यों किया।
पूरब- ऎसा नहीं कहते हमें उसके कितने फायदे भी तो हैं।
निधी- क्या फायदे हैं?
पूरब- वो हमारा साईक्लाजिकल बिहेवियर स्टड़ी कर रहे हैं।हम कैसे बिहेव करें ये वो हमें बार-बार क्या नहीं बताते रहते हैं।और उनका एक आदमी हमारा पूरा सोशल नेटवर्क संभालता रहता है।किसको B’day wish करना है, माँ को कब फोन करना है,आलू,प्याज़ कब महंगा हो रहा है,हमारे पड़ोसी हमारे बारे में क्या सोचते हैं, ये मोहल्ला हमारे घर के बारे में क्या सोचता है, ये शहर हमारे मोहल्ले के बारे में क्या सोचता है, ये प्रदेश हमारे शहर के बारे में क्या सोचता है, ये देश हमारे प्रदेश के बारे में क्या सोचता है, ये विश्व हमारे देश के बारे में क्या सोचता है... और मैं सोचता हूँ मंगल ग्रह पृथ्वी को देखकर क्या सोचता होगा?
निधी- इतना मत सोचो उन्होंने, बहुत ज़्यादा सोचने को मना किया है।
पूरब- मैं बहक गया था।
निधी- मैं भी बहक गयी थी, मुझे भी उनकी बहुत सी बातें अच्छी लगती हैं।
पूरब- क्या?
निधी- उन्होने हमें जैसे समझाया कि कैसे हम सारे इन्सानों को किस्त अच्छी लगती है, चाहे वो टी.वी. की हो, फ्रिज की हो या घर की... और ठीक इसी किस्त की थ्योरी पर उन्होने बताया कि हमें सुख और दुख भी किस्तो में लेना चाहिए.. ज़्यादा खुशी आए तो एकदम से ज़्यादा खुश मत हो.. एक मिनिट से ज़्यादा तो कभी भी नहीं... उस खुशी को बांट दो.... दिनों में.. हफ्तों में ... तो एक खुशी कई दिनों तक कई महीनों तक खुशी देती रहेगी... और ऎसे ही दुख...दुख असल में कितना बड़ा था इसका कभी पता ही नहीं चलेगा।
पूरब- हाँ, सोचो हम लोग कब से रोए नहीं।
निधी- मुझे तो याद भी नहीं कि आखरी बार मैं कब रोई थी...।सुनो... इधर आओ...!
पूरब- क्या हुआ?...
निधी- इधर आओ..।
पूरब- देखो...
निधी- प्लीज़...।आओ न एक बार...।
पूरब- देखो हमें ....खुश रहना है।
निधी- प्लीज़..।
(वो दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, एक मुद्रा बनाते हैं... एक ओह! निकालते हैं...।)
निधी- मैंने कैसा घर सजाया है... अच्छा है न?
पूरब- बहुत अच्छा है...।
(पूरब शांत है बहुत... वह अपनी जगह जाकर बैठता है...निधी लोरी गुनगुनाने लगती है।)
(ब्लैक आऊट...)

Scene-15

अरुन- हाँ अब मेरी समझ में आ गया कि वह मुझसे दूर क्यों बैठी है। मैं समझ गया... गिलहरी के कारण? हे ना?
(वह जवाब नहीं देती है।)
अरुन- मैं सही जवाब नहीं दे पाया... इसके कारण क्या कोई अलग बैठ जाता है?
शशी- बात सही और गलत जवाब की नहीं है तुम बात को ही नहीं समझे...।
अरुन- मैं समझ गया था... वह.. गिलहरी वाली बात थी ना.. कि गलहरी.. अब मुझे ठीक से याद नहीं है... पर मैं बात को समझ गया था।
शशी- खड़े हो... चलो मेरे साथ.. ।
अरुन- कहाँ?
शशी- खड़े हो... हम उस शाम घूम रहे थे... तभी मुझे एक गिलहरी दिखी...।
अरुन- हाँ वह कूदती हुई तुम्हारे सामने आकर रुक गई थी... वह एक टक तुम्हें देखे जा रही थी। देखो मुझे सब याद है... तब तुमने कुछ पूछा था.... आ!!! कुछ गिलहरी के बारे में...?
शशी- तुम्हें पता है कि गिलहरी की पीठ पर यह तीन निशान कैसे आए?
अरुन- हाँ.. हाँ.... और मैंने कहा था कि नहीं मुझे नहीं पता.. जबकि मुझॆ पता था.. वह.. असल में...
शशी- कहते हैं कि एक बार गिलहरी ज़ख्मी पड़ी थी। तभी वहाँ से भगवान राम गुज़रे। उनकी निग़ाह उस गिलहरी पर पड़ी, उन्होंने उस गिलहरी को उठाया उसकी पीठ पर हाथ फेरा और गिलहरी ठीक हो गई... तब से राम की उंग्लियों के निशान गिलहरी की पीठ पर रह गए।
अरुन- कितनी सुंदर बात है।
शशी- पर क्या गिलहरी यह बात जानती है कि उसकी पीठ पर जो यह तीन उंग्लियों के निशान है यह राम की उंग्लियाँ हैं???
अरुन- अरे! यह कहानी गिलहरी की नहीं है, यह कहानी तो राम की है।
शशी- तुमने सही कहा था यह कहानी तो राम की है।...... गिलहरी तो बस इस कहानी में आई थी.. उसकी अपनी कोई कहानी थोड़ी है... कहानी तो हमेशा राम की ही होती है।
अरुन- मतलब... उसकी भी अपनी कोई कहानी होगी... मतलब कुछ तो होगा...
शशी- हाँ.. कुछ तो होगी ही... क्या फर्क पड़ता उससे...। तुमने कभी मेरी पीठ देखी है?
अरुन- क्या? पीठ?
शशी- देखी है? देखो... प्लीज़ मेरी खातिर... देखों...।
अरुन- यह क्या मज़ाक है लोग देख रहे हैं।
शशी- मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ... ध्यान से देखो.. तुम्हें निशान नज़र आ रहे है...
अरुन- यहाँ कोई निशान नहीं है...।
शशी- तीन उग्लियों के निशान.. दिखे.. देखों...
(अरुन वापिस जाकर अपनी जगह बैठ जाता है। शशी उसके सामने जाकर खड़ी हो जाती है।)
शशी- तुम्हें मेरी पीठ पर कोई निशान नहीं दिखे?
अरुन- नहीं.. मुझे कुछ भी नहीं दिखा।
शशी- मुझे आश्चर्य है, सच में तुम्हें कुछ भी नहीं दिखा?
(अरुन चुप रहता है।)
शशी- बानी कैसी है?
अरुन- हं!!!
शशी- बानी, तुम्हारी बीवी बानी कैसी है?
अरुन- तुम अपनी जगह जाकर बैठो... मुझॆ नहीं बैठना तुम्हारे साथ.. जाओ।
शशी- क्यों क्या हुआ? राम की कहानी तो तुमने रट रखी है, अब गिलहरी की कहानी भी सुन लो?
अरुन- मुझॆ नहीं सुनना।
शशी- गांव मेरे साथ जाना चाहते हो और शहर में बानी के साथ रहोगे?
(अरुन उठता है और वापिस अपनी जगह जाने को होता है कि शशी उसे खींचकर बिठा देती है।)
शशी- घर के सुख… घर के सुख होते है... नहीं.. नही.. उन्हें नहीं छूना... वह सुख बने रहने चाहिए। और जो सच है वह... वह सच घर में दीमक के जैसे है... वह घर में है यह सबको पता है... पर उन दीमको को घर के सुख की आड़ में छुपे रहने दो... बस, उन दीमको को ’पता है..’ की आड़ में रहने दो... वरना वह राम की कहानी में अपनी अलग गिलहरी की कहानी की मांग करेगें.... जो राम भक्तों को कतई पसंद नहीं आएगा।


Scene-16

बॉस- “थ्योरी आफ बोट” किसकी है???
अमल- Albert Einstein.
विमल- चार्ली चेप्लिन.
कमल- paas sir…
बॉस- यह थ्योरी मेरी थी... जिसकी वजह से... मैं कंपनी का बॉस भी हूँ और बोट हमारी कंपनी का logo है।
अमल- sir what is this theory??
बॉस- good… इस थ्योरी के हिसाब से एक दिन बाढ़ आएगी-FLOOD और हम सब ढूब जाएगें... बचा सिर्फ वही रहेगा जिसके पास बोट है..नाव। हमारी कंपनी ने बाढ़ आईगी के डर को फैलाया... नाव बनाने को जीवन का हिस्सा बनाया और आज कंपनी यहाँ तक पहुच गई। ’एक दिन बाढ़ आएगी’ यह मेरा निजी डर था... जिससे कंपनी को फायदा हुआ। अब हम एक ऎसा employee चाहते है जो एक नयी थ्योरी कंपनी को दे... एक नया डर एक नया logo…
अमल- sir sir...The future you see is the future you get.
विमल- The best way you can predict your future is to create it.
कमल- tomorrow belongs to those who prepare for it today.
अमल- The past can't see you, but the future is listening
विमल- sir sir.. The future is much like the present, only longer.
कमल- I never think of the future-it comes soon enough.
अमल- I have seen the future and it doesn’t work.
विमल- The future will be better tomorrow.
कमल- The future ain’t what it used to be.
बॉस- shut up… just shut up… रटा-रटाया नहीं निजी.. अपना खुद का डर बताओ... एक आदमी का डर... सबका डर है... इसी से कंपनी चलती है... निजी.. अपना... खुदका डर। start…
विमल- सर.. मैं grasshopper नहीं बनना चाहता हूँ.. जो गरमीयों में मस्ती करता रहता है.. खेलता रहता है.. पर ठंड आते ही, बर्फ गिरते ही... भूखों मर जाता है। सर मैं grasshopper की दोस्त चींटी की तरह पूरी ज़िंदग़ी काम करना चाहता हूँ... मैं भूखा नहीं मरना चाहता हूँ... कभी भी नहीं....। सर, थ्योरी-grasshopper, logo-चींटी।
अमल- सर मुझे लगता है कि एक दिन यह सारे भयानक लोग.. मतलब ग़रीब लोग जो सड़कों के किनारे रहते हैं... गांवों में रहते हैं... झुग्गीयों में रहते हैं...हमारे घरों में घुस आएगें... रोटी की तलाश में। पर सर वह बहुत सारे हैं... हमारे घरों में घुसते ही उन्हें इतनी रोटीयाँ नहीं मिलेगी तो वह रोने लगेंगें... चींख़-चींख़कर...। हम सारे लोग खुद को बचाने के चक्कर में रोटियाँ बनाने लग जाएगें... दिन-रात... पर सालों की उनकी भूख़ कभी शांत नहीं होगी। सर... मुझे आटा गूंदना नहीं आता है सर... मैं रोटी नहीं बना सकता हूँ सर... मैं पूरी ज़िंदगी रोटियाँ नहीं बनाना चाहता हूँ। सर, थ्योरी-रोटी... logo- चकला-बेलन।
कमल- सर मैं मरने से नहीं डरता हूँ... पर मैं पहले मरने से डरता हूँ सर..। मैं चाहता हूँ सर कि मैं सबसे आखीर में मरु। मैं अंत में सबसे आखीर में जीत जाऊं... सब से। मैं सर मरने के पहले एक बार हंसना चाहता हूँ... जीत की हंसी... सबसे आखीर तक बचे रह जाने की हंसी हसना चाहता हूँ।और सर... मैं चाहता हूँ जब मैं मरु तो हर चीज़ भरी हुई हो... मेरा घर कमरों से, मेरे कमरे चीज़ों से, मेरा फ्रिज सब्ज़ी-फलों से, मेरा टी.वी. दुनियाँ के सारे चेनलों से, मेरा बैंक पैसों से, मेरा पेट खाने से... गले-गले तक भारा हो। सर मैं मरना नहीं चाहता मैं फटना चाहता हूँ... मेरे पास इतना सारा सब कुछ हो कि मैं मरु नहीं... मैं अंत में फट जाऊ....। सर.. थ्योरी- जीत... logo- रस्सी बंम।
बॉस- good… अमल you bloody Marxist … out…
अमल- सर.. पर वह तो मेरा डर है।
बॉस- out I said.
(अमल चला जाता है।)
बॉस- अब अंतिम खेल... तुम दोनों में से जो बचा रह जाएगा... जॉब उसे ही मिलेगा। are you ready?
विमल- yes sir…..
कमल- yes sir….

Scene-17

(निधी... हँसना चालू करती है। बगल में पूरब भी बैठा है। वो भी निधी की हँसी में शामिल होने की कोशिश करता है।.... जैसे किसी की बात बहुत गंभीरता से सुन रही हो.... फिर हँस देती है....।)
निधी- लीजिए आप पकोड़ी लीजिए।... (फिर हँसती है..।)
पूरब- नहीं... नहीं... हँसी ज्यादा हो रही है।
निधी- कम तो नहीं है ना? ज्यादा चलेगी..।पिछ्ली बार मेरी हँसी ही नहीं निकल रही थी, लोग क्या सोच रहे होगें... कैसी मूर्ख औरत है, इसे जोक़ ही समझ में नहीं आ रहा। तुम भी कुछ कहो ना..। मैं ही बात करती रहूगीं क्या?
पूरब- हाँ मैं भी करता हूँ…।
(पूरब के चहरे पर अजीब सी परेशानी दिखती है… वह बात करना शुरु करने की कोशिश करता है..पर कुछ धबराई हुई मुस्कान के बाद चुप हो जाता है।)
पूरब- आप पकोड़ी लीजिए ना।
(फिर चुप हो जाता है… निधी उसकी तरफ धूम जाती है, वह मूहँ नीचे कर लेता है।)
पूरब- मैं दौड़ना चाहता हूँ...। बहुत दूर तक... भागना चाहता हूँ, पागलो की तरह। यह सारी भीड़ को चीरते हुए। पसीने में लथ पथ... बिना रुके। दौड़ते-दौड़ते किसी ऊँचे पहाड़ से छलांग लगा दूगाँ... मुझे पता है मैं उड़ नहीं पाऊंगा... पर वह मरने से पहले, उड़ सकने का थोड़ा सा भ्रम मैं, पूरी आज़ादी के साथ जीना चाहता हूँ।
(निधी हंसती है...।पूरब अपना सिर उठाता है।)
निधी- क्या है यह?
पूरब- आप क्या सोचते है इस बारे मैं।
निधी- यह क्या जोक था? क्या था यह? अच्छा हुआ हम प्रेक्टिस कर रहे हैं... तुम्हे क्या हो रहा है।
पूरब- कुछ नहीं... मैं ठीक हो जाऊगाँ।
(अचानक पूरब अपने आपको रोकने में आवाज़ ऊँची करता जाता है.. पूनम अपनी धबराहट में अजीब
सी परेशान हो जाती है।)
निधी- सुनों dinner cancel करते हैं। वह हम पर फिर फाईन लगा देंगें।
पूरब- नहीं डिनर केंसिल नहीं करेगें।
निधी- डिनर केंसिल करेगें।
पूरब- नहीं डिनर केंसिल नहीं करेगें।
निधी- डिनर केंसिल करेगें।
पूरब- नहीं डिनर केंसिल नहीं करेंगें।
निधी- डिनर केंसिल करेगें.... डिनर केंसिल करेगें।
पूरब- डिनर केंसिल नहीं करेगें.... मैं जोक बोलूंगा।
(पूरब चिल्लाकर बोलता है... निधी खुश हो जाती है।)
निधी- हाँ हाँ....वो, वो वाला...अरे वही … यह ना वह चूहे और हाथी वाला जोक बहुत ही अच्छा सुनाते हैं.. वह जोक़ तुम बहुत अच्छा बोलते हो.. बोलो जल्दी।
पूरब- हाँ याद आया.... एक लड़की अपने बॉस के पास जाती है और कहती है कि, ’ बॉस- बॉस मुझे पाँच-सौ रुपये की ज़रुरत है...कल देती हूँ।’ बॉस कहता है- ’हज़ार ले-ले ओर आज ही दे दे।’
(पूरब हँसने की कोशिश करता है.... निधी चुप है।)
निधी- छी!!!
(ब्लैक आऊट...)

Scene-18

(जोकर ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाता है... कुछ देर में प्रवेश करता है....।)
जोकर- माफ करना, मुझे लगा दरवाज़ा दूसरी तरफ खुलेगा। शशी... शशी..
(वह जोकर शशी को आवाज़ लगाती है।)
अरुन- ओ! तेरी...बानी... बानी यहाँ क्या कर रही है?
शशी- बानी.... यहाँ है अरुन.. इधर इस तरफ।
(बानी धीरे-धीरे चलती हुई दोनों की तरफ बढ़ती है... अरुन खड़ा हो जाता है।)
बानी- अरुन.. तुम.. तुम यहाँ क्या कर रहे हो?
अरुन- शू... शू..... बैठो... बैठो..... (शशी बैठ जाती है... तीनों एक साथ बैठे हुए हैं...) मैं तो यहाँ नाटक देखने आया था... अचानक देखा कि शशी भी है... तो हम दोनों... सोचा साथ ही नाटक देख लेते हैं।
(कुछ शांति के बाद...)

बानी- पर......तुम तो कहीं काम से जाने वाले थे..।
अरुन- हाँ वह... काम नहीं हुआ।
शशी- झूठ....।
बानी- झूठ???
शशी- हाँ झूठ...।
बानी- तुम झूठ बोल रहे हो?
अरुन- अरे नहीं...।
बानी- तुमने बताया नहीं कि अरुन भी आने वाला है... क्यों शशी?
अरुन- तो तुमने बानी को बुलाया है?
शशी- अरुन ने हम दोनों का टिकित खरीदा था और मैंने तुम्हारा।
अरुन- झूठ है।
बानी- यह सच कह रही है?
अरुन- झूठ है।
शशी- सच है।
अरुन- झूठ है।
बानी- सच है।
शशी- झूठ है।
बानी- क्या? झूठ है।
अरुन- माँ कसम, धरती माता की कसम,विध्या माता की कसम मैंने झूठ नहीं बोला...
(बानी और शशी दोनों हसना शुरु करते हैं।)
अरुन- मैं धरती माता की कसम झूठ नहीं खाता हूँ... कसम से...
(दोनों और ज़ोर से हंसने लगती हैं।)
अरुन- अच्छा.... तुम्हारे मरने की कसम...।
(यह सुनते ही दोनों चुप हो जाती हैं..... और भागकर दूर खड़ी हो जाती है, अरुन रोने लगता है। तीनों बच्चे हो जाते है और एक तरह का खेल शरु होता है।)
बानी- अब हमें तुम्हारे साथ नहीं खेलना है।
शशी- झूठा...झूठा...झूठा।
(दोनों अलग खेलना शुरु करते है अरुन कोने में अकेला रो रहा है कुछ देर में दोनों उसके पास जाते हैं...)
शशी- अच्छा ठीक है... चल खेलते है पर अब चीटिंग नहीं...।
अरुन- कसम से... कोई चीटिंग नहीं...।
बानी- फिर कसम खाई?
शशी- चल डॉक्टर-डॉक्टर खेले?
बानी- हाँ... पर यहाँ बहुत उजाला है पीछे चलते है।
(तीनों पीछे की तरफ जाते है अंधेरा हो जाता है।)
शशी- पहले मैं जाती हूँ।
बानी- नहीं पिछली बार भी तू ही गई थी... हर बार तू ही जाती है पहले, इस बार मैं।
शशी- नहीं पहले मैं.... डॉक्टर साहब मैं अंदर आ सकती हूँ.. मुझे यहाँ वहाँ बहुत तकलीफ है।
बानी- हर बार तू ही जाती है... मैं तेरी माँ को बता दूंगी... सच में.. कि तुम दोनों अंधेरे में डॉक्टर-डॉक्टर खेलते हो।
अरुन- यह तो बहुत ही खतरनाक बीमारी है... इंग्जेक्शन लगाना पड़ेगा.. चलो कपड़े उतारो।
शशी- छी...छी..।
अरुन- छी क्या? इग्जेक्शन लगाने के लिए कपड़े तो उतारने ही पड़ेगें।
शशी- अच्छा.. लगा दो इग्जेक्शन डॉक्टर साहब....।
बानी- मैं घर जा रही हूँ और माँ को बताऊंगी... ।
शशी- अच्छा रुक... चलो ऑफिस-ऑफिस खेलते हैं... और तू बीबी बनना बस...।
बानी- और तू...।
शशी- मैं सेक्रेटरी...।
बानी- वहां तू पेशेंट बनती है और यहाँ सेक्रेटरी... वाह भई वाह...
शशी- ठीक है तो मैं बीवी... तू सेक्रेटरी... चलो।
बानी- नहीं.. नहीं... मैं बीवी बनूगीं.. और ऑफिस की छुट्टी चल रही है... तीन चार संड़े एक साथ।
अरुन- रुको... पहले कसम खाओ कि हम जो भी खेल खेल रहे हैं... उसका पता उसको नहीं चलना चाहिए जिसको... पता चलने से हमारा खेल बिगड़ जाएगा।
शशी- हम कसम खाते हैं।
बानी- हम कसम खाते हैं।
अरुन- कसम है हमें।

Scene-19
(यहा कोई भी एक खेल हो सकता है विमल और कमल के बीच जो उनको अंत में थका दे... बुरी तरह और वह खेल ना खेल पाए।)
एक पोटली में चावल, दाल मिली हुई है। उसके ठीक बगल में दो ट्रांसपेरेंट बर्नी रखी हुई है। विमल-दाल, और कमल-चावल बीनता है... पांच दाने बीनने के बाद दोनों एक-एक करके बर्नी में डालते हैं... जब बीनना बढ़ता जाता है तो दोनों एक दूसरे की बर्नी सबसे पीछे बैठे दर्शकों के हाथ में रख देतें है। अब उन्हें पाँच-पाँच दाने बीनकर उस दर्शक के पास जाना है जहाँ उसके बर्नी है। यह भाग-दौड़ उस थकान तक पहुँच जाती है जहाँ दोनों घिसटने लगते हैं.... और कुछ देर में दोनों थक कर गिर जाते हैं।

Scene-20
(निधी डरी हुई एक कोने में बैठी है… पूरब पागलों जैसा पूरे कमरे में चक्कर काट रहा है।)
पूरब- हा… हा… हा…. पुंगी बना और अंदर डाल दे… हा… हा… हा… पुंगी बना और अंदर डाल दे…. हा…. हा… हा… पुंगी बना और अंदर डाल दे……नहीं... नहीं... sorry यह गंदा था...।
निधी- तुम्हें क्या हो गया है.. तुम ठीक हो ना..जोक़ क्यों सुनाते हैं… पता है ना?
पूरब- जोक़ वो जो सोश्यली सुनाया जा सके, और सबको मज़ा आए... सबको मज़ा आए... सबको मज़ा आए।
निधी- हाँ, सुनो रहने दो। हम आज dinner केन्सिल करते हैं।
पूरब- डिनर केन्सिल नहीं करेगें
निधी- मुझे डर लग रहा है... मुझे डर लग रहा है... मुझे डर लग रहा है... मुझे डर लग रहा है... मुझे डर लग रहा है.... मुझे डर लग रहा है.. मुझे डर लग रहा है।
पूरब- मैं हार गया… मैं जोक़ नहीं सुना सकता हूँ(रोने लगता है।) पर…पर.. सुनों मैं जोक नहीं सुना सकता हूँ… लेकिन मैं नाच तो सकता हूँ… क्यों, मैं बचपन में बहुत नाचता था।
निधी- तुम्हें नाचना नहीं आता है। यह क्या कर रहे हो तुम।
(पूरब बहुत धीर-धीरे नाचना शरु करता है.... और काल्पनिक अतिथियों को देखकर पूछता है।)
पूरब- मज़ा आ रहा है? हे? क्यों आपको मज़ा आ रहा है? यह देखो... यह.. यह...
निधी- तुम्हें नाचना नहीं आता.. तुम्हें नाचना नहीं आता.. तुम्हें नाचना नहीं आता है... तुम्हें नाचना नहीं आता है... तुम्हें नाचना नहीं आता है।


Scene-21

(तीनों तेज़ चलना चालू करते हैं और साथ-साथ में बोलते रहते हैं... बिना रुके...)
अरुन- ऑफिस से थका मांदा आदमी घर पर आता है और घर की दिन-भर की समस्या लेकर बीवी बैठ जाती है...। वह बीवी से पक चुका है...
बानी- पर वह मन ही मन बीवी को बहुत चाहता भी है। अभी लगातार छुट्टीयां है और बीवी उसे बता देगी कि प्यार क्या होता है। बीवी मदमस्त चाल से, अपनी पूरी जवानी लिए पति के कमरे में जाती है।
अरुन- पति सो चुका है।
शशी- तभी दरवाज़े की घंटी बजती है।
अरुन- पति उठ बैठता है।
बानी- पत्नी उसे वापिस लिटा देती है।
शशी- दरवाज़े की घंटी दौबारा बजती है।
अरुन- इस बार पति... गुस्से में उठ ही जाता है। वह दरवाज़े के तरफ बढ़ता है।
बानी- पर पत्नी उसे दरवाज़े की तरफ जाने नहीं देती है। वह उसे वापिस ख़ीच लेती है।
अरुन- पति एक थप्पड़ पत्नि के जमाता है... और पत्नि को अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है।
बानी- पर फिर भी वह पति को दरवाज़ा खोलने नहीं देती है।
अरुन- पति एक और थप्पड़ जमाता है।
शशी- तभी सेक्रेटरी को पता चलता है कि “अरे उसके पास तो घर की एक ड्युप्लीकेट चाबी पहले से ही है।“
बानी- यह झूठ है।
अरुन- हाँ मैंने ही दी थी उसे यह चाबी।
शशी- वह धीरे से चाबी से दरवाज़ा खोलती है। वह पहले भी यह खेल खेल चुकी है।
अरुन- पति उसका स्वागत गले लगकर करता है।
बानी- नहीं यह झूठ है।
शशी- सच है।
अरुन- अरे यह सच है।
शशी- ना.. झूठ है।
बानी- झूठ है ना?
शशी- ना...।
अरुन- सच है यह सब।
बानी- यह खेल झूठ है।
शशी- ना खेल स्च्चा था।
अरुन- झूठा था।
बानी- सच्चा था।
अरुन- झूठ था।
शशी- सच है।
बानी- झूठ.... झूठ...झूठ।
अरुन- सच है।
शशी- झूठ... सच है
अरुन- और सच।
बानी- खेल।
शशी- सच है।
अरुन- झूठ है।
बानी- सच है।
(सच और झूठ... पूरब के डॉस के साथ बढ़ता जाता है..... विमल और कमल... शक्कर और दाल को अलग करने की भाग-दौड़ में थककर गिरने लगते है। सब बढ़ते-बढ़ते एक चीख़ पर खत्म होता है।


Scene-22

(निधी पूरब के यहाँ डिनर पर सभी आए हुए हैं.... एक बहुत बड़ा सफेद कपड़ा है जिसमें 9 (नौ) छेद है... सभी उस सफेद कपड़े के नीचे है सिर्फ उनके सिर बाहर देखाई दे रहे हैं....।एसा लग रहा है कि एक बड़े से डाईनिंग टेबल पर सभी बैठ हुए हैं। सभी के चहरे उस छेद में से निकले हुए हैं... डिनर पर बॉस सबसे ऊपर बैठा है.... बाक़ी सब नीचे है और शांत है..। तभी सबकी निगाह इंद्रजीत पर पड़ती है... और सभी डर जाते हैं। कुछ देर ही फुस-फुसाहट और डर के बाद बॉस पूछ लेता है।)

बॉस- तुम... तुम कौन हो???
इंद्रजीत- मैं इंद्रजीत...।
बॉस- हे!!!.... इंद्रजीत को तो कबका हमारी कंपनी मार चुकी है। तुम झूठ बोल रहे हो।
इंद्रजीत- नहीं.... मैं इंद्रजीत हूँ... और आप जानते हैं कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता।
बॉस- हाँ... इंद्रजीत कभी झूठ नहीं बोलता है।
विमल- देखा सर मैंने कहा था ना कि इंद्रजीत मरा नहीं है वह गांव छोड़कर भाग गया था... देखिए सर वह वापिस आ गया है।
अमल- नहीं... नहीं सर... इंद्रजीत सन्यासी हो गया था... वह अपना सन्यास ख़त्म करके वापिस आ गया है।
कमल- नहीं सर यह झूठ बोल रहा है... इंद्रजीत को तो हम सबने मिलकर मारा है... हम सब यह जानते हैं।
बॉस- shut up… shut up….
अरुन- अरे!!! ऎसे थोड़ी हो सकता है... इंद्रजीत कालेज में मेरे साथ था... वो पागल था।
निधी- हाँ उसे मैं भी जानती थी। उसे आखिरी बार बंदूक लेकर जंगलों में भागते हुए किसी ने देखा था।
पूरब- नहीं.. नहीं...वह तो नुक्कड़ नाटक करता था। एक दिन नुक्कड़ नाटक के दौरान ही किसी पार्टी वालों ने मार-मारकर उसकी जान ले ली... हमारे सामने की बात है।
शशी- नहीं.... वह तो सुना है कि रायपुर में रहता है.... कुछ किताबें लिखता है जिसे कोई नहीं पढ़ता।
अरुन- नहीं इसने तो अपना नाम बदलकर दया बाई रख लिया था।
बॉस- अगर यह ही इंद्रजीत है तो यह यहाँ क्यों आया है?
पूरब- हाँ... यहाँ इसका क्या काम?
शशी- यह हमें डराने आया है।
निधी- नहीं... शायद यह किसी कंपनी की तरफ से आया है।
अमल- यह प्रचार करने निकला है।
कमल- क्या इसने भी कोई कंपनी join कर ली?
विमल- हम सब किसी ना किसी कंपनी की तरफ से है।
पूरब- पर वह तो अकेला खड़ा है।
शशी- मैं जाना चाहती हूँ।
निधी- रुको मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ।
अमल- मुझे अकेला छोड़कर मत जाओ।
अरुन- अरे कोई उससे पूछो तो कि वह यहाँ क्यों आया है।
बॉस- ओए... सुनों... तुम जो भी हो...
पूरब- इंद्रजीत बोलो ना....।
कमल- ए एवम इंद्रजीत...।
इंद्रजीत- मैं एवंम इंद्रजीत नहीं हूँ....। मैं अमल, विमल, कमल और इंद्रजीत हूँ।
शशी- जो भी है तुम यहाँ क्यों आए हो?
निधी- हाँ... क्यों आए हो?
अरुन- किसने बुलाया तुम्हें?
अमल- मैंने नहीं बुलाया।
विमल- मैंने भी नहीं...
इंद्रजीत- प्रकृति हमें अच्छी लगती है।
कमल- क्या? क्या?
इंद्रजीत- प्रकृति हमें अच्छी लगती है?
पूरब- हाँ... प्रकृति हमें अच्छी लगती है... का एक पक्षी हमने पिंजरे में बंद करके रखा है..... हे ना?
निधी- हाँ और एक फूल गमले में भी उगा रखा है... हे ना!!!
इंद्रजीत- हमें सुख से रहना चाहिए।
अरुन- हाँ बिलकुल सही बात है... हमें सुख से रहना चाहिए... हमारे यहाँ उसकी आवाज़े लोगों को बाहर सड़क तक सुनाई देती हैं... क्यों बानी??
बानी- हाँ.. हाँ
इंद्रजीत- पर दुख की लड़ाई नहीं है कहीं... रोना?
बानी- हाँ वह भी कभी-कभी होता है... पर दुख की लड़ाई और रोना सिर्फ इसलिए है कि खुशी का पैमाना तय हो सके... हे ना!!
शशी- हाँ.. खुशी का पैमाना तय हो सके।
विमल- हाँ...हम खुश है यहा...
कमल- हमारे माँ-बाप को हमपर फक्र है।
अरुन- बुज़ुर्गों की इज़्ज़त के माँ-बाप घर के कोनों में ज़िदा बैठे रहते है।
शशी- और घर के कोनों को हम एकदम साफ करके रखते हैं।
बॉस- हमें जानवरों से भी प्रेम है।
निधी- हाँ हमारे घर में जानवरों से प्रेम की एक बिल्ली भी है... हे ना?
पूरब- हाँ जो डरी हुई पूरे घर में घूमती रहती है।
इंद्रजीत- हम आपस में कितना प्रेम करते हैं
बॉस- हाँ हम इंसान है... हम आपसी प्रेम के लिए ही पैदा हुए हैं।
शशी- आपसी प्रेम के त्यौहार भी तो हम मनाते हैं। कितने सारे त्यौहार।
इंद्रजीत- पर इंसानों ने इंसानों को मारा भी तो है।
बानी- हाँ.. वह... ऎसा... हुआ है कभी-कभी... इसलिए हम अपने सारे त्यौहार इतने चीख़ते और चिल्लाते हुए मनाते हैं कि इसांन ने ही इंसानों को मारा है की आवाज़े लोगों को थोड़ी कम सुनाई दें।
इंद्रजीत- हमें एक दूसरे की ज़रुरत है।
अरुन- हाँ उसके खेल हम खेलते रहते हैं...
अमल- चोर-पुलिस
विमल- भाई-बहन, घर-घर
कमल- आफिस-आफिस।
(सभी हर बात पर हाँ-हाँ में सिर हिलाते हैं.... इंद्रजीत हंसने लगता है। सभी चुप हो जाते हैं।)
इंद्रजीत- कितनी खूबसूरत व्यवस्था है यह... पर असल खेल क्या है.... कि हमारी व्यवस्था के बीच हमारे नाखून बढ़ते रहने का जनवर भी है... उस क्या क्या किया हमने?
बॉस- उसके लिए हमारे पास धर्म है शांति का संदेश है।
इंद्रजीत- हाँ धर्म और शांति की बोटीयाँ खिला खिला कर हमने उसे गुफा में बंद करके रखा है.... पर इन्हीं सब दिनों में किसी एक दिन...’हमें प्रकृति अच्छी लगती है’ के पक्षी को ...’जानवरों से प्रेम की बिल्ली’ पंजा मारकर खा जाती है। हमारे ’नाखून बढ़ते रहने का जानवर’ गुफा से निकलकर बिल्ली को मार देता है। ’वहाँ बुज़ुर्गों की इज़्ज़त के माँ-बाप’ सब चुपचाप देखते रहते हैं... और घर में ’हमें प्रकृति अच्छी लगती है’ का पिंजरा हमेशा के लिए खाली हो जाता है... शून्य।
(इंद्रजीत हसना चालू करता है... उसकी हंसी तेज़ होतीजाती है... धीरे-धीर सभी छिपने के लिए कपड़े के भीतर जाते जाते हैं..... और सभी मिलकर वह पूरा का पूरा कपड़ा इंद्रजीत पर पलट देते हैं...और उसे उसी कपड़े के भीतर दबोच लेते हैं.....। उसके ऊपर एक नाल रखकर उसे दफ्न कर देते हैं। निधी लोरी गाना चालू करती है... और सभी इंद्रजीत की लाश के अगल बगल चुप-चाप खड़े रहते हैं।)
Black out….







The end……








1 टिप्पणी:

  1. अभी पूरा नहीं पढ़ा। कुछ अंश पढ़े। देखने की इच्छा बलवती हो गई। देखते हैं कब ये अवसर मिलता है।

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