मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

इल्हाम....





(नाटक दो स्थानों में। एक पार्क की बेंच और एक मध्यमवर्गीय परिवार के
ड्राइंग रूम में घटित हो रहा है।)

(लाईट आती है। एक आदमी की धुंधली आकृति बेंच में बैठी दिखती है। म्यूजिक
शुरु होता है।)

(आदमी अकेला बेंच के अगल-बगल खेल रहा है।)

(वो सो रहा है।)

(आदमी नाच रहा है।)

सीन १

(पूनम तोहफ़े, गुलदस्ते और दूसरे सामान उठा रही है और शुक्ला मेहमानों को
दरवाजे तक छोडने गया है और बाहर से उसकी आवाज आती है)

शुक्ला:- अच्छा तिवारी जी फ़िर आना… हाँ.. हाँ… मैं भगवान को बता दूँगा…
अच्छा भाभी जी, नमस्कार।

(शुक्ला अंदर आता है, शुक्ला और पूनम काफी परेशान हैं और अचानक शुक्ला
हँसने लगता है)

पूनम:- तुम हँस क्यों रहे हो?

शुकला:- भाभी सोचो, दिन भर कितनी मेहनत की हमने, साले के बैंक के सारे
दोस्तों को चोरी से जमा किया कि सरप्राइज देंगे…… साले ने हमें ही
सरप्राइज दे दिया… आया ही नहीं।

पूनम:- कहाँ होंगे वो?

शुक्ला:- हाँ, कहाँ गया होगा? सारे दोस्त तो यहीं थे। क्या भाभी कोई
चक्कर तो नहीं है?

पूनम:- अरे नहीं, उनको नोट गिनने से फ़ुर्सत मिले तब ना। रात में सोते
वक्त भी उनकी उंगलियां चलती रहती हैं। थूक लगाते हैं, नोट गिनते हैं।
मैंने कहा अब तो नोट गिनने की मशीन भी लग गयी है… तो कहते हैं अगर नोट
मशीन गिनेगी, तो मैं क्या करूंगा? जब तक नोट नहीं गिन लेते तब तक लगता है
नहीं कुछ किया है…… आज आपका दिन भी पूरा बर्बाद हो गया…।

शुक्ला:- एक दिन अपने दोस्त के लिये क्या दिक्कत है।

पूनम:- आपको भी देर हो रही होगी… अब तो आते ही होंगें…

शुक्ला:- अपना कौन इंतजार कर रहा है। नीचे जाऊँगा, दुकान का शटर उठाऊँगा
फ़ैल के सो जाऊँगा। भाभी मुझे थोडी चिंता हो रही है। काफी समय हो गया है…
साला अपने ही जन्मदिन में गायब है। मुझे तो याद नहीं पहले भी कभी उसने
ऎसा किया हो?

पूनम:- अभी पिछले कुछ महीनों से थोडा देर से घर आने लगे हैं पर इतनी देर
कभी नहीं हुई… मुझे तो लगता था कि नीचे आपकी दुकान में बैठ जाते होंगें,
पर कहने लगे कि ऑफ़िस के पास एक पार्क है, वहीं थोडी देर जाकर बैठ जाता
हूँ, अच्छा लगता है।

शुक्ला:- अजीब बात है। मुझे नहीं बताया साले ने।

पूनम:- बल्कि पिछले कुछ दिनों से ज्यादा ही खुश दिखते हैं।

शुक्ला:- ये देखो… ये लाया था… साले के लिये… विदेशी। सोचा था साथ में
पीयेंगे… अपने सुनहरे भविष्य के बारे में गपशप करेंगे… चलता हूँ भाभी…
अकेले ही पीयूंगा अब… एक गिलास दे दीजिये…

(भगवान अंदर आता है)

भगवान:- अबे गिलास भी यहीं से लेगा तो यहीं पी ले ना।

शुक्ला:- अबे साले… कहाँ था बे भगवान… अभी पाँच मिनट पहले तेरा बर्थ डे
निकला… पर कोई बात नहीं हैप्पी बर्थ डे, कितनी चिंता हो रही थी तेरी।

भगवान:- कहाँ है माल?

शुक्ला:- माल तो है, पहले अपनी बीवी से तो मिल ले… बहुत नाराज है वो।

(भगवान पूनम के पास जाता है। पूनम डिब्बा खोलने की कोशिश करती है, डिब्बा
नहीं खुलता)

भगवान:- अरे खुल नही रहा है?

पूनम:- पता है आपको कितने लोग आये थे। आपका पूरा बैंक यहीं पर था। किसी
ने कुछ नहीं खाया। पूरा खाना बचा हुआ है… अब पूरे हफ़्ते वही गर्म करके
खिलाऊँगी।

भगवान:- अरे इतने लोग थे तो मुझे पहले बताना चाहिये था ना।

शुक्ला:- सरप्राइज का मतलब जानता है तू?

(अचानक डिब्बा खुल जाता है)

भगवान:- अरे खुद ही खुल गया। पिंकी कहाँ है?

पूनम:- सुबह कॉलेज है उसका… इंतजार करते-करते सो गई। पता है कितना समय हुआ है?

भगवान:- अरे बाप रे… मुझे तो पता ही नहीं चला।

पूनम:- कहाँ थे आप, पूछ सकती हूँ?

भगवान:- अरे मैं… वो पार्क गया था। मुझे पता ही नहीं चला कि इतना टाईम हो
गया… अरे हाँ पता है आज पार्क में…

पूनम:- मुझे नहीं सुनना पार्क में क्या हुआ था। मैं थक गई हूँ। भाई साहब,
अंदर पानी, सोडा सब रखा है, निकाल लीजियेगा। मैं सोने जा रही हूँ।

(पूनम जाती है। भगवान, शुक्ला से गिलास लेने के लिए आगे बढता ही है कि
पूनम वापिस आती है। भगवान जल्दी से गिलास वापिस करता है।)

पूनम:- वो मैं कहना भूल गयी थी… जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें… ।

भगवान:- अरे नाराज हो?

पूनम:- आपको फ़र्क पडता है? (पूनम चली जाती है)

भगवान:- हा…हा…शुक्ला… आज मैं बहुत खुश हूँ। मैंने ऎसा जन्मदिन कभी नहीं मनाया।

शुक्ला:- ये ले… चियर्स। पता है भाभी ने आज कितनी मेहनत की… मैंने भी आज
दुकान अपने नौकरों के हवाले कर दी… तेरे सारे दोस्तों के घर गया… उन्हें
खबर की कि आज पार्टी है… सब बिचारे आ भी गए…… और एक तू ही गायब।

भगवान:- अच्छा, तभी मैं कहूँ कि उन्हें खबर कैसे लगई?

शुक्ला:- मैंने कहा ना मैंने ही सबको बताया।

भगवान:- नहीं…… वो बच्चों को?

शुक्ला:- बच्चे… किसके?

भगवान:- पार्क… पार्क के बच्चे…

शुक्ला:- ये पार्क का क्या चक्कर है?

भगवान:- वहीं ऑफ़िस के पास एक पार्क है ना… छोटा सा। वहीं शाम को कुछ
बच्चे खेलने आते हैं। उन्हें खेलता देखना…… पूरी थकान मिट जाती है। मेरी
तो बच्चों से दोस्ती भी हो गई है। मैंने उन्हें वो सारे खेल सिखाये जो
मैं बचपन में खेला करता था और आज तो उन्होने मेरा जन्मदिन भी मनाया। मैं
पूछता रहा – तुम्हें कैसे पता चला… पर किसी ने कुछ नहीं बताया।

शुक्ला:- किसके बच्चे हैं वो?

भगवान:- पता नहीं… अरे हाँ आज चाचा भी आये थे मिलने।

शुक्ला:- चाचा… तेरा कोई चाचा भी है यहाँ?

भगवान:- नहीं, मेरे चाचा नहीं…… वो चाचा हैं… पर वो कैसे आ सकते हैं?

शुक्ला:- सुन भाई मुझे थोडी चढ गई है। तेरी कोई बात मेरी समझ में नहीं आ
रही है… कौन चाचा… कौन से बच्चे… अभी ये सब छोड, देख हर साल की तरह इस
साल भी मैं दारू लाया… लाया कि नहीं…?

भगवान:- हाँ, लाया।

शुक्ला:- और हर साल की तरह इस साल भी हम लोग अपने खूबसूरत भविष्य की
बातें करेंगें… करेंगें कि नहीं?

भगवान:- हाँ, करेंगें…… लेकिन इस बार पहले तू शुरु करेगा।

शुक्ला:- अरे, मैं क्या बोलूंगा…… अरे यार तू ना फ़ंसा देता है… मैं… नहीं यार…

भगवान:- शुक्ला… बुदबुद नहीं। शुरु कर।

शुक्ला:- चल ठीक है, मैं ही शुरु करता हूँ… वो देख… दुकान… है कि नहीं।

भगवान:- हाँ, दुकान।

शुक्ला:- फ़िर… दो दुकान।

भगवान:- दो दुकान। फ़िर?

शुक्ला:- फ़िर तीन दुकान।

भगवान:- हाँ तीन। फ़िर?

शुक्ला:- हा… हा… । फ़िर क्या? अपना भविष्य तो सीधा है। अभी थोडे कपडे
बेचता हूँ, बाद में बहुत कपडे बेचूँगा। चल मेरा हो गया अब तू शुरु कर… और
हाँ पिंकी की शादी से शुरु करना… मजा आएगा।

भगवान:- नहीं… उसके भी पहले से घर से शुरु करता हूँ। ये घर दो साल में
अपना हो जायेगा।

शुक्ला:- अपना हो गया।

भगवान:- फ़िर पिंकी की शादी।

शुक्ला:- हो गयी… मजा आ गया। फ़िर?

भगवान:- बिल्लू कुछ साल में इंजीनियर बन चुका होगा।

शुक्ला:- वो बिल्डिंग बना रहा है, पुल बना रहा है।

भगवान:- फ़िर उसकी शादी।

शुक्ला:- धूमधाम से।

भगवान:- तब तक पिंकी के बच्चे हो गए होंगे।

शुक्ला:- बहुत सारे।

भगवान:- फ़िर बिल्लू के बच्चे।

शुक्ला:- मजा आ गया।

भगवान:- फ़िर हम उन्हें बडा करेंगे… और अगर ज़िंदा रहे तो उन्हें बहुत
प्यार भी करेंगे और उनकी भी शादी करेंगे…

शुक्ला:- करेंगे… भगवान करेंगें।

भगवान:- और फ़िर भी अगर बचे रहे तो उनके बच्चों का भी सुख भोगेंगे… और फ़िर…

शुक्ला:- हाँ… फ़िर?

भगवान:- फ़िर… फ़िर क्या… और क्या?

शुक्ला:- फ़िर मजा। बहुत सारा मजा…… क्या हुआ आज तूने मन से नहीं सुनाया,
पिछली बार कितना मज़ा आया था याद है? क्या हुआ भगवान…?

भगवान:- कुछ नहीं… शुक्ला। आज एक अजीब सी बात याद आई… मेरा स्कूल नदी के
उस पार था, रोज छोटी सी नाव में उस पार जाना पडता था। जो नाव चलाता था
उससे मेरी अच्छी दोस्ती थी। एक दिन हम नाव में स्कूल जा रहे थे, तभी हमने
देखा कि मल्लाह नाव चलाने के बजाए अपने डंडे से चिडिया को उडा रहा है पर
चिडिया बार-बार उडकर वापस वहीं बैठ जाती है। मल्लाह का गुस्सा बढता जा
रहा है। हम सब डर गए क्योंकि नाव नाव बुरी तरह हिल रही थी। मैंने कहा-
’अरे क्या कर रहे हो? नाव डुबाओगे क्या?’ तो उसने कहा – ’अरे साहब, इसे
मुफ़्त में नदी पार करने की आदत पड गई है।’ हम सभी हँस दिये। इसके काफ़ी
दिनों बाद हमने देखा, मल्लाह और चिडिया एक दूसरे से मुँह फ़ेरकर बैठे
हैं, मानो एक दूसरे से नाराज हों। फ़िर कुछ दिनों बाद देखा मल्लाह चिडिया
से बातें कर रहा है लगातार… कभी हँसता है… कभी चिल्लाता है। सभी कहने लगे
ये पागल हो गया है। मुझसे रहा नहीं गया, मैंने उससे पूछ लिया- ’क्या कर
रहे हो? पागल हो गये हो क्या, एक चिडिया से बात कर रहे हो?’ तो वो कहने
लगा-’ मुझे तो लगता है आप सब लोग पागल हैं, अरे ये तो आप सब से बात करना
चाहती है, आप लोग इससे बात क्यों नहीं करते?’ हम उसे पागल समझ रहे थे और
वो हम सबको।

शुक्ला:- फ़िर वो मल्लाह का क्या हुआ?

भगवान:- जब बात फ़ैल गई तो सबने उसकी नाव में जाना बंद कर दिया, कुछ समय
तक वो अकेले ही नाव चलाता रहा। बाद में मैंने सुना था कि लोगों ने उसे
पत्थर मार-मारकर गाँव से भगा दिया।

शुक्ला:- बस…

भगवान:- हाँ, बस।

शुक्ला:- अरे ये तो एकदम अजीब सी बात हुई?

भगवान:- ये ही सब चीजें मुझे याद आती हैं, जब मैं पार्क की उस बेंच पर
बैठता हूँ और फ़िर वो बच्चे आ जाते हैं। लेकिन शुक्ला, आज तेरे को पता
नहीं कितने सालों बाद मैं नाचा…

शुक्ला:- तू नाचा…… ?

भगवान:- अरे हाँ… बहुत मजा आया… क्या धुन थी वो… (भगवान मुँह से अजीब सी
धुन निकालता है और नाचना शुरु कर देता है। पहले शुक्ला को ठीक लगता है
फ़िर वो परेशान हो जाता है। डर जाता है)

शुक्ला:- अरे वाह… मजा आ गया… चल आ जा… सुन आ जा यार… बहुत हो गया…
भगवान… बैठ ना। क्या कर रहा है… सुन… बस बहुत हो गया यार…… ओ बैठ ना………
देख मुझे ठीक नहीं लग रहा है…… भगवान…… भगवान…… तू पागल हो गया है क्या?

Black Out

Scene-2


(भगवान पार्क की बेंच पर मानो किसी से बात कर रहा है)

भगवान:- भीतर पानी साफ़ था… साफ़ ठंडा पानी… कुँए की तरह, जब हम पैदा हुए
थे…… जैसे-जैसे हम बडे होते गए हमने अपने कुँए में खिलौने फ़ेंके, शब्द
फ़ेंके, किताबें, लोगों की अपेक्षाओं जैसे भारी पत्थर और इंसान जैसा जीने
के ढेरों खांचे और अब जब हमारे कुँए में पानी की जगह नहीं बची है तो हम
कहते हैं…… ये तो सामान्य बात है।

Scene-3


(पिंकी चाय लेकर आती है। पूनम, शुक्ला और सौरभ बैठे हुए हैं)

पूनम:- लीजिये, चाय पीजिये। माफ़ कीजियेगा जन्मदिन के दिन इन्हें कुछ
जरूरी काम आ गया था। बहुत देर बाद आये। हम भी परेशान हो गये थे, अब सब
ठीक है। ये एकदम ठीक हैं। आपसे भी उस दिन के बाद आज मुलाकात हो रही है।

शुक्ला:- भाभी, इन्हें सब पता है। ये आपसे कुछ बात करने आये हैं।

सौरभ:- असल में…… (सौरभ, पिंकी की तरफ़ देखता है)

पूनम:- पिंकी, तुम अंदर जाओ…… हाँ, कहिये।

सौरभ:- जी…… सर मेरे सीनियर हैं। मैं बैंक का ये लेटर लाया हूँ। अकेले
आने की हिम्मत नहीं थी, इसलिये शुक्ला जी से रिक्वेस्ट की कि साथ चलें…
सर को सस्पेंड कर दिया गया है……

पूनम:- क्यों…? क्यों सस्पेंड कर दिया वो तो रोज काम पर जाते हैं। इतने
साल उन्होंने बैंक को दिये हैं और आप एकदम……

सौरभ:- वो करीब एक महीने से बैंक नहीं आ रहे हैं…… इसलिये ये लेटर मुझे
खुद ही लाना पडा।

पूनम:- पर वो तो रोज सुबह…… मैं टिफ़िन……… पर क्यों निकाल दिया?

सौरभ:- सर असल में पैसे बाँटने लगे थे।

शुक्ला:- मतलब बाँटने नहीं लगा था… सिर्फ़ एक को………

पूनम:- किसको…… ?

सौरभ:- भगवान सर……?

पूनम:- वो घर पर नहीं हैं… आप कहिए…

सौरभ:- एक बुढिया हर महीने पेंशन लेने आती थी, भगवान सर पता नहीं क्यों
उसे पाँच सौ रुपये ज्यादा देने लगे। मैनेजर साहब ने पूछा- ये गलती कैसे
हुई। तो सर कहने लगे- ये गलती नहीं है, मैंने जानबूझकर दिये हैं। मैनेजर
साहब ने पूछा- क्या माँगे थे उसने? सर ने कहा – नहीं। फ़िर उनकी बहुत तेज
बहस हुई। हम लोगों ने भी बाद में सर को समझाया तो सर कहने लगे कि मैंने
उसकी ’आह’ सुनी है। (सौरभ को हँसी आने लगती है वो हँसी दबाता है) सॉरी……
और फ़िर सर पता नहीं क्या पागलों जैसे बातें करने लगे…… मेरा मतलब…… मैं
नहीं, ऎसा बैंक वाले लोग कहते हैं कि किसी को भी पैसे बाँट देना… पागलपन
ही हुआ न……

पूनम:- पागल नहीं हैं वो…………।


Black Out


Scene-4

भगवान:-

आदतन… अपना भविष्य मैं अपने हाथों की

रेखाओं में टटोलता हूँ……

’कहीं कुछ छुपा हुआ है’ – सा चमत्कार

एक छोटे बादल जैसा हमेशा साथ चलता है।

तेज धूप में इस बादल से हमें कोई सहायता नहीं मिलती…

वो हथेली में एक तिल की तरह… बस पडा रहता है।

तिल का होना शुभ है…

और इससे लाभ होगा…

इसलिये इस छोटे बादल को संभालकर रखता हूँ।

फ़िर इच्छा होती है…… कि वहाँ चला जाऊँ……

जहाँ बारिश पैदा होती है…

बादल बँट रहे होते हैं……

पर शायद देर हो चुकी है।

अब मेरी आस्था का अँगूठा इतना कडक हो चुका है

कि वो किसी के विश्वास में झुकता ही नहीं है।

फ़िर मैं उन रेखाओं के बारे में सोचता हूँ……

जो बीच में ही कहीं गायब हो गयीं थीं……

’ये एक दिन मेरी नियति जीयेगा’ – की आशा में……

जो बहुत समय तक मेरी हथेली में पडी रहीं……

क्या थी उनकी नियति?

कौन सी दुनिया इंतजार कर रही थी……

इन दरवाजों के उस तरफ़……

जिन्हें मैं कभी खोल नहीं पाया……।

तभी मैंने एक अजीब सी चीज देखी……

मैंने देखा… मेरे माथे पर कुछ रेखायें बढ गई हैं…… अचानक।

अब – ये रेखायें क्या हैं।

क्या इनकी भी कोई नियति है…? अपने दरवाजे हैं?

नहीं – इनका कुछ नहीं है।

बहुत बाद में पता चला इनका कुछ भी नहीं है।

ये मौन की रेखाये हैं।

मौन – उन रेखाओं का जो मेरे हाथों में उभरी थीं।

पर मैं उनके दरवाजे कभी खोल ही नहीं पाया।

सच मैंने देखा है-

जब भी कोई रेखा मेरे हाथों से गायब हुई है…

मैंने उसका मौन अपने माथे पर महसूस किया है।

मुझे लगता है- यही मौन है – जो हमें बूढा बनाते हैं।

जिस दिन माथे पर जगह खत्म हो जायेगी……

ये मौन चेहरे पर उतर आयेगा………

और हम बूढे हो जायेंगें।

Fade Out






Scene-5


(पिंकी बाहर बैठी हुई है। शुक्ला भीतर से बाहर आता है)

शुक्ला:- सो रहा है। भाभी कहाँ है?

पिंकी:- फ़ोन करने गई हैं। पापा एक हफ़्ते से कहाँ थे… कहाँ मिले?

शुक्ला:- एक हफ़्ते से कहाँ था ये तो पता नहीं…… पर अभी पार्क में मिला,
सो रहा था बेंच पर।

पिंकी:- मतलब…… एक हफ़्ते से पार्क में ही थे?

शुक्ला:- नहीं, मैं पहले भी गया था वहाँ। पता नहीं इतने दिन कहाँ था ये……
बेटा पानी देना।

पिंकी:- मैंने माँ को कभी नहीं बताया, नहीं तो वो बहुत घबरा जातीं……
अंकल, पापा मुझसे बहुत बातें करते थे……

शुक्ला:- क्या… क्या बातें करते थे?

पिंकी:- कुछ भी, किस्से, घटनायें। मुझे ज्यादा समझ में नहीं आतीं थीं। पर
मुझे उनकी बातें सुनना बहुत अच्छा लगता था। वो कुछ डरे हुए थे…… मैंने
उनसे पूछा कि उन्हें क्या हुआ है तो कहने लगे मुझे इल्हाम हुआ है।

शुक्ला:- इल्हाम…… वो क्या होता है?

पिंकी:- पता नहीं… फ़िर कहने लगे – मुझे हर चीज एकदम नई सी लगती है… धुली
हुई। मैं सब कुछ फ़िर से एक बच्चे की तरह जी रहा हूँ। मैं बच्चा होने
वाला हूँ। तो मैंने उनसे पूछा – अभी आप क्या हैं? तो वो कहने लगे – ’अभी
मैं शेर हूँ और इसके पहले मैं ऊँट था’

शुक्ला:- क्या हो गया है इसे…… कैसा हो गया है ये…… उसने बताया क्यों वो
इतना परेशान है?

पिंकी:- वो परेशान नहीं हैं, वो बस डरे हुए हैं………… उन्हें डर है……… और
शायद इसीलिए वो इतने दिन घर नहीं आये।

शुक्ला:- ये सब तुम्हें पहले बताना चाहिये था, क्या डर……… किसका डर?

पिंकी:- तृप्ति का डर…

शुक्ला:- तृप्ति …?

पिंकी:- हाँ तृप्त हो जाने का डर…… पापा कह रहे थे उन्हें लगता है कि वो
तृप्त हैं। जिसमें सारी वजह, इच्छाएँ खत्म हो जाती हैं। वो कह रहे थे…
कोई भी वजह नहीं बची है, सिवाए एक वजह के… एक इच्छा के…… कि मुझे वापिस
इस घर में आना है…… रोज…… अपने परिवार…… अपनी बेटी के पास…… और उन्हें ये
वजह भी खो जाने का डर है।

शुक्ला:- मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है… और… और क्या कह रहा था?

पिंकी:- और वो किस्से सुनाते थे…… बचपन के, इधर-उधर के, चाचा के……

शुक्ला:- ये… ये चाचा कौन है? वो कह रहा था कि चाचा उससे मिलने आए थे।
कहाँ रहते हैं वो कुछ पता है?

पिंकी:- वो यहाँ रहते हैं? मुझे नहीं मालूम था। ( पूनम अंदर आती है)

पूनम:- अरे कहाँ हैं वो?

शुक्ला:- अंदर सो रहा है…… सोने दीजिये… डॉक्टर ने कहा है कि आराम की
सख्त जरूरत है।

पूनम:- मैं बस देखकर आती हूँ। (पूनम भीतर जाती है)

शुक्ला:- वो चाचा के बारे में तुम्हारी माँ को कुछ पता है?

पिंकी:- उन्होंने कभी बात नहीं की मुझसे। (पूनम आती है)

पूनम:- हे भगवान, बस इन्हें ठीक कर दे और कुछ नहीं चाहिये। ये प्रसाद लो
। मैं मन्नत माँग के आई हूँ। सब ठीक हो जायेगा। ये खुद घर आये ना?

शुक्ला:- नहीं…… पार्क में सो रहा था। बहुत गहरी नींद में। मैंने इतनी
कोशिश की उठाने की… फ़िर पानी डाला… तब भी नहीं उठा। मैं डर गया, कई
लोगों की मदद से इसे डॉक्टर के पास लेकर गया तब कहीं जाकर इसे होश आया।

पूनम:- डॉक्टर… क्या कहा उसने?

शुक्ला:- उसने तो डॉक्टर का गला ही पकड लिया था और पता नहीं क्या कह रहा
था डॉक्टर से… कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वापिस इसे बेहोश करके इसके
टेस्ट लेने पडे…… डॉक्टर ने कहा है कि इसे आराम करने दो।

पूनम:- मैं भी कल पार्क गई थी… इन्हें ढूंढते हुए…… ये तो कह रहे थे कि
बहुत सुंदर पार्क है… पर वो तो एकदम खंडहर जैसी जगह है। एक बेंच पडी है।
टूटे-फ़ूटे झूले हैं और बस…।

शुक्ला:- और भाभी, जिन लोगों ने मेरी मदद की डॉक्टर के पास ले जाने में,
वो कह रहे थे – ’ये पार्क सालों से बंद पडा है, यहाँ सिर्फ़ ये ही जाता
है, बेंच पर बैठा रहता है।’ लोगों ने इसे कभी अकेले बडबडाते देखा है, तो
कभी नाचते हुए……

पूनम:- बच्चे……?

शुक्ला:- कभी ऎसे ही अखबार को हवा में घुमा रहा है……

पूनम:- बच्चे…?

शुक्ला:- भाभी…… वहाँ कोई बच्चे खेलने नहीं जाते।

पूनम:- हे भगवान (आँखे बंद कर लेती है, एक लंबी साँस भर के शांत हो जाती
है।) हम अभी पिछले ही साल घूमने गए थे… है ना… पिंकी याद है। वहाँ पहाड
थे, बहुत सारी बर्फ़ थी। बिल्लू भी था वहाँ पर। हमने बर्फ़ के चार बडे
बडे गोले बनाये, कंचो से उनकी आँखे बनाईं… एक बिल्लू, एक पिंकी… मैं और…
पिंकी वो फ़ोटो लाना, जो हमने वहाँ खींचे थे।

पिंकी:- माँ…

पूनम:- फ़ोटो लाओ बेटा आआआ……

शुक्ला:- बेटा… जाओ…(पिंकी अंदर जाती है)

भाभी… भाभी… किसको फ़ोन किया आपने?

पूनम:- हाँ बिल्लू को फ़ोन किया पर उसके पास तो टाईम ही नहीं है। इनके
भाई को भी फ़ोन किया, मुझे लगा था ये गाँव चले गये होंगें… इनके भाईसाहब
बता रहे थे, जब ये बारह-तेरह साल के थे तो किसी बात पर एक दिन इनके
पिताजी ने इन्हें मारा था और ये घर छोडकर चले गये थे। दो साल कहाँ थे
किसी को नहीं पता। फ़िर जब मिले तो एक साल लग गया इनके मुँह से पहला शब्द
निकलवाने में…… मैं बता रही हूँ। ये सब भूत-प्रेत का चक्कर है।

शुक्ला:- भाभी… ये सब बेकार की बाते हैं। भगवान ठीक हो जायेगा।

(भीतर से पिंकी के चीखने की आवाज आती है। वो भागती हुई बाहर आती है।)

पिंकी:- मम्मी…

पूनम:- क्या हुआ……?

पिंकी:- पापा… पापा सो नहीं रहे थे वो बैठे हुए थे… मैंने पूछा- ’आप ठीक
तो हैं, क्या हुआ?’ तो वो मुझपर झपट पडे और मेरे हाथ से फ़ोटो एलबम छीन
लिया और…… (भगवान के खांसने की आवाज आती है और वो एलबम देखता हुआ अंदर
आता है… उसका सिर भारी हो रहा है। सभी डरे हुए हैं। भगवान सीधा पूनम के
पास जाता है)

भगवान:- पूनम… कौन सा दिन है… कौन सी तारीख है (पूनम डर के मारे रोने
लगती है) क्या हुआ पूनम…… (भगवान फ़िर एलबम को देखता है और मुस्कुराने
लगता है)

भगवान:- सुंदर है ये सब… कितना खूबसूरत है (एलबम नीचे पटक देता है) पर हम
क्या करेंगे इतनी खूबसूरती का… मैं कभी कभी अपना सबसे खूबसूरत सपना याद
करता हूँ, मेरा सबसे खूबसूरत सपना भी… कभी बहुत खूबसूरत नहीं था… मेरे
सपने भी थोडी सी खुशी में, बहुत सारे सुख चुगने जैसे हैं। जैसे कोई
चिडिया अपना खाना चुगती है… पर जब उसे पूरी रोटी मिलती है तो वो पूरी
रोटी नहीं खाती… वो उस रोटी में से रोटी चुग रही होती है। बहुत बडे आकाश
में हम भी अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं। देखने के लिये हम बडा
खूबसूरत आसमान देख सकते हैं… पर जीने के लिये हम उतना ही आकाश जी
पायेंगें, जितने आकाश को हमने अपने घर की खिडकी में से जीना सीखा है।
(भगवान हँसने लगता है)

शुक्ला:- भगवान…(शुक्ला चिल्लाता है। पूनम उसे रोकती है) भाभी… मैं बात
करता हूँ बहुत दिनों से इसका नाटक चल रहा है। (शुक्ला भगवान के पास आकर
gibberish में बात करता है)

शुक्ला:- #$#%$#^%$#$%#%%$%$^^&##!$$#%$^$

भगवान:- तुम लोग क्या बोल रहे हो…? पिंकी भी अंदर आई तो पता नहीं क्या
बोल रही थी? (शुक्ला फ़िर कुछ बोलने की कोशिश करता है, भगवान टोक देता
है) क्या…… क्या है?

शुक्ला:- भाभी, पता नहीं क्या बोल रहा है। कौन सी भाषा… कुछ समझ में नहीं
आ रहा है… क्या हो गया…… (भगवान को झिंझोड देता है)

पूनम:- भाई साहब… रुकिए मैं बात करती हूँ।

#$%#%^%$^$^^$%^$%^$%#%%^&

भगवान:- ये सब क्या है… पूनम…

पूनम:- ^$^$$^$^#$%#%%$%$$%$^^ (पूनम बोलते बोलते रोने लगती है)

शुक्ला:- (शुक्ला चिल्लाना शुरु करता है)

#%$^%&**&^$^#%$^&**^%^&^%&(&*^^%^%$^&

भगवान:- पागल नहीं हूँ मैं।

शुक्ला:- #$%$^%&*&()*&*%$%^^&*(*)

भगवान:- पागल नहीं हूँ मैं।

शुक्ला:- %#%%^&*^&*&(^*(&^((*^&*^()*)_+()(*&^

भगवान:- पागल नहीं हूँ मैं ऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎऎ

Black Out

Scene –6

पूनम:- नमस्कार डॉक्टर साब! पूनम… इनकी पत्नी…। जी, पहले से काफ़ी बेहतर
हैं गहरी नींद सोते हैं। जब तक कुछ बोलते नहीं हैं, तब तक एकदम ठीक दिखते
हैं पर मैं आपको एक बात बताऊँ… इन्हें दिमागी बुखार हो गया है या फ़िर
किसी का साया है। जी… मैं विश्वास… करती हूँ। मैं सब पर विश्वास करती
हूँ। अगर कोई मुझसे कहेगा ना कि यहीं सौ बार नाक रगडो, तुम्हारे पति ठीक
हो जायेंगे तो मैं नाक रगडूंगी। एक पूरा साल हो गया है एक डॉक्टर से
दूसरे डॉक्डर तक जाते जाते… मैं बहुत थक गई हूँ। बस बहुत हो गया… अब सहन
नहीं होता… माफ़ करना डॉक्टर साब… सब ठीक हो जायेगा……।



शुक्ला:- नमस्कार… जी मेरा नाम पी.पी.शुक्ला। मेरी एक छोटी सी कपडे की
दुकान है वहीं इसके घर के नीचे। इससे दोस्ती तो बहुत पुरानी है, शादी से
पहले से जानता हूँ। क्या हुआ… ये तो सर भगवान जाने या… भगवान जाने। मुझे
लगा कि कहीं कोई गडबड है। एक दिन मेरे पास आया और कहने लगा शुक्ला एक बात
बता। मैंने कहा पूछ… तो कहने लगा चिडिया जब पैदा होती है तो क्या वो अपना
पेड खरीदती है, घोंसला खरीदती है… अपना एक ईश्वर चुनती है? मैंने कहा ऎसा
लगता तो नहीं है। तो कहने लगा यदि वो इन सबका बोझ उठाती तो उड ही नहीं
पाती और हंसता हुआ चला गया। अब आप बताइये एक बीवी बच्चों वाला आदमी, बैंक
का कर्मचारी उसको ये सब बातें शोभा देती हैं। अब तो क्या बोल रहा है,
क्या नहीं किसी को कुछ समझ नहीं आता।



पिंकी:- मैं पिंकी… मेरे भाई का नाम बिल्लू है। पापा मुझ्से बहुत प्यार
करते थे… मेरा मतलब करते हैं। जी मैंने एक-दो बार कोशिश की उनसे अकेले
में बात करने की… पर… एक बार उन्होंने मुझे कुछ कागज दिये और इशारा किया
कि पढो। जब मैंने कागज खोले तो उसपर चित्र बने हुये थे… अजीब से थे। मुझे
डर लगता है… मुझे अपने ही पापा से डर लगता है।



सौरभ:- जी, मैं ऎसे बहुत से पगलों को जानता हूँ। अजी गर्मी में बडे बडे
लोग निकल लेते हैं। माफ़ कीजियेगा डॉक साब, वैसे आप ज्यादा जानते हैं पर
आप ही बताईये बुढापे में बुड्ढों के मुंह से आह नहीं निकलेगी तो क्या
निकलेगा और ऎसे हर आह पर पैसे बाँटने लगे तो बैंक तो दो दिन में खाली हो
जायेगा। अजी इन पगलों का कोई भरोसा नहीं है। हमारे गाँव में एक पागल था,
एक बार उसने एक आदमी का सर फ़ोड दिया… बताईये, मैं एक बात बोलूं… डॉक साब
पगलों का कोई इलाज नहीं…टॉइम वेस्ट है बस।

Scene –7

(भगवान अंदर आता है और उसके पीछे पीछे मोहन(भिखारी) अंदर आते हैं)



भगवान:- पूनम… (मोहन से) आ जाओ, अरे अंदर आ जाओ।

मोहन:- क्या भाई… तुम्हारा ही घर है ना… नहीं तो दोनों पिटेंगें।

भगवान:- मेरा ही घर है। पूनम… पूनम…

मोहन:- पूनम कौन है?

भगवान:- मेरी पत्नी है… तुम्हें बताया था।

मोहन:- नहीं, मैं कह रहा था… पूनम कहाँ है?

भगवान:- हाँ वो कहीं गयी होगी। अरे तुम अंदर आओ ना।

मोहन:- नहीं, मैं भिखारी हूँ। मुझे अपनी औकात पता है, मैं यहीं ठीक हूँ।

भगवान:- अच्छा… ठीक है। मैं भीतर देखकर आता हूँ।

(भीतर से भगवान की आवाज आती है, जो पिंकी से कुछ पूछ रहा है। पिंकी डरी
हुई बाहर आती है। भगवान पीछे पीछे बाहर आता है )

भगवान:- बेटा… तुम्हारी माँ कहाँ है… क्या हुआ तुम्हें… अच्छा मुझे देखो… माँ… माँ।

पिंकी:- #$%^%&^*&%&*^*^%&%^%&^&^$#%

भगवान:- बेटा, सुनो… क्या कह रही हो?

मोहन:- मै बताऊँ… मैं बताऊँ… माँ किसी बाबा को लेने गई है। मुझे बहुत डर
लग रहा है… पापा… पापा।

पिंकी:- #$%^*%&^$#%#$%$^$^#$%#^%^^%^$%^&

मोहन:- ये कौन है? ये तो कोई भिखारी है। पापा आप भिखारी को…

भगवान:- ये मेरी बात समझता है। मैं बस इतना बताना चाहता हूँ कि मैं खुद
ठीक हो जाऊँगा। इधर आओ… मोहन तुम बताओ इसको कि…

पिंकी:- $#%^$^&^&%$^&%^$%&$&

मोहन:- पापा, आप सच में पागल हो गये हैं। दूर हटो तुम मुझसे।

भगवान:- बेटा… बेटा मेरी बात सुनो… बेटा…

पिंकी:- #%%$^&^%&%^&%&^&%&&*&*&* (पिंकी बाहर भाग जाती है)

भगवान:- पिंकी कहाँ चली गई? क्या कह रही थी वो?

मोहन:- मैं मॉ को लेकर आती हूँ… माँ… माँ।

भगवान:- तुमने उसे रोका क्यों नहीं

मोहन:-मरे वो इतनी डरी हुई थी। (हँसने लगता है)

भगवान:- तुम हँस क्यों रहे हो?

मोहन:- तुम्हारा तो खेल हो गया है दोस्त! मुझे लगा था तुम मुझे बेवकूफ़
बना रहे हो… अब क्या करोगे तुम?

भगवान:- पता नहीं…… मुझे तो बस इतना पता है, मैं वापिस आना चाहता हूँ

मोहन:- वापिस… तुम तो यहीं हो।

भगवान:- यही तो मैं अपने परिवार वालों को समझाना चाहता हूँ कि मैं यहीं
रहने के लिये लड रहा हूँ और मैं चाहता हूँ कि जब पूनम आये तो तुम उसे एक
बार बता देना कि मैं कोशिश कर रहा हूँ। तुमने देखा ना वो मेरी बात नहीं
समझ पा रहे हैं…… और अगर उन्हें ये लगता है कि ये बीमारी है तो उसका इलाज
भी मैं ही कर सकता हूँ।

मोहन:- देखो। मैं कोशिश करूँगा… पता नहीं कि वो लोग मेरी बात समझेंगे कि
नहीं। वैसे क्या हुआ है तुम्हें… माफ़ करना मुझे हंसी आ रही है, पर मैं
सच में जानना चाहता हूँ।

भगवान:- तुम्हें पता है, मैं बचपन में अपने पिताजी के साथ एक आरती गाया
करता था। ’ओ शंकर मेरे, कब होंगें दर्शन तेरे’। मेरे पिताजी बडी तल्लीनता
से वो आरती गाया करते थे… रोज मुझे लगा कि अगर मैं शंकर होता तो पिताजी
को दर्शन जरूर देता और तब मेरे पिताजी क्या करते… ये बात मेरे दिमाग में
फ़ंस गई। सच में मेरे पिताजी क्या करते? ये सोचते हुये मैं कई महीनों
अपने पिताजी के साथ घूमता रहा और एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया कि – ’आप
क्या करेंगें?’ उन्होने मेरी बात टाल दी। पर मुझे जवाब चाहिये था। सो वो
जब भी मेरे सामने पडते मैं पूछ लेता कि – ’आप क्या करेंगें।’ एक दिन
उन्होने गुस्से में आकर मुझे मार दिया… बहुत मारा… पर वो बात वहीं की
वहीं रह गई। सो कुछ दिनों बाद मैं घर से भाग गया। फ़िर मुझे याद नहीं कि
क्या हुआ था। मेरे घर वाले बताते हैं कि दो साल तक मैं नहीं मिला था फ़िर
कुछ समय मुझे मेंटल हॉस्पिटल में भी रखा गया था, तब उनका कहना है कि मैं
सब भूल गया था मतलब ठीक हो गया था।

मोहन:- तुम ठीक हो गये थे तब…?

भगवान:- झाडू लगाने के बाद हमको लगता है कि घर पूरी तरह साफ़ हो गया है
पर असल में कचरा वहीं घर के बाहर, घर के कोनों में दुबका हुआ ताक लगाये
बैठा रहता है।

मोहन:- सुनो भाई… मैं तुम्हारे घरवालों को बताने की कोशिश करूँगा जैसा
मैंने देखा कि तुम्हारी बात तो कोई सुन ही नहीं रहा है पर मेरी खुद समझ
में नहीं आ रहा है कि मैं उन्हें क्या बताऊँगा…… मतलब क्या कहूँगा उन्हें
कि क्या हुआ है तुम्हें?

भगवान:- “क्या दुनिया तुम्हारे पास आकर कहती है-देखो मैं हूँ?” (रमण
महर्षि) ये वाक्य पता नहीं कहाँ, कब सुना था… जो घर के कचरे की तरह, मेरे
दरवाजे के बाहर ही जाने कब से घात लगाये पडा था… एक दिन जब मैं पसीने में
लथपथ बिना कुछ सोचे एकदम खाली कुँए सा अपने घर की ओर जा रहा था… मानो
किसी ने मुझको सुन्न कर दिया हो… तब उस क्षण इस वाक्य ने मुझे ढर दबोचा।
“क्या दुनिया तुम्हारे पास आकर कहती है-देखो मैं हूँ” तब पहली बार मैं उस
पार्क की बेंच पर जाकर बैठा था। कुछ देर में पसीना आना बंद हो गया। मेरे
झुके हुए कंधे सीधे हो गये और मैंने अपने दोनों हाथ खोल दिये… जैसे कोई
बहुत पुराना बिछडा हुआ दोस्त मुझे दिखा हो, जिसके मैं गले लगना चाहता
हूँ। तभी मुझे लगा जैसे कोई मेरे बगल में आकर बैठ गया हो। अचानक वो मेरे
करीब आया और मेरे कान में फ़ुसफ़ुसाया-“क्या दुनिया तुम्हारे पास आकर
कहती है-देखो मैं हूँ।” और मैंने इसका जवाब देना शुरु किया… उस दिन… अगले
दिन… हफ़्तों…. महीनों…. और तब मुझे हर चीज धुली-धुली लगने लगी। जैसे
किसी ने साबुन से रगड-रगडकर सब कुछ धो दिया हो… सडकों को, कूडे के डिब्बे
को, सारे जानवरों को, वो कोने में बैठे मोची को और मोची के आँखों के नीचे
पडे गड्ढों को और… पूरे शहर को, सबको और तब मुझे वो रेखायें दिखने लगीं।

मोहन:- रेखायें…?

भगवान:- रेखायें… जैसे हाथों पर, माथे पर होती हैं, ठीक वैसी ही रेखायें
ज़मीन पर भी पडती हैं। ये एक पगडंडी बनने जैसा है।

मोहन:- मतलब…?

भगवान:- जैसे ये घर में, ये रेखायें तुम्हें नहीं दिख रहीं ?

मोहन:- नहीं… कहाँ हैं?

भगवान:- अभी थोडी बिगड गयी हैं क्योंकि पिछले कुछ समय से मैं अपनी ही
रेखाओं को लांघ रहा हूँ इसीलिए पूरा घर परेशान है… हमारे जीने की… हमारे
चलने की रेखायें पूरे शहर में फ़ैली होती हैं… जैसे तुम्हारी रेखायें…
नहीं मुझे तुम्हारी रेखायें नहीं दिखीं, मोहन?

मोहन:- नहीं दिखीं… क्योंकि मैं चलता ही नहीं हूँ… मैं जहाँ धंधा करता
हूँ वहीं सो जाता हूँ। हमें तो अपनी जगह इतना बैठना पडता है कि लोगों को
लगने लगे कि ये यहीं से उगा है और एक दिन यहीं समा जायेगा… रुको, तुम्हें
कैसे पता कि मेरा नाम मोहन है? मैंने आजतक किसी को अपना नाम नहीं बताया।

भगवान:- मुझे तो उस चिडिया का नाम भी पता है जो बाहर चहक रही है। आजकल
मैं उससे थोडा नाराज हूँ… इसलिये देखो कैसे मना रही है।

मोहन:- तुम्हारी पत्नी अभी तक आई नहीं ?

भगवान:- आती होगी।

मोहन:- सुनो… मैं काफ़ी समय से एक बात किसी को नहीं बता पाया, अब तुम
मुझे सुन रहे हो तो तुमसे एक बात कहूँ?

भगवान:- हाँ

मोहन:- मैं जो खाना खाता हूँ ना… कभी लोगों का जूठा, कभी कहीं से जुगाड
किया हुआ। खाते वक्त मैं हमेशा सोचता हूँ कि जो खाने का स्वाद मुझे आ रहा
है क्या वही स्वाद इन सबको भी आ रहा होगा या मुझे कुछ अलग ही स्वाद आता
है। मैं अपना खाना हमेशा चटखारे मारकर खाता हूँ। देखो अभी भी मुँह में
पानी आ गया।

भगवान:- क्या तुम ठीक ठीक बता सकते हो कि कैसा स्वाद आता है?

मोहन:- हाँ… ये… ये वाला। ये अभी आया था… रुको… अ… अ… ये… ये आया… अरे…

भगवान:- नहीं बता सकते। कोई नहीं बता सकता। मेरी भी यही समस्या है, मुझे
अब खाने में जो स्वाद आ रहा है वो मैं किसी को नहीं बता सकता।

(मोहन गाना, गाना शुरु करता है। पीछे एक बाबा का प्रवेश होता है वो कुछ
छिडकता हुआ भीतर के कमरे में चला जाता है। पिंकी और पूनम आते हैं।)

पूनम:- ये कौन है पिंकी…?

पिंकी:- आपसे कहा था ना कि पापा किसी भिखारी को ले आये हैं।

भगवान:- मोहन मेरी पत्नी आ गई… इसे कह दो जो भी मैंने तुम्हें बताया है… जल्दी।

मोहन:- ठीक है भाई मैं कोशिश करता हूँ। (मोहन, पूनम के पास जाता है) आ…आ…आ…

(मोहन भगवान के पास आता है) मैंने कहा था ना ये लोग मेरी बात नहीं समझेंगें।

भगवान:- क्यों नहीं समझेंगें ये लोग… तू बोल ना… तू बोल उनसे।

मोहन:- आ…आ…आ…

बाबा:- बाहर निकालो इस गूंगे को। (पूनम और पिंकी मोहन को खींचते हुये
बाहर निकालते हैं और मोहन भागकर वापिस आता है। पूनम और पिंकी उसे वापिस
पकडकर बाहर निकालते हैं। यहाँ भगवान और बाबा अकेले रह जाते हैं। भगवान डर
के मारे बाबा से दूर भागना चाहता है। बाबा उसके बालों को पकड लेता है और
मंत्र पढता हुआ भगवान को खींचते हुये पूरे घर का चक्कर लगाता है। उसपर
कुछ छिड्कता है और बीच स्टेज पर लाकर चाँटा मारता है, तब तक पिंकी और
पूनम अंदर आ जाते हैं।)

पिंकी:- पापा …S…S…S…

(ब्लैक आउट होता है कुछ चाँटो की आवाज आती है। फ़िर लाईट आती है। भगवान
सामने बेहोश पडा है। बाबा, पिंकी और पूनम पीछे खडे हैं।)

बाबा:- अब इसे रात भर यहीं अकेला रहने दो। बाहर से ताला लगा देना, ये
सुबह तक ठीक हो जायेगा। चलिए…।

पूनम:- बेटा, चाभी ले आ…।

(पिंकी चाभी लाती है।स ब निकल जाते हैं। ब्लैक आउट। फ़िर लाईट आती है।
भगवान कराहता हुआ उठता है और विंग के पास जाकर बैठ जाता है। अचानक विंग
से बहुत अधिक प्रकाश अंदर आता है भगवान के चेहरे पर मानो सूरज उग आया हो।
तभी भगवान को चाचा चौधरी आते हुए दिखाई देते हैं)



भगवान:- चाचा… चाचा जी।

चाचा- जो लोग नाच रहे थे वो हमेशा पागल समझे गये उन लोगों के द्वारा
जिन्हें कभी संगीत सुनाई ही नहीं दिया। (नित्शे)

भगवान:- मैं वापस आना चाहता हूँ। चाचा… मैं वो नहीं हूँ… मैं सब कुछ नहीं
जानना चाहता… ये पहले सुख था अब नहीं… मेरे हाथ से सब कुछ छूटता जा रहा
है। मैं ये सहन नहीं कर सकता।

चाचा:- जब तुम अपने बाप की मार खाकर अपने घर से भाग गये थे, तब तुम क्या
थे? तब तुम ऊँट थे… ऊँट… जो एक वीराने में घुटनों तक झुका हुआ अपनी ही
आत्मा का बोझ लादे, बिना कुछ जाने-समझे भटक रहा था… अब तक। अभी कायकल्प
हुआ है… ट्रांसफ़ार्मेशन… और अब तुम सीधे खडे हो। अब तुम शेर हो… जो अब
उसी वीराने में शासन करना चाहता है। ईश्वर कहता है- तुम्हें ये करना
चाहिये। शेर कहता है- मैं नहीं करूँगा। तुम्हारे लिये सारे मूल्य,
मर्यादायें सब अप्रासांगिक हैं। तुम सब कुछ नया रचना चाहते हो… और यही
नया रचते-रचते बहुत जल्द फ़िर एक कायाकल्प होगा और तुम एक शिशु हो
जाओगे…… बच्चे और वो ही जरूरी है, वो ही नयी शुरुआत है और यही तो तुम
चाहते हो। (नित्शे)

भगवान:- क्या मैं सच में यही पाना चाहता था…? तो क्यों मुझे सब लोग रोते
हुये और मुझे मारते हुये दिखाई दे रहे हैं।

चाचा:- अब ये ग्लानि है… जब मल्लाह को गाँव वाले पत्थर मार-मारकर गाँव से
बाहर निकाल रहे थे तो एक पत्थर तो तुम्हारे हाथ में भी था।

भगवान:- हाँ… पर मैंने मारा नहीं था।

चाचा:- मारा नहीं… तो बचाया भी नहीं… और अब जब तुम खुद चिडिया से बातें
कर रहे हो तो उन पत्थरों को कैसे रोक सकते हो जो अब तुम्हें दूसरों के
हाथों में दिख रहे हैं।

भगवान:- क्या मैं ये सब रोक नहीं सकता हूँ… पर ये सब एकदम से कैसे हो गया?

चाचा:- ये सब एकदम से नहीं हुआ है… मैं तो तुम्हारे साथ बचपन से हूँ ऐर
तुमने कभी सोचा, क्यों तुमने अपने बच्चों के नाम बिल्लू और पिंकी रखे
हैं। ये तो तुम्हारे कॉमिक्स के पसंदीदा पात्र हैं ना…?

भगवान:- नहीं… मुझे सबसे ज्यादा साबू पसंद है। अरे साबू कहाँ है… चाचाजी
आप साबू को नहीं लाये ?

चाचा:- लाया हूँ ना… वो बाहर खडा है।

भगवान:- साबू… साबू… (भगवान बाहर आता है। दरवाज खोलने की कोशिश करता है
पर बाहर ताला लगा है। भगवान वापिस आता है) आप उसे बुला लीजिये ना मैं
उससे मिलना चाहता हूँ।

चाचा:- वो तो खुद तुमसे मिलना चाहता है। पर क्या करें… तुमने अपने घर ही
इतने छोटे बना केर खे हैं कि साबू अंदर आ ही नहीं सकता। पर जैसे ही तुम
शिशु हो जाओगे ना तो वो भीतर आ जायेगा, वो ही नहीं सब कुछ भीतर आ जायेगा।

भगवान:- चाचाजी… क्या हम दोनों सुख एक साथ नहीं ले सकते?

चाचा:- क्या इंसानों जैसी बातें करर हे हो?

भगवान:- मुझे ऎसा लगता है कि मैं नदी के तेज बहाव के विरुद्ध तैर रहा
हूँ। तैरता हूँ, तैरता हूँ पर कहीं पहुँचता नहीं हूँ और अगर तैरना बंद कर
दूं तो डर है कि कहीं ये नदी बहाकर ना ले जाये। क्या करूँ मैं… ये सब
कितना कठिन क्यों है…?

चाचा:- ये सब सरल है… इस दुनिया में जीना उतना ही सरल है जितनी सरलता से
एक चिडिया जीती है। पर हमने ’कैसे जीना है के’ इतने किस्से और कहानियाँ
बना लिये हैं कि अब लगता है कि कोई बुद्ध ही होगा जो ऎसा जी सकता है।
हमारे बस की बात नहीं है। जबकि एक चिडिया वैसी ही जी रही है जैसे उसे
जीना चाहिये।

भगवान:- पर मैं कौन हूँ… क्या खोज रहा हूँ ?

चाचा:- तुम कुछ नहीं खोज रहे हो। तुम्हें बस ये पता लग गया है कि तुम
बिछड गये हो…अपने घर से… अपने आप से… खुद से… तुम बस अपने घर वापस आना
चाहते हो…. और उस ओर चल रहे हो।

भगवान:- तुमने ईश्वर को देखा है…?

चाचा:- तुम्हें पूछना चाहिये क्या मैंने ईश्वर को देखा ? ये तुम्हारा
इल्हाम है ये सब तुम्हें पता है।

भगवान:- क्या मैंने ईश्वर को देखा है ?

चाचा:- मैंने ईश्वर को नहीं देखा, पर हाँ मैंने एक सपना देखा है…

भगवान:- हाँ… उस स्वप्न में एक झील दिखाई दी… काई से ढँकी हुयी (रामकृष्ण परमहंस)

चाचा:- तभी हवा का झोंका आया… और धीरे धीरे काई एक और सरकती गई।

भगवान:- और मुझे नीला पानी दिखाई दिया।

चाचा:- तो मैंने सोचा … ये नीला पानी सत्य है… ईश्वर है। तभी हवा का
झोंका दोबारा आया और काई झील पर वापस आ गयी।

भगवान:- तब मैंने सोचा… ये तो माया है… छलावा।

चाचा:- सत्य भी वही है… माया भी वही है। दोनो एक दूसरे के बगैर नहीं रह
सकते। हा… हा… हा…

भगवान:- हा… हा… हा… चाचाजी, चलो पार्क में जाकर बैठेंगें। मुझे आपसे
बहुत बातें करनी हैं।

चाचा:- नहीं… अभी मैं चलता हूँ। तुम आराम करो… तुम्हें आराम की जरूरत है।

भगवान:- अब आप मुझ्से मिलने कब आयेंगें… ?

चाचा:- जब तुम बुलाओगे।

भगवान:- आप मेरे साथ रह क्यों नहीं जाते… यहीं इस घर में ?

चाचा:- मैंने कहा ना जब तुम शिशु हो जाओगे तो मैं ही नहीं सब… पूरी
दुनिया तुम्हारे साथ रहने लगेगी। (चाचाजी जाने लगते हैं) क्या ज़िंदगी
तुम्हारे पास आकर कहती है, देखो मैं हूँ?

भगवान:- चाचाजी… हाँ वो कहती है, पर अब मैं उसे सुनना नहीं चाहता। मैं इस
पूरे आकाश का क्या करूँगा जिसमें उडना मैंने सीखा ही नहीं… मैं तो बस
उतना ही आकाश जीना चाहता हूँ जितने आकाश को मैंने अपने घर की खिडकी में
से जीना सीखा है।

चाचा:- तो ठीक है… इसे हमारी आखिरी मुलाकात ही समझो।

(चाचा चौधरी गाना गाते हुए निकल जाते हैं और उसी गाने के साथ भगवान भी
गाना शुरु करता है और धीरे धीरे नाचना चालू करता है। भगवान का गाना और
नाचना डरावना होता जाता है और वह भगवान की एक चीख के साथ खत्म हो जाता
है।)

Fade Out

Scene – 8

(भगवान पार्क में हारा हुआ सा बैठा है)

मैंने सुनहरा सोचा था, वो काला निकला

तभी नींद का एक झोंका आया

मैंने उसे फ़िर सुनहरा कर दिया

अब… सुबह होने क भय लेकर

नींद में बैठा हूँ

या तो उसे उठकर काला पाऊँ

या हमेशा के लिये उसे सुनहरा ही रहने दूँ…

…………… और कभी ना उठूँ।



Scene-9

(भगवान बहुत सारे पेपर लेकर कुछ काम कर रहा है और उसका व्यवहार अति
सामान्य है कि सामान्य नहीं लग रहा है। पिंकी तैयार होकर कहीं बाहर जा
रही है।)

पिंकी:- माँ, जल्दी चलो… मुझे कॉलेज के लिये देर हो रही है… अरे पापा आप
अभी तक गये नहीं। शुक्ला जी इंतजार करर हे होंगें।

भगवान:- मैं उसी की दुकान का हिसाब कर रहा था… मुझे पता ही नहीं चला कि
इतना टाईम हो गया ।

पिंकी:- आप फ़िर अपनी दवा खाना भूल गये ?

भगवान:- मैं भूल गया ?

पिंकी:- दवाई खाई आपने ?

भगवान:- बस खाता हूँ। (पूनम आती है)

पूनम:- अरे आप गये नहीं अभी तक… ?

भगवान:- बस… अभी हो गया… हो गया।

पिंकी:- माँ… चलो मुझे देर होर ही है।

पूनम:- चलो… आप जाते हुये दरवाजा बंद कर लेना। एक चाभी मेरे पास है। (तभी
बेल बजती है पिंकी देखने जाती है)

पिंकी:- माँ…

पूनम:- कौन है…?

पिंकी:- वो…

पूनम:- अरे कौन है…?

पिंकी:- वो भिखारी आया है…

भगवान:- कौन… मैं… मैं… उससे मिलना चाहता हूँ… मिलूँ… अब तो मैं ठीक भी हो गया हूँ।

पूनम:- पर दुकान में जल्दी जाना… मैं शुक्ला जी को बोलकर जाती हूँ… दवाई
मत भूलना। चलो पिंकी।

पिंकी:- माँ… ?

पूनम:- कुछ नहीं होगा… तू चल… (दोनो चले जाते हैं) जाईये अंदर बैठे हैं वो।

(मोहन अंदर आता है भगवान के गले लग जाता है और कुछ तोहफ़ा उसे देता है)

मोहन:- आ… आ… आ…

भगवान:- अब मैं तुम्हारी बात नहीं समझ सकता… अब तुम मेरे लिये बस एक
गूंगे भिखारी हो।

मोहन:- आ… आ… आ…

भगवान:- नहीं… मोहन… तुम्हारा नाम मोहन है ना… ये भी मुझे इसीलिये याद है
क्योंकि मैंने अभी तक अपनीद वाई नहीं खाई।

मोहन:- (ये दवाई क्या है) आ… आ… आ…

भगवान:- मैं नहीं जानता। मैंने तुमसे कहा था ना कि मैं वापस आना चाहता
हूँ। बहुत कोशिशों के बाद भी जब मैं वापस नहीं आ पाया तो मैंने आसान
रास्ता चुन लिया। मैंने सोचा मैं मर जाता हूँ। बहुत मुश्किलों से ये
गोलियां मिलीं। जैसे ही मैंने इसे खाया, मुझे नींद आने लगी। मेरा ये हाथ
सुन्न होने लगा, सिर एकदम भारी हो गया। तभी किसी ने आकर मुझसे कहा – ’आप
बीच रास्ते में खडे हैं, यहाँ आ जाईये।’… मैंने उसे धन्यवाद दिया। वो कोई
बात नहीं कहकर चला गया… और मैंने देखा मुझे सब समझ में आ रहा है… सभी
मेरी बात भी समझ रहे हैं। बस… और बस मैं ठीक हो गया। अभी भी मुझे ठीक से
नींद नहीं आती है, ये हाथ हल्का सा सुन्न रहता है, सर भारी बना रहता है……
ये कहते हैं अब मैं ठीक हो गया हूँ। मैं अब सामान्य हूँ।

(मोहन दवाईयाँ अपने हाथ में ले लेता है और भगवान की तरफ़ इशारा करता है )

भगवान:- ये… ये असल में झाडू है जो मुझे अपने घर में रोज लगानी पडती है
कि हर आदमी की तरह मेरा भी घर साफ़ रहे।

(मोहन, भगवान को खींचकर दूसरी ओर लाने की कोशिश करता है और नाचते हुये
इशारा करता है कि उसे इल्हाम की ओर चले जाना चाहिये। भगवान पीछे हटता है
)

भगवान:- इल्हाम की मुझे क्या जरूरत है… पूरा सच जानकर मैं क्या करूँगा।
अगर जीवन के इस तरफ़ ही रहना है तो हर थोडी चीज से काम चल जाता है… थोडा
सच, थोडी खुशी, थोडे सपने। अगर पूरा चाहिये तो उस तरफ़ जाना पडेगा… पूरी
तरह। इस तरफ़ रहकर उस तरफ़ की बात करना भी झूठ है, अपने आपको बेवकूफ़
बनाने जैसा है और मैं… और बेवकूफ़ नहीं बनना चाहता ।

मोहन:- (मोहन दवाई की शीशी तोडना चाहता है ) आ… आ… आ…

भगवान:- नहीं… मैं हाथ जोडता हूँ…

(मोहन गवाई वापस रख देता है )

भगवान:- मोहन… अब मैं एक इकाई हूँ… इस पूरी दुनिया की नहीं… दुनिया से अब
मुझे कोई मतलब नहीं । मैं इकाई हूँ, हमारी बनायी दुनिया की, इस समाज की
और मुझे इस पूरे खाने में हमेशा नमक की मात्रा में रहना है… ना ज्यादा ना
कम । ठीक उतना ही जितने में सभी को ये खाना एक तरह का स्वाद देता रहे…
हमेशा ।
(भगवान दवाई खाने को होता है, मोहन उसे रोकता है और जाने की
आज्ञा माँगता है… तोहफ़ा टेबल पर रखकर वो वो चला जाता है। भगवान दवाई
खाता है। अपने सारे कागज़ उठाकर जाने लगता है। तभी उसे चिडिया के चहकने
की आवाज सुनाई देती है और वो रुककर पीछे मुडता है।)

नाराज हो…… माफ़ करना । मैं अब तुम्हें कभी नहीं समझ पाऊँगा।

Fade Out

The end…….

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपका ये नाटक मैने भोपाल में देखा था, इसके साथ ही शक्कर के पांच दाने भी उसी फेस्टीवल में देखा था। बाद में भारत भवन में पार्क भी देखने को मिला।

    इल्हाम मुझे बहुत पसंद आया था। इसे यहाँ देखकर खुशी हुई। पढ़ूंगा पूरा। धन्यवाद।

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  2. behad sundar aur prabhawshali natak hai ye. dekhne ki ichcha badh gayi hai.

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  3. Hey .. I was quite impressed and motivated by your play 'ILHAAM' and would like to watch it so that I could co-relate with it in a better way. If you could help me find its video online, I would be forever indebted to you. Thankyou.

    Arjun Chopra

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  4. अतिसुंदर , मनमोहक, बहुत ही अच्छा है। इल्हाम जल्द ही play करने वाले हैं।

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