बुधवार, 23 मार्च 2011

बलि और शंभू


बलि और शंभू

शंभु अपने बेड पर सूटकेस खोल रहा है। Stage (R) गौतम सो रहा है, शंभु सूटकेस में से एक फोटो निकालता है और Stage (R) देखता है और ’’तितली’’ कहता है। तितली स्टेज के बीच में खड़ी है, (Music) लाइट आती है और तितली डांस के बाद शंभू के पीछे आती है।
तितली- पापा.... आप डांस देखने तो आए नहीं, अब यहां बैठे-बैठे फोटो देख रहे हो।
शंभू- बेटा.... मैं वहां आकर क्या करूंगा... ?
तितलीः- मुझे भी पता है आप नहीं आऐंगे, पर पता नहीं क्यों हमेशा नाचते हुए मैं आपको भीड़ में ढूंढ़ती हॅू.... या जब लोग पीछे मिलने आते हैं तो मैं इंतजार क्यों करती हॅू कि आप मेरा नाम पूछते हुए, पीछे मुझे ढूढेगें। तितली को देखा आपने.... तितली .... जो सबसे आगे डांस कर रही थी ... उसका कमरा कहां है तितली ..... बेटा....
शंभू- बेटा मुझे पता है कि तुम अच्छा डांस करती हो।
तितली- अच्छा.... यह आपने फोटो देखकर जान गए...?
शंभू- सारी प्रेक्टिस तो तुमने मेरे सामने की है ... विश्वास नहीं ... मैं तुम्हें तुम्हारा डांस करके बताता हॅू... (डांस करता है)
तितली- (Laugh) आप बैठ जाइए ... रहने दीजिए ... एक बात कहॅू ... आप बहुत गंदा डांस करते हैं। पापा ... कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं नाचते-नाचते उड़ जाउंगी ओर किसी पहाड़ पर जाकर बैठ जाउंगी और वहां नीचे आप मेरा इंतजार कर रहे होंगे ... पर मैं नहीं आउंगी और जब आप इंतजार करते करते थक जाऐंगे, तब मैं पीछे आकर ... वो ... आपको डरा दूंगी.... मजा आएगा ... क्यों पापा ....
शंभू- मुझसे ऐसी बातें मत किया करो।
तितली- पापा ... मैं मजाक कर रही थी।
शंभू- मुझे पसंद नहीं ऐसा मज़ाक।
तितली- ठीक है पापा ... अच्छा मेरी परीकथा कहां है ...
शंभू- परीकथा बाद में ....
(starts to take out something from the suitcase)
तितली- तो ठीक है ... फिर मैं परीकथा सुनने आउंगी
शंभू- बेटा तितली कहां जा रही हो ... बैठो सुनो .... चली गई .... अपने समय से आती है अपने समय से चली जाती है .... (परछाई को देखता है) अरे आप आप कौन हैं तितली बेटा तुमने किसी को बुलाया है आप आपका नाम क्या है बेटा देखो अपने घर कोई घुस आया है (shadow laughs) क्या हंस क्यों रहे हो। जाओ निकल जाओ यहां से।
शुभांकर - मेरा नाम ....
शंभू- नहीं नहीं जानना मुझे तुम्हारा नाम निकल जाओ
शुभांकर- मेरा नाम शुभांकर है ... (laughs & exit)
(शंभू बहुत सारी चीजें फेंकने लगता है ......... दरवाजे की तरफ गौतम जो कि जमीन पर सो रहा है डरकर उठ जाता है)
गौतम- डर लगे तो गाना गाओ ... भूख लगे तो खाना खाओ ?
(शंभू बेहोश हो जाता है ... गौतम उसे उठाकर पलंग पर सुलाता है और भाग जाता है)
(गौतम दरवाजे पर खड़ा है, झिलमिल सामान बीन रही है, भीतर से शंभू आता है)
शंभू- अरे आप लोग कब आए ?
झिलमिल- नमस्ते... रात में काफी तोड़-फोड़ की है आपने याद है ... कल आप गौतम की वजह से बच गए, अगर समय पर ये मुझे नहीं बुलाता तो कुछ भी हो सकता था। कल आपको दूसरा अटैक आया था।
(गौतम के पास जाता है)
गौतम- डर लगे तो गाना गाओ, भूख लगे तो खाना खाओ ....
शंभू- चुप जींदो और कल रात के लिए माफी चाहता हॅू।
गौतम- डर लगे तो गाना गाओ, भूख लगे तो खाना खाओ।
झिलमिल- अब कैसी तबीयत है ?
शंभू- ठीक है।
झिलमिल- गौतम को आपकी ही देखभाल के लिए रखा है पर वो इतना डर गया है कि वो इस कमरे में आना भी नहीं चाहता। पहले ही मूर्ख भूतों से डरता है आप बताइये क्या करूं इस Old Age Home के भी कुछ rules हैं मुझे भी जवाब देना पड़ता है और आपकी तबीयत ?
शंभू- कितने दिन बचे हैं मेरे पास ......।
झिलमिल- सब कुछ आपके ऊपर है।
शंभू- सॉरी।
झिलमिल- ये आप पहले भी कई बार कह चुके हैं........ गौतम दवाईयां दी?
गौतम- मैं वो देने ही वाला था पर
झिलमिल - ये दवाईया गौतम वो कागज कंप्लीट हो गए ?
गौतम- किसके ?
झिलमिल- वो क्या नाम है बलि आने वाले थे ना उनके।
गौतम- वो आज शाम आने वाले थे पर age proof certificate नहीं था तो वो रात तक उसे लेकर आ जाऐंगे।
झिलमिल- ठीक है - अगर सब ठीक है तो उन्हें, इनके साथ शिफ्ट कर देना।
शंभू- क्या मैं किसी के साथ नहीं रहॅूगा मैं इस old age home को अपनी पूरी पेंशन दे रहा हॅू ताकि मैं अकेला रह सकॅू।
झिलमिल- अगर मैंने आपकी सही सही रिपोर्ट तैयार कर के दे दी कि आप कैसे अकेले यहां आए दिन तोड़ फोड़ करते रहते हैं तो आपको अगले दिन यहां से निकाल दिया जाएगा... देखिए ये सब आप ही की बेहतरी के लिए है अरे हां आपकी परिकथा मुझे लगी।
शंभू- हां ?
झिलमिल- जी.... अजीत नहीं है छोटी सी ... पर अच्छी है।
शंभू- क्या करूं इसकी मुझे आदत हो गई है तितली को बहुत अच्छी लगती थी मैं इसे पढ़कर उसे सुलाया करता था।
झिलमिल- ठीक है दवाईयां भूलियेगा नहीं।
(शंभू परिकथा पढ़ना शुरू करता है ... तितली भीतर से वही परिकथा पढ़ते हुए बाहर आती है)
शंभू- मैंने एक परी से कहा कि मुझे एक ऐसी परिकथा सुनाओ, जिसे सुनकर मेरी बेटी को अपनी परी मिल जाए। वो परी हंसने लगी और उसने कहा ठीक है, मैं एक ऐसी परी की कहानी सुनाती हॅू जो एक दिन गायब हो गई थी और फिर कभी नहीं मिली। वो बहुत खूबसूरत परी थी जिस दिन वो गायब हो गई थी, परी देश में सभी परेशान हो उठे थे। कैसे गई ? कहां गई ? क्योंकि ऐसे कोई परी कभी गायब नहीं होती। उसे ढूढ़ने का काम मुझे सौंपा गया क्योंकि (तितली साथ में बोलती है) हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे।
तितली- मैं धरती पर उस आदमी की तलाश करने लगी जिसकी वो परी थी। बहुत समय बाद वो मिला। पर परी उसके पास नहीं थी जानते हो क्या हुआ था। उस आदमी ने एक बार किसी से कह दिया था कि मैं परियों में विश्वास नहीं करता और उसकी परी मर गई थी।
(music till gautam’s entry)
(शंभू सोता है)
झिलमिल- आइये... ये कमरा है ... ये शंभूजी हैं ... शायद सो रहे हैं । आप काफी ले हो गए।
बलि- हां ... आयु प्रमाण पत्र बनने में दे हो गई।
झिलमिल- वो आपकी जगह ... चलती हॅू, कल मुलाकात होगी।
बलि- वैसे नाम क्या बताया आपने ?
झिलमिल- अभी तक तो बताया नहीं, वैसे मेरा नाम झिलमिल है।
बलि- झिलमिल....
झिलमिल- जी
बलि- काफी अच्छा नाम है, ये नाम हंा सुना है अरे हां
झिलमिल- सो जाइये काफी देर हो गई है सुबह बात होगी (exit)
बलि- (singing) नमस्ते शंभू जी ...... कमरा तो ऐसा लग रहा है जैसे अभी आपके बच्चे फुटबाल खेल के गए हों ... (पलंग सरकाने लगता है)
शंभू- पलंग मत सरकाइए....

बलि- अरे शंभू जी ... नमस्ते। काफी अच्छा है कमरा आपने एकदम अपने घर जैसा रखा है। काफी समय से आप यहां रह रहे होंगे।
शंभू- दो साल से..।
बलि- ये झिलमिल जी कोन हैं।
शंभू- डॉक्टर हैं रोज सुबह शाम देखने आती है।
बलि- काफी अच्छी दिखती है मेरा मानना है डाक्टर को हमेशा अच्छा दिखना चाहिए। इससे मरीज जल्दी ठीक हो जाता है।
शंभू- अपने मानने को आप अपने पास ही रखिए लाइट बंद कर दीजिए, मुझे सोना है।
बलि- जी जैसा आप कहें। बस थोड़ा सामान जमा लॅू।
शंभू- मुझे नींद आ रही है लाइट ऑफ कर दीजिए (लाइट ऑफ करता है) (पलंग सरकाता है)
बलि- पर ये तो एकदम अजीम जगह रखा है। मुझे घर के कोंनों से बहुत घबराहट होती है।
शंभू- जो भी हो वो ही आपकी जगह है। अब चुपचाप सो जाइये।
बलि- अगर मेरी पढ़ने की इच्छा हुई तो शंभू जी .... तब तो लाइट जलानी ही पड़ेगी क्योंकि अंधरे में पढ़ना मैंने अभी तक सीखा नहीं है।
शंभू- मेरा साथ रहना है तो अंधेरे में पढ़ने की आदत डाल लीजिये। (silence)
बलि- आप खर्राटे तो नहीं लेते। (silence)
बस यूूं ही पूछ लिया। (silence)
मैं रात को खर्राटे लेता हॅू ... बस बताना चाहता था ...( silence)
(starts singing) ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया।
शंभू- आप... चुपचाप नहीं सो सकते... अब अगर एक शब्द भी मुंह से निकाला तो धक्के मरकर इस कमरे से निकाल दूंगा।
बलि- मुझे इतनी जल्दी नींद नहीं आती... अजीब तानाशाही है, मेरी जब इच्छा होगी, तब सोउंगा... आप क्या क्या डरा किसको रहे हैं... मैं किसी से नहीं डरता... देखो मुझसे पंगा मत लेना ......... मैंने जवानी में कराटे सीखे थे... एक समय ब्रूस ली मेरे गुरू थे...
शंभू- और मैंने जवानी में दो खून किए हैं ... अभी तीसरा खून करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी ....... समझे । चुप .......... एकदम चुप लेटो .... आंखे बंद एकदम बंद ( ेपसमदबम)
बलि- पेशाब करने चला जाउॅ शंभू जी....।
( Music)
( fade out)
(बलि सो रहा है, शंभू उसके आगे गुस्से में चक्कर लगा रहा है, झिलमिल आती है)
झिलमिल- Good Morning मैंने कहा Good Morning..... कैसी तबीयत है ?
शंभू- जिन्दा हॅू-
झिलमिल बलि जी दिख नहीं रहे, वो जिन्दा हैं कि वो अरे अभी तक सो रहे हैं ?
शंभू- उल्लू हैं, उल्लू .... दिन में सोते हैं रात में गाने गाते हैं।
बलि- मैं सोया नहीं हॅू ...... सुबह-सुबह अपनी तारीफ सुन रहा हॅू।
झिलमिल- Good Morning बलि जी।
बलि- Good Morning........? उठ जाउॅ शंभू जी ... डर के मारे रात भर सो नहीं पाया ........ और आप एक मिनट.....
झिलमिल- बाथरूम उधर है।
बलि- रात भर इन्होंने जाने नहीं दिया।
शंभू- मैं इसके साथ एक मिनट भी नहीं रह सकता।
बलि- मैं भी इनके साथ नहीं रहना चाहता .... मैं पागल हो सकता हॅू ये रात में मुझे डरा रहे थे। अभी जैसे दिख रहे हैं ...... असल में हैं नहीं .... मैं अभी आया आप जाना मत ...... (बलि अंदर जाता है)
झिलमिल- शुभांकर का लैटर आया है ये 10 दिन पहले आया था ... ये अभी आया है।
शंभू- मैंने कहा था इसे फेंक दो ...।
झिलमिल- पता है आपने कहा था, पर मुझे लगा शायद बलि जी के आने से आपका मूड डीक हो जाए.... पर अब मुझे लगता है, इन्हें फेंकना ही पड़ेगा।...
शंभू- डस्टबिन उधर है।
झिलमिल- दो साल हो गए हैं .... वो लगातार आपको लैटर लिख रहा है, क्या आपकी एक बार भी इच्छा नहीं हुई कि कम से कम एक लैटर पढ़कर देखें, क्या कहना चाहता है वो। कल शुभांकर का फोन भी आया था, कह रहा था किसी बड़ी कंपनी में उसे ऑफर आया है, शायद out of India जाना पड़े। पर समझ में नहीं आ रहा है कि Join करे या नहीं करे .... वो आपसे मिलना चाहता है।
शंभू- मैं किसी शुभांकर को नहीं जानता हॅू, तुम मुझसे उसकी बातें मत किया करो।
झिलमिल- मैंने मना कर दिया ... कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए आप अभी नहीं मिल सकते।
शंभू- नहीं कभी नहीं मिलना मुझे .... (बलि की अंदर से आवाज आती है) मैं इस आदमी के साथ नहीं रह सकता हॅू इसे पहले यहां से निकाल दो।
झिलमिल- आपको अकेले रहना ठीक नहीं है ये मेरा नहीं मैनेजमेंट का फैसला है। मैं इस बारे में कुछ नहीं कर सकती ... कम से कम कुछ दिन रहकर तो देखिए, फिर भी आपको ठीक नहीं लगेगा, तो बात करूंगी।
शंभू- ठीक है।
झिलमिल- वैसे बलि जी के बारे में हमने पता किया है... वो अच्छे आदमी है।
बलि- Thank you मैंने सुन लिया .... आपने सुना।
झिलमिल- अच्छा तो मैं चलती हॅू।
बलि- अरे ... मुझे आपसे बात करनी है, इधर आईए .... क्या आप लोग यहां खूनियों को भी रखते हैं ?
झिलमिल- कौन ... ?
बलि- ये बुढउ दो खून कर चुके हैं ... एक और करना चाहते हैं वो भी मेरा बताइए।
झिलमिल- वो मजाक कर रहे होंगे।
बलि- नहीं भाई ...... इनका तो नाम भी खूनियों जैसा है - शंभू। आप क्यों मेरी बलि चढ़ा रही हैं।
झिलमिल- आपको रहना तो इन्हीं के साथ। घबराइए नहीं मैं आती रहॅूगी ... क्या आप मेरे खातिर इतना नहीं कर सकते ... प्लीज
बलि- ठीक है ... पर आप आती रहिएगा .... वरना ये मुझे मार डालेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा।
झिलमिल- चलती हॅू शंभू जी शाम को आती हॅू आपसे मिलने बलि जी- ठीक। (exit)
बलि- झिलमिल जी शाम को आ रही हैं मुझसे मिलने, (singing)
शंभू- देखिए ... सुनिए ... गाना बंद ... आप और हम आराम से एक साथ रह सकते हैं अगर हमारे बीच कम से कम संवाद हो तो।
बलि- आप यह हिन्दी में बोलेंगे ?
शंभू- मूर्ख ...
बलि- और मैं मज़ाक कर रहा था, आप मजाक समझते नहीं क्या ? देखिए मैं आपको बता दूं, मैं बहुत बोलता हॅू। मेरा यहां रहना और बात करना एक ही बराबर है ... मैं जहां होता हॅू, वहां बहुत बोलता हॅू .... बोलना मेरी बीमारी है, जो बुढ़ापे में आकर लगातार बढ़ती जा रही है। बोलने के कारण मेरे घर वालों ने मुझे , मेरे घर से निकाल दिया....।
(शंभू आईने में अपना चेहरा देख रहा है) वैसे मैं आपसे कम बूढ़ा हॅू।
शंभू- कम बूढ़ा क्या होता है ?
बलि- मतलब आप ज्यादा बूढ़े हैं और मैं कम बूढ़ा ...
शंभू- देखिए कम, ज्यादा कुछ नहीं होता। बूढ़ा आदमी, बूढ़ा आदमी होता है।
बलि- ठीक है तो आप चिड़चिड़े खडूस बूढ़े हैं और मैं ज्यादा बोलने वाला नेकदिल बूढ़ा।
शंभू- तुमको मैं खडूस दिखता हॅू.....
बलि- तो आपको मैं बूढ़ा दिखता हॅू ध्यान से देखिए- ये जॉ लाइन देखिए।
शंभू- सच में तुम बहुत बकवास करते हो, ये तुम्हारी खानदानी बीमारी है ... ?
बलि- नहीं खानदानी नहीं है, मेरे एक दोस्त थे हरिशंकर तिवारी... माफ करना।
शंभू- क्या ?
बलि- डॉ हरिशंकर तिवारी वो बहुत बोलते थे ... ये बीमारी मुझे वहीं से मिली है ...
शंभू- किससे बात कर रहे हो ... ?
बलि- तिवारी जी से , अरे तिवारी जी के नाम के आगे डॉ नहीं लगाओ, तो वो बहुत नाराज हो जाते थे। पहले जब तिवारी जी जवान थे, तो उन्हें लगता था कि उनकी उनके घर मोहल्ले शहर, देश में कोई इज्जत ही नहीं है। कोई उन्हें पूछता भी नहीं है - तो उन्होंने एक दिन , घर से बाहर अपना नाम लिखवा दिया - ’हरिशंकर तिवारी जी यहां रहते हैं। पर बात बनी नहीं। लोग कहने लगे- हमें तो पता है तिवारी जी यहां रहते हैं, लिखने की क्या जरूरत थी। तिवारी जी को कुछ समझ में नहीं आया क्या करें, फिर उन्होंने अंग्रेजी में नेम प्लेट बनवाई और लिख दिया डा0 याने ..........
शंभू- डॉक्टर ....
बलि- हां ... डॉक्टर हरिशंकर तिवारी यहां रहते हैं। और घर में छुपकर देखने लगे कि लोग क्या कहते हैं .... लोगों ने मजाक उड़ाना शुरू कर दिया .... कुछ बातें तो लोगों ने इतनी बुरी कहीं कि तिवारी जी को सहन नहीं हुई। क्या करते तिवारी जी डॉक्टर तो थे नहीं ... और पढ़ने-लिखने को शौक बहुत पहले ही गवां चुके थे ... अब Dr लिखकर फंस चुके थे ... तो उन्होंने अपने एक दोस्त की स्कूल बस चलाना शुरू कर दी ... बात बन गई। Dr उनकी नेमप्लेट पर बना रहा .... अब यहां Dr का मतलब डॉ० ना होकर क्या हो गया था Dr का मतलब डाक्टर ना होकर क्या हो गया था ?
शंभू- (चिडचिडाकर) अरे मुझे क्या पता क्या हो गया था।
बलि- अरे ड्राइवर हो गया था।
शंभू- लेकिन तुम तो उन्हें डॉक्टर कहते हो .... फिर तो डॉ0 कैसे हुए ... ?
बलि- बाद में वो डॉक्टर हो गए थे वो अलग किस्सा है वो बाद में बताउंगा।
शंभू- अभी क्या कर रहे हो ... ?
बलि- कुछ नहीं।
शंभू- अरे अजीब आदमी हो, तो अभी सुनाओ ना किस्सा।
बलि- अरे अजीब तो आप है, कभी कहते हो किस्सा सुनाओ कभी कहते हो नहीं सुनाओ।
शंभू- बात को घुमाओ मत।
बलि- मुझे नींद आ रही है एक तो रात भर सोने नहीं दिया - अच्छा ठीक है एक शर्त पर किस्सा सुनाउंगा- पहले आपको मेरे कुछ प्रश्नों का एकदम सही उत्तर देना होगा।
शंभू- अच्छा चुप रहो, मुझे नहीं सुनना कोई किस्सा।
बलि- ठीक मत सुनो, मैं सोता हॅू ....(silence)
शंभू- ठीक है पूछिए .... लेकिन मेरी जो इच्छा होगी मैं सिर्फ उन सवालों का जवाब दूंगा।
बलि- जैसी आपकी मर्जी .... शुरू करूं ..... आप जेल से कब छूटे ? आपने जो दो खून किए थे वो कैसे किए थे ? और अगर अब पछतावा हो रहा है तो यहां क्यों आए ? किसी पहाड़ पर जाकर सन्यास क्यों नहीं ले लिया ? आपने इतना डरावना नाम खून करने के बाद रखा या ये नाम पहले से ही था। आप मरने से डरते हैं ? आपके दांत असली हैं या नकली ? (आपको संस्कार चैनल कैसा लगता है?) आप दिन में कितनी बार नहाते हैं, और हां अगर आपको एक दिन के लिए प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो आप क्या करेंगे ?
शंभू- बेवकूफ ....।
बलि- वो आखिरी सवाल मैंने ऐसे ही पूछ लिया, उसका जवाब अगर आप नहीं भी दो तो चलेगा।
शंभू- एक तो तुम ..........
बलि- रूको.... मुझे आराम से लेट जाने दो ..... और हां आपने वो हथियार कहां छुपाकर रखा है, जिससे तुम खून करते हो। हां .... शुरू हो जाईए।
शंभू- तुम चुप रहोगे .... पहली बात तो मैंने कोई खून नहीं किए, वो बात मैं तुम्हें डराने के लिए कह रहा था ..... पर अब पछता रहा हॅू, काश किए होते तो तुम्हें मारने में जरा भी दिक्कत नहीं होती।
बलि- अरे भई आप इतनी जल्दी गुस्सा क्यों हो जाते हो। मैं ये सब थोड़ी जानना चाहता था.... मैं तो चाहता हॅू कि आप बोले, जो इच्छा हो वो बोलें। अपने बारे में किसी के बारे में भी .... सास भीतर लें .... रोकें ... छोड़े .... फिर भीतर लें .... रोकें ...... छोड़े.....
शंभू- मैं तुम्हारी बात क्यों मान रहा हॅू मैं ?
बलि- दो तीन बार करिए अच्छा लगेगा ... और हां मैं इंतजार कर रहा हॅू। जब इच्छा हो शुरू हो जाईयेगा .... मैं सुन रहा हॅू।
शंभू- कुछ नहीं बोलना है। मुझे .... (दो तीन बार सांस लेता है) अच्छा लग रहा है बेकार मं गुस्सा करता हॅू (बलि को देखता है) बुढ़ापा, बहुदा बचपने को पुनरागमन होता है, यह बात मुझ पर लागू होती है। अजीब हॅू मैं , मेरी पलकों के बाल कई बार मेरी हथेली तक आए, पर मैंने अभी आंख बंद करके उड़ाया नहीं, कई बार मैंने टूटते तारों को भी देखा, पर मेरी आंखे तब भी खुली रहीं ..... आॅख बंद करके मैंने कभी कुछ मांगा ही नहीं, उस सुख की भी तलाश नहीं की .... जिस सुख को जीते हुए मेरी आँख झुक जाए ... पर एक टीस जरूर है ... वो भी उन सुखों की जो मेरे आसपास ही पड़े थे... कई बार मेरे रास्ते में भी आए पर पता नहीं क्यों.... मैं उन्हें जी नहीं पाया अपने ऐसे बहुत से सुखों को जिन्हें मैं जी नहीं पाया, मैंने अपने इस पुराने सूटकेस में बंद कर दिया है .... कभी-कभी इसे खोलकर देख लेता हॅू ... इसमें ... इसमें बड़ा सुख है .... और इस सुख को मैंने कभी अपने इस पुराने सूटकेस से गिरने नहीं देता हॅू .... इसे हमेशा अपने पास रखता हॅू। जिन सुखों को जी नहीं पाया .... उन सुखों को महसूस करना .... कभी इन्हें जी सकता था .... ये अजीत सुख है .... और जिन सुखों को जी चुका हॅू उनका अपना अलग बोझ है ... जिसे ढोते-ढोते जब भी थक जाता हॅू ... तब अपना पुराना सूटकेस खोल लेता हॅू .... और थोड़ा हल्का महसूस करता हॅू ... तितली ...
तितली- खड़े क्या हो, पकड़ो धीरे ....
शंभू- तितली सुनो ... धीरे ....
तितली- पापा ... पापा ....
शंभू- बस .... आ जाओ बेटा ... मेरी हिम्मत नहीं है .... बहुत थक गया .... बस।
तितली- आपके साथ खेलने में मजा नहीं आता .... बाहर जाउॅ ?
शंभू- बेटा रात हो गई है , इतनी रात को बाहर नहीं निकलते ।
तितली- रात कहां दिन है पापा .... पापा आप सच में बूढ़े हो गए हैं , बाहर जाउॅ ?
शंभू- दोपहर है तो बाहर जाने की क्या जरूरत है यहीं ठीक है ना।
तितली- (Hops catch) पापा फाउल। पापा आप सच में बूढ़े हो गए है बाहर जाउॅ ?
शंभू- नहीं बेटा, बाहर धूप है। दोपहर में बाहर जाओगी तो काली हो जाओगी।
तितली- हां, काली हो जाउंगी तो बंदरिया जैसी दिखने लगूंगी, फिर जंगल में किसी बंदर को पकड़कर लाना पड़ेगा, मुझसे शादी करने के लिए ... यही ना तो ठीक है ... तो ठीक है, मैं बंदर से शादी करने को तैयार हॅू ... अब बताईये ... आप बंदर को ढूढ़ने मेरे साथ चलेंगे या मैं अकेले जाउं, बोलिए बाहर जाउं?
शंभू- काले मुँह के बंदर तो दूर जंगलों में होते हैं, आसानी से नहीं मिलते।
तितली- और लाल मुँह के बंदर ... वो।
शंभू- लाल मुँह के बंदर तो सात समुंदर पार के जंगलों में होते हैं (Blind man’s buff) उन्हें ढूढ़ना बहुत मुश्किल है.... वैसे लाल मुँह के बंदर अपने आपको अंग्रेज समझते हैं वो आसानी से तुमसे शादी करने को तैयार नहीं होंगे ... और अगर राजी हो भी गए तो वो दहेज में केले के बाग मांगेगे। बताओ बेटी इस उम्र में मैं जमीन खरीदंगा ... केले के बाग लगाउंगा, केले उगाउॅगा ... तब तक तो तुम बूढ़ी हो गई होगी ... और फिर एक काली-कलूटी बुढ़िया से बंदर तो क्या चूहे भी शादी करने को तैयार नहीं होंगे ... (remove blind fole) बेटा .... तितली बेटा क्या हुआ ..... अच्छा माफ कर दो ... चूहे राजी हो जाऐंगे, मैं मना लूंगा उनको ... अच्छा ....?
तितली- नहीं पापा .... कुछ लाल मुँह के बंदर, अपने गांव में घुस आए हैं।
शंभू- अपन गाँव में ....
तितली- हां पापा ... एक बंदर का तो मैं नाम भी जानता हॅू।
शंभू- बेटा बहुत हो गया मज़ाक ....
तितली- मैं बताउॅ उसका नाम ?
शंभू- मुझे नहीं सुनना नाम ...
तितली- उसका नाम है ....
शंभू- अच्छा तुम जाओ .... अभी
तितली- बाहर जाउॅ ... खेलने ?
शंभू- हां चली जाओ ....
तितली- मैं जा रही हॅू ... (वापस आती है) वैसे उस बंदर का नाम शुभांकर है।
(बलि गाना गाता है, वो अंदर शंभू को देखता रहता है, पलंग खिसकाता है। उसी वक्त शंभू अंदर आता है।)
शंभू:- एक काम करो.....उपर ही चढ़ा दो इसको।
बलि:- शंभू जी आपको हमारी दोसती की कसम।
शंभू:- दोस्त-वोस्त नहीं हैं हम लोग...समझे...वापस रखो।
बलि:- चलिए....आपकी ना मेरी...इतना। और बताइए कैसे हैं आप ?
शंभू:- उठो....वापस वहीं रखो।
बलि:- अच्छा ठीक है बस इतना.....इससे पीछे नहीं।
शंभू:- मैंने कहा ना।
बलि:- (बलि पलंग पकड़कर लेट जाता है) मैं मर जाउॅगा पर इसके पीछे नहीं जाउॅगा। मुझे घबराहट होती है....और समाज में सबको समान अधिकार है ये भेदभाव नहीं चलेगा.....कसम खाता हूं, इसके आगे नहीं आउॅगा।
शंभू:- तुमने बताया नहीं।
बलि:- बताया ना पीछे घबराहट होती है।
शंभू:- अरे नहीं.....वो तिवारी जी ड्राइवर से डॉक्टर कैसे बने ?
बलि:- आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया तो मैंने भी नहीं बताया।
शंभू:- मैंने जवाब दिया था, आप सो गए थे।
बलि:- अब रात भर सोने नहीं देगे तो क्या करूंगा ?
शंभू:- अभी नींद तो नहीं आ रही ना.....
बलि:- नहीं.....
शंभू:- क्या....
शंभू:- अरे वो ही
बलि:- वो ही क्या.....
शंभू:- अरे वो ही....
बलि:- क्या वो ही भई...
शंभू:- वो तिवारी जी ड्राइवर से डॉक्टर कैसे बने ?
बलि:- नहीं अभी नहीं। अभी मुझे जरा तैयार होना है। (बलि अंदर जाता है)
शंभू:- तो तुमने जाने का फैसला कर लिया है।
बलि:- मैं भी नहीं करता था...पर अब लगता है पहली नजर का प्यार होता है। भई अब कोई मुझे पहली ही नजर में पसंद कर ले....बस बात खत्म।
शंभू:- पगलाओ मत सच में आ जाएगी।
बलि:- अभी तक तो नहीं आई ना...बस ऐसे ही प्यार में दरार पड़नी शुरू हो जाती है।
शंभू:- कल तुम उससे मिले, आज प्यार हुआ और अभी-अभी दरार भी पड़ गई।
बलि:- अब सोचता हूं, जो आसान काम है वही कर दूं।
शंभू:- क्या....???
बलि:- ना...ना कर दूं उसको।
शंभू:- हाँ करने का तो कोई मतलब नहीं है, बेहतर होगा ना कर दो। चलो थोड़ा प्रैक्टिस कर लो। देखो ऐसे झिलमिल जी आयेंगी। (बलि हॅसने लगता है) अरे मैं नहीं....
बलि:- ना....
शंभू:- अरे ये तो एकदम फुस्स था।
बलि:- ना.....
शंभू:- अरे ये तो एकदम राक्षसों जैसा हो गया। ठीक से प्रेक्टिस करो।
(गौतम की Entry)
बलि:- ना.....
गौतम:- ना.....(डर कर वापिस चला जाता है)
बलि:- अरे बुरा ना लग जाए....मैंने सुना है प्यार में लोगों ने आत्महत्या तक की है....तुम्हें क्या लगता है कहीं वो आत्महत्या तो नहीं कर लेगी।
शंभू:- अगर वो तुमसे प्यार करती है....जैसा कि तुम्हें लगता है तो कुछ तो करेगी
बलि:- देखो....अभी तक नहीं आई।
शंभू:- कहीं सच में तो आत्महत्या नहीं कर ली उसने।
बलि:- नहीं.....प्यार में जो मरता है वो कायर होता है, पर जो प्यार करे और जिंदा भी रहे वो ही सच्चा प्रेमी होता है। कैसी कही।
शंभू:- अच्छी कही, पर कैसे कही। मतलब निकली कहाँ से.....?
बलि:- अरे वही मेरे दोस्त डॉ0 हरिशंकर तिवारी के मुँह से सुना था। उन्हें एक बार प्यार हो गया था....वही मोहल्ले में एक गुलाब बाई नाम की औरत रहती थी, उसकी एक बच्ची भी थी और पति मर चुका था। उसे पैसों की जरूरत थी तो तिवारी जी ने उसे अपने घर बर्तन मांझने और कपड़े धोने का काम दे दिया था। गुलाब बाई को कपड़े धोता देखते-देखते तिवारी जी को गुलाब बाई से प्यार हो गया। और गुलाब बाई वो गजब औरत थी....उसे कोई गुलाब बाई कहे तो उसे अच्छा नहीं लगता था....वो अपने आपको आंटी कहलवाना ज्यादा पसंद करती थी। तिवारी जी थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानते थे...वो गुलाब बाई को Rose madam कहने लगे। वो खुश हो गई।
शंभू:- रोज अच्छा गुलाब....Rose।
बलि:- कुछ समय बाद तिवारी जी से नहीं रहा गया और समाज की परवाह किए बगैर बाई को उसकी बच्ची समेत अपने घर पन रख लिया.....गुलाब बाई....वो तिवारी जी से प्यार नहीं करती थी इसलिए वो तिवारी जी को अपने पास तक फटकने नहीं देती थी। बहुत बाद में तिवारी जी को इतनी इजाजत मिल गई कि वो जब चाहे गुलाब बाई से अपने पैर दबवा लेते थे। और गुलाब बाई कभी-कभी नहाते वक्त उनसे अपनी पीठ पर साबुन लगवा लेती थी.....इसीलिए तिवारी जी कहते थे जो प्यार करे और जिंदा भी रहे वो ही सच्चा प्रेमी होता है।
शंभू:- और बच्ची।
बलि:- कौन बच्ची....?
शंभू:- अरे गुलाब की बच्ची, उसका क्या हुआ ?
बलि:- पता नहीं, वो स्कूल जाती थी।
शंभू:- उसका नाम क्या था ?
बलि:- नाम तो तिवारी जी ने बताया नहीं। सब बच्ची-बच्ची कहकर बुलाते थे। अरे तुम्हारे चक्कर में मैं तो भूल ही गया था। अरे मुझे तैयार होना था।
शंभू:- अरे मैं सोच रहा था उस बच्ची का क्या हुआ होगा....कैसे उसका बचपन बीता होगा। कैसे बड़ी हुई होगी।
(बलि के कुल्ला करने की आवाज आती है)
शंभू:- आज तो इसको ठीक ही कर देता हूँ।
(शंभू, बलि का पलंग उसकी जगह से सरका देता है)
बलि:- ये क्या है ?
शंभू:- छि....ये क्या है ?
बलि:- ये नास का मंजन है। पलंग क्यों सरकाया ?
शंभू:- वैसे भी तुम्हारी जगह वो ही थी।
बलि:- सुनो यहाँ तानाशाही नहीं चलेगी।
शंभू:- तुम पहले थूक के आओ....मैं ऐसे बात नहीं कर सकता।
बलि:- देखो मैंने कसम खाई थी, इसके आगे नहीं आउॅगा।
शंभू:- पहले थूक के आइए।
बलि:- बुढापे में सठिया गया है...एक कनटे का हाथ मारूंगा तो यहीं मर जाएगा।
शंभू:- क्या...आप उठिए।
बलि:- ऐ मजाक नहीं कर रहा हूँ। मुझे सच में घर के कोनों से घबराहट होती है...मुझे जानवरों जैसा लगता है यहाँ बीच में.....बीच में रहना चाहता हूँ अब कोई हिलाकर बता दे....अरे बूढ़ा गया तो कया कोने में फेंक दोगे ?
शंभू:- उठो......उठो यहाँ से।
बलि:- मैं नहीं जाउॅगा।
शंभू:- गौतम......इससे कहो यहाँ से उठ जाए।
गौतम:- चलिए.....उठिए।
बलि:- हं....हं।
शंभू:- ये ऐसे नहीं मानेगा गौतम....
(दोनों बलि को उठाकर उसके पलंग तक ले जाते हैं, बलि वापिस जमीन पर बैठ जाता है)
गौतम:- आइए.....आइए....
(दोनों फिर से बलि को उठाकर उसके पलंग तक ले जाते हैं....वो वापिस नीचे बैठ जाता है)
गौतम:- आइए....आइए।
शंभू:- अरे क्या आइए...आइए। रहने दो....मैं समझ गया....मैं समझ गया तुम यहाँ क्यूँ आए हो ? क्यों तुम्हें कोनों से नफरत है.....तुम एक ऐसे बूढे थे, जो अपने ही घर पर बोझ थे.....तुम्हें घर के कोनों में ठूंसकर रखते थे.... जानवरों की तरह..किसी भी जानवर की तरह नहीं....बल्कि कुत्ते की तरह अगर घर में कुत्ते की तरह रहते थे तो यहाँ शेर बनने की कोशिश मत करो।
(बलि चुपचाप उठता है और पलंग पर जाता है)
गौतम, पानी दो उसे।
बलि:- मुझे कुछ नहीं चाहिए.....और तुम यहाँ क्यों आए....? मैं जानता हूँ.....तुम्हारी तो एक बेटी है ना.....
शंभू:- बलि चुप....
बलि:- क्या हुआ.....? वो बदचलन थी.....? उसके बहुत से यार थे....
शंभू:- बलि....
बलि:- या फिर वो तुम्हें अपना बाप भी नहीं मानती थी।
शंभू:- बलि।
(Black out)
शंभू:- मेरी बेटी तितली.....बच्चे कब बड़े हो जाते हैं, आपको पता ही नहीं लगता और जैसे-जैसे वो बड़े हो जाते हैं, उनके साथ अपेक्षाएं भी बड़ी हो जाती हैं.बाद में बच्चे चले जाते हैं और अपेक्षाएं रह जाती हैं....जिन्हें हम कभी दीवार पर टाँग देते हैं तो कभी मेज पर रख देते हैं....
(Black out) (Fade in)
बलि:- मैं कभी-कभी सोचता हूँ, मुझमें और गाय में कितना फर्क है.....खासकर उस गाय में जिसने दूध देना बंद कर दिया है....बुढ़ापा गाय हो जाने जैसा है। गाय....जो कुछ भी खा लेती है....बिना किसी को परेशान किए जिन्दा रहती है...आपको गायों से और बूढ़ों से बहुत परेशानी नहीं होती....बेचारी गाय और बेचारा बूढ़ा.....घर में इंसानो के बीच जानवर जैसा महसूस होता था तो मैंने तय कि जब गाय जैसा ही जीना है.....तो गायों के बीच में ही रहो.....तो मैं यहाँ आ गया।
(Black out) (Fade in)
झिलमिल:- मुझे बूढ़े और बच्चे अच्छे लगते हैं। यहाँ इतने सालों काम करने के बाद मुझे एक बात पता चली है....जैसे बच्चों को माँ-बाप की जरूरत होती है....वैसे ही बूढ़ों को भी माँ-बाप की जरूरत होती है, बूढ़ो के माँ-बाप.....जिनसे वो बात कर सके जिन्हे सुन सके या जिन्हें वो कभी-कभार छू सके।
(Black out)

गौतम:- मैने कभी यहाँ भूत नहीं देखा है..... पर इन बूढो को भूत दिखते हैं....क्योंकि मैं जब भी किसी बूढे के कमरे में जाता हूं....वो हमेशा किसी ना किसी से बात कर रहे होते हैं....जबकि कमरे में कोई नहीं होता है....सच में, कसम से इन्हें भूत दिखते हैं।
(Black out)
(Interval)
(Music)
शंभू:- बलि जी.....बलि जी....
बलि:- क्या है.....आपके कपड़े धो रहा हूँ।
शंभू:- झाडू कौन लगाएगा।
बलि:- आपका नौकर हूँ, कपड़े धोने के बाद लगाउॅगा।
शंभू:- पहले झाडू लगाओ, मैं तुमसे बात करना चाहता हूँ।
बलि:- आप मुझसे बात करना चाहते हैं...इसलिए मैं पहले झाडू लगाउॅ। जाओ नहीं लगाता।
शंभू:- ठीक है मत लगाओ। आज शाम को झिलमिल जी आएंगी तो मैं उन्हें बता दूंगा कि बुढ्ढा फ्राड है।
बलि:- अच्छा ठीक है लगाता हूँ।
शंभू:- मैंने हिसाब लगाया है....हमें छः महीने हो गए साथ रहते हुए। इस बीच हम 12 बार लड़े। इसमें से 8 बार गलती तुम्हारी थी, दो बार गौतम की और एक बार हम यूं ही मजाक में लड़ लिए थे और अंतिम बार तो सिर्फ तुम्हारी गलती थी।
बलि:- अरे बुड़उ तू तो दूध का धुला है न.....।
शंभू:- कुछ कहा तुमने....।
शंभू: इतने बूढ़े होके शर्म आनी चाहिए कि आप एक सीधे-सीधे आदमी को ब्लैकमेल कर रहे हैं....मैंने आपको अपना समझकर एक राज बताया और आप बता दूंगा की धमकी देकर अपने सारे काम मुझसे करवा रहे हो। छि....शर्म आनी चाहिए आपको।
(बलि झाडू लगाता है, शंभू कागज नीचे फेंकने को होता है, बलि रोक देता है)
शंभू:- अब आया उॅट पहाड़ के नीचे.....अब बताओ कि तिवारी जी ड्राइवर से डॉक्टर कैसे बने।
बलि:- अभी मैं काम कर रहा हॅू....काम करते वक्त मैं ज्यादा बात नहीं करता।
शंभू:- ठीक है तो काम करो। (शंभू कचरा जमीन पर फेंक देता है)
लेकिन मुझे यकीन नहीं होता कि कोई आदमी ऐसा कैसे कर सकता है।
बलि:- क्यूं नहीं कर सकता ?
शंभू:- पर तुमने क्यूं किया ?
बलि:- क्योंकि जब आप अपने ही घर....अपने परिवार....अपने लोगों के बीच आराम से रह रहे हो और अचानक एक दिन आपको पता लगे कि असल में आपको कोई पसन्द ही नहीं करता है.....आपसे कोई बात ही नहीं करना चाहता है। मैं आपको क्यूं बता रहा हूँ....आप क्या समझोगे ये बात? जब मैं शाम को घूमने के बाद घर में वापस आता था तो मुझे घर में ताला लगा मिलता....ठीक है.....मैं घंटो घर के बाहर इंतजार करता....तो एक दिन मैंने मेरे बेटे से कहा-बेटा मैं घंटो बाहर बैठा रहता हूँ....अच्छा नहीं लगता मुझे एक डुप्लीकेट चाबी बनवा दो.....तो वो कहने लगा नहीं....उसमें चोरी का खतरा बढ़ जाता है.....तो मैंने चुपके से डुप्लीकेट चाबी बनवा ली तो उन्होंने घर में दो ताले लगवा लिए.....मैंन दोनों की डुप्लीकेट चाबी बनवा ली। तो उन्होंने मुझे पैसे देना ही बंद कर दिया.....ये घटनाएं खाने से लेकर मैं अपने कमरे में पंखा देर तक चालू रखता हॅू तक पहुँच गई... बताइए......जब आपको पता हो कि आपको आपने ही घर में कोई देखना नहीं चाहता, सुनना नहीं चाहता, तब आप अपने ही घर में डरावना भूत बन जाते हैं। और उस भूत की दिक्कत है कि वो दिखता है.....दिन में भी और रात में भी....तब बताईये शंभू जी.....तब आप क्या करेंगें....?
शंभू:- लेकिन तुमने ये क्यों किया ?
बलि:- क्यों कि और कोई मुझे जानता ही नहीं जो मुझे अपने घर में रख ले.....तो सोचा चलो किसी अच्छे old age home में अपना बाकी जीवन बिता दूंगा. पता है शंभू जी करीब पांच old age home वालों ने मुझे रिजेक्ट कर दिया....कहने लगे मैं उनके हिसाब से पूरा बूढ़ा नहीं हॅू। पूरा बूढ़ा...ये होता है पूरा बूढ़ा। इसलिए मैंने अपनी age बढ़वाई.....आयु प्रमाण पत्र बनवाने में मुझे कितनी दिक्कत आई.....पता है आपको ? और आप है कि सही age बता दूंगा की धमकी देकर अपने सारे काम मुझसे करवा रहे हैं।
शंभू:- पर कोई आदमी बूढ़ा होना चाहता है.......ये बात आजीब नहीं है।
बलि:- उड़ा लो मजाक....लगा दी झाडू....जा रहा हूँ
शंभू:- पोछा कौन लगाएगा ?
बलि:- कितना मजा आ रहा है न आपको......लगाता हूँ।
शंभू:- तुम एक बात बताओ....तुम कहानियों पर यकीन करते हो....परी की कहानियों पर ?
बलि:- यकीन है तो मैं सभी पर करता हूँ.... उसी का अंजाम भुगत रहा हूँ।
शंभू:- अच्छा ठीक है पोछा मत लगाओ.....
शंभू:- अच्छा....ठीक है लगाओ।
बलि:- क्या आप कह रहे थे नहीं लगाओ।
शंभू:- मैं तो कह रहा था मत लगाओ.....लेकिन अगर तुम लगाना चाहते हो तो कोई बात नहीं।
बलि:- अच्छा ठीक है।
शंभू:- इधर बैठो.....(बलि, शंभू के कंधे पर सर रखने लगता है) ठीक है.....अब ये चिपको-विपको मत। बताओ तुम परिकथा पर यकीन करते हो।
बलि:- मैं तो सिर्फ कथा पर यकीन करता हूँ। कथाए-हरिशंकर तिवारी....उसके अलावा मैनें कोई कथा सुनी ही नहीं....।
शंभू:- मैं भी कभी परिकथा पर यकीन नहीं करता था पर एक परी की कहानी थी, जिसे मेरी बेटी सुना करती थी। जब उसे नींद नहीं आती थी तो वो उस परी की कहानी को सुनते हुए सोती थी। पहले उसकी माँ उसे सुनाती थी....फिर उसके चले जाने के बाद मैं उसे सुनाने लगा और बाद में जब मुझे नींद नहीं आती थी तो तितली उसे पढ़कर मुझे सुनाती थी। और मैं सो जाता था.....परिकथा।
मैं पहले सोचता था कि हमें परिकथा की जरूरत क्यों पड़ती है। क्या जो जीवन हम जी रहे हैं वो इतना कठिन ओर असहनीय हे कि हमें ऐसी कहानी की जरूरत पड़े। जो सिर्फ कोरी कल्पना है......असल में ऐसा कुछ नहीं होता। जानवर कभी इंसान से बाते नहीं करते। आम जीवन में कोई चमत्कार नहीं होता। कोई परी अचानक एक दिन आकर सब कुछ ठीक नहीं कर देती.....पर फिर भी हमने परिकथाओं को उनके पूरे झूठ के साथ स्वीकार कर लिया है क्यों कि बलि जी इसमें जिया जा सकने वाला सुख होता है......जिसे उस कहानी के साथ उस वक्त हम जी लेते हैं.....और ये आदत है। बुरी आदत जो मुझे लगी हुई है...... और अजीब बात ये है कि मुझे पूरी परिकथा याद है पर मैं उसे खुद को सुनाकर सो नहीं सकता। इसके लिए हमेशा कोई अपना चाहिए होता है। जिसे आप छू सके, जो आपके सर पर हाथ रख सके। पर अब ऐसा कोई नहीं है.....हाँ पर एक परी है.....तितली.....जिससे मैं थोड़ी बातें कर लेता हॅू। और सो जाता हूँ।
बलि:- आपकी बेटी तितली अब कहाँ है ?
शंभू:- मैंने कहा ना वो परी बन चुकी है....
बलि:- परी मतलब......
शंभू:- परी मतलब.....पहले इसका मतलब बताओ ?
बलि:- अरे वो आप कहानी सुना रहे थे......
शंभू:- ओर तुम पसर गए। चलो पोंछा लगाओ।
बलि:- अरे अभी आप कर रहे थे, पोंछा मत लगाओ।
शंभू:- अब कहा ना लगाओ।
बलि:- बुडउ एक दिन ना तेरी चंपी कर दूंगा। (गौतम आता है)
गौतम:- बलि जी, कपड़े धुल गए। अब जाउॅ।
बलि:- आ....हाँ......अरे गौतम आजा आजा....कहाँ से धूम के आ रहा है....चल मैं थक गया हूँ। ये ले पोंछा लगा दे।
गौतम:- पर अभी तो मैंने कपड़े धोए। और.....
बलि:- शंभू जी.....
गौतम:- नहीं.....लगाता हूँ।
बलि:- शंभू जी....
गौतम:- अरे लगा तो रहा हॅू।
बलि:- शंभू जी....थक गया। कपड़े धोकर, पोंछा लगाकर। वैसे शंभू जी, मैं और झिलमिल जी कल पकोड़े खाने गए थे। बड़ा मजा आया...कह रही थी आज वो मुझे कुछ अच्छी खबर सुनाने वाली हैं। मुझे....आज हम फिर पकोड़े खाने जा रहे हैं। वैसे तो मुझे पता था.....पर इतनी जल्दी सब कुछ हो जाएगा ये पता नहीं था।
शंभू:- क्या-क्या कहा ?
बलि:- लीजिए मैं अपने जीवन की इतनी महत्वपूर्ण घटना सुना रहा हूँ और आप है कि क्या-क्या कर रहे हैं।
शंभू:- नहीं.....मैं सोच रहा था।
बलि:- क्या ?
शंभू:- मैं सोच रहा था, वो गुलाब बाई.....
बलि:- छि....छि गुलाब बाई।
शंभू:- अरे...मैं गुलाब बाई की बच्ची के बारे में सोच रहा था।
बलि:- पता नहीं....मैं भी कहां उलझ गया। मुझे तैयार होना है।
शंभू:- तुम भी एकदम अजीब आदमी हो.....तुम्हें क्या कोई फर्क नहीं पड़ता है ?
गुलाब बाई....उसकी बेटी....तिवारी जी। तुम्हें इनमें से किसी की भी याद नहीं आती.....अपने परिवार वालों की बात तो छोड़ ही दो। उनका तो तुम कभी जिक्र भी नहीं करते। पर तुम्हारे हरिशंकर तिवारी.....
बलि:- डॉ... हरिशंकर तिवारी।
शंभू:- हां....डॉ. हरिशंकर तिवारी। तुम्हें कभी उनसे मिलने की इच्छा नहीं होती।
बलि:- अरे मिलूंगा कैसे। वो मर गए ना।
शंभू:- मर गए ? कैसे ?
बलि:- पता नहीं....मैंने तो गांव छोड़ दिया था ना...उसी समय उनकी मृत्यु हो गई थी। जब बहुत समय बाद मैं वापिस गया तो कोई बता रहा था कि तिवारी एक दिन सुबह-सुबह रोड क्रास कर रहे थे। तभी एक बिल्ली ने उनका रास्ता काट दिया....तो बीच सड़क पर रूक गए और इंतजार करने लगे....कि जब तक कोई दूसरा सड़क क्रास न कर ले तब तक वो रोड क्रास नहीं करेंगे। वो वहीं खड़े रहे।
गौतम:- फिर।
बलि:- फिर क्या वो इंतजार करते रहे।
गौतम:- मतलब कोई आया नही।
बलि:- गांव में सुबह लोग कम ही निकलते हैं ना।
गौतम:- फिर।
बलि:- फिर एक ट्रक निकला।
गौतम:- तो ट्रक एकदम बगल से निकला.....और तिवारी जी की सांस रूक गई।
बलि:- नहीं....
शंभू:- हाँ... हाँ....
गौतम:- हाँ.... डर लगे तो गाना गाओ, भूख लगे तो खाना खाओ।
बलि:- अरे भई तुझे क्या हुआ ?
गौतम:- मरे हुए लोगों की ज्यादा बात नहीं करते, वरना वो आ जाते हैं। जैसे चुड़ैल का तीन बार नाम लो तो आ जाती हैं ना....
बलि:- किसका
गौतम:- चुड़ैल का....
शंभू:- किसकी बात कर रहा है....
गौतम:- अरे वो होती है ना चुड़ैल....
बलि-शंभू:- ले लिया.... तीन बार नाम ले लिया।
बलि:- अब चुडै़ल आएगी। हू....हू....मैं चुडै़ल हूँ।
गौतम:- अरे बाप रे....डर लगे तो गाना गाओ, भूख लगे तो खाना खाओ। अब तो पूजा करनी होगी, नींबू काटना पड़ेगा। (गौतम चला जाता है)
शंभू:- अरे ये चुडै़ल का नींबू पानी मुझे ना पिला दे.... सच में मुझे आश्चर्य होता है और जानने की इच्छा भी है कि सच में क्या तुम्हें किसी की याद नहीं आती।
बलि:- हाँ याद आया....मुझे कभी-कभी अपनी चवन्नी की याद आती है।
शंभू:- देखो मेरे सामने लड़कियों की बातें मत करो।
बलि:- नहीं मैं अठन्नी-चवन्नी वाली चवन्नी की बात कर रहा हूँ। क्या हुआ जब मैं छोटा था ना, तो मेरे पिताजी ने मुझे चवन्नी दी थी और कहा- जा जैसे चाहे खर्च करना है कर। शंभू जी उस वक्त चवन्नी का मिलना. मैं उसे लिए कई दिनों तक घूमता रहा। प्लान बनाता रहा, सपने देखता रहा कि कहाँ....किसी बड़ी जगह खर्च करूंगा। पर कुछ समझ में नहीं आया। तो मैंने सोचा अभी में बहुत छोटा हूँ। जब बड़ा हो जाउॅगा तो बड़ी जगह खर्च करूंगा इसे। तो मैंने उस चवन्नी को अपने घर की एक टूटी दीवार में छिपा दिया। कभी-कभी उसे निकालकर देख लेता था कि ठीक-ठाक रखी है। कुछ समय बाद पिताजी ने पूरे घर का पलास्टर करवा दिया। चवन्नी अंदर दब गई.....पर मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। क्योंकि मुझे पता था, मैं जब चाहूँ वो चवन्नी निकाल सकता हूँ.....बल्कि अब तो चवन्नी ज्यादा सुरक्षित थी। फिर मैं बड़ा हो गया, पिता जी मर गए और सारे घर की जिम्मेदारी मुझ पर आई। पर मैंने उस चवन्नी को नहीं निकाला। अभी भी वो चवन्नी उसी दीवार में पड़ी हुई है। मैं जब चाहूं उसे निकाल सकता हूँ पर मैंने नहीं निकाला... उसी चवन्नी की कभी-कभी याद आ जाती है।
शंभू:- अरे झिलमिल जी आईये-आईये।
बलि:- (बलि नकल करते हुए) अरे झिलमिल जी आईये-आईये।
शंभू:- देखिये-देखिये।
बलि:- देखिये-देखिये। हं......
झिलमिल:- अरे बलि जी....हम जब पकोड़े खाने जाते हैं तब आप ये बात मुझे नहीं बताते।
बलि:- अरे आप कब आई।
झिलमिल:- अभी, जब आप वो चवन्नी वाली बात सुना रहे थे। शंभू जी कैसे हैं ?
शंभू:- ठीक ?
झिलमिल:- आपकी दवाई लाई थी ?
शंभू:- वो तो है मेरे पास ?
झिलमिल:- अच्छा.....वो दवाई खाई आपने ?
शंभू:- पर अभी तो किसी दवाई का समय नहीं है। क्या बात है ? कुछ कहना चाहती हो, कहो ?
झिलमिल:- शंभू जी....असल में।
बलि:- एक मिनट... झिलमिल जी पहले हम पकोड़े खाने चले.... फिर शंभू जी तो यहीं हैं। आप उसके बाद बात कर लेना।
झिलमिल:- बलि जी, मुझे कुछ जरूरी बात करनी है।
बलि:- आपने ही कहा था कि आप कुछ अच्छी खबर सुनाने वाली हैं आज।
इसलिए मैंने सोचा....चलो ठीक है।
झिलमिल:- अच्छा वो.... तो ठीक है, पहले अच्छी खबर सुना देती हूँ।
बलि:- यहाँ, शंभू जी के सामने।
झिलमिल:- हाँ..... क्यों। असल में बात ये है कि.....
बलि:- ठहरिए....मैं पीछे खड़े होकर सुनता हॅू.....मुझे शर्म आती है। थोड़ा तेज बोलना।
झिलमिल:- बात ये है कि सब कुछ तय हो गया है और अगले महीने मैं शादी कर रही हॅू। (बलि पीछे गिर जाता है)
शंभू:- देखिए खुशी के मारे गिर गया। ये तो बहुत अच्छी खबर है.....मिठाई होनी चाहिए।
झिलमिल:- मिठाई मैं लाई नहीं हूँ, पर शंभू जी....
शंभू:- कोई बात नहीं, लीजिए मुँह मीठा कीजिए (डिब्बे से चॉकलेट निकालता है) क्या बात है आप कुछ कहना चाहती हैं।
झिलमिल:- मुझसे एक गलती हो गई है.....
शंभू:- गलती तो सब करते हैं।
झिलमिल:- पर ये गलती मैंने जानबूझकर की है।
शंभू:- देखिए, हम बूढ़े लोग बरगद की तरह होते हैं हैं कोई भी आकर अपने मन की बात उनसे कह सकता है।
झिलमिल:- और अगर बात बरगद के बारे में ही हो तो ?
शंभू:- मतलब ?
झिलमिल:- मैंने शुभांकर को आपसे मिलने की इजाजत दे दी है.....वो अगले हफते आपसे मिलने आ रहा है।
शंभू:- देखिए झिलमिल जी.....
झिलमिल:- नहीं....आप अभी मत बोलिए....पहले मेरी बात सुनिए। फिर आपको जितना डांटना हो डांट लीजिएगा। वहां उसका फोन आता है। यहां आप मुझे डांट देते हैं। मैं आप दोनों के बीच फंस गई हूँ। और मुझे नहीं लगता है। कि मैंने कुछ गलत किया है, वो out of india जा रहा है, हमेशा के लिए। और एक बार आपसे मिलना चाहता है। उसका हक बनता है। वो दो साल से इसकी कोशिश कर रहा है। सो मैने हाँ कर दिया बताईए...गलत किया....बोलिए
शंभू:- शुभांकर....वो.....तितली.....
झिलमिल:- शंभू जी.....शंभू जी।
(Black Out)
(तितली Enters)
तितली:- पापा....तबियत खराब है आपकी....
शंभू:- नहीं वो तो बस.....तुम कब आई ?
तितली:- मैं तो यहीं हूँ.... आप बहुत परेशान दिख रहे हैं।
शंभू:- हाँ, बेटा बहुत गंदा सपना देखा मैंने....एक राक्षस था....मुझे डरा रहा था।
मैंने कहा, मैं भी तितली का बाप हूँ, डरूंगा नहीं....बेटा मैं नहीं डरा।
तितली:- फिर अभी आप किससे डर रहे हैं ?
शंभू:- मैं झूठ बोल रहा था, मैं डर गया था....मैं तितली का बाप हूँ, डरूंगा नहीं। ये वाक्य मैं उस राक्षस से बोल नहीं पाया।
तितली:- आपको राक्षस से डर लगता है ?
शंभू:- तुम्हें राक्षसों से डर नहीं लगता....इसलिए मुझे डरना पड़ता है।
तितली:- मुझे राक्षस अच्छे लगते हैं, पर पापा मुझे तितली नाम अच्छा नहीं लगता।
तितली....ये भी कोई नाम है।
शंभू:- इतना अच्छा नाम है।
तितली:- पापा नाम होता है......जैसे झांसी की रानी।
शंभू:- झांसी की रानी....उनका नाम तो लक्ष्मीबाई था.....तुम चाहो तो लक्ष्मीबाई रख लो ?
तितली:- बाई नहीं....रानी।
शंभू:- तो ठीक है तितली रानी.....तितली रानी बड़ी सयानी।
तितली:- पापा.....कुछ और....अगर आप कुछ और इंतजार कर लेते तो मैं अपना नाम खुद ही आपको बता देती। नाम रखने में इतनी जल्दबाजी क्यों की ?
मैंने सुना है....ये नाम मेरा माँ ने रखा था....आप क्या चाहते थे ?
शंभू:- मैं....मैं तो बेटा बस तुम्हें चाहता हूँ। कुछ भी नाम होता तुम्हारा। ठीक है, तुम जो अपना नाम रखना चाहती हो, मुझे बता देना....मैं तुम्हें उसी नाम से पुकारूंगा....ठीक है।
तितली:- ठीक है....मैं बताउॅ नाम....?
शंभू:- अरे वाह.....तुमने तय भी कर लिया।
तितली:- हाँ.....
शंभू:- बताओ......
तितली:- शुभांकर......
(Black out)
बलि:- शंभू जी....शंभू जी....इतनी देर तक तो आप सोते नहीं हैं। उठिए भई।
शंभू जी....शंभू जी....शंभू जी।
शंभू:- जिंदा हूँ.....जिंदा हूँ.....ऐसे चिल्लाओगे तो शायद मर जाउॅ ?
बलि:- नहीं....मुझे लगा.....आप निकल लिए....।
शंभू:- पानी देना.....
बलि:- कल शुभंकर आने वाला है.....कौन है ये ?
शंभू:- मैंने कभी उसे देखा नहीं.....मैं मिला भी नहीं हूँ उससे।
बलि:- फिर आप डरते क्यों हैं......वैसे झिलमिल जी ने मना किया था कि आपसे उसके बारे में बात न करूं......पर......अब तो हम दोस्त हैं......हैं कि नहीं।
शंभू:- हाँ।
बलि:- बस फिर क्या है, देखो मेरे पास एक प्लान है हम दोनों दरवाजे के पीछे छुपे रहेंगे....और जैसे ही वो अंदर आएगा.....मैं उससे पूछूंगा आप कौन..... जैसे ही वो बोलेगा शुभांकर....आप पीछे से उसके उपर कंबल डाल देना.... पर शुभांकर बोलने का मौका उसे देना। वरना बेकार में गौतम फिर से पिट जाएगा। इधर आपने कंबल डाला, उधर उसकी कंबल कुटाई शुरू। कंबल कुटाई जानते हैं ना आप ?
शंभू:- मुझे नहीं लगता कि मैं तब तक रूक पाउॅगा....
बलि:- क्यों आप पहले ही शुरू हो जाऐंगें ?
शंभू:- नहीं मेरी बात सुनो....मैं नहीं जानता ये शुभांकर कौन है....मेरी बेटी तितली.....बस उसी के मुंह से सुना था मैंने....उसके बारे में.....ये दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। ये बात मुझे बहुत देर बाद पता लगी। जब तितली ने कहा कि वो उससे शादी करना चाहती है। मैं और मेरी बेटी....इतने
सुखी थे....ये कौन आ गया ? कब आ गया? कैसे तितली अचानक मुझे छोड़कर जाना चाहती है। उस वक्त एकदम से मैं ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाया और मैंने तितली को मना कर दिया। वो मेरी जिद जानती थी। पर ये मेरी जिद नहीं थी। मैं उसे वक्त ये सब एकदम से सहन नहीं कर पाया....शायद मैं शुभांकर से मिलता...पर उसने मुझे दूसरा मौका नहीं दिया। कुछ समय बाद....वो उसके साथ चली गई। उन्होंने शादी कर ली। और वो कहीं घूमने चले गए। मैं अकेला रह गया। सोचा जब तितली वापस आएगी तो थोड़ा गुस्सा होउॅगा...थोड़ा नहीं बहुत गुस्सा होउंगा पर फिर मान जाउॅगा। फिर एक दिन खबर आई कि....शुभांकर और तितली जिस कार में थे। उस कार का accident हो गया है....जिसमें शुभांकर बच गया और....तितली....तितली....मेरी फूल सी बच्ची मर गई। मैं अकेला रह गया.....तितली की माला टंगी हुई फोटो को देखने की हिम्मत मैं नहीं जुटा पाया। और सब कुछ छोड़कर मैं यहां आ गया। मुझे शुभांकर से कोई लेना-देना नहीं है पर उसने एक झटके में मुझसे मेरा सबकुछ छीन लिया....क्यों वो मेरे पीछे पड़ा है.. मुझे नहीं मिलना है उससे मेरी बेटी, मुझसे प्यार करती थी....अभी भी करती है.....वो मेरे पास है....मेरी बेटी, मुझसे मिलने को आती है। हम घंटो एक दूसरे से बातें करते हैं और शुभांकर ये सुख भी मुझसे छीनना चाहता है।
बलि:- नहीं आएगा वो....आप उसके बारे में मत सोचिए। पानी पीजिए.....। आपने दवाई खाई......कौन सी दवाई है ? मैं झिलमिल जी से पूछ के आता हॅू।
शंभू:- अच्छा बहाना है.....झिलमिल जी से मिलने का।
बलि:- अरे नहीं.....शंभू जी, उसकी शादी होने वाली है। इतना बुरा नहीं हॅू मैं।
शंभू:- सुनो.......कम से कम वही बता दो।
बलि:- क्या....?
शंभू:- अरे वही।
बलि:- वही क्या.....?
शंभू:- तिवारी जी ड्राईवर से डॉक्टर कैसे बने ?
बलि:- हाँ.....आप अभी तक वहीं अटके हुए हैं। नहीं वो मैं आपको तब बताउॅगा जब आप एकदम ठीक हो जाऐंगे।
शंभू:- अच्छा चलो तिवारी जी के बारे में ही कुछ बताओ.....कम से कम कुछ हंस लूं।
बलि:- तिवारी जी....तिवारी की एक इच्छा थी। उसके बारे में बताता हूँ।
हरिशंकर तिवारी जी असल में।
शंभू:- डॉ0 हरिशंकर तिवारी बोला वरना वो नाराज हो जाऐंगे।
बलि:- अरे हाँ....माफ कीजिऐगा तिवारी जी आपके नाम के आगे डॉ0 लगाना भूल गया। तिवारी जी असल में प्रसिद्ध होना चाहते थे। जो वो हुए नहीं। तो वो ऐसी चीज को देखना चाहते थे.... जो प्रसिद्ध हो। तो उन्होंने तय किया कि वो ताजमहल देखने जाऐंगें। नजदीक से उसे छूऐंगें। क्यों वो इतना प्रसिद्ध है ? क्यों उसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। जबकि उन्हें देखने कोई नहीं आता।
शंभू:- क्यों आप तो थे।
बलि:- अरे मैं बहुत छोटा था उस वक्त। मुझे तो वो कोई गिनती में भी नहीं रखते थे। तो उन्होंने तय किया कि वो पहले शिरडी जाऐंगे। मन्नत मांगेंगे कि वो ताजमहल देखना चाहते हैं और अगर मन्नत पूरी हुई और उन्होंने ताजमहल देख लिया तो वापस शिरडी जाकर भगवान को धन्यवाद देंगें।
शंभू:- अरे अजीब है....दो बार शिरडी जाऐंगें....उससे अच्छा एक बार ताजमहल देख लें।
बलि:- वहीं तो मैंने उनसे कहा तो वो कहने लगे। अगर मैं सीधे आगरा चला गया और ताजमहल देख लिया तो किसी बताउॅगा कि मैंने ताजमहल देख लिया..... इसलिए वापस शिरडी जाकर भगवान की बोलूंगा कि.... भगवान ताजमहल देखा....अच्छा लगा।
शंभू:- तो उन्होंने ताजमहल देखा ?
बलि:- जब तक मैं था तब तक वो शिरडी जाने के पैसे ही जमा कर रहे थे।
शंभू:- अब मैं सोना चाहता हूँ।
बलि:- लाइट ऑफ कर दूं ?
शंभू:- तुम्हारे साथ तो कैसे भी सोने की आदत पड़ गई है। बलि जी....एक चाय मिलेगी ?
बलि:- हाँ क्यों नहीं ? (बलि अंदर जाता है, तितली की आवाज आती है)
तितली:- मैंने एक परी से कहा कि मुझे एक ऐसी परीकथा सुनाओ जिसे सुनकर मेरी बेटी का अपनी परी मिल जाए। वो परी हसने लगी और उसने कहा ठीक है, मैं एक ऐसी परी की कहानी सुनाती हूँ, जो एक दिन गायब हो गई थी। और फिर कभी नहीं मिली।
(बलि चाय लेकर आता है। शंभू मर चुका है)
बलि:- शंभू जी चाय....शंभू जी चाय....शंभू जी।
(Black out) तितली की परछाई पीछे दिखाई दे रही है।
(Music)
झिलमिल:- आज शाम को शुभांकर आ रहा है। अच्छा ही है, कम से कम शंभू जी का सारा सामान उसको दे देंगें। उसी का हक बनता है।
बलि:- इस बात पर मैं आपसे लड़ सकता हूँ.....उनका सूटकेस तो मैं ही रखूंगा।
बाकी सामान आप उसे दे सकती हैं।
झिलमिल:- उसे यहां आकर कितना बुरा लगेगा....काश एक दिन पहले आ जाता.... उसका कोई नंबर भी नहीं है कि उसे इन्फ़ार्म कर सकूं।
बलि:- अच्छा ही है....पता नहीं शंभू जी उसे देखकर उसका क्या करते और उनके बीच में मैं अपना क्या करता।
झिलमिल:- आपसे एक फेवर चाहिए।
बलि:- कहने की जरूरत नहीं है। आपकी शादी में पूरा काम करूंगा।
झिलमिल:- अरे नहीं आज शाम को सब लोग आ रहे हैं। अच्छा ही है, मैं ऐसे शुभांकर से मिलना नहीं चाहती थी। आप संभाल लेंगें ?
बलि:- आप रहे या ना रहें संभालना तो मुझे ही पड़ेगा.....आप जाईये।
झिलमिल:- कोई तकलीफ हो तो गौतम को भिजवाकर मुझे बुलवा लीजिएगा। अच्छा नमस्ते।
बलि:- झिलमिल जी आपसे एक बात कहनी थी। जब बहुत समय बाद मैं तिवारी जी से मिला तो देखा उनके घर के सामने भीड़ लगी थी....पता किया तो पता चला कि वो घर पर ही पढ़ाई करके हौम्योपैथिक के डॉक्टर हो गए हैं। और गाँव के लोगों का फ्री इलाज करते हैं। फ्री के डॉक्टर........
झिलमिल:- जी....
बलि:- अरे ड्राइवर से डॉक्टर.....वो शंभू जी और मेरी बात थी....उन्हें बता नहीं पाया....बस बताना था....ठीक है।
(झिलमिल जाती है)
(शुभांकर आता है, बलि उसे पीछे से डरा देता है)
बलि:- बौं....क्यों डर गया ?
शुभांकर:- ओ.....आप.....
बलि:- तुम....मुझे लगा गौतम है।
शुभांकर:- मैं शुभांकर .......
बलि:- शुभांकर तुम जल्दी आ गए।
शुभांकर:- मैं जल्दी आ गया.....मैं तो और भी जल्दी आना चाहता था।
शुभांकर:- नहीं।
बलि:- चाय....चाय पिओगे.....
शुभांकर:- नहीं.....कुछ नहीं। (तितली की फोटो देखता है)
बलि:- तितली है....
शुभांकर:- मेरी बीवी है.....
बलि:- अच्छा, अभी भी है। मुझे लगा तुमने दूसरी शादी कर ली होगी। भई दो साल काफी वक्त होता है।
शुभांकर:- मैं....तो।
बलि:- कब जाओगे ?
शुभांकर:- यहां से.....बस....
बलि:- नहीं.....मतलब तुम्हारी फ़्लाईट कब है ?
शुभांकर:- आज रात में.....
बलि:- और घर में बाकी सब कैसे हैं ?
शुभांकर:- घर में कोई नहीं है....मैं अकेला हूँ।
बलि:- कुछ खाओगे....
शुभांकर:- नहीं.....देखिए।
बलि:- यहाँ कुछ नहीं है, बाहर से मंगाना पड़ेगा।
शुभांकर:- मुझे कुछ नहीं चाहिए। कुछ भी नही।
बलि:- ये कुछ चीजें हैं। ये तुम रख लो।
शुभांकर:- ये सब आप मुझे क्यों दे रहे हैं।
बलि:- मैं क्या करूंगा इनका और एक सूटकेस है।
शुभांकर:- हाँ सूटकेस.....
बलि:- वो मैं आपको नहीं दूंगा.....वो सेरा है।
शुभांकर:- हाँ, तितली ने बताया था मुझे पापा का सूटकेस’’
बलि:- उसके बारे में आप बात मत करिए वो मैं आपको नहीं दूंगा।
शुभांकर:- नहीं चाहिए.....वो आपका ही है।
बलि:- तब ठीक है। (शुभांकर घड़ी देखता है)
शुभांकर:- बस थोड़ी देर में निकलूंगा।
बलि:- थोड़ी देर है तो मैं चाय पी लूं.....
शुभांकर:- हाँ....आप....आप चाय पी लीजिए।
बलि:- ठीक है....देखो मुझसे ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है.....मैं तुम्हें बता दूं कि...
शुभांकर:- मैं भी आपको बताना चाहता हूँ।
बलि:- बोलो....
शुभांकर:- मैं....मैं निकलता हूँ। अच्छा.....नमस्ते।
बलि:- ठीक है.....क्या हुआ ?
शुभांकर:- मैं आपको एक बात बता दूं....कि में तितली को बहुत प्यार करता हूँ। ये दो साल मैंने कैसे बिताए हैं......मैं ही जानता हूँ। मैं हर जगह हजारों बार जा चुका हॅू। जहां हम मिला करते थे। पिछले दो सालों से मैं वही-वही बार-बार वैसा का वैसा जी रहा हूँ। मैं बहुत तकलीफ में जिया हॅू। और कोई भी नहीं था, जिससे मैं ये सब बता सकता। आज आप (गले मिलता है) आप एक बार.....आप एक बार मुझसे मिल लेते। मैं बस आपके साथ रोना चाहता था.....आप एक बार मुझसे मिल लेते। मैं बस आपके साथ रोना चाहता था....शंभू जी मैं आपके साथ रोना चाहता हूँ.....बस।
बलि:- बैठो....बैठो......मैं तुमसे....एक बात।
शुभांकर:- मैंने आपको इतने सारे लैटर लिखे। आपने एक का भी जवाब नहीं दिया। आपने वो लैटर पढे ही नहीं। क्यों ? एक लैटर......एक लैटर खोल कर तो देखते....वो सारे लैटर मैंने आपको तितली बनकर लिखे थे। इतना जानता था मैं आपकी बेटी कों आप एक लैटर भी पढते न तो मुझसे जरूर मिलने आते। मुझे पता है आप मुझसे क्यों नहीं मिलना चाहते थे। पर मुझे माफ कर दो और तितली ने कहा था वो आपको मना लेगी। हम लोग रोज आपको मनाने के नए-नए तरीके खोजते थे... एक दिन तो.....
बलि:- बेटा.....मुझे खुद नहीं पता मैं तुमसे क्यों नहीं मिल पाया। तितली का जना मैं शायद बर्दाश्त नहीं कर पाया इसलिए सबकुछ छोड़कर यहां आ गया। और तुम्हारे लैटर.....मुझसे मत पूछो क्यों नहीं पढ़े.....मैं बदल गया हूँ। अजीब हो गया हूँ। मुझे माफ कर दो।
शुभांकर:- नहीं....मैं माफी चाहता हूँ....मैं शायद ज्यादा बोल गया।
बलि:- नहीं....नहीं.....अच्छा किया जो तुमने सब बोल दिया।
शुभांकर:- चाहिए....मुझे देर हो रही है....मैं जाता हूँ।
बलि:- ठीक है।
शुभांकर:- आप मुझे माफ कर देना। क्योंकि मैंने आपसे आपका सब कुछ छीन लिया मैं जानता हूँ, मुझे लगा सबकुछ ठीक हो जाएगा। पर कुछ भी ठीक नहीं हुआ।
बलि:- अब सब ठीक हो गया है.....मैंने तुम्हें माफ कर दिया। तुम भी मुझे माफ कर देना। ठीक है।
शुभांकर:- अरे हाँ.....जिसके लिए मैं आपसे मिलना चाहता था, वो तो आपको देना ही भूल गया। ये....ये.....तितली आपको देना चाहती थी।
बलि:- क्या है.....?
शुभांकर:- जिसके लिए मैं आपसे मिलना चाहता था।
बलि:- ये....तो.....ठीक है।
शुभांकर:- सुन लीजिए....
बलि:- अभी।
शुभांकर:- हाँ... (बलि कैसेट शुरू करता है)
कैसेट-तितली:- हैलो पापा.....मुझे पता है आप मुझसे नाराज होंगे। मैं आउॅगी और झट से आपको मना लूंगी। पर मुझे पता है आपको नींद तो आती नहीं है। तो जब तक आप नाराज हैं ये परी की कहानी सुनकर सोना। ठीक है.....एक परी थी।
(बलि बीच में ही रोक देता है)
बलि:- मैं बाद में सुन लूंगा.....ठीक है।
शुभांकर:- मैंने इसकी एक कॉपी अपने पास रखली है। अगर आपको एतराज ना हो तो ?
बलि:- ये सबकुछ तुम्हारा है।
शुभांकर:- चलता हूँ।
(शुभांकर जाता है)
बलि:- शंभू......तुम्हें शुभांकर से एक बार मिल लेना चाहिए था। खैर मैं मिल लिया
(गौतम आता है)
गौतम:- बलि जी.....मैंने वो उसे रिक्शा दिला दिया। अभी गया वो...
बलि:- कौन ?
गौतम:- शुभांकर.....शुभांकर ही था ना वो....?
बलि:- हाँ....तुम्हें कैसे पता।
गौतम:- अरे जब वो आ रहा था ना तो बाहर मिला मुझे। मुझसे पूछा-शंभू जी कहां है। मैंने पूछा-आप कौन तो उसने बताया शुभांकर। मैंने कहा तुमने आने में देर कर दी.....शंभू जी तो मर चुके हैं।
बलि:- तुमने बता दिया था......उसे.....
गौतम:- हाँ... और वो तो.....
बलि:- जाओ यहां से.....
(बलि टेप का बटन दबाता है, परिकथा शुरू हो जाती है)
मैंने एक परी से कहा कि मुझे एक ऐसी परिकथा सुनाओ, जिसे सुनकर मेरी बेटी को अपनी परी मिल जाए। वो परी हंसने लगी और उसने कहा-ठीक है। मैं एक ऐसी परी की कहानी सुनाती हॅू.....जो एक दिन गायब हो गई थी.... और फिर कभी नहीं मिली। वो बहुत खुबसूरत परी थी। जिस दिन वो गायब हो गई थी, परी देश में सभी परेशान हो उठे। कैसे गई, कहाँ गई क्योंकि ऐसे ही कोई परी गायब नहीं होती। उसे ढूंढने का काम मुझे सौंपा गया, क्योंकि हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। मैं धरती पर उस आदमी की तलाश करने लगी, जिनकी वो परी थी। बहुत समय बाद वो मिला पर परी उसके पास नही थी। जानते हो क्या हुआ था। उस आदमी ने एक बार किसी से कह दिया था कि मैं परियों में विश्वास नहीं करता और उसकी परी मर गई थी।

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