शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

’लाल पेंसिल....’






अरण्य...



लाल पेन्सिल





मानव कौल

Scene-1

सब बच्चे embryo की मुद्रा मे लेटे है. एक बीट को फॉलो करते हुए सब धीरे धीरे उठते है. पास में पडे पेन और कागज को देख्ते है. कागज लेकर अपनी जगह जाते है और लिखने लगते हैं.
सब सामने देखते है और सीधे बैठ जाते है.
उसके बाद सभी क्लास का lesson रट रहे हैं... जो सिर्फ साऊंड़ है... कुछ gestures है... और कुछ rhythm है। उनके बीच में नंदु है जो सब कुछ गलत कर रहा होता है.. वह कोशिश करता है कि सब कुछ सही करे पर उससे कुछ भी सही नहीं होता। तभी द्रुपद नाम का एक टीचर आ जाता है। वह नंदु को देखता है कि वह सब कुछ गलत कर रहा हैं... वह उससे अलग से करने को कहता है... पर वो नहीं कर पाता....
(नीतू द्रुपद के पास जाती है)
नीतू- सर ये तो सब गलत कर रहा है.
(द्रुपद को कॉपी दिखाती है और कर के बताती है, द्रुपद उस्से कॉपी ले लेता है नंदु को देता है, वो फिर भी नही कर पाता। द्रुपद उसे वापिस अपनी जगह बिठा देता है। द्रुपद पान थूकने के लिये बाहर जाता है, सभी बच्चे नंदु को चपत लगाते हैं. द्रुपद वापिस आता है)
द्रुपद –तो इस बार कौन कौन भाग लेगा कविता की प्रतियोगिता में???
(तभी सब फ्रीझ हो जाते है और पिंकी कहती है)
पिंकी- मै इसी क्लास में हूँ पर असल मे नही हूँ,मै यहां रहू या चली जांऊ, किसी को बहुत फरक नहीं पड्ता, चपरासी के अलावा किसी को मेरा नाम तक नहीं पता, लोग मुझे ’ए’ कह्कर बुलाते है, जबकि मेरा नाम पिंकी है. मै कविता लिखना चाह्ती हू. कैसे भी , किसी भी तरह, सबसे अच्छी कविता!
(फ्रीज़ खत्म होता है द्रुपद वापिस बोलना शुरु करता है।)
द्रुपद - पहले इस क्लास में जो अव्वल आएगा वह पूरे स्कूल की प्रतियोगिता में भाग लेगा.. फिर जो इस स्कूल में आव्वल आएगा उसे सारे स्कूलों की कविता की सबसे बड़ी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका मिलेगा.. और उसके बाद भूल जाओ.. क्योंकि उस प्रतियोगिता में मैं चालीसवें स्थान पर आया था... और मुझसे आगे अभी तक कोई नहीं गया है। तो कौन-कौन भाग लेना चाहता है... ?
पिंकी को छोड़कर सभी लोग अपने हाथ खड़े कर देते है...।
द्रुपद – ’ए’ क्या नाम है तुम्हारा?
पिंकी – पिंकी.
द्रुपद- पिंकी तुम कविता नहीं लिखोगी?
पिंकी- मुझे नहीं आती है...।
द्रुपद- क्यों पिछली बार तो तुमने लिखी थी कविता...
पिंकी- वह पापा ने लिखी थी।
द्रुपद- तो अब...
पिंकी- असल में यह हुआ था कि.....
(पिंकी ऊपर देखती है.....पीछे सिलुअट में... उसे अपने माँ बाप लड़ते हुए दिखते हैं... ।)
बाप- फिर तुमने वही बात कही....।
माँ- मैं वह बात नहीं कह रही हूँ...
बाप- तो क्या कह रही हो..?
माँ- मैं वह बात कह ही नहीं रही थी....
बाप- फिर वही बात..
माँ- तुम फिर वही बोल रहे हो?
बाप- मैं वह नहीं बोल रहा हूँ...
माँ- देखों तुम अभी भी वही बोल रहे हो...
बाप- वही क्या?
माँ- वही... देखो..
बाप- तुम बार-बार वही बात क्यों कर रही हो?
माँ- तुम बार-बार वही कह रहे हो।
बाप- देखों इस्से पहले भी तुमने यही कहा था और अब भी तुम वही कह रही हो।
माँ- मैंने यही बात कब कही...?
बाप- वाह!! तुमने यह बात की ही नहीं?
माँ- तुम्हारी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती।
बाप- अरे!! अब मैंने यही बात कब कही?
माँ- देखों फिर वही बात?
बाप- देखो अभी तुमने ’फिर वही बात कहा ना...’
माँ- हाँ...
बाप- हाँ तो मैं भी वही कह रहा हूँ कि तुम बार-बार वही बात कर रही हो..।
माँ- अरे तुम बार-बार वही बात कर रहे हो।
बाप- अरी अभी तो तुम मानी थी कि तुमने वही बात कही थी।
माँ- अच्छा ठीक है अब तुम वही बात करो जो तुम पहले कह रहे थे?
बाप- हाँ यही तो कह रहा था मैं पहले भी...।
माँ- यही कहाँ तुम तो वही बात कर रहे थे?
बाप- हाँ मेरा मतलब वही बात...।
माँ- तुम वही नहीं इस्से पहले यही बात कर रहे थे।
बाप- मैं तो कब से वही बात कर रहा हूँ।
माँ- हाँ मैं भी तो कह रही हूँ कि तुम कबसे वही बात कर रहे हो।
बाप- तो सबसे पहले तुमने वह बात छेड़ी ही क्यों?
माँ- अरे मैं वह बात नहीं कर रही थी।
बाप- तो कौन सी बात कर रही थीं?
माँ- अरे मैं वह बात कर ही नहीं रही थी।
बाप- वही बात... यही बात... यही बात.... वही बात...ऊफ...!!!
माँ- नहीं यही बात... वही बात... वही बात.. यही बात...ऊफ!!!..
बाप- ऊफ...
माँ- ऊफ...
( पिताजी अपना सामान उठाते हैं और घर छोड़कर चले जाते हैं...। पिंकी चुप रहती है। लाईट वापिस क्लास में आती है।)
रोमा- सर इसके पापा इनको छोड़क्र चले गए हैं।
पिंकी- नहीं वह वापिस आएगें।
द्रुपद- जो भी है... सबको कविता लिखना है... कंपलसरी है... ठीक है..।
रोमा- सर मैं तो कविता लाई हूँ.. यह रही...।
द्रुपद- अभी नहीं कल देना... ठीक है..।
(प्रत्युश कवि सा दिखने वाला लड़का है...।)
प्रत्युश- हाँ सर .. मैं तैयार हूँ... ।
द्रुपद- अच्छे से लिखना... हें... कोई तकलीफ हो तो मेरे से पूछ भी सकते हो...।
प्रत्युश – सर एक तक़लीफ है!!!
द्रुपद – बाद मे.. तो कविता का विषय है – किताबें
(सब बच्चे ’किताबें’ शब्द कहते हैं… द्रुपद चला जाता है... इसी बीच चपरासी आकर बेल बजाता है। सभी बच्चे पीछे सीधी लाइन मे बैठ जाते हैं। पिंकी क्लास में अकेली रह जाती है... वह रोमा की कॉपी से उसकी कविता चुराकर पढ़ लेती है फिर उस कविता को फाड़ देती है.. तभी उसे एक खट की आवाज़ आती है....। वह पलटकर देखती है तो उसे एक लाल पेंसिल दिखती है... वह उस पेंसिल को उठाती है.. वह बहुत खूबसूरत पेंसिल है...। वह घबराकर इधर उधर देखती है... क्लास में उसके अलावा कोई भी नहीं है....।)
पिंकी- कौन है? कौन है?.... यह पेंसिल किसकी है?
(जब कोई जवाब नहीं देता तब वह लाल पेंसिल अपने पास रख लेती है...।)
Scene-2
(पीछे सारे बच्चे लाईन में बैठे हैं.. वह कविता लिखने की कोशिश करते हैं.... कुछ बहुत ही कविता नुमा लईने बोलने की कोशिश करते हैं... जैसे “किताबें दिल का आईना है.... किताबे जीवन है.. नवल बुक डिपो पर आज बड़ी भीड़ है... वगैहरा वगैहरा”....... पर अंत में कुछ लिख नहीं पाते और चिल्लाकर अपना सिर झुका लेते हैं...। इसी चिल्लाहट के साथ पीछे पिंकी भी चिल्लाती है.... और माँ और पिंकी का सीन शुरु होता है।)
पिंकी- आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.....।
माँ- पिंकी... क्या हुआ क्या कर रही है?
पिंकी- माँ मैं कविता लिख रही हूँ।
माँ- क्या???
पिंकी- मैं कविता लिख रही हूँ।
माँ- क्यों?? क्यों लिख रही है कविता... अरे तबियत तो ठीक है तेरी.. देख पूरा शरीर गर्म हो गया है तेरा... क्यों लिख रही है कविता तू????
पिंकी- माँ कंपलसरी है सबको लिखनी है....
माँ- अरे!!! कंपलसरी है.... ठीक है.. कंपलसरी है तो लिख.... पर ज़्यादा दिमाग़ खर्च मत कर..ऎसे ही लिख दे कुछ भी....
पिंकी- कुछ भी...
माँ- हाँ कुछ भी.. ऎसे ही दो लाईन.. मतलब.. चल लिखना तो शुरु कर.. मैं हूँ यहा.. लिख..
पिंकी- कुछ भी क्या माँ कुछ तो बताओ?
माँ- अरे!! मैं... मैं क्या बताऊं....????? पागल है क्या???
पिंकी- मैंने पापा को फोन किया था... पर वह फोन ही नहीं उठाते हैं.....
माँ- क्यों किया था फोन..? क्यों किया था उनको फोन...? ऎ!!!!!! चल लिख मैं बताती हूँ..... देख ऎसा कर ... पिंकी तू सुन रही है ना????
पिंकी- हाँ....
माँ- हाँ ... तो सुन.. पहले तो तू कुछ लिख... फिर देख क्या लिखा है... फिर लिख जो देखा है... और ऎसे ही लिखती जा.. लिखती जा.. जब तेरा लिखना बंद हो जाए तो समझ ले कि हो गई कविता.. और फिर वह कविता किसी को सुना दे...मुझे नहीं किसी को... वह हो गया तेरा कविता पाठ.... देख कितना सरल है...।
पिंकी- हाँ माँ ’बहुत’ सरल है...!!!!
माँ- अब चल लिख दे.... ऊफ.......
(माँ के सिर में दर्द होने लगता है वह चली जाती है...। पिंकी वापिस लिखने बैठती है तभी उसकी निग़ाह लाल पेंसिल पर पडती है..... वह उसे उठाती है...। और लिखना शुरु करती है... पर पेंसिल अचानक खुद लिखने लगती है... पिंकी उसे रोकने की कोशिश करती है ..पर वह उसके रोके नहीं रुकती है... फिर अचानक पेंसिल उसे बुरी तरह घुमा देती है... पिंकी बेहोश हो जाती है.. और पेंसिल धीरे-धीरे लिखने लगती है...।)
(सामने बैठे सभी बच्चों ने अचानक अपनी कविता पूरी कर ली है... वह सभी एक के बाद एक.. बोलते हैं... वाह... जेबात... गज़ब... मारडाला.. क्या कविता है... वेरी गुड... आय हाय.....।)
Black out…
Scene-3
सारे बच्चे सपना देखने की मुद्रा मे बैठे हैं....
भूमिका - शोर बहुत हो तो कुछ देर बाद शोर सुनाई नहीं देता... बहुत शोर में हम सब चुप हो जाते हैं... और तब सभी सपना देखते हैं। छोटे सपने... अभी इसी वक़्त के सपने... देखो सब अभी सपने में है... मैं भी... पर मैं इनके सपने जानती हूँ... सबके नहीं कुछ के... जैसे.. पीहू....
पीहू को हमेशा लगता है कि कुछ केमरे हैं जो उसे लगातार शूट कर रहे हैं... सालों से....। लंडन के ग्लोब थियेटर में उसके जीवन का लाईव टेलिकास्ट चल रहा है....। एक आदमी उसके पैदा होने के समय से उसके ऊपर फिल्म बना रहा है... और लगभग सौ लोग... लगातार उसकी यह फिल्म देख रहे हैं... सालों से..।
(तभी एक आदमी शेड़ो में दिखता है....जो फिल्म का डायरेक्टर है.... और वह फिल्म को अनाऊंस करता है....।)
डायरेक्टर-ladies and gentlemen.. it’s an honor to present you a film… a film which I believe is going to change the face of cinema… a film which I believe is going to redefine the word ‘cult’… yes ladies and gentlemen..put your hands together for my film… “peehu…”
(सभी ताली बजाते हैं.. पीहू.. पिशाब जाने का इशारा करती है.. पर शायद इशारा बदल गया है... वह आश्चर्य में है.. बाक़ी सारे बच्चे जो दर्शक बन गए है.. वह मूक तालीयाँ बजाने का इशारा करते हैं...।)
भूमिका- उसे लगता है कि वह लंदन की एक बहुत बड़ी अभिनेत्री है.. जबकि इस क्लास में वह महज़ “पीहू” है। यह सोनू है... इसे जहाँ काली चींटी दिखती है उसे वह मुँह में रख लेती है...। उसे लगता है कि जिस तरह उसके मुँह में यह काला चींटा चल रहा है... उसी तरह वह भी इस दुनियाँ के मुँह में चलती है...।
(तभी सोनू को चींटा काट लेता है...।)
इस चींटे ने उसे काटा....
सोनू- मैं इस दुनियाँ को कब काटती हूँ? जब मैं चलती हूँ.. ना.. दौड़ती हूँ.. ना.... ट्रेन एक्सीड़ेट... ना.... जब बंम फटता है तो हम दुनियाँ को काटते हैं.. और दुनियाँ हमे....
(सोनू चींटे को मार डालती है।)
भूमिका- यह नीतू है... इसे लगता है कि यह एक दिन अचानक मर जाएगी... तब लोग इसकी अहमियत समझेंगे....। कुछ लड़के जो इसे प्रेम करते हैं वह इसके प्रेम में आसूं बहाएगें....। स
लड़के- नीतू कभी कह नहीं पाया... उससे पहले ही तू मर गई.... यार आई लव यू नीतू.....।
उसकी दूशमन उससे माफ़ी मांगने के लिए तरसेगें...
दुशमन १-ऎ माफी मांग...।
दुश्मन २- अरे मर गई अब क्या माफी...
दुश्मन १- बोला ना माफी मांग...।
दुश्मन २- तेरे लिए....ज़
दोनों मिलकर- ऎ सॉरी यार... ।
भूमिका-टीचर्स उसे ग्रेट स्टूड़ंट कहेंगें...
टीचर- लाखों में एक थी हमारी नीतू बिटिया... अरे बहुत ही गज़ब की पढ़ाई करती थी... नीतू.. हम तो उसके पूरे खानदान को जानते थे.. गज़ब का खानदान था उसका.. बताओ मर गई।
उसकी मौत पर स्कूल बंद कर दिये जाएगें.. देश में छुट्टी का एलान होगा.. प्रधान मंत्री राष्ट्र्पति तक उसके लिए शोक सभा आयोजित करेंगें.... ।
नेता- नीतू हमारे देश का भविष्य थी... हाँ गौरव थी...।
और फिर वह एक दिन वापिस आ जाएगा..। उसके सारे दोस्त खुशी के मारे चिल्ला भी नहीं पाएगें.... और वह कहेगी...
नीतू- शू..शू...अब मैं आ गई हूं ना... बस..”
(और नीतू आशिर्वाद की मुद्रा में एक हाथ उठा देती है...तभी रोमा उठती है...।)
रोमा- अबे क्या था यह सब....????
भूमिका- ये रोमा है. इसे लगता है एक दिन bruce lee की आत्मा इसके अंदर आ जायेगी
(रोमा ब्रूसली की तरह बहुत तेज़ चिल्लाकर एक कराटे की मुद्रा बनाती है।)
और तब ये बद्ला लेगी, उस्से जिसने इसकी पेंसिल चोरी की थी, उस्से जिसने इसका boyfreind छीना था. उस्से जिसने उसकी शिक़ायत टीचर से की थी, असल मे वो सबसे बद्ला लेना चाहती थी।
भूमिका- ये पिंकी है, यह बापू को अपना सच्चा दोस्त मानती है.. क्योंकि क्लास में इससे और कोई बात ही नहीं करता...।
पिंकी- सारी बापू..... फिर लेट हो गई।
भूमिका- ये प्रत्युश है, भारत मे कवियों की बुरी हालत के चलते इसका कविता सुनाने का तरीका थोड़ा बदल गया है...
प्रत्युश- अबे उठो... कविता सुनों...
(सभी मना करते है कविता सुनाने से.... वह डॉली को इशारा करता है।)
डॉली- अबे चुपचाप कविता सुनों वरना एक रापटा दूंगी ना खीच करके...
नीतू- हाँ एक रापटा दूंगी ना खीच कर के.......।
प्रत्युश- फूल ने कहा खुशबू से.......
(सभी चिल्ला देते है... वाह!!! क्या बात है... प्रत्युश नाराज़ हो जाता है।)
प्रत्युश- अबे.. अभी शुरु भी नहीं किये थे हम.....
Scene-4
(द्रुपत तेज़ी से चलते हुए क्लास में आता हैं.... सारे बच्चे खड़े हो जाते हैं...। वह बैठने का इशारा करते हैं...।)
द्रुपद- इस कक्षा में.. यह कविता अव्वल आई है... पर उसने अपना नाम नहीं लिखा.... यह किसकी कविता है?
डॉली- सर प्रत्युश...
द्रुपद- तुमने लाल पेंसिल से लिखी थी कविता?
प्रत्युश- नहीं सर.. मैंने तो पेंन से लिखी थी कविता.. जैसा कि आपने कहा था....।
(द्रुपद सबसे पूछता है... पिंकी अपना हाथ उठा चुकी होती है.. पर कोई भी ध्यान नहीं देता... द्रुपद चिल्लाता है... सभी अपना सिर नीचे कर लेते हैं.... तब द्रुपद की निग़ाह पिंकी पर जाती है...। )
द्रुपद- ऎ क्या है.. फिर शू शू... जाओ जल्दी जाओ और जल्दी आना....। तो बताओ किसने लिखी है कविता????
पिंकी- सर यह कविता मैंने लिखी है....
द्रुपद- अच्छा मतलब यह पूरी कविता तुमने लिखी है...?
रोमा- सर झूठ बोल रही है...।
द्रुपद- जानता हूँ....अच्छा तो सुनाओ.. मैं देखता हूँ.. एक भी गलती हुई तो तुम्हारी खैर नहीं..... सुनाओ...
पिंकी- बस्ते में भर दूं यह किताबें...
मिट्टी से ढ़क दूं यह किताबें...
बंद करके रख दूं यह किताबें...
दिखने में छोटी हैं, पर पढ़ने में मोटी हैं...
काश कभी ऎसा हो जाए...
पन्नों पर बारिश गिर जाए..
टप-टप अक्षर बहते जाए...
मैं बूंद-बूंद रख लूंगी...
जब जी चाहे तैरुंगीं...
जब जी चाहे पी लूंगी...
(द्रुपद देखता रह जाता है। सभी बच्चे हैरान होते हैं.....)
रोमा- पिंकी... तू मेरी दोस्त बन जा यार....
(सभी उससे दोस्ती करना चाहते हैं.... प्रत्युश नाराज़ हो जाता है वह ज़बर्दस्ती अपनी कविता सुनाना लगता है..)
प्रत्युश- किताबों के मेले हैं.. फिर भी हम अकेले हैं... यूं एक भी किताब जीवन में नहीं है.. पर जीवन को देखो तो वह असल में एक किताब है....।
द्रुपद- तुम चुप रहो.. चुप.. एकदम चुप...।
(प्रत्युश चुप हो जाता है...)
डॉली- अबे बहुत लाऊड़ कर दिया यार...
द्रुपद- पिंकी यह कविता सच् में तुमने लिखी है? तुम्हारी माँ ने तो नहीं लिखी???
पिंकी- मेरी माँ को तो पता भी नहीं है...।
द्रुपद- तुम झूठ तो नहीं बोल रही हो...?
रोमा- सर!!!
द्रुपद- बहुत अच्छी कविता लिखी है तुमने.. सुनो अब कल ही तुम्हें अगली प्रतियोगिता के लिए दूसरी कविता लिखनी हैं....और उस प्रतियोगिता का विषय है... ’परिवार...’।
प्रत्युश- एक परिवार था... भूख थी, दर्द था संग यह विचार था....
(तभी प्रत्युश की निगाह द्रुपद पर पड़ती है.. और वह चुप हो जाता है.... )
डॉली- अबे इस बार कतई साफ्ट कर दिया यार..।
द्रुपद- पिंकी तुम लिखो.. परिवार.. ।
(..द्रुपद जाने लगता है।)
नंदु- सर आप रो रहे हैं.....
(द्रुपद कोई जवाब नहीं दे पाता और चला जाता है..।)
पिंकी- (रोमा से..) तू सच में मेरी दोस्त बनेगी????
(रोमा के साथ बाक़ी लोग भी हां बोलते हैं.. प्रत्युश और उसका गुट पिंकी के नए दोस्तों को धमकाने लगते हैं...। पर वह बहुत ज़्यादा है तो वह उनपर हावी हो जाते हैं... प्रत्यश हारने लगता है... तभी क्लास की घंटी बजती है... सभी चले जाते हैं... पिंकी क्लास में अकेली रह जाती है..)
पिंकी- बापू... मज़ा आ रहा है... हा-हा... बापू... यह सब मुझसे दोस्ती करना चाहते हैं... सभी... बापू कमाल हो गया.. कमाल....। यही तो चाहिए था मुझे.. हा-हा... बापू कमाल का गिफ्ट दिया है आपने मुझे यह “लाल पेंसिल...”। यह झूठ है मैं जानती हूँ... बस अब नहीं लिखूंगी.. जो चाहिए था वह मिल गया.. मैं इस पेंसिल को चपरासी को दे दूंगी... और माँ को सब सच-सच बता दूंगी......promise..
(तभी प्रत्युश.. अंदर आता है)
प्रत्युश- ए पिंकी..... क्या सच सच बता देगी.
(पिंकी डर जाती है।)
प्रत्युश- किससे बात कर रही थी....?
पिंकी- बापू से....
प्रत्युश- हा..हा हा.... बापू से...? अरे बापू तो सिर्फ फोटो में हैं सही में थोड़ी है.. वह तो कब के मर चुके.. इतिहास नहीं पढ़ा तूने...?
पिंकी- पढ़ा है...।
प्रत्युश- सुन... मैं तेरा पक्का दोस्त हूँ... हे ना...?
पिंकी- पहले भी तूने बोला था कि तू पक्का दोस्त है... पर तूने मेरी शिक़ायत कर दी थी सर से... कितनी पिटाई हुई थी।
प्रत्युश- अरे तब तो मैं छोटा था बहुत... पक्के दोस्त का मतलब थोड़ी पता था मुझे तब...। जो पक्का दोस्त होता है वह कभी किसी को कुछ नहीं बताता....।
पिंकी- तू सच में मेरा पक्का दोस्त है...?
प्रत्युश- हाँ पागल.. झूठ थोड़ी बोल रहा हूँ मैं....।
पिंकी- तो चल साथ में लंच करते हैं...।
प्रत्युश- अरे नहीं...
पिंकी- नहीं...
प्रत्युश- अच्छा ठीक है एक शर्त पर.. पहले बता कि यह कविता किसने लिखी है...?
पिंकी- मैंने लिखी है...
(पिंकी डर जाती है...)
प्रत्युश- अरे चल.. बोल किसने लिखी है कविता...
पिंकी- मैने लिखी है....
(पिंकी भाग जाती है डर के मारे...)
प्रत्युश- अरे सुन.. सुन .. पिंकी... अरे सच्चे दोस्त को ऎसे छोड़कर जाते हैं क्या? पागल... क्या बापू.. अब आपको भी पता चल गया ना कि इसने कविता नहीं लिखी है.. झूठ बोल रही है.. हे ना...।
(सभी चिल्लाते हैं... ’ऎ..’ प्रत्युश के मुँह से डर के मारे ’बापू’ निकलता है...)
Black out…
Scene-5
(चपरासी भीतर आता है और वह पिंकी को देखता है.. वह उसे आवाज़ लगता है.. पिंकी उछलती कूदती भीतर आती है...।)
चपरासी-ऎ पिंकी... इधर आ... वाह!! वाह!! क्या बात है बहुत चहक रही है आज...?
पिंकी- आज का दिन जादूई था अंकल.. एक दिन में सब कुछ उलट पलट हो गया।
चपरासी-अरे क्या पलट गया.?
पिंकी- कुछ नहीं पलटा अंकल.. पूरी क्लास को मेरा नाम पता चल गया.. मेरे बहुत सारे दोस्त बन गए... मैं अपनी क्लास में फेमस हो गई...।
चपरासी-यह सब कैसे हो गया...??
पिंकी- असल में यह लाल पेंसिल ने...... नहीं.. नहीं... मैंने.. मैंने एक कविता लिखी थी जो क्लास में प्रथम आई.....।
चपरासी-तुम कविताए भी लिख लेती हो???
पिंकी- ऎसे ही कभी कभी अपने विचारों को.... आआअ... ओह हो छोडो....।
चपरासी-अब तो तुम प्रथम आई हो.. तो कभी-कभी क्यों.. हर कभी लिखा करो।
पिंकी- नहीं.. नहीं.... मुझे ना यह पेंसिल पड़ी मिली थी... आप इसे कहीं फेंक देना...।
चपरासी-ठीक है फेंक दूंगा...
(चपरासी पेंसिल लेता है और जाने लगता है.... पिंकी उसे रोकती है।)
पिंकी- अंकल रुको...
(वह पेंसिल लेती है.. उसे कुछ देर देखती है... फिर वापिस चपरासी को दे देती है..।)
पिंकी- ले लो.. और इसे दूर फेंक देना.. बहुत दूर.. एकदम दूर... ठीक है..
चपरासी-ठीक है .. फेंक देता हूँ.....
(चपरासी जाने लगता है... पिंकी फिर उसको रोकती है...।)
चपरासी-अरे मेरी माँ फेंक दूंगा बहुत दूर... पर तू कम से कम.. वह कविता ही सुना दे जो प्रथम आई है..।
पिंकी- अरे अभी नहीं.. अभी टाईम नहीं है.. अभी मैं बहुत खुश हूँ... हा.. हा....
(पिंकी चली जाती है। चपरासी कुछ देर लाल पेंसिल को देखता रहता है...।)
Black out…
Scene-6
(माँ पिंकी के कमरे में पूजा कर रही है... पिंकी अंदर आती है...।)
पिंकी- अरे माँ आप मेरे कमरे में यह क्या कर रहे हो...?
माँ- यही तो वह कमरा है.. जहाँ मैंने तुम्हें कविता लिखना सिखाया था...।
पिंकी- अरे माँ आपको कैसे पता...?
माँ- अरे सब पता है मुझे.. तू बैठ इधर... बैठ.. आँखें बंद.. हाथ जोड़... हे भगवान... कितने बड़े-बड़े शब्द.. कितना दिमाग़ खर्च हुआ होगा इसका.. कितनी सुंदर कविता लिखी है मेरी बेटी ने....
पिंकी- माँ... मैं आपसे एक बात कहना चाहती हूँ.. असल में मैंने वह कविता नहीं लिखी है..।
माँ- हे भगवान... देखो.. हर बड़ा कवि यही कहता है.. कि कविता मैंने नहीं लिखी है... वह तो बस लिखा गई..।
पिंकी- माँ आप मेरी बात समझ नहीं रहे हो।
माँ- अरे भगवान क्या मैं इसकी hand writing नहीं पहचानती हूँ...।
पिंकी- माँ वही तो... मैंने ही वह कविता लिखी है.. पर असल में.. नहीं लिखी है..।
माँ- अरे तेरे हिंदी के टीचर आए थे..
पिंकी- कौन द्रुपद सर...
माँ- हाँ.. कितने खुश थे वह.. लेकर आए थे तेरे हाथ की लिखी कविता अपने साथ.. बाप रे मैं तो विश्वास ही नहीं कर पाई...
पिंकी- पर माँ.. असल में...
माँ- चल तू यह प्रसाद खा...
पिंकी- माँ.. एक बहुत बड़ी समस्या है... मुझे ना.. एक कविता और लिखनी है....
माँ- क्या???? सच में.... रुक मैं तेरे लिये गर्म दूध लेकर आती हूँ...।
पिंकी- अरे माँ सुनो तो.. मैं कविता नहीं लिख सकती....।
(माँ नहीं सुनती है... वह चली जाती है)
पिंकी- हे भगवान क्या लिखूं मैं.... ऊफ... हाँ.. आआआ... सोमवार.. मंगलवार.. बुधवार... गुरुवार.... परिवार......
(पीछॆ मास्क पहने द्रुपद, प्रत्युश, डॉली, मॉ और नीतू दिखते हैं। वह धीरे धीरे पिंकी की तरफ बढ़ते हैं...।)
प्रत्युश – कविता लिखने बैठी हैं पिंकी जी
डॉली- चलिये हम भी देख्ते है कैसे लिखती है कविता
नीतू –अरे उसे ध्यान लगाने दो
द्रुपद- अरे चुप, पिंकी बेटा लिखो कविता, मैं भी नहीं लिख पाया था ऐसी महान कविता
प्रत्युश- तूने ही लिखी थी ना कविता पिंकी?
डॉली – अरे अभी देख फिर लिखेगी
नीतू – एक कवि लिख रहा है और हम उसे देख रहे है.
मॉ- पिंकी बेटा कविता लिखना सिखाय था ना मैंने याद है ना.
द्रुपद – प्रिन्सिपल साब कितने खुश है तुमसे....वाह!!!!
प्रत्युश – क्या हुआ कुछ लिखा क्या????
डॉली- लिख रही है.... लिख रही है।
द्रुपद- अरे चुप... उसे लिखने दो
मॉ – कैसे कवि जैसे दिखने लगी है
नीतू – लिख लिया।
डॉली – चलो कुछ तो लिखा....
प्रत्युश – सुनाओ
डॉली – सुनाओ
नीतू – सुनाओ
मॉ – सुनाओ
द्रुपद – सुनाओ पिंकी, अपनी महान कविता सुनाओ..
(पिंकी पढ़ना चालू करती है... )
पिंकी- एक था परिवार...... पापा नहीं थे सोमवार... मम्मी थी मंगलवार... बुध को हुई मैं बीमार...
(इसपर सभी हंसने लगते हैं.....।)
प्रत्युश – अबे अख़बार पढ़ रही है क्या पिंकी?
नीतू- अरे इसे तो कविता लिखना ही नही आता...
(द्रुपद लाल पेन्सिल उठाता है)
द्रुपद – ये क्या है पिंकी
पिंकी – लाल पेन्सिल, यह तो चपरासी के पास थी.. उसने तो इसे बहुत दूर फेंक दिया था.. फिर यह यहाँ कैसे आ गई.. और ये इतनी बडी कैसे हो गयी?
(पिंकी पलटती है।)
माँ– ले ले... ले ले.... लिख ले
डॉली- हां हां ले ले वरना कुछ भी नही लिखायेगा
पिंकी- मुझे नहीं लिखना इस लाल पेंसिल से...
माँ- तो कैसे लिखेगी कविता...?
पिंकी- मैं नहीं लिखूंगी कविता..।
डॉली- तो सब दोस्त.. दुश्मन हो जाएगें.... सब तेरा नाम भूल जाएगें।
पिंकी- मुझे लाल पेंसिल से डर लग रहा है।
माँ- जब जब यह लाल पेंसिल कविता लिखेगी...
डॉली- तब तब यह बड़ी होती जाएगी....।
माँ- यह तेरी दोस्त है...।
डॉली- सच्ची दोस्त....
सभी- यह ले...
पिंकी- आआआआआआआअ....
(इसमें द्रुपद के हाथ में बड़ी हो चुकी लाल पेंसिल है जिसे वह उछालता रहता है.... और नीतू और प्रत्युश को उसे एक चक्कर में घुमाते रहते हैं। पिंकी अंत में चिल्लाकर बिस्तर में अपना चहरा डर के मारे छुपा लेती है।)
Black out…
Scene-7
सारे बच्चे अलग अलग count पर उठते हैं मानों सर ने उन्हें उठाया है या वह कुछ पूछने के लिए उठे हैं...। यह सब पपेट की तरह होता है... फिर अचानक उन्हें समझ में आता है कि वह पपेट हैं.... उनके दोनों हाथ बिना उनकी इच्छा के उठ जाते हैं... वह उस धागे को देखते हैं जिसके ज़रिये उनके हाथ जुड़े हुए हैं.. वह उस धागे को छू कर देखते हैं... फिर सभी अपने दोनों हाथ ऊपर उठाते हैं और अपने से जुड़े सभी धागों को तोड़ देते हैं...। धागे टूटते ही वह सारे बच्चे गिर जाते हैं.... फिर अचानक उठते हैं.. और कंधे उचकाते हुए... हंसते हुए अपनी नई मिली आज़ादी का मज़ा लेते हैं.. तभी वह सभी एक दूसरे से टकराते हैं.... तो उन्हें पता चलता है कि वह अकेले नहीं है... वह डर जाते हैं.. और अपने हाथ फैलाकर एक दूसरे के करीब आने लगते हैं... करीब आते-आते वह एक दूसरे से चिपक जाते हैं.. इतने एक दूसरे से चिपक जाते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है.. वह सभी चीख़ मारकर एक दूसरे से अलग होते हैं..... और वापिस पपेट बनकर.. फिर से वही खेल शुरु करते है कि मानों उन्हें कोई उठा रहा है.. या वह कुछ पूछ रहे हैं...। तभी द्रुपद क्लास में आता है.. सभी अपने काऊट पर ऊपर नीचे होते रहते हैं..।)
द्रुपद- पिंकी... तुम कविता लाई... प्रिंसिपल सर मंगा रहे हैं।
पिंकी- नहीं सर मैंने कविता नहीं लिखी है।
द्रुपद- क्या तुमने कविता नहीं लिखी.. क्यों.. अरे आज जमा करनी है कविता...
(पिंकी कुछ भी नहीं बोलती है.... द्रुपद पूछता रहता है...)
द्रपद- बंद करो यह... बंद करो...। चलो जाओ..क्लास ख़त्म... जाओ...
(द्रुपद सभी बच्चों को भगा देता है...। पिंकी को रुकने के लिए कहता है..।)
नंदु- सर पर हमारी पीटी की क्लास थी..
रोमा- सर एक ही तो क्लास होती है हमारी पीटी की...
द्रुपद- अरे कभी तुमने निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध को पी.टी. करते हुए देखा है। है!!! कवि हैं वह लोग... । एक कवि लिख नहीं पा रहा है और तुम लोग उससे पी.टी. करवा रहे हो। बेटा पिंकी तुम्हें नहीं मैं तो इन लोगों को डांट रहा हूँ...।(फिर डांटना चालू करता है।) मैंने कभी पी.टी. नहीं की लाईफ मे..... (कुछ बच्चे हंसने लगते हैं।) कौन हंसा... कौन हंसा...। मैं कवि नहीं हो पाया पर मेरे अंदर कवि का दिल है.....। चलो जाओ यहाँ से.. चलो...।
(सभी चले जाते हैं।)
द्रुपद- क्यों नहीं लिखी कविता.. आज जमा करनी है। प्रिंसपल साहब कितने खुश हैं मुझसे... मतलब तुमसे भी... आज कैसे भी कविता लिखनी है... तुम यहीं क्लास में बैठो.. कोई तुम्हें तंग करने नहीं आएगा... आराम से कविता लिखो...ठीक है..।
पिंकी- पर सर.. मुझे कविता लिखनी नहीं आती है.... बहुत मुश्किल काम है...।
द्रुपद- आसान होता तो मैं क्या सबसे बड़ी प्रतियोगिता में पैंतिस्वें स्थान पर आता?... लिखों.... मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा इंतज़ार करता हूँ.... जैसे ही कविता खत्म हो जाए मुझे आवाज़ लगा देना... मैं तुरंत अंदर आ जाऊंगा.. आराम से बैठकर कविता लिखो... ठीक है... मैं बाहर हूँ....
(द्रुपद चला जाता है.. पिंकी अकेली बैठी रहती है...। उसे समझ में नहीं आता कि कैसे लिखे...। तभी बाहर से लुड़कती हुई लाल पेंसिल भीतर आती है...। पिंकी डर जाती है....। वह उसे उठाती है... अपनी डेस्क पर आती है और लाल पेंसिल से लिखना शुरु करती है..... तेज़-तेज़...। पिंकी लिखते लिखते थक जाती है और बेहोश हो जाती है। कुछ वक़्फे के बाद... रोमा कहती है ’पिंकी..’ और उठकर पिंकी के बगल में बैठ जाती है.... फिर सोनू, पीहु और भूमिका भी आकर पिंकी के बगल में बैठ जाते हैं...।)
प्रत्युश- तो भईया फिर एक सपना शुरु होता है...
नंदू- किसका सपना?
डॉली- अरे यार प्रत्युश... बोला था इसे अपनी टीम में नहीं लेते हैं...
नंदू- अच्छा मैं समझ गया.. पिंकी का... फिर..
प्रत्युश- हाँ फिर... पिंकी के सपने में.....
नंदू- बापू आए... हे ना..
डॉली- अरे यार... इसके सिक्के में चव्वनी कम है..।
नीतू- सुन.. बापू नहीं आए.. एक बूढ़ा आदमी आया.. जो बापू के जैसा दिखता था... ठीक है..।
प्रत्युश- तुम्हीं सब बोल दो.... बोलो?
डॉली- सॉरी भाई.. बोलो..
प्रत्युश- तो... बापू... एक नदी के किनारे बैठे हुए थे।
डॉली- कवि है यार तू... मैं भी बोलू.. तभी उन्हें एक नाव दिखी.. लाल रंग की नाव..
नीतू- मैं भी बोलू... जिसमें एक लड़की बेहोश पड़ी हुई थी.... कैसा है यह...?
नंदू- हट... यह तो पिंकी है.... सो रही है क्या?
डॉली- अरे यह पिंकी है.. लाल रंग की नाव वाली....।
नंदू- अच्छा!! यह पिंकी है लाल रंग की नाव वाली तो... मैं नदी किनारे बैठा हूँ...।
(नंदू उठकर आगे बैठ जाता है।)
सभी- अबे तू....।
(रोमा अचानक नंदू को बापू कहने लगती है.. नंदू चौंक पड़ता है..।)
रोमा- बापू...
नंदू- हें.... मैं.....
रोमा- बापू...
नंदू- बोलो बेटी क्या बात है??
(नंदू को हंसी आ जाती है... । पीछे से डॉली, नीतू और प्रत्युश भी हंसने लगते हैं..।)
रोमा- बापू यह तो सब उल्टा हो गया...
नंदू- मुझे तो सब सीधा दिख रहा है...
(नंदू को फिर हंसी आ जाती है... पर तब तक वह बापू के बैठने की मुद्रा बना चुका होता है।)
सोनू- बापू... बापू..
नंदू- क्या है..?
(नंदू.. बापू हो जाता है।)
सोनू- बापू सीधा कुछ भी नहीं है... बहुत टेंशन है.. वह द्रुपद बाहर दरवाज़े पर खड़ा है कविता के लिए.. और यह पेंसिल है कि मेरे हाथ से छूट ही नहीं रही हैं....।
नंदू- तो कविता तो लिख दी ना तुमने...
पीहु- बापू सभी लिखवाना चाहते हैं मुझसे .. माफी.. मैंने आपका promise तोड़ दिया.. पर सच में मैं नहीं लिखना चाहती थी....।
नंदू- नहीं.. जो तुम चाहती थी.. वही हुआ है..।
भूमिका- मैं सब बदल दूंगी..।
नंदू- तो बदल दो..
रोमा- मैं इस पेंसिल को जला दूंगी... तोड़ डालूंगी... कहीं गाड़ कर आ जाऊंगी...।
नंदू- तुम्हें तो सब पता है.. तो कर दो...
सोनू- कर दू ना बापू???
नंदू- जो सही लगे वही करो...।
पीहु- यही सही है बापू.. मैं यही करुंगी...।
(इसी बीच पीछे गांधी का शेड़ो उभर आता है... डॉली प्रत्युश और नीतू... घबराकर नंदू के पास खिसक आते हैं... डॉली नंदू को एक चपत लगाती है...।)
डॉली- अबे नंदू.. क्या कर रहा था बे...
प्रत्युश- हाँ बे... डरा दिया तूने बे...
नीतू- अबे यह पिंकी का सपना है तू क्यों इतना सीरियस हो रहा है..।
(नंदू की कुछ समझ में नहीं आता कि उसे क्या हुआ था... तभी बाहर से द्रुपद की आवाज़ आती है.. पिंकी झटके से उठती है.. और सपना टूट जाता है.. सभी अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं...।)
द्रुपद – पिंकी बेटा कविता लिख ली? पिंकी? मैं अंदर आ जाऊं...??
(पिंकी झटके से उठती है.. वह उस बड़ी सी पेंसिल को अपने हाथ में लेती है.. कुछ फैसला करके.. अपनी कविता को वहीं छोड़कर चली जाती है... द्रुपद भीतर आता है।)
द्रुपद- वाह यही हैं बडे कवि के लक्षण, कविता खतम हुई और कवि निकल लिया, वाह क्या कविता लिखी है..वाह वाह…
बच्चे – सर, आप रो रहे है?
द्रुपद – कौन है ?
(द्रुपद वापिस कविता पढ़ने लगता है......)
Black out….
Scene-8
डॉली – प्रत्युश यार.. तू जो कविता लिखता है ना.. बहुत सही है….मेरी समझ में ज्यादा नहीं आती…पर दिल को छूती जाती है!
नीतू – अरे निराला जी की कविता किसको समझ में आती है..पर वो फेमस है ना..
डॉली – निराला….भवानी प्रसाद मिश्र , मुक्तिबोध और फिर अपना प्रत्युश… कवि है यार तू..
प्रत्युश – अरे छोडो यार जाने दो..
नीतू – अरे नही यार, वो कल की छोकरी, सही नही है, दाल में कु्छ काला है…
(तभी तीन लड़कीयां खड़ी होती है.. तीनों पिंकी की भूमिका में हैं....)
डॉली- हॉ यार वो कैसे लिख सकती है..
प्रत्युश- वो किसी से लिखवाती है मैं कह रहा हूँ ना....
(तीनों पिंकी अलग अलग... पूछती है तीनों से... फिर तीनों अपनी अपनी पिंकी से संवाद करते हैं)
पिंकी – क्या कहा? (प्रत्युश से...)
पिंकी2- क्या कहा? (डॉली से..)
पिंकी3- क्या कहा? (नीतू से..)
प्रत्युश – आज पता कर ही लेते हैं..क्यों पिंकी जी, लिख ली कविता, कहां, किस्से लिखवाई?
नीतू- हाँ बोलो कव्यत्री...???
डॉली- आजकल तो कोई भी कविताएं लिख लेता है.. क्यों? बहुत कविताए लिख रही हो पिंकी जी...।
(तभी बीच में बैठा नंदू... बड़ी सी लाल पेंसिल उठाता है और पूछता है।)
नंदू– ए ये लाल पेन्सिल किसकी है?
(तीनों पिंकी चीखती हैं! और दूर जाकर बैठ जाती है... उनकी चीख़ सुनकर प्रत्युश, डॉली और नीतू भी अलग अलग जगह छुप जाते हैं।)
नंदू- क्या हुआ यार...क्या हुआ...???
डॉली- चुप कर...
(भूमिका और रोमा अचानक खड़े हो जाते हैं.. जो इस चीख़ के बाद जानना चाहते हैं कि क्या हो रहा है...?)
पिंकी- यह पेंसिल तो पीछे ही पड़ गई है..
पिंकी२- यह तो मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही है...
(वक़्फा....)
रोमा- ओ तेरी क्या हुआ बे?
भूमिका- कुछ समझ में नहीं आया यार.. ओए छोटू... ओए छोटू.
नंदू- मेरा नाम छोटू नहीं है...
रोमा- अबे.. बता ना क्या हुआ बे...
नंदू- मुझे नहीं पता यार.. ।
पिंकी- ऎ.. यह लाल पेंसिल यहाँ कैसे आई...??
पिंकी2- तुम तो इसे जलाने वाली थी ना...?
पिंकी3- हाँ.. मैंने इसे जला दिया था...।
रोमा- फिर...
भूमिका- फिर...
पिंकी3- जली नहीं...
पिंखी2- हाँ यार जली नहीं...
रोमा- फिर क्या हुआ..
भूमिका- फिर क्या हुआ..
पिंकी2- तोड़ा-मरोड़ा...
पिंखी3- टूटी नहीं इसे कुछ भी नहीं हुआ....
रोमा- तो फिर क्या हुआ...
भूमिका- तो फिर क्या हुआ...
पिंकी- गाड़ दिया था...
पिंकी2- हाँ.. गहरा गढ़ा खोदकर...
पिंकी3- नीचे बहुत नीचे दबा दिया था।
पिंकी- ऎ!! यह पेंसिल तुम्हारे पास कैसे आई...।
नंदु- अरे मुझे क्या पता मुझे तो पड़ी मिली थी...
(और नंदु पेंसिल को अपने सामने पटक देता है...।)
डॉली- प्रत्युश भाई..प्रत्युश भाई...
प्रत्यश- अबे बहुत टेंशन है छुपे रह...।
डॉली- मैं तो कह रही थी.. लाल पेंसिल को लपक लो...
प्रत्युश- हाँ सही है.. उठा लेते हैं.... सुन तू उठा ले लाल पेंसिल...
डॉली- ना. ना.. मैं नहीं.. ओए नीतू.... तू जा... उठा ले..
नीतू- ना.. मैं तो ऎसी चीज़ो को हाथ भी नहीं लगाती..।
प्रत्युश- अरे डरपोक हो तुम दोनों..
डॉली- अरे तो प्रत्युश.. तू ही उठा ले ना....
नीतू- हाँ आप ही उठा लो....
(प्रत्युश, नीतू और डॉली.. तीनो पेंसिल उठाने जाते हैं... जैसे ही पेंसिल के पास पहुंचते हैं... नंदू चीख़ देता है.. वह तीनों भी डर के मारे वापिस छुप जाते हैं।)
नंदू- आआआआआआ.. अरे वह हिली थी. हिली थी...।
(नंदू भागकर पीछे चला जाता है...।)
प्रत्युश- अबे बहुत डॆंजर है बे.. बाद में देखते हैं.. अभी निकलो यहाँ से... और तुझे तो बाद में देख लूंगा पिंकी... समझी...।
डॉली- हाँ बाद में देख लेंगे...
नीतू- हाँ.. बाद में देख लेंगे....।
(तीनों चले जाते हैं... भूमिका और रोमा... पेंसिल की तरफ देखते हैं.. और धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ना चालू करते हैं.... जैसे ही पेंसिल के पास पहुंचते हैं.... उन्हें पेंसिल हिलती हुई दिखती है दोनों चीख़ मारकर पीछे भाग जाते हैं...।)
भूमिका- वह हिली थी. वह हिली थी....।
रोमा- हाँ... मैंने देखा.. वह हिली थी...।
(अब सिर्फ तीनों पिंकी बचते हैं... और बीच में बड़ी सी लाल पेंसिल रखी होती है...। तीनों पिंकी धीरे-धीरे उठती है.... पिंकी धीरे से पेंसिल की तरफ जाती है उसे उठाती है.. और वह पेंसिल उसे नचाना चालू करती है.. पीछे दोनों पिंकी भी काल्पनिक पेंसिल को लिए झटके खाती रहती है...।)
Black out…
Scene-9
(पीछे शेड़ो में बहुत बड़ी लाल पेंसिल दिखयी देती है.... और वह बोलने लगती है... दूसरी तरफ शेड़ो में पिंकी के अलग-अलग डरे हुए शेड़ो बदलते रहते हैं..)
लाल पेंसिल-हेलो पिंकी कैसी हो??? तुम्हें मज़ा आ रहा है ना...।
(पिंकी की चीखने की आवाज़ आती है...)
लाल पेंसिल-डरो मत पिंकी... मैं तुम्हारी ही इच्छा हूँ तुम्हारी desire.. तुम्हारी चाह.. देखों तुम्हारे साथ-साथ मैं भी कितनी बड़ी होती जा रही हूँ....।इतनी आसानी से तुम मुझसे छुटकारा नहीं पा सकती... यह तो अभी शुरुआत है पिंकी.. तुम तो बस ऎश करो.. और देखो मैं कैसे तुम्हें ऎश करवाती हूँ....।
(लाल पेंसिल अचानक पिंकी की तरफ बढ़ने लगती है... पिंकी का शेड़ो डर के मारे गायब हो जाता है।)
Black out…
Scene-10
(down stage.. एक तरफ एक जूता लटका हुआ है..। सारे बच्चे पूरे नाटक में सिर्फ एक ही जूता पहने हुए हैं.... एक पेर खाली है..।..। सारे बच्चे पीछे लेटे हुए है..। सभी अपना सिर उठाते हैं एक साथ... जूते को देखते हैं....)
सोनू- यह खेल क्या है?
नंदू- इसके नियम किसने बनाए हैं?
भूमिका-क्या हम सब किसी एक ही आदमी के लिए खलते हैं?
पीहु- जो लगातार जीत रहा होता है?
नीतू- वह जीता कर करता क्या है?
रोमा- फिर वह वापिस हमारे जैसा क्यों दिखना चाहता है?
प्रत्युश- अगर हमें पूरी ज़िदग़ी एक ही जूता पहनना है तो हमें दूसरे जूते का सपना क्यों आता है?
डॉली- अबे तो खेलना ज़रुरी है क्या....?
सभी- हाँ....।
(...रेंगते हुए.. उस जूते की तरफ जाते हैं... सभी एक दूसरे को खींचते है.. और आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं.....। इसमें ’संघर्ष जीतने का’ बहुत ज़रुरी है..। जो भी कोई पहले जूते को छू लेता है वह जीत जाता है.. वह उस जूते को निकालता है... सभी चुप-चाप उसे देखते हैं..। और तभी अचानक पूरा दृश्य स्लो-मोशन में बदल जाता है... जीता हुआ व्यक्ति स्टेज के एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ, अपनी जीत का जश्न मनाता हुआ बढ़ता है...। बाक़ी जो हार चुके हैं वह ज़मीन पर पड़े रोने लगते हैं... यह सब कुछ बहुत ही धीमी गति में होता है.. वह कोसते हैं.. अपने एक पैर को जिसमें एक जूता नहीं है.. भगवान को, खुद को....। वह जो जीता है.. वह स्टेज के दूसरी तरफ पहुंचता है और वहा से एक छुपाया हुआ बेग़ निकालता है जिसमें बहुत सारे एक पैर के जूते रखे हैं..... वह उस बेग़ में एक और जीता हुआ जूता डाल देता है...। बाक़ी बच्चे... बार बार कभी अपने एक पैर को, जिसमें जूता नहीं है.. और कभी उस बेग़ को देखते हैं जिसमें जूते ही जूते हैं...। तभी द्रुपद भीतर प्रवेश करता है..। सारे लोग अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं।)
द्रुपद- आप लोगों को जानकर बहुत खुशी होगी कि पूरे स्कूल में मेरी कक्षा की पिंकी प्रथम आई है.... आ जाओ पिंकी... अंदर आ जाओ...।
(पिंकी के गले में मेड़िल है.. पीछे बड़ी सी पेंसिल फसी हुई है.. वह झुकी हुई चल रही है।)
द्रुपद- अरे खड़े हो....।
(सभी खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं... पिंकी पीछे अपनी जगह बैठने जाती है... द्रुपद उसे आगे बैठने को कहते हैं।)
द्रुपद- अरे पीछे कहाँ पिंकी तुम्हारी जगह अब यहाँ है.. तुम यहाँ बैठोगी अब से....। (प्रत्युश से....)चलों तुम पीछे जाओ... आओ पिंकी...। अब जो सारे स्कूलो के बीच जो प्रतियोगिता होगी वह बहुत कठिन है... बहुत बड़े कवी डॉ. रमेश उसे जज करने आने वाले हैं.... मैं खुद उस प्रतियोगिता में तीस्वें स्थान पर आया था...
नंदु- सर पिछली बार तो आप चालीस्वें स्थान पर आए थे...?
द्रुपद- चुप... तो मैं खुद इस प्रतियोगिता में अठाईस्वें स्थान पर आया था। पूरे शहर के सारे स्टूड़ेन्ड... इसमें भाग लेते हैं... विषय भी उसी वक़्त मिलता है.. पिंकी इसमें तुम जीत सकती हो... इस कविता को पढ़्ने के बाद् मुझे लगा कि सच में तुम जीत सकती हो....सुनो.. पिंकी की कविता...
परियों के भी लोक से सुन्दर, छोटा सा प्यारा मेरा घर
सपने जो भी रहते मेरे, कुछ सीधे कुछ टेड़े-मेड़े
हर रात मेरी आँखों से चुराकर, अपनी आँखों में बंद कर लेते
पापा मेरे, उन सारे सपनों को, सोने का बनाकर वापस कर देते
बिठा के काँधे पे मुझको, वो आसमान की सैर कराते
चलते चलते जब थक जाऊं, झट से वो घोडा बन जाते
माँ तो मेरी, थाली में हर दिन मेरी खुशियाँ लाती है
जितने भी निवाले खा लूँ मैं, भूख बढती ही जाती है...
(जब द्रुपद इसे पढ़ता है तो धीरे-धीरे लाईट जाती है और पीछे ख़ड़ी उसकी माँ पर लाईट आती है....। माँ भी चुपचाप कविता सुनती है.. द्रुपद कविता खत्म करता है....)
माँ- पापा घोड़ा बन जाते??? पिंकी... यह तो झूठ है...। तुमने झूठ लिखा है?
(माँ पर से लाईट जाती है... सिर्फ पिंकी पर लाईट रह जाती है... वह बापू को देखती है... बापू की तस्वीर पर लाईट आती है।)
पिंकी- बापू... मुझे कुछ नहीं चाहिए.. मैं बस सोना चाहती हूँ....। इस झूठ ने मेरी नींद उड़ा दी है... बापू... लाल पेंसिल मेरा पीछा नहीं छोड़ रही है.. जहाँ जाती हूँ वहां पहुंच जाती है...। मैं क्या करुं...??? मुझे बहुत डर लग रहा है.. मुझे नहीं चाहिए यह सब... मुझे कुछ भी नहीं चाहिए.....।
द्रुपद- पिंकी..पिंकी.. अरे कहां जा रही हो.. पिंकी..
(द्रुपद पिंकी के पीछे जाता है... सभी पहले द्रुपद को देखते हैं फिर पिंकी जिस मेडिल को फेंक कर चली गई है.. उसे देखते है... धीरे-धीरे लेटते हैं... इसी बीच प्रत्युश, डॉली और नीतू... पिंकी के पीछे भाग लेते हैं। बाकी लोग वापिस से competition शुरु करते हैं...। चपरासी आकर घंटी बजाता है।)
Black out..
Scene-11
(पिंकी अकेली बैठी है.. पीछे से चपरासी बहुत से... पेपर लेकर आता है और बिछाने लगता है। उसकी निग़ाह पिंकी पर पड़ती है।)
चपरासी-अरे पिंकी घर नहीं गई तुम अभी तक...?
पिंकी- ना...
चपरासी-क्यों स्कूल में ही सोना है क्या..?
पिंकी- अंकल मैं कई रातों से सोई नहीं हूँ...
चपरासी-कवि कोई गहरी कविता तो नहीं सोच रहा है..? अरे तेरा खुशी का टाईम खत्म हो गया है क्या? चल कोई कविता ही सुना दे अपनी....?
पिंकी- कविता नहीं अंकल समस्या है.. मेरी एक दोस्त बहुत समस्या में है.. वह असल में मेरी बेस्ट फ्रेंड है... उसने ना एक झूठ बोला...
(इसी बीच प्रत्युश, डॉली और नीतू.. पीछे से छुपते हए आते हैं .. और छुपे रहते हैं।)
चपरासी-क्या झूठ...
पिंकी- वह जाने दो..
चपरासी-फिर क्या हुआ?
पिंकी- फिर वह ना.. उस झूठ में बुरी फस गई..
चपरासी-कैसे?
पिंकी- लोग उस झूठ को सच मानने लगे.. जब की वह कहना चाहती है अब कि.. वह झूठ था... पर उसका सच कोई सुनने को ही तैयार नहीं...
चपरासी-मतलब जो झूठ था वह सच हो गया है.. और अब जो सच है.. वह झूठ हो रहा है...यह तो बहुत बड़ी समस्या है..।
पिंकी- झूठ अब बहुत बड़ा हो गया है... और भारी भी...अब बताओ मेरी बेस्ट फ्रेंड को क्या करना चाहिए..
चपरासी-तुम्हारी बस्ट फ्रेंड का नाम पिंकी है क्या..?
पिंकी- अंकल...
चपरासी-अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था...मेरे ख़्याल से तुम्हारी दोस्त को...
पिंकी- हाँ मेरी दोस्त को क्या???
चपरासी-मेरे ख़्याल से तुम्हारी दोस्त को अपने किसी पक्के दोस्त के साथ चाय पीनी चाहिए।
पिंकी- चाय...?
चपरासी-हाँ चाय.. कौन है तुम्हारी दोस्त का पक्का दोस्त..?
पिंकी- उसका.. तो... कोई दोस्त नहीं है..
चपरासी-अरे कोई तो होगा..
पिंकी- बस एक बापू हैं...
चपरासी-किसका बापू...?
पिंकी- अरे बापू.. अंकल आपने इतिहास नहीं पढ़ा...?
चपरासी-अरे बस तो आराम से बापू को बिठा और उनके साथ चाय पी... सब सही होगा..।
(चपरासी चला जाता है.. वह बापू से बात करने को होती है कि एक कागज़ उसे आकर लगता है... फिर दूसरा .. फिर तीसरा...।)
प्रत्युश- अब फसी है अकेली...
डॉली- अब नहीं छोड़ेगें बेटा...।
नीतू- अब सब सच-सच बोलना पड़ेगा..।
प्रत्युश- बता किसने लिखी है कविता..?
नीतू- तेरे बस की तो है नहीं...
डॉली- अरे बोल..
प्रत्युश- पापा लिखते हैं?
डॉली- अरे मम्मी से लिखवाती होगी...
नीतू- जब तक बोलेगी नहीं.. तब तक नहीं छोड़एगे तेरेको...।
सभी- बोल.. बोल... बोल....
प्रत्युश- रुको... उठो... तो कवियत्री जी.. अब बताओगी कि और पिटना है...
(तभी पीछे से रोमा आ जाती है।)
रोमा- ऎ....
(रोमा... आती है पिंकी पीछे चली जाती है...। रोमा तीनों के बीच में आकर बुरी तरह चिल्लाकर कराटे की एक मुद्रा बनाती है... तीनो डार जाते है.... फिर तीनो कराटॆ की मुद्रा बनाने की कोशिश करते हैं।)
प्रत्युश- हमें भी तो आता है कराटे...।
डॉली- हाँ हाँ हमने भी क्लासेज़ की हैं।
नीतू- मेरे पास तो यलो बेल्ट भी है..।
(तभी रोमा कराटे के कुछ दाव करती है..और खड़ी हो जाती है....। तीनों अपना पेर उठाकर चिल्लने लगते हैं...। रोमा सबको चुप होने को कहती है...।)
रोमा- चुप... पिंकी... पिंकी..
(पर पिंकी वहा नहीं है...)
रोमा- अरे पिंकी कहाँ चली गई।
तीनों- हम देखकर आते हैं....
Black out…


Scene-12
पीछे शेड़ो में पिंकी जाती हुई दिखती है.. तभी पीछे से लाल पेंसिल उसके पीछे-पीछे चल रही होती है...। पिंकी रुककर उसको देखती है... वह भी रुक जाती है.. पिंकी फिर चलना शुरु करती.. लाल पेंसिल भी उसके पीछे-पीछे चलने लगती है...। तभी सामने गांधी जी का शेडो आता है.. और पिंकी गांधी जी से बात करती है.. पीछे लाल पेंसिल का भी शेड़ो है....।)
बापू- पिंकी...।
पिंकी- बापू...
बापू- क्या बात है...?
पिंकी- बापू... आप चाय पीते हैं?
बापू- तुम्हारे साथ पी लूंगा...
पिंकी- बापू मैं ना बुरी फसी हूँ...
बापू- कैसे?
पिंकी- आप तो जानते हैं कि मैंने कविताएं नहीं लिखी हैं... पर अब कोई मेरी बात का यक़ीन ही नहीं कर रहा है... और यह पेंसिल है कि सब झूठ लिखती ही चली जा रही है...
बापू- और झूठ बड़ा होता जा रहा है...
पिंकी- बड़ा नहीं बापू बहुत बड़ा.. अब मैं कुछ भी करुं यह झूठ पीछा ही नहीं छोड रह है.. मैं सो भी नहीं पा रही हूँ... मैं क्या करुं...?
बापू- सच बोलो.... बस..
पिंकी- मैं कहना चाहती हूँ पर कोई सुनना ही नहीं चाहता...।
बापू- किसी से नहीं.. अपने से.. खुद से सच कहो... पहले खुद सुनों फिर सब सुन लेंगे..।
पिंकी- पर मैं कह तो रही हूँ...
बापू- तुम्हारा झूठ तुम्हारी कविताओं में है... हे ना?
पिंकी- हाँ....।
बापू- तो बस वहाँ सच बोलो...।
पिंकी- पर मैं कविता नहीं लिख सकती....।
बापू- जब झूठ लिख सकती हो तो सच लिखना तो आसान ही है....
पिंकी- सच क्या लिखूं?
बापू- अब वह तुम जानों...।
पिकी- बापू... मैं सच लिखूंगी...
बापू- चाय का क्या हुआ?
पिंकी- लाती हूँ.... लाती हूँ..।
Black out..
Scene-13
(कविता की अंतिम प्रतियोगिता है। पीछे मास्क पहने चार जज हैं... जिसमे एक डॉ रमेश हैं। सामने सारे लोग मास्क पहने लिखने की मुद्रा में बैठे हैं...। पिंकी ने मास्क नहीं पहना है..।)
जज१- मुख्य अतिथी डॉ रमेश का स्वागत है।
रमेश- मेरा सोभाग्य।
जज२- भविष्य के कवि हमारे सामने बैठे हैं।
रमेश- मेरा सौभाग्य।
जज३- अंतिम और निर्णायक प्रतियोगिता है...।
जज१- सफल कवि बड़ा कवि होगा..।
जज२- चुनाव रमेश जी करेगें..।
रमेश- मेरा सौभाग्य...।
जज३- तो कवियों आप लोग तैयार हो?
(सारे लोग अपनी मुद्रा बदलकर लिखने को तैयार हो जाते हैं।)
जज१- रमेश जी कविता का विषय बताएं...।
रमेश- मेरा सौभाग्य.
जज२- रमेश जी... विषय .. विषय बताना है...
रमेश- हाँ.. मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी होती है कि....
जज१- तो आज की कविता का विषय है.... ’खुशी... happiness’
(सारे लोग तुरंत लिखना शुरु करते हैं। और लिखते लिखते लोगों की (happiness के साऊंड़...) आवाज़े सुनाई देती हैं...। सारे जज भी अपनी मुद्राए बदलते रहते हैं....। सारे लिखना बंद करके अपने-अपने कागज़ो को हवा में उठाते हैं... जज ताली बजाकर समय समाप्ति की घोषणा करते हैं। फ्रीज़....। पिंकी अपना कागज़ नीचे करती है।)
पिंकी- मेरी इच्छा थी कि मैं किसी ओर की तरह दिखूं... कुछ ओर बन जाऊं...। लाल पेंसिल ने वह कर दिया.. उसने एक दूसरी पिंकी पैदा कर दी..। वह पिंकी बड़ी होती जा रही थी...। हां बड़ी... बहुत बड़ी.. मैं उसमें गुमने लगी थी...।... पर मैं वह नहीं हूँ.... लाल पेंसिल मेरी नहीं है.. मैं सिर्फ पिंकी हूँ जिसे कविता लिखना नहीं आता है।
(पिंकी के इस संवाद के बीच में पीछे शेड़ो में पेंसिल टूटती है..। जज आकर सबके कागज़ लेते हैं। सारे कागज़ रमेश जी को देते हैं... रमेश सबको रिजक्ट कर देता है.. और एक कागज़ पर थोड़ा सा हंसता है। और वह काग़ज़ जज१ को देता है...। जज१ कहता है..)
जज१- अरे यह तो कोई रमेश ही जीता है...।
(बच्चों में से एक बच्चा अपना हाथ उठाता है.. बाक़ी सारे लोग अपना सिर झुका लेते हैं....फ्रीज़...)
पिंकी- बापू मुझे नींद आ रही है... मैं सोना चाहती हूँ.. मुझे बहुत तेज़ नींद आ रही है।
(पिंकी सोने लगती है... और सारे बच्चे अपना सिर उठाकर पिंकी को देखते है..सोता हुआ...। फिर सभी अपना मास्क उतारते हैं... और लेट जाते हैं...। सभी embryo की मुद्रा में वापिस लेट जाते हैं...। नाटक फिर शुरु से शुरु होता है.... तभी लाल पेंसिल गिरती है....नंदू झटके से उठता है.. बाक़ी लोग नाटक की शुरुआत दौहराते हैं। वह लाल पेंसिल को उठाता है .. सबसे पूछता है कि यह किसकी है...? जब उसे कोई जवाब नहीं मिलता तो वह... उस पेंसिल को अपने देखता है और फिर आश्चर्य से दर्शकों की तरफ देखता है कि वह इस लाल पेंसिल का क्या करे....। तब तक सभी नाटक की शुरुआत का एक अंश पूराकर लेते हैं...( embryo से पैदा होने तक का).... धीरे धीरे लाईट जाती है... अंधेरा।)
Black out….


end

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut behtareen. apka purana natak shakkar ke panch dane bahut ki kamaal ka tha...likhte rahein aur yahan prakashit karte rahein....kai jagah log apke natak manchit karna chahte hain par scripts nahin mil pati hain. agar park aur shakkar ke panch dane ki scripts bhi upload kar sakein toh bada upkaar hoga.
    shubhkamnayein
    anand

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