गुरुवार, 19 जनवरी 2012

पीले स्कूटर वाला आदमी....




पीले स्कूटर वाला आदमी



लाल अपनी डेस्क पर टाईप्राईटर पर बैठे हुए कुछ टाईप कर रहा है... तभी वह कुछ सोचकर लिखना बंद करता है... हमें संगीत सुनाई देता है... और एक लड़की ’नील..’ उसके पीछे से नाचती हुई बाहर आती है... लाल उसे नाचता हुआ देखता है और लिखना भूल जाता है... तभी उसे पीछे से पीताम्बर आता दिखता है.. और वह सीधा लाल की आंखों में देखता है.. लाल उसे देखता रह जाता है... नील नाच रही होती है...।
ब्लैक आऊट।
जब लाइट आती है तो पीताम्बर लाल की जगह बैठा है और लाल नील के साथ नाच रहा है होता है...।
ब्लैक आउट
लाइट आती है तो हम देखते है कि पीताम्बर लिखना शुरु करता है। नील जा चुकी है, लाल अकेला नाच रहा है। वह नाचते-नाचते पीताम्बर को देखता है... पीताम्बर लिखना बंद करके लाल की तरफ देखता है...। लाल शर्मिंदा हो जाता है और धीरे से पलंग पर लेट जाता है... सो जाता है।
ब्लैक आऊट...
जैसे ही लाइट आती है, हमें डोर-बेल सुनाई देती है। लाल के पिताजी अन्दर आते है। वे अपनी पेटी नीचे रखते हैं और लाल के सर पर हाथ फेरते है, लाल चौंक कर उठ जाता है।
लाल : आप !
पिता : मैंने कहा था मैं साढ़े सात बजे आऊँगा।
लाल : (पैर पड़ता है) मैं सो रहा था।
पिता : कैसी तबीयत है तुम्हारी ?
लाल : ठीक है।
पिता : फिर जोडिस हो गया ?
लाल : फिर मतलब ? बचपन में होता था, अब हुआ है और अब तो लगभग ठीक भी हो गया है।
पिता : मैंने तुम्हें मना किया था।
लाल : अरे मैने स्कूटर नही बेचा, बस सौदा तय कर रहा था। पर वो
घटिया स्कूटर कोई खरीदना ही नहीं चाहता।
पिता : स्कूटर बेचने के बारे में तुमने सोचा ही क्यों ?
लाल : क्यों? सोचने से पीलिया हो जाता है क्या ?
पिता : तुम्हें हो सकता है।
लाल : पता है। (दोनों दर्शकों से)
जब मैं छोटा था, मुझे पीलिया हो गया था।
पिता : दो बार !
लाल : हाँ हाँ दो बार। खूब झाड़-फूँक कराई गई।
पिता : मेरे पिताजी इसको लेकर गाँव-गाँव भटके थे।
लाल : गाँव-गाँव, सिर्फ दो गाँव भटके नहीं थे, गए थे। तब एक बाबा ने ताबीज पहनाया और कहा कि इक्कीस दिन में इसका पीलिया उतर जाएगा और.....
पिता : और इसकी कोई भी चीज जो इस सबसे ज़्यादा पसन्द हो उसे पीले रंग की होना चाहिए। अगर नही है तो उसे पीला करा दो, तो हम इसे गोद में लेकर पूरे घर में भटके और पूछा कि बताओ तुम्हारी सबसे पसंदीदा चीज कौन-सी है।
लाल : मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी, मैंने अपनी उँगली सीधे स्कूटर पर रख दी।
पिता : और मेरे स्कूटर को पीला कराया गया।
लाल : और पीलिया के डर के चक्कर में आज तक उसे साथ लेकर घूम रहा हूँ, मुझे पीलिया का डर नहीं है... इनका वहम है। हर लेटर में पूछते है, वो स्कूटर ठीक है ना, सर्विसिंग कराई, तीन महीने हो गए......
पिता : तुम्हारा हेलमेट किस रंग का है?
(कुछ शांति...)

पिता : (लाल से) मेरा लेटर मिला तुम्हें ?
लाल : हाँ कुछ दिन पहले मिला था !
पिता : पढ़ा ?
लाल : स्कूटर सर्विसिंग पर दे दिया है ।
पिता : स्कूटर की सविसिंग के लिए लेटर नही लिखा था। मै कल आ रहा हूँ तुमसे मिलने।
लाल : पता है। आपने लेटर में ऊपर ही लिखा है। 7:30AM आ रहा हूँ।
पिता : इसलिए क्योंकि मुझे पता है कि तुम मेरा लेटर कभी खोलकर पढ़ते नहीं। पैसों की ज़रुरत है ?
लाल : नहीं।
पिता : काम कैसा चल रहा है ?
लाल : काम नहीं कर रहा हूँ। दो महीने से छुट्टी ले रखी है।
पिता : जो हो गया उसे भूल जाओ।
लाल : कोशिश कर रहा हूँ। पर आज-कल ये फाँस बहुत दर्द करती है।
पिता : किससे बदला ले रहे हो, मुझसे कि अपने आपसे।
लाल : में कहानी लिख रहा हूँ।
पिता : जिस कहानी का तुम्हें अन्त नहीं पता उसे क्यों लिखना चाहते हो ?
लाल : मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं।
पिता : क्या पूछना चाहते हो?
लाल : आपने इंदिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को क्यों नहीं दी?
पिता : तुम इसका जवाब जानते हो...।
लाल : हाँ..... मैं जानता हूँ, पर मुझे ये नहीं पता कि वो सही है या ग़लत।
पिता : तुम क्यों इस कहानी के पीछे पड़े हो ? तुम कुछ दूसरा नही लिख सकते ?
लाल : मैं लिख रहा हूँ। एक बूढ़े की कहानी लिख रहा हूँ, वो बूढ़ा मेरे घर के सामने की बिल्डिंग की सातवीं मंजिल की बालकनी पर दिन भर बैठा रहता है। मै उसकी कहानी भी लिख रहा हूँ पर ............
पिता : पर क्या ?
लाल : मेरी कहानी का हर पात्र पीला स्कूटर क्यों चलाता है ?
पिता : तुम पीले स्कूटर को भूल क्यों नही जाते हो ?
लाल : मैं तो उसे अपनी ज़िन्दगी से निकाल देना चाहता हूँ।
पिता : ऐसा मत करना।
लाल : क्यों, आपको डर है पीलिया से मेरी मौत हो जाएगी ?
पिता : हाँ।
लाल : ऐसे कोई नही मरता।
पिता : तुम्हारे दादाजी ने सख़्त मना किया था।
लाल : ठीक है, मैं इसे ज़िन्दगी भर अपने पास रखूँगा, पर एक शर्त है। मुझे कहानी का अन्त बता दीजिए।
पिता : तुम डरे हुए हो, तुम अन्त जानना ही नहीं चाहते।
लाल : मै जानना चाहता हूँ।
पिता : देखो कई चीज़ें ज़िन्दगी में गणित के सवाल की तरह होती है, जिन्हें अगर आपको हल करना हो तो आपको ‘माना कि....’ से शुरुआत करनी पड़ती है। तुम्हारी दि़क्कत ये है कि तुम्हें इसका अन्त मानना पड़ेगा। माना कि अन्त ये है, इसलिए कहानी ये है।
लाल : ठीक है कम से कम इतना तो बता दीजिए कि आपने इन्दिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को क्यों नहीं दी ?
पिता : देखो वो तो मैं खुद तुमसे .....(जाने लगता है)
लाल : कहाँ जा रहे हैं आप ?
पिता : बाथरुम (लाल सो जाता है) मेरे पास एक कुदाली है जिससे मैं सफे़द भविष्य के पहाड़ को काटता जा रहा हूँ और उसकी मिट्टी पीछे ढकेल रहा हूँ। पीछे अतीत का बड़ा-सा पहाड़ इकठ्ठा होता जा रहा है। हर बार अपना कुदाल चलाने पर भी ढेर सारा सफ़ेद भविष्य सामने है और पीछे हर कुदाल के वार का ढेर सारा अतीत। अतीत के पहाड़ पर घांस उग आई है वो हरा-भरा हो गया है। सारी घटनाएँ जो जीते वक़्त कड़वी लगती थीं वो अतीत के पहाड़ पर जाकर घना पेड़ बन गई है, जो अब छाया देता है। कई कहानियाँ अतीत में बिना अन्त लिये आती हें। अन्त भी उस कहानी के साथ ही घटता है... लेकिन आप ऐन उस वक़्त पर वहाँ मौजूद नहीं होते या आप बहुत छोटो होते है, या वो अन्त कहीं बहुत डरावना न हो इस शंका में आप उसे जानना ही नहीं चाहते। ऐसी कहानियाँ बड़ा-सा पत्थर बनकर अतीत के पहाड़ पर जम जाती है, जिसे आप पूरी ज़िन्दगी ढोते रहते है।
(पिता चले जाते है। ब्लैक आउट होता है और फिर लाइट आती है शाम का समय है। लाल रात भर साया, दिन भर सोया, बीच में 7:30AM को उसकी आँख खुली थी, जिसका ज़िक्र बाद में पीताम्बर भी करता है और वो फिर सो जाता है लाल अजीब सी बैचेनी महसूस करता है। वो पिताजी का अन्तिम लेटर उठाकर देखता है जो अभी तक खुला नहीं है, बाकी कई लेटर खुले हुए इधर-उधर बिखरे पड़े है। लाल भीतर चाय बनाने जाता है। चाय लेकर बाल्कनी में आकर खड़ा हो जाता है। पीताम्बर लिखना बन्द करता है।)
पीताम्बर : रात होने के ठीक पहले मेरी आँख खुल गई.......तो देखा पिछली रात से पूरे दिन तक मैं सोता रहा .......इस बीच मेरी आँख खुली थी......सुबह 7:30 बजे .....फिर सो गया, अब सर भारी हो रहा था, सब कुछ बड़ा अजीब-सा लग रहा था। खुद को कोसने लगा, क्या कर रहा हूँ? क्या हो रहा है मेरे साथ? वैसे भी पिछले दो महीने से मैं कुछ कर नहीं रहा था। पर, एक पूरा दिन वो भी पिछली रात के साथ सोते हुए बिता देना। मैं सोच रहा था वो सभी एक दिन में कितना आगे बढ़ गए होंगे जो परसों तक मेरे साथ थे। उठकर पानी पिया, कुछ समझ में नही आया तो चाय चढ़ाने रख दी। अब मैं पूरी रात कैसे बिताऊँगा ? नींद का आना वैसे भी रात के साथ आपके सम्बन्ध पर निर्भर करता है ... खैर मैंने चाय छानी और बाल्कनी में आकर खड़ा हो गया, पूरा शहर मेरी बाल्कनी से नही दिखता था। (बूढ़ा आदमी बाल्कनी से इशारा करता है और फिर चला जाता है।) बस सामने की दो ऊँची बिल्डिंग और उनके बीच से मुझे शहर की चौड़ी सड़क हाईवे दिखती थी। मुझे इस बाल्कनी से इतनी-सी दुनिया देखने की आदत पड़ गई थी, सो जब भी देखता था घण्टों वहीं खड़ा रह जाता था। वो इतनी-सी दुनिया मुझे पूरी तरह सम्मोहित कर लेती थी...-हर बार। असल में ये बिल्डिंग, ये चौड़ी सड़क, सामने के घर, ये सब मेरे घर के अन्दर का ही हिस्सा थे... बाहर बोलकर मैं इन्हें बाहर करने की कोशिश ज़रुर करता था पर मैं खड़ा रहा। काफ़ी देर, चाय आधी पी चुका था, आधी ठण्डी हो चुकी थी-फिर भी पिए जा रहा था। पिताजी के लगभग सारे ख़तों का जवाब मैं लिख चुका था, सिवाय उनके अन्तिम लेटर के। (डोर बेल बजती है..)तभी बेल सुनाई दी, डोरबेल। मैं मुड़ा नहीं, (डोर बेल फिर बजती है..) वो फिर सुनाई दी। मुझे हँसी आने लगी, वो फिर आ गए। ये वो ही हैं, असल में मेरे घर में डोरबेल थी ही नहीं।
(लाल जाता है, पीताम्बर उसे दरवाज़ा खोलने से रोकता है। उसके सामने जाकर खड़ा हो जाता है। बाहर से आवाज़ आती है।)
नील : दरवाज़ा खोला।
पीताम्बर : नहीं .........
नील : क्या हुआ ? आज भी कुछ ठान लिया है। दरवाज़ा खोलो।
लाल : आज..... मैं सोच रहा था कि तुम आज.........
नील : मत सोचो, तुम्हारे पास कोई बहाना नहीं है। दरवाज़ा खोलो।
लाल : ज़िद मर करो।
(पीताम्बर लाल के सामने से हट जाता है)
नील : मैं ज़िद नही कर रही हूँ और अगर तुम देर करोगे तो मै चली जाऊँगी पर कोई और आएगा जिसे तुम्हें सहना पड़ेगा। बोलो जाऊँ या तुम्हें बचाऊँ ?
लाल : (दरवाजा खोलता है, वो अन्दर आ जाती है, दर्शकों से) पता नही क्या हुआ, पर मैंने दरवाज़ा खोल दिया। अगर आपको पता हो कि दूसरी तरफ़ कौन है तो दरवाज़ा खोलना आसान हो जाता है। तो आसान काम मैंने कर दिया। वो अन्दर आ चुकी है।
(लाल उसके सामने जाकर बैठ जाता है.. पीताम्बर को यह बिल्कुल ठीक नहीं लगता है।)
नील : कपड़े उतारुँ ?
लाल : नही।
नील : अधिकतर तो तुम कपड़े उतरवाते ही हो इसलिए पूछ लिया।
लाल : नहीं आज नही ।
नील : क्यों, आज क्यों नही ? सोमवार को तुम्हारा उपवास होता है क्या ?
(नील उसके सामने से उठती है और पलंग पर लेट जाती है।)
लाल : (दर्शकों से) लोग झूठ बोलते हैं कि समय अपनी रफ़्तार से चलता है। ना..... असल में समय बहुत बुरी तरह थमता है और बहुत तेज़ चलता है। समय के अपने खाली घेरे होते हैं, इन घेरों का अपना अलग समय और अपनी अलग रफ़्तार होती है।
नील : तुम अपने समय से नाराज़ हो ।
लाल : तुम कितनी देर यहाँ रुकोगी ?
नील : तुम बताओ।
लाल : क्यों तुम कुछ तय करके नही आई हो ?
नील : आई थी।
लाल : फिर ?
नील : तुम्हारे ऊपर है।
लाल : क्या ?
नील : तुम्हें पता है।
लाल : देखो तुम मुझे डराती हो।
नील : बचाती भी तो हूँ।
लाल : मै बचना नही चाहता।
नील : वो तो मैं पहले ही कह रही थी कि बचो मत।
लाल : तुम जाना चाहती हो।
नील : मैं तो आना भी नहीं चाहती थी।
लाल : देखो आज मैंने तुम्हें नही बुलाया है।
नील : क्या ? ज़रा फिर से कहना।
लाल : मुझे कुछ देर के लिए अकला छोड़ोगी ?
नील : तुम अकेले ही हो।
लाल : कितना अच्छा लगता है तुम्हें ये बोलना।
नील : ये छोडो, इसका जवाब दो, एक नदी में छोटी-सी नाव पे एक भैंस खड़ी हैं, वो नाव डूबनेवाली है। मतलब अगर उस नाव में एक कंकड़ भी डालो तो वो डूब जाएगी। तभी भैंस गोबर कर देती है, बताओ नाव डूबेगी कि नहीं ?
लाल : मेरे ख़्याल से नाव .....तुम कुछ देर चुप रहोगी ।
नील : फँस गए ना।
लाल : मैं फँस चुका हूँ...मुझे लिखना है।
नील : तुम्हें किसी की ज़रुरत है।
लाल : तुम्हारी नहीं इतना जानता हूँ।
नील : जब ज़रुरत हो तो बुलाना मत मै खुद आऊँगी। इससे तुम्हें इतनी तो संतुष्टि मिलेगी कि तुमने नही बुलाया है।
लाल : (नील चली जाती है) देर तक सोते रहने से ‘क्यों’ जैसे कई सवाल उठे हैं, इन सारे सवालों का मेरे पास एक ही जवाब है। सो जाता हूँ।
पीताम्बर : तुम सो नही सकते ।
लाल : क्यों ?
पीताम्बर : तुम्हें कहानी लिखना है।
लाल : तुम कौन हो ?
पीताम्बर : देखो तुम ये नही जानना चाहते जो तुम पूछ रहे हो।
लाल : हाँ......तो मैं क्या चाहता हूँ ?
पीताम्बर : तुम्हारे पास बहुत सारे सवाल हैं ?
लाल : हाँ, मरे पास बहुत सारे सवाल हैं। मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम रोज़ कहाँ जाते हो ?
पीताम्बर : तुम रोज़ मुझे क्यों देखते हो ?
लाल : तब मेरा चाय पीने का वक़्त होता है और मै तुम्हें रोज़ अपनी बाल्कनी से जाता हुआ देखता हूँ।
पीताम्बर : मैं भी तुम्हें कई दिनों से मुझे देखते हुए देख रहा हूँ।
लाल : तुम हाईवे पर रुककर मुझे क्यों देखते हो ?
पीताम्बर : तुम बाल्कनी में खड़े होकर मुझे क्यों देखते हो ?
(चुप्पी) तुम्हें अपने बाप से प्रॉब्लम है ना ?
लाल : क्यों ?
पीताम्बर : क्योंकि वो तुम्हारी माँ के साथ सोता था।
लाल : (चुप्पी/दर्शकों से) सभी अपने-अपनी तरीके से रात के साथ सोते है, हर आदमी का रात के अँधरे के साथ अपना सम्बन्ध होता है। यह सम्बन्ध अगर अच्छा है, तो आपको नींद आ जाती है और अगर ये सम्बन्ध खराब है तो आपके जीवन के छोटे-छोटे अँधेरे, रात के अँधेरे में घुस आते हैं और आपको सोने नहीं देते ।
पीताम्बर : तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ना ?
लाल : हाँ मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
पीताम्बर : मैं भीड़ में खो जाने से डरता हूँ। मै हमेशा भीड़ का हिस्सा बनने से डरता हूँ। इसलिए मैने बहुत सारे चुटकुले, जोक्स याद कर लिये है। हमेशा लगातार सबके सामने सुनाता रहता हूँ....लाल,पीली,नीली,हरी शर्ट पहनता हूँ, रोज़ शेव करता हूँ, जब भी घबराता हूँ, बाथरुम चला जाता हूँ। दो अलग-अलग किस्म के अख़बार रोज घर से याद करके निकलता हूँ ज़्यादा चीजे़ं पता नही होती पर किसी भी विषय पर लगभग एक घण्टे बोल सकता हूँ और हाँ.... मै पीला स्कूटर चलाता हूँ।
लाल : चुप क्यों हो गए ....बोलो।
पीताम्बर : क्यों दूसरों की कहानी में अपना सुख ढूँढ़ रहे हो ?
लाल : नहीं....मै सुनना चाहता हूँ।
पीताम्बर : किसके बारे मे ?
लाल : तुम जानते हो।
पीताम्बर : कहानी शुरु करें ?
लाल : हाँ (डोरबेल बजती है) अरे मुझे पिताजी को लेने स्टेशन जाना था, मै भूल ही गया।
(पिताजी अन्दर आते हैं। दोनों पैर छूते हैं।)
पिताजी : खुश रहो अगर रह सको तो।
लाल : मैं आने ही वाला था आपको स्टेशन पर लेने।
पिताजी : उसकी कोई ज़रुरत नहीं है .....कैसा लग रहा हूँ मैं?
लाल : अच्छे।
पिताजी : तुम्हारा मुँह क्यों लटका हुआ है ? (खुद से) बहुत गैस बन रही है।
लाल : कहाँ जा रहे हैं ?
पिताजी : बाथरुम, क्यों तुम्हें प्रॉब्लम है ? (अन्दर से) ये क्या हाल बना रखा है बाथरुम का (चुप्पी)
पीताम्बर : तुम्हें अपने बाप से प्रॉब्लम है ना ?
लाल : चुप रहो ।
पीताम्बर : क्योंकि वो तुम्हारी माँ को छोड़कर चले गए थे। फिर भी बार-बार उनसे मिलने आते थे क्यों ? शायद उनके साथ सोने ....तुम्हें पैसे देकर चॉकलेट लेने भेजते थे। माँ उनके लगातार आने के डर से चल बसी। तुमसे मिलने की जिद्द क्यों करते हैं .... तुमसे क्यों मिलना चाहते हैं ?
(पिताजी भीतर से वापिस आते हैं... दोनों सचेत हो जाते हैं... पिताजी धीरे से अपनी पेंट की जेब में हाथ डालते हैं... और कुछ चॉक्लेटस निकालते हैं)
पिताजी : चॉकलेट खाओगे ?
लाल : आप यहाँ कितने दिन रुकेंगे ?
पिताजी : तुम कहो तो मै अभी जा सकता हूँ।
लाल : चाय पीएँगें ?
पिताजी : तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया ? क्या कर रहे हो आजकल ?
लाल : कुछ नहीं।
पिताजी : सुना है तुमने कोई जॉब ज्वाइन कर लिया है ?
लाल : कर लिया था। पिछले दो महीने से छुट्टी ले रखी है।
पिताजी : क्यों मेरे मरने का शोक मना रहे हो। लिखना क्यो छोड़ दिया ?
लाल : मै लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।
पिताजी : किसकी कहानी लिख रहे हो?
लाल : एक बूढ़े की। वो बूढ़ा .....
(डोरबेल बजती है। लाल दरवाजे़ की ओर मुड़ता है।)
पिताजी : क्या हुआ ? मेरा आखि़री लेटर अब तक क्यो नहीं खोला ? (बूढ़े आदमी का प्रवेश और प्रस्थान) मुझसे बात नहीं करना चाहते। जब बात करने की इच्छा हो तो बुला लेना। मैं इन्तजार करुँगा।
(पिताजी का प्रस्थान..)
लाल : आओ ...अन्दर आ जाओं
बूढ़ा आदमी : मुझसे कोई ग़लती हो गई क्या ?
लाल : नही कोई ग़लती नहीं।
बूढ़ा आदमी : आज तुमने मेरी तरफ एक बार भी नही देखा।
लाल : मै अभी तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था।
बूढ़ा आदमी : मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी। मैं बाल्कनी से तुम्हें इशारा भी कर रहा था। सातवीं मंजिल से चलकर आ रहा हूँ। मेरी लिफ्ट भी काम नही कर रही है।
लाल : क्या बात है बोलो .......?
बूढ़ा आदमी : मुझे तुम्हारी चिन्ता हो रही है, मुझे लगता है, तुम्हें भी वही लगता है जो मुझे लगता है पता है मुझे क्या लगता है?, मुझे लगता है कि... कल का दिन सांत्वना है आज के दिन के बीतने की। आज तो बीत गया, जैसे कैसे बीत ही जाएगा ना!!! फिर लगने लगता है कि कल एक जादू की पुड़िया में बंद है, पुड़िया खुलेगी, सूरज उगेगा और सब कुछ वही होगा जो सालों से मैं बाल्कनी में बैठे-बैठे सोच रहा हूँ.... पता है आजकल मैं एक बूढ़ी चील को देखता हूँ, वो बहुत बूढ़ी हो चुकी है। वह बस एक पेड़ के ठूठ पर बैठी रहती है, बहुत से जवान कौवे उसे चोंच मारकर भागते हैं। उस चील की एक समस्या है या शायद जवान कौवों का डर, पर उसने अब ऊपर आसमान में उड़ना छोड़ दिया है। उसके पर झड़ते हैं। मै उसके झड़े हुए परों को आजकल इकट्ठा कर रहा हूँ........रोज.... पर वो ऊपर उडेगी ना। मैं उसे एक बार आसमान में ऐसे गोल गोल ऊपर उड़ते हुए देखना चाहता हूँ।
(लाल ना में सिर हिलाता है.... बूढ़ा आदमी नाराज़ हो जाता है... और गुस्से में चला जाता है।)
लाल : ये एक दिन सातवीं मंज़िल से कूदकर अपनी जान देगा।
पीताम्बर : तुम इसे बचा सकते हो।
लाल : नही.... क्योंकि चील अब इतना ऊपर नही उड़ सकती।
पीताम्बर : चाहो तो बचा सकते हो। बस कहानी का अन्त बदल दो। जाने दो....तुम बहुत थक गए हो।
लाल : मैं थका नही हूँ ........मैं बस सोना चाहता हूँ।
पीताम्बर : नही तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो।
लाल : हाँ, मेरे पास बहुत सारे सवाल हैं.. मैं पूछना चाहता हूँ कि... इंन्दिरा गांधी के मरने की ख़बर दादा जी को क्यों नही दी गई ?
पीताम्बर : ये बहुत बड़ा सवाल है - कुछ दूसरा पूछो ?
लाल : तुमने लिखना क्यो छोड़ दिया ?
पीताम्बर : अब मै नही लिख सकता, क्योंकि मुझे हर कहानी में हर पात्र में अपना बाप दिखाई देता है। मेरी हर कहानी मेरी माँ की कहानी होती है। मेरी कहानी का हर आदमी मेरी माँ को डरा रहा होता है और कहानी का अन्त होने से पहले मेरा बाप हँसता है और मुझसे एक ही वाक्य बोलता है।
लाल : ये लो बेटा.. दस रुपए.. जाओं चॉकलेट ले आओं फिर हम स्कूटर पर घूमने जाएँगें।
पीताम्बर : .....और कहानी वहीं रुक जाती है।
लाल : नही, पर अब मुझे दूसरे लोग दिखने लगे है। मैं उस बूढ़े आदमी की कहानी लिख सकता हूँ। (दोनों खड़े हो जाते हैं... पीताम्बर अपनी छोटी सी नोट बुक निकाल लेता है.. दोनों कहानी गढ़ने का सिलसिला शुरु करते हैं.. मानों कहानी लिख रहे हों..।) मैने हमेशा इसे बाल्कनी में धूप सेंकते हुए देखा है।
पीताम्बर : धूप हो या ना हो ये हमेशा धूप सेकता रहता है।
लाल : इसने अपने जीवन में सिर्फ़ चार ठोस चीजें की है।
पीताम्बर : पहली अपनी बेटी की शादी।
लाल : जो घर वापिस आ गई .....पति ने छोड़ दिया।
पीताम्बर : टी.वी. और फ्रिज खरीदा।
लाल : फ्रिज में आजकल बर्फ नहीं जमती है। टी0वी0 बहुत पुराना है इसलिए सिर्फ आठ चैनल ही देखे जा सकते है।
पीताम्बर : तीसरा इसने -
लाल : इसने.. इसने... इसने.... मेरा सिर भारी हो रहा है।
(डोर बेल बजती है)
पीताम्बर : तीसरी और चौथी ठोस चीज क्या है ?
लाल : मुझे पता है पर....
पीताम्बर : तुम बिल्कुल ठीक जा रहे हो बूढ़े के बारे में सोचों।
लाल : मैं बचना चाहता हूँ।
(नील इस वाक्य को सुनते ही तेज़ी से भीतर चली आती है.... )
नील : देखो तुमने खुद कहा बचना चाहता हूँ, बोलो बचाऊँ ?
लाल : (पीताम्बर से...)उस बूढ़े के पास पीला स्कूटर है, मेरे पास तीसरी ठोस चीज ये है।
पीताम्बर : (पीताम्बर अपनी नोटबुक गुस्से में वापिस अपनी जेब में रख लेता है।) तुम फिर अपने बाप को बीच में घसीट लाए।
नील : बचाऊँ ?
पीताम्बर : (वह फिर कहानी लिखवाने की कोशिश करता है..।) तुम्हें कहानी लिखनी है। इसे छोड़ो बूढ़े के बारे में सोचो।
नील : मेरी तरफ़ देखो, कपड़े उतारुँ ?
पीताम्बर : चौथी ठोस चीज़ क्या है ?
नील : मेरी जरुरत है या मैं जाऊँ ?
लाल : (उसका हाथ अपने हाथ में लेता है.. पीताम्बर उसे रोकने की कोशिश करता है पर लाल उसे झिड़क देता है.। लेकिन झिड़कते ही लाल को अपनी ग़लती का एहसाह होता है। ) रुको - ये गलत है .... जब तक मैं अपनी कहानी नहीं लिखूँगा मै किसी और की कहानी नही लिख सकता-मुझे अपनी कहानी लिखना है ....
नील : तो बूढ़े का क्या होगा? ....मेरा क्या होगा...? मै चली...
लाल : सुनों ......मुझसे बात करो ....
नील : नही मै बात नही कर सकती ...तुम्हें तो मेरी ज़रुरत नही है ...।
लाल : मुझे तुम्हारी ज़रुरत है ....मुझसे बात करो .....।
नील : ठीक है - एक दिन सफेद घोड़े पे सवाल होकर एक राजकुमार आया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क। उसे मुझसे प्यार हो गया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क.. फिर हमारी शादी हो गई तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क, ढेर सारे बच्चे हो गए, तबड़क, तबड़क, तबड़क.....
पीताम्बर : और फिर वो तुम्हें छोड़कर चला गया तबड़क, तबड़क, तबड़क, तबड़क, हमें तुम्हारी कहानी नहीं सुननी है।
नील : अच्छा ठीक है उसी के बारे में बात करुँगी तो तुम सुनना चाहते हो..
(वह पीताम्बर के बग़ल में जाकर खड़ी हो जाती है... और दोनों एक कहानी की शुरुआत करते हैं।)
पीताम्बर : मै पूरी ज़िन्दगी चेहरों के पीछे भागा हूँ।
नील : मै पूरी ज़िन्दगी चेहरों के पीछे भागी हूँ।
पीताम्बर : असल में मैने चौकोर साँस लेना शुरु कर दिया था।
नील : इन चौकोर साँसों के अपने अँधरे कोने हैं- जिनमें बहुत से चेहरे छिपे बैठे हैं- ये एक तरह का चौकोर कुँआ जैसा है जिसमें अगर मैं आव़ाज लगाती हूँ तो मुझे अपनी नहीं किसी दूसरे की आव़ाज गूँजती हुई सुनाई देती है... मैं उस आवाज के पीछे भागती हूँ- वो आवाज चेहरा बन जाता है और मै उससे कहती हूँ ....कपड़े उतारुँ....
पीताम्बर : तुमने फिर अपनी कहानी शुरु कर दी ?
नील : क्यों जब तुमकों हर कहानी में अपना बाप दिखाई देता है तो मै तुम्हारी कहानी में अपनी एक लाइन नहीं जोड़ सकती हूँ।
पीताम्बर : कम-से-कम कपड़े उतारुँ जैसा घटिया शब्द तो मत जोड़ो ....
नील : क्यों जब तुम कहते हो, कपड़े उतारो तो तुम्हें तो बड़ा मज़ा आता है। ये सब छोड़ो .......इसका जवाब दो.....एक नदी में ........छोटी सी नाव में एक भैंस खड़ी है ....वो नाव डूबने वाली है ......मतलब अगर उस नाव में एक कंकड भी डाल दोगे न तो वो डूब जाएगी.....तभी भैंस गोबर कर देती है ....बताओ नाव डूबेगी कि नहीं .....
पीताम्बर : नाव डूबेगी......उत्तर है नाव डूबेगी।
नील : गलत । उत्तर है नाव नहीं डूबेगी क्योंकि गोबर तो भेंस के पेट में ही था अब नाव में है इसलिए नाव नही डूबेगी।
पीताम्बर : नाव डूबेगी - बचपन में भी मेरे लिए नाव डूबती थी और अभी भी मेरे लिए नाव डूबेगी।
(दोनों बाहर निकल जाते हैं, डोरबेल।)
लाल : बहुत पहले मेरी उँगली में एक फाँस गड़ गई थी- वो काफ़ी भीतर तक घुस गई थी-बहुत दर्द हो रहा था खून निकलने लगा था जब मैने उस फाँस को बाहर खींचा तो वो टूट गई- आधी फाँस भीतर ही रह गई-उस वक्त मैं दर्द सहन नही कर पा रहा था-मै डर के मारे डॉक्टर के पास भी नही गया - करीब एक हफ्ते तक वो दर्द रहा फिर कम होने लगा... अब उस दर्द का कम होना मै बर्दाश्त नही कर पा रहा था-मुझे अजीब लगने लगा!!! अब मुझे इसके साथ रहने की आदत पड़ गई थी- करीब दो हफ़्ते बाद जब वो दर्द लगभग खत्म होने लगा तो उस भीतर घुसी हुई फाँस को मैंने और भीतर कर दिया- फिर खून निकला, फिर दर्द होने लगा। (वह उठता है, और बूढ़े के पास जाता है।) अभी तक ये फाँस मेरी उँगली में जमी हुई है। आप इसे देख सकते है।
बूढ़ा आदमी : (बूढ़ा अपनी बाल्कनी समेत लाल के घर में चला आता है। वो अपनी ही बाल्कनी में बैठा हुआ है और लाल बाल्कनी के नीचे खड़े होकर उससे बात कर रहा है। पीताम्बर लाल की बाल्कनी में जाकर खड़ा हो जाता है।) हाँ मै इसे देख सकता हूँ ये अभी तक तुम्हारे पास है।
लाल : हाँ।
बूढ़ा आदमी : क्या चाहते हो ?
लाल : पता नहीं।
बूढ़ा आदमी : तुम्हें पता है -
लाल : दर्द कम हो रहा है ......
बूढ़ा आदमी : तुम्हें दूसरी फाँस की ज़रुरत है-
लाल : अभी नहीं ......(वो फाँस को वापिस भीतर की तरफ दबाता है।)आ.....ऽऽ
(पिता का प्रवेश)
लाल : (पैर पड़ता है) कैसे हैं आप पापा ?
पिता : बहुत बड़ा हो गया है तू।
लाल : पापा मैं आपके जैसा बनना चाहता हूँ.....
पिता : अरे बेटा मेरे जैसा बनने के लिए बहुत कसरत, वर्जिश करनी पड़ेगी- मैं जब मिल्ट्री में था तो बॉक्सिंग करता था....एक दिन रिंग में मैंने अपने सीनियर का कान काट लिया-वो रोता हुआ गया था-बाद में उसने मेरा कोर्ट मार्शल कर दिया.....पर मैं रोया नहीं....उस वक़्त भी मैं मुस्कुराता रहा, तेरा बाप कभी नहीं रोया...
पीताम्बर : आप कभी नही रोये पापा ?
(पीताम्बर, बूढ़े आदमी को पापा कहकर सम्बोधित कर रहा है। यहाँ लाल अपने बाप से बात कर रहा है। ठीक इसी समय बूढ़ा आदमी भी लाल का बाप हो जाता है।)
लाल : मेरे पापा कभी नहीं रोये.....पापा आप रेम्बो को भी बॉक्सिंग में हरा सकते हैं.....
पिता : बेटा बॉडी से कुछ नहीं होता -जिगर होना चाहिए....... जिगर..
पीताम्बर : पापा आप रोते हैं .....
पिता : बहुत दिन से तेरे साथ बॉक्सिंग नहीं लड़ी.....चल...उठ...मार-मार
(दोनों बाक्सिंग खेलना शुरु करते हैं।)
पीताम्बर : जब आपके छोटे भाई की मौत की ख़बर आपको मिली थी तो आपने अपने आपको बाथरुम में क्यों बन्द कर लिया था ?
लाल : चुप।
पीताम्बर : आप बाथरुम में क्या कर रहे थे।
(बाक्सिंग करते करते पिताजी थक जाते हैं।)
पिता : बस-बस-तुम अपनी सेहत का थोड़ा ध्यान रखो बहुत जल्दी थक जाते हो।
पीताम्बर : मैं हमेशा थक जाता था-मैं बहुत जल्दी थक जाता थ।
पिता : चल एक ताश की बाज़ी हो जाए।
पीताम्बर : बहुत छोटे में मुझे चश्मा लग गया था। पापा ने पाँच बार मेरी आँखों का चेकअप करवाया। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि उनके बेटे को भी कभी चश्मा लग सकता है। मैं अपनी आँखों का चेकअप करवा-करवाकर थक गया। मैं हमेशा थक जाता था। मैं बहुत जल्दी थक जाता था।
पिता : फिर हार गया। अब रोना मत, चल एक और बाज़ी खेलते हैं।
पीताम्बर : एक बार स्कूल में मेरे दोस्त से मेरी लड़ाई हो गई। हम दोनों ने एक दूसरे को चाँटा भी नहीं मारा बस मुँह से ढिशुम ढिशुम की आवाज़ निकालते रहे, वो बच्चों जैसी लड़ाई होती हैं ना जिसमें चाँटे घूसे नहीं पड़ते, बस कपड़े गंदे हो जाते हैं,। मेरी पैंट घुटनों पर से फट गया। घर पर पापा ने देख लिया, पूछने लगे किसने मारा ? मैंने कहा-लड़ाई हुई पर मारा किसी-ने-किसी को भी नहीं। उन्हें लगा मैं कुछ छुपा रहा हूँ। वो उसी वक़्त मेरे दोस्त के घर पर गए और उसके पापा को सड़क पर खड़े होकर गालियाँ दीं और जब मेरा दोस्त माफ़ी माँगने आया तो उसे एक चाँटा मार दिया। स्कूल में काफ़ी समय तक मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाते रहे... ’ऐ इसे छूना मत, नही तो बदला लेने इसका बाप घर तक आ जाता है।’ ये सुनते-सुनते मैं थक गया था। मैं हमेशा थक जाता था। मैं बहुत जल्दी थक जाता था।
पिता : तू फिर हार गया।
लाल : मुझे ताश खेलना नहीं आता है।
पिता : क्यों ?
लाल : क्योंकि आपने कभी मेरे साथ ताश नहीं खेला है।
पिता : क्योंकि तुझे चश्मा लग गया था ना इसलिए।
लाल : आपने मेरे दोस्त को चाँटा क्यों मारा था। (पिता जाने लगता है) इन्दिरा गांधी के मरने की ख़बर दादाजी को क्यों नहीं दी गई।
पिता : इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।
लाल : आप कहाँ जा रहे हैं ?
पिता : बाथरुम। (प्रस्थान)
पीताम्बर : अजीब-सा बुखार आजकल मैं महसूस करता हूँ। ये बुखार बढ़ता नहीं है, घटता नहीं है, अस रहता है वहीं आपके भीतर।
लाल : देर तक सोते रहने से क्यों जैसे कई सवाल उठे। इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है, क्योंकि मेरी कहानियाँ आधी रह जाती हैं पूरी नहीं हो पाती.....मेरी कहानियाँ....(तभी लाल को कहानी सूझती है... पीताम्बर खुश हो जाता है वह जल्दी से अपनी नोट बुक निकालता है।) मेरी कहानी .......मेरे दादाजी काले थे, मेरे पिता गोरे और मैं बहुत गोरा.....शुरु करो.....
पीताम्बर : (टाइप करते हुए) मेरे दादाजी काले थे, मेरे पिताजी गोरे और मैं बहुत गोरा।
बूढ़ा आदमी : मेरे पिताजी बहुत काले थे - वो कहते थे कि वो रात में पैदा हुए है इसीलिए काले हैं....उन्हें पूरा यकीन था कि यदि वे दिन में पैदा हुए होते तो गोरे होते....मेरी तरह-मेरी माँ काली थी, मेरे पिताजी बहुत काले थे- और मै गोरा था....पर मेरे पिताजी खुश रहते थे क्योंकि उनको ये कारण ही बहुत सही लगता था कि मेरा बेटा सुबह पैदा हुआ है इसलिए रात अपना रंग उस पर नहीं छोड़ पाई-वो बच गया, मेरा बेटा बच गया, देर रात को वह हमेशा उठकर एक बार मेरी तरफ़ देख लेते थे......उन्हें रात में मैं बहुत सुन्दर दिखता था-ये वो मुझे सुबह बताते थे...’कल रात को बहुत सुन्दर लिख रहा था।’
लाल : मैं आपको स्टेशन लेने आपने ही वाला था।
(बाप प्रवेश कर चुका होता है....दोनों पैर पड़ते हैं)
पिता : उसकी क्या ज़रुरत है-क्या मुझे तुम्हारा घर नहीं पता है ?
लाल : किसे ढूँढ रहे हैं ?
बूढ़ा आदमी : मुझे दोपहर का आसमान बहुत अच्छा लगता है-दोपहर का आसमान बहुत शान्त होता है-उसमें छोटे धब्बे सी एक चील मँडराती रहती है, मुझे पता ही नहीं चलता था कि मैंने कब चील को देखना शुरु किया और कब आसमान को देखना छोड़ा...अब चील नहीं उड़ती है...उसके पर झड़ते हैं......चील के पर झड़ना अजीब लगता है ना....? जैसे कोई शेर बूढ़ा हो रहा हो और आपने उसके झड़ते हुए दाँत देख लिये... हा.. हा.. हा....।
लाल : किसे ढूँढ़ रहे है?
पिता : तुम्हारी माँ....तुम्हारी माँ की तस्वीर नहीं लगाई तुमने ?
लाल : नहीं लगाई।
पिता : बेटा अब मैं अकेला नही रह सकता....मुझे किसी की ज़रुरत है.... तुम शादी कर लो.... माफ़ करना....तुम एक छोटी-सी दुकान क्यों नहीं खोल लेते.....अरे आजकल STD-PCO बहुत चलते हैं...और उसके साथ अगर Xerox डाल लो तो पैसा ही पैसा...... तुम अपना लिखते रहना, मैं दुकान सँभालूँगा।
लाल : ये कहानी मुझे अभी पूरी करनी है।
पीताम्बर : फिर क्या हुआ ?
पिता : अपनी माँ के नाम पर रखना STD-PCO और Xerox का नाम .... सावित्री बाई STD-PCO & Xerox अच्छा है ना-
बूढ़ा आदमी : फिर मेरी शादी हुई-सावित्री नाम था लड़की का -मेरे पिताजी ने सिर्फ़ इसलिए उससे मेरी शादी की....क्योंकि वो रात में पैदा हुई थी फिर भी गोरी थी-पिताजी को लगा कितनी भाग्यशाली है, रात में पैदा होकर भी गोरी हैं- बाद में हमें एक लड़का पैदा हुआ .......जिसे पैदा होते ही जॉन्डिस हो गया... पीलिया। (बूढ़ा आदमी लाल की तरफ इशारा करता है।)
पिता : घटनाएँ सालों में बँटी होती है .....साल भी हमें घटनाओं के रुप में ही याद रहते हैं....जिस साल की कोई घटना नहीं, समझो वो साल हमने जिया ही नहीं...और कई घटनाएँ इतनी बड़ी होती है कि जीवन लगती है जिसे हम अलग-अलग तरीके से पूरी जिन्दगी जीते रहते हैं।
बूढ़ा आदमी : ये तब की बात है जब हमारे यहाँ नया-नया टीवी आया था- बहुत कम लोगों के यहाँ टी वी हुआ करता था। उस वक्त सावित्री मुझे भूल चुकी थी- उसे टीवी से प्यार हो गया था .....तक तक मेरे पिताजी बूढ़े हो चुके थे, उन्हें अलग कमरे में शिफ्ट भी कर दिया गया था। तब सिर्फ़ दूरदर्शन हुआ करता था और सैटर्डे-संडे को फिल्म दिखाई जाती थी।
लाल : मुझे फिल्म देखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.....पर मेरे दादाजी- वो फिल्मों के पीछे पागल थे- उनके लिए टीवी चमत्कार था- वो फ़िल्म देखते हुए हँसते थे, रोते थे....वो फिल्म देखते नही थे- वो फिल्म देखना जीते थे। दादाजी की आवाज़ चली गई थी- वो दिन भर में केवल दो-तीन शब्द ही बोल पाते थे.....जैसे पानी-खाना और बोलते ही हाँफने लगते थे-इसलिए वो इन शब्दों का इस्तेमाल बहुत नाप-तौलकर करने थे। मै फिल्म नहीं देखता था, मैं तो बस दादाजी को फिल्म देखते हुए देखता था।
पिता : सैटर्डे-संडे को हमारे यहाँ बहुत भीड़ होती थी, सावित्री के दोस्त आते थे- खासकर संडे को तो मेरा अपने ही घर में घुसना मुश्किल हो जाता था। सावित्री को मेरे पिताजी का फ़िल्म देखना बिल्कुल पसन्द नहीं था.... क्योंकि उनके पूरे शरीर से बदबू आती थी पेशाब की......। सावित्री....पर उसने गलत किया......!!!
लाल : क्या....क्या गलत किया था माँ ने ?
पिता : पूरी दुनिया में इतनी कहानियाँ बिखरी पड़ी हैं, तुम कुछ भी लिख सकते हो....फिर क्यों अपने आपको तकलीफ़ दे रहे हो ?
लाल : क्योंकि मैं एक ही तकलीफ़ को बार-बार नही जीना चाहता हूँ।
(लाल बाप के सामने चिल्ला देता है.. बाप घबरा जाता है..।)
पिता : मैं जब सपने देखा करता था तो मैं उन कभी उन सपनों को बुला नहीं पाया जिन्हें मैं देखना चाहता था। मेरे सपने बस आते थे और मै उन्हें देख लेता था। मैं अपने सपने में अपने बेटे को कुछ बनाना चाहता था पर वो बना नहीं, वो मेरे सपनों जैसा ही निकला। वो जैसा था वैसा ही मेरे सपने में आ जाता था।
लाल : क्या ग़लम किया माँ ने ?
पिता : देखा ......
(पिता का प्रस्थान)
लाल : सावित्री ने क्या ग़लत किया ?
पीताम्बर : ये तो तुम्हें पता है .... हे ना?
लाल : हाँ...ये तो मुझे पता है- तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो?
पीताम्बर : पता नहीं.... शायद मैं STD-PCO खोलना चाहता था, नहीं खोल पाया इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ। वैसे भी इस देश में आदमी कौन से रंग का स्कूटर चला सकता है.....? पहले तो स्कूटर चलाते ही वो मिडिल क्लास का हो जाता है ....वो हरे रंग का स्कूटर नही चला सकता, वो भगवे कलर का स्कूटर नही चला सकता, वो लाल रंग का स्कूटर नही चला सकता। तो वो कैसे बता सकता है कि मैं किसी का नही हूँ, किसी की तरफ़ नहीं हूँ.....पीला रंग बचा हुआ है इसलिए मैं पीला स्कूटर चलाता हूँ और मै किसी की तरफ़ नही हूँ।
पीताम्बर : बताओं साचित्री ने क्या ग़लत किया ?
लाल : सावित्री ने दादाजी का संडे को टीवी वाले कमरे में आना बन्द करवा दिया......(संगीत)
(पीताम्बर उस संगीत पर टाईप्राईटर पर जाकर बैठ जाता है.. और टाईप करना शुरु कर देता है।)
बूढ़ा आदमी : पिताजी का संडे को फ़िल्म देखना बन्द हो गया था.... बन्द करवा दिया गया.....सावित्री के दोस्त आते थे ना.....मैंने सावित्री को कहा, पिताजी को फिल्म देखना बहुत अच्छा लगता है....वो पूरे हफ्ते इन दो दिनों का इन्तजार करते हैं और शनिवार-इतवार को तो उनसे शाम का समय नहीं कटता है....वो खाना-पीना सब भूल जाते हैं-पर वो नहीं मानी-संडे को उनका आना बन्द करवा दिया गया। पर टीवी की आवाज़ उनके कमरे तक आती थी।
पीताम्बर : हाँ टीवी की आवाज़ उनके कमरे तक आती थी।
लाल : मुझे उस वक्त फ़िल्म देखने का शौक बिलकुल नहीं था, मुझे तो बस दादाजी को फ़िल्म देखते हुए देखना अच्छा लगता था। अब मैं संडे को दादाजी के कमरे में इर्द-गिर्द मँडराता रहता था, अन्दर जाने की हिम्मत नही होती थी- अगर दादाजी ने मुझसे कह दिया कि मुझे दीवी वाले कमरे में ले चलो तो मैं क्या करुँगा...... माँ ने स़ख्त मना किया था... वैसे मुझे माँ का भी उतना डर नहीं था पर असल में दादाजी दिन भर में कुछ ही शब्द बोल पाते थे और मैं उनके पूरे एक वाक्य को ज़ाया होते हुए नही देख सकता था।
पीताम्बर : एक संडे को मुझसे नही रहा गया...मैंने सोचा वहाँ फिल्म चल रही है तो दादाजी इस वक़्त क्या रहे होंगे। सो मैं एक स्टूल लो आया, ऊपर चढ़ा और खिड़ी का पर्दा हटाकर देखा... तो देखता क्या हूँ कि दादाजी अपने पलंग पर लेटे हुए है...उनकी आँखें माथे की तरफ चढ़ी हुई हैं और वो टीवी वाले कमरे की तरफ देखने की कोशिश कर रहे हैं....और चेहरे पर वैसे ही भाव बदल रहे है जैसे वो फ़िल्म देखते हुए बदलते थे ।
वो हँस रहे थे-वो रो रहे थे....वो चुप थे-वो अब फिल्म देखना सुन रहे थे।
बूढ़़ा आदमी : थककर बैठ जाने से पहले नींद आ जाती थी......पर अब बैठे-बैठे थकना तो होता है पर नींद नहीं आती है। नींद आने के लिए हमारी उम्र में बड़े पैंतरे करने पड़ते हैं.....ये रात से आपके सम्बन्ध पर भी निर्भर करता है...बचपन में मेरे पिताजी मुझसे कहते थे सो जाओ पर हम सोते नही थे-फिर कहते थे....आँखे बन्द करो और एक सपना देखो-जैसे ही सपना खत्म हो जाए, मुझे तुरन्त सुना देना-मेरे अच्छे सपने की तलाश वहीं से शुरु हो जाती थी। जैसे ही सपना मिलता-एक आवाज़ आती...उठो बेटा घूमने चलते है...सुबह हो गई...और सुबह हो जाती थी...रोज़ सुबह घूमते समय मैं पिताजी को अपना टूटा-फूटा सपना सुनाता था- पर आलकल रात, पूरी रात चलती है....सपने हैं जो थकी हुई उबासी की तरह आते है और वहीं उस वक़्त खत्म हो जाते हैं....मेरे पिताजी को भी नींद नहीं आती थी...अब सोचता हूँ कि वो दिन भर एक कमरे में अकेले क्या करते होंगे....कमरा, जिसमें सुबह और रात का पता खिड़की से आती हुई रोशनी के आने और जाने से लगता था--एक बल्ब था नीरस-सा....जिसे जला दो तो समझो रात होने वाली है और बुझा दो तो समझो सुबह....पर वो मुस्कुरा देते थे-बल्ब जलाने का काम मेरा था। जब भी उनके कमरे में बल्ब जलाने जाता था तो पिताजी मुझे देखकर मुस्कुरा देते थे।
पीताम्बर : वह मुस्कुरा देते थे?
लाल : हाँ वह मुस्कुरा देते थे।
पीताम्बर : हाँ वो मुस्कुरा देते थे....बल्ब बुझाने का काम मेरा था। जब भी मैं दादाजी के कमरे में बल्ब बुझाने जाता था-तो वो हमेशा मुझे देखकर सचेत हो जाते थे....जैसे उस कमरे में और भी बहुत से लोग हैं.....जिनसे वो मेरे आने के ठीक पहले तक बातें कर रहे थे....मैं पूरे कमरे में देखता कि वो कौन लोग है जिन्हें दादाजी छुपाना चाहते हैं-अजीब-सी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर छा जाती थी, जैसे कि वो रँगें हाथों पकड़े गए हों....मैं डर के मारे बल्ब बुझाकर भाग जाता था...अरे तुम कहाँ चल दिए ?
लाल : चाय चढ़ाने।
पीताम्बर : इसका क्या होगा ?
लाल : पता नहीं।
पीताम्बर : ये कहानी पूरी नहीं करोगे ?
लाल : करुँगा।
पीताम्बर : कब ?
लाल : अभी....अभी चाय ब्रेक।
पीताम्बर : रुको।
लाल : क्या मैं एक चाय नही पी सकता।
पीताम्बर : चाय पीते वक़्त क्या सोचोगे ?
लाल : अरे ये मैं कैसे बता सकता हूँ।
पीताम्बर : तुम यहीं तय करते जाओ कि चाय पीते वक़्त क्या सोचोगे।
लाल : तय कर लिया।
पीताम्बर : क्या ?
लाल : तुम्हें क्यों बताऊँ (लाल भीतर चला जाता है)।
(अब अगले तीन सीन लाल भीतर चाय बनाते हुए सोच रहा है- जो बाहर हो रहे हैं। तीसरे सीन में लाल खुद बाप के साथ आ जाता है।)
(पीताम्बर पिताजी का एक लेटर लेकर बूढ़े आदमी की बाल्कनी में जाकर खड़ा हो जाता है।)
बूढ़ा आदमी : पीलिया पीला स्कूटर चलाने से खत्म हो जाता है। पर विश्वास करना पड़ता है। पीलिया के कारण मुझे पीले रंग से नफ़रत है।
पीताम्बर : कोई आदमी पीला स्कूटर कैसे चला सकता है। इस बात पर मुझे हँसी आती है। पर मेरे पिताजी के पास इसके कई कारण थे और वो अपने सारे बचकाने कारण मुझे लिखकर बताते थे जिसका नतीजा यह हुआ कि बाद में मैने उनका लिखा हुआ पढ़ना बन्द कर लिया।
बूढ़ा आदमी : छोटे सवालों के छोटे जवाब हो सकते हैं। पर कुछ सवाल इतने बड़े हैं कि उनके जवाब नहीं होते। वो आपके साथ रहने लगते हैं।
पीताम्बर : मैं जब भी पिताजी के लिखे कारण को पढ़ता तो उनसे एक ही बात कहा करता था कि वो मुझे मेरे सपनों जैसे लगते हैं .....टूटे-फूटे, अधूरे, बचकाने।
बूढ़ा आदमी : मैंने अपने अधिकतर लिखे खतों में अपने बेटे से अपने बचकाने सपनों का ही ज़िक्र किया है। पर अन्त हमेशा एक ही लाइन से किया है।
पीताम्बर : (खत का अन्त पढ़ते हुए)मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ कब आऊँ ?
बूढ़ा आदमी : जवाब कभी नही मिला क्योंकि वो मेरे खत खोलकर कभी पढ़ता ही नहीं था। इसलिए मैंने एक ख़त के ऊपर ही लिख दिया ‘‘730AM आ रहा हूँ’’
(ब्लैक आउट)
(पीताम्बर लाल की बाल्कनी में खड़ा है.. नील बाल्कनी में आती है और उसके सामने खड़ी होकर उससे पूछती है।)
नील : अन्दर आऊँ ? या नही आऊँ ?
पीताम्बर : तुम अन्दर आ चुकी हो।
नील : तुम बहुत थक गए हो, इतना मत सोचो ।
पीताम्बर : तुम्हारे सामने बेचारा बनने में कितना सुख मिलता है।
नील : बेचारी मैं।
पीताम्बर : तुम मुझे कभी माफ़ नही करोगी ना ?
नील : तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करुँ।
पीताम्बर : हाँ मैं चाहता हूँ... मैं चाहता हूँ कि तुम यहाँ कभी ना आओ।
नील : क्यों मुझमें एक फाँस ढूँढ़ रहे हो ?
पीताम्बर : नहीं।
नील : तुम जब भी मुझसे प्यार करते हो मुझे लगता है कि तुम मुझसे
बदला ले रहे हो।
पीताम्बर : किस बात का ?
नील : वो चीजें जो तुम्हारे पास नहीं हैं, उनका। या वो चीजें जो सिर्फ तुम्हारे ही पास है।
पीताम्बर : जो बाते मैं तुमसे कहता हूँ तुम्हारे जाने के बाद उनसे कही ज्यादा उन बातों की कतरनें मेरे घर में बिखरी रहती हैं जो मैं तुमसे नही कह पाता हूँ।
नील : क्या कहना चाहते हो ?
पीताम्बर : पता नहीं। (किचेन से कुछ गिरने की आवाज़ आती है) कहानी पूरी करनी है।
नील : क्या कहती है तुम्हारी कहानी। आज पूरी हो जाएगी ?
पीताम्बर : आज पूरी करनी है। वो पिताजी के सारे लेटर्स खोल के पढ़ चुका हूँ सिवाए अन्तिम लेटर के। अगर वो खुल गया तो कहानी यहीं रुक जाएगी।
(डोरबेल)
(लाल और उसके पिता दरवाजे़ से अन्दर आते हैं। लाल के कपड़े अलग है.. वह इस समय तीसरे सीन में हैं जो वह भीतर चाय बनाते हुए सोच रहा है।)
लाल : आइए, आइए पिताजी सँभल के हाँ, यहाँ बैठ जाइए।
पिता : कैसे हो बेटा? यहाँ सब ठीक है ना.....मुझे कई दिनों से बुरे सपने आ रहे थे- लगा तुम्हारा एक्सीडेन्ट हो गया है....तुम फिर से बीमार पड़ गए हो....तुम्हें जॉन्डिस हो गया है .....
लाल : नही....
पिता : मेरी तबीयत ठीक नहीं है ....फिर भी मैं आ गया....सोचा कुछ दिन तुम्हारे साथ रह लूँगा तो सब ठीक हो जाएगा....वैसे मैंने अपने सारे लेटर्स के अन्त में तुमसे पूछा है कि मैं तुम्हें मिलने आऊँ-पर तुमने जवाब नहीं दिया....मैं यहाँ ज्यादा दिन नही रुकूँगा, मुझे पता है तुम्हें मेरा यहाँ आना पसन्द नहीं......
पीताम्बर : नहीं ऐसी बात नहीं है....पापा...मैं...मैं...कुछ बोलो ना....
लाल : पानी पियेंगे ?
पिता : जो पूछना चाह रहे हो....पूछ लो....
लाल : आप बल्ब जलाने जाते थे ना...तो आपने इंदिरा गांधी के मरने की ख़बर दादाजी को क्यों नहीं दी.....?
पिता : इसमें तुम्हारी ग़लती नहीं है......
नील : उन्होंने कह दिया, इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं है...चुप रहो।
लाल : मेरी ग़लती की मुझे चिन्ता नहीं, पर आप......
नील : देखो ये मत पूछना......
लाल : आप माँ को छोड़कर क्यों चले गए थे...? बाद में माँ से बार-बार मिलने क्यों आते थे....?
नील : उनकी तबीयत ठीक नहीं है और तुम ......
पिता : पता है जब मैं और मेरे पिताजी रोज़ घूमने जाया करते थे ना तो मैं उन्हें अपने सपने के बारे में बताया करता था....हर रोज़...। उस वक़्त मेरे पिताजी के रंग की एक काली चील हमारे सिर के ऊपर मँडराया करती थी- पिताजी कहते थे-जब मैं ना रहूँ तो तुम अपने सपने इस चील को सुना देना और मान लेना कि मैं सुन रहा हूँ.....मैंने मान लिया-आज तक मैं यही मानता आ रहा हूँ, तुम्हें भी अन्त मानना पड़ेगा।
नील : देखो तुम मान सकते हो.....मान लो अन्त....और कहानी खत्म करो।
पिता : आजकल सपने नहीं आते....रात पूरी रात चलती है.....सोते रहना बड़ी कला है जो एक उम्र के बाद कम होती जाती है....सुबह घूमने भी नहीं जाता हूँ....क्योंकि चील बूढ़ी हो चुकी है.......वो ऊपर आसमान में नही उड़ती....उसके पर झड़ते हैं.....वो मेरे घर के सामने-एक पेड़ के ठूँठ पर बैठी रहती है..........मैं रोज सुबह घर से निकलकर उस पेड़ के नीचे जाके थोड़ी देर बैठ जाता हूँ-मेरे पास कोई सपना नहीं होता लेकिन चील सपना सुन रही होती है-वो मान लेती कि मैं सपना सुना रहा हूँ.......और मैं मान लेता हूँ कि वो सपना सुन रही है..
लाल : पर आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया.....?
नील : वो जवाब दे चुके हैं।
पिता : इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।
पीताम्बर : ये तो मैं अपने आपको कब से समझा रहा हूँ....पर उस डर का क्या करुँ....जिसे एक बुखार की तरह मैं अपने भीतर पाल रहा हूँ....जो बढ़ता नही है, घटता भी नहीं है, बस रहता है वहीं आपके भीतर।
लाल : ये डर है शब्दों का .....अनकहे शब्दों का....जो कोई आपसे कहना चाह रहा था पर आप उसे अनसुना करते रहे। हर सुबह जब मैं दादाजी के कमरे में बल्ब बुझाने जाता था...तो वो कुछ शब्द मुझसे कहते थे-शब्द जिन्हें मैं समझता तो था पर सुनना नहीं चाहता था। मैं डर के मारे उनके सामने चिल्ला देता था-क्या...क्या? पानी चाहिए...?.क्या....?चाय....चाय चाहिए? भूख लगी है...? अच्छा मैं बाद में आता हूँ और उनके कमरे से बाहर निकल आता था।
पीताम्बर : पर वो शब्द...वो अधूरे शब्द पूरे दिन मेरे कानों में गूँजते रहते थे। बाद-बाद में वो डर इतना बढ़ गया कि मैंने उनके कमरे में जाना ही बन्द कर दिया- चुपके से बल्ब बुझाने जाता था और वहाँ से भाग जाता था।
पिता : तुम पीला स्कूटर मत बेचना उसे अपने पास ही रखना।
लाल : आपने दादाजी को इंदिरा गांधी के मरने की खबर क्यों नही दी?
पिता : तुम अपने सपने....अपनी कहानियाँ स्कूटर को सुनाया करना और मान लेना मैं सुन रहा हूँ।
बूढ़ा आदमी : (निर्मल वर्मा ने कहीं लिखा है) ’एक उम्र के बाद माँ-बाप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र की छाया तले छोटे होते जाते हैं।’ मेरे पिताजी सचमुच बच्चे हो गए थे। वेा फिल्म देखने के पीछे पागल थे...वो बच्चों जैसी ज़िद करने लगते थे। खाना-पीना छोड़ देते थे। शनिवाद को फ़िल्म देखते थे, लेकिन मैनें उन्हें संडे को फिल्म नही देखने के लिए जैसे-तैसे मना लिया था....मुझे लगा मैं उनसे उनके जीवन को आधी साँसें माँग रहा हूँ। उन्हें बहुत दुःख पहुँचा था...मैं सावित्री से बहुत नाराज़ हुआ करीब एक हफ़्ते घर भी नहीं आया.....खैर....अन्त में वो नही मानी।
लाल : मुझे माफ़ कर देना पापा.....
पिता : नहीं-इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है...बेटा मुझे......अन्दर....
लाल : चलिए मैं ले चलता हूँ...कहाँ जाना है......
पिता : बाथरुम।
(लाल पिताजी को लेकर अन्दर आता है, ब्लैक आउट होता है। जब लाइट आती है तो पीताम्बर टाइप कर रहा होता है और हम देखते हैं, एक बाल्कनी में बूढ़ा आदमी और एक बाल्कनी में पिता नाच रहे होते है... ये उनके पात्रों के लिखे जाने का उत्सव जैसा है। लाल चाय का कप लेकर अन्दर आता है, बाप और बूढ़े आदमी पर से लाईट जाती है.. और कहानी आगे बढ़ती है।)
पीताम्बर : चाय ब्रेक ओवर ?
लाल : हाँ....चाय ब्रेक ओवर।
पीताम्बर : फिर क्या हुआ ?
लाल : फिर इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई।
पीताम्बर : फिर एक दिन खबर आई कि इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई है..... 31 अक्टूबर, बुधवार....पूरे देश में शोक मनया गया। टी0वी0 पर भी फिल्में दिखाई जानी बन्द हो गई....पिताजी ने माँ से कहा-इंन्दिरा गांधी के मरने की खबर दादाजी को दे देना और माँ ने.....
लाल : और माँ ने वो काम मुझे सौंप दिया.... बेटा अपने दादाजी को बता देना कि इंदिरा गांधी की मृत्यु हो गई है...इसलिए टी0वी0पर फिल्में नहीं आ रही हैं।
पीताम्बर : मैं कई दिनों तक दादाजी के कमरे के इर्द-गिर्द मँडराता रहा....उसमें एक सेटर्डे संडे भी निकल गया पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
लाल : फिर एक दिन मैं दादाजी के कमरे में गया...घुसते ही लगा जैसे वो मेरा इन्तजार कर रहे थे। मैं उनके पास गया तो उन्होनें मेरा हाथ पकड़ लिया.....कसकर पता नहीं इतनी ताकत उनमें कहाँ से आ गई थी। मुझे अपने पास खींचा और कहा ‘‘मेरे कान खराब हो गए हैं, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है’’ वो एक साँस में इतनी लम्बी लाइन कैसे बोल गए-वो हाँफने लगे, उन्हें मेरे भाग जाने का शायद डर था, इसलिए उनके हाथ की पकड़ तेज होती जा रही थी......उन्होने मुझे और पास खींच लिया...शायद वो और कुछ कहना चाह रहे थे-पर उनका चेहरा डरावना होता जा रहा था। मैं डर गया जल्दी में मैने कहना चाहा कि-‘‘इन्दिरा गांधी की मृत्यु हो गई है इसलिए टी0वी0 पर फिल्में नहीं.....’’ पर मेरे मुँह से एक शब्द भी नही निकला। मैंने देखा उनकी आँखें पीली होती जा रही हैं.... चेहरा काला-पीली आँखें......वो एकदम चील जैसे दिखने लगे थे-मैं डर गया...मैंने अपना हाथ छुड़ाया और कमरे से बाहर निकल आया।
बूढ़ा आदमी : इतवार को मुझे अभी भी याद है...जब मैं उनके कमरे में बल्ब जलाने गया था, तो देखा उनकी आँखें उनके माथे तक चढ़ी हुई हैं। वो टी0वी0 वाले कमरे की तरफ़ देखने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे अजीब लगा, क्योंकि वो पहली बार मुझे देखकर मुस्कुराए भी नहीं.....पास पहुँचा तो देखा उनका शरीर पूरी तरह अकड़ा हुआ है.....इच्छा तो हुई कि सावित्री को घसीटकर लाऊँ और ये दृश्य दिखाऊँ...पर मैं उनके पास जाकर बैठ गया ... उनसे माफ़ी माँगी.....उनकी पलकों पर हाथ फेरा और उनकी आँखें बन्द हो गई।
(बूढा आदमी उठकर जाने लगता है।)
लाल : कहाँ जा रहे हैं आप ?
बूढ़ा आदमी : बाथरुम।
पीताम्बर : लगातार पिताजी का बाथरुम आना मैं देखता रहा.....वो बहुत परेशान थे-मेरी इच्छा हुई पिताजी से कहूँ कि मेरे कारण ही दादाजी की मृत्यु हो गई...मैं ही उन्हें इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बारे में नही बता पाया....पर...मेरी हिम्मत ही नहीं हुई...मुझे मार खाने का डर नहीं था। मुझे पिताजी की चिन्ता थी, वो दादाजी की मौत के कारण पूरी टूट चुके थे-मैंने सोचा समय आने पर बता दूँगा। सही समय आने पर बता दूंगा......
लाल : मैं सही वक़्त का इन्तजार ही करता रहा....दादाजी की मृत्यु के तीसरे दिन पिताजी घर छोड़कर चले गए थे....वो जाते वक़्त अपना सारा सामान भी ले गये थे। सारा समान, मतलब एक झोला और एक पेटी। पीला स्कूटर छोड़ गए थे.... उस वक़्त भी उन्हें मेरे जॉन्डिस की चिन्ता थी।
पीताम्बर : पिताजी के आए सभी लेटर्स को मैने कभी खोला नही, पर पिछले दो महीने से उन्हें खोलता हूँ, पढ़ता हूँ, जवाब लिखता हूँ। उनका अन्तिम लेटर दो महीने पहले आया था...ये मैंने अभी तक नहीं खोला है....कल 7:30AM आ रहा हूँ....ऊपर ही लिखा है....। इस लेटर के बाद ना वो आए, न उनका कोई लेटर,.... किसी के मरने का आपको उतना दुःख नहीं होता है, जितना इस बात का कि उसके साथ-साथ वो सम्बन्ध भी जल गया, जो सिर्फ आप दोनों जी रहे थे....एक साथ.....। फिर लगने लगता है जैसे आपके साथ धोखा हुआ है.. आप दोनों का एक संबंध का एक पुल था जिसपर आप दोनों चला करते थे.. एकसाथ। अचानक वो अपना हिस्सा काट कर चला गया....अब आप अधूरे पुल के छोर पर खड़े हैं....जहाँ से आपको उसके जीवन का किनारा तो दिख रहा है पर उस किनारे के रहस्यों को आप कभी नहीं जान पाएँगे......वो दिन-ब-दिन आपसे दूर होता जाएगा......
लाल : कहानी तो दादाजी की मौत पर खत्म हो चुकी है.....अब ये जो भी हैं उस कहानी की कतरनें है-जो इस कहानी में ही हैं.... पर इनकी कहानी को अब कोई ज़रुरत नहीं है।
पीताम्बर : 7:30AM पिताजी आने वाले हैं।
लाल : हाँ।
पीताम्बर : एक बात पूँछू ?
लाल : पूछो !
पीताम्बर : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ? हा-हा-हा.....
(चला जाता है ....पिता का प्रवेश)
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : मान लेने के लिए मेरे पास ज़्यादा कुछ नहीं है....एक पीला स्कूटर है, जिसे पिताजी के खतों के जवाब पढ़कर सुनाता हूँ और मान लेता हूँ कि पिताजी सुन रहे हैं, इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : अब मुझे पीलिया का भी डर है इसलिए मैं पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : तुम पीला स्कूटर क्यों चलाते हो ?
लाल : मैं असल में... अपने आपसे बदला ले रहा हूँ...ये पीला स्कूटर नहीं है ये असल में मेरी उँगली में फसी हुई एक फाँस है...जिसे मैं आपने साथ लिये घूमता हूँ। इसलिए पीला स्कूटर चलाता हूँ।
पिता : अपराध बोध अगर पीठ पर लादे घूमते रहोगे तो जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा।
लाल : आप....आप कब आए ?
पिता : 7:30AM मैंने कहा था आऊँगा।
लाल : कब तक आप आते रहेंगे ?
पिता : जब तक तुम मेरा अन्तिम लेटर खोलकर पढ़ोगे नही.....
लाल : मेरे पास बहुत सारे सवाल थे-जिनका उत्तर सिर्फ़ आप जानते थे। इन सवालों के साथ, आपसे मिलने से भी मै डरता था- इसलिए मैं पूछ नहीं पाया ...पर कोई है जो इन सवालों के उत्तर जानता है...ये विश्वास ही अपने आपमें इतना बड़ा था कि इन प्रश्नों के साथ् मैं आराम से जी रहा था। पर आपकी मृत्यु के साथ ही ये विश्वास भी मर गया और ये कल्पना ही अपने आप में इतनी डरावनी लगने लगी कि अब पूरी जिन्दगी आपको अकेले ही इन प्रश्नों के बोझ तले जीना पड़ेगा। अब कोई भी नहीं है जो इन प्रश्नों के उत्तर जानता है...पर अब मैंने मान लिया है कि आपने मेरे सारे सवालों के उत्तर अपने इस अन्तिम ख़त में लिख दिए हैं। इस ख़त को मैं पूरी ज़िन्दगी अपने पास रखूँगा पर खोलूँगा नही....मैंने मान लिया है।
पिता : मैंने कहा था अन्त तुम्हें मानना पड़ेगा...अच्छा है तुमने मान लिया। अब मैं नही आऊँगा। मैं जाता हूँ।
लाल : पापा... मेरी एक इच्छा है, मै एक बार आपकी गोद में सर रखकर सोना चाहता हूँ, सो सकता हूँ ? और जब तक मैं सो ना जाऊँ आप कुछ बोलते रहना ....
पिता : क्या बोलता रहूँ ?
लाल : वही जो मैं सुनना चाहता हूँ।
पिता : सो जाओ.... सभी अपने-अपने तरीके़ से रात के साथ सोते हैं। हर आदमी का रात के अँधरे के साथ अपना सम्बन्ध होता है। ये सम्बन्ध अगर अच्छा है तो आपको नींद आ जाती है और अगर सम्बन्ध ख़राब है जो आपके जीवन के छोटे-छोटे अँधेरे, रात के अँधेरे में घुस आते है जो आपको सोने नही देते और आप दूसरों को....



अंत.................................................................

1 टिप्पणी:

  1. सर मेरी ये कविता कबूल करे आपके नाटक पर लिखी है
    पीली स्कूटर वाला
    उन रातोंके हर कोने में
    मैं ढूँढता हु एक रंग न जाने
    कौन से रँग का ।
    सफ़ेद या काला...हरा या नीला
    नहीं शायद पिलाही होगा।
    ना जाने कौनसे वक्त मैंने
    वह होली खेली थी जहाँ मेरे
    रूह को लग गया यह रंग...।
    कई कोशिशों के बावज़ूद मिटाता नहीं है ये।
    रात का रंग भी अब
    पिला दिखता है...उन कवाड़ों के पीछे
    एक स्कूटर है मेरा
    शायद पिले रंग का ही है।
    हर रात मैं किश्तों मे जीता हूँ
    जैसे हर रंग का कुछ
    उधार है मुझपर...
    रंग का या कुछ कर्म का ?
    कई सायें पिरोये गये है मेरे
    आसपास किसी मकसत से
    पर वो क्यूँ पिले है ?
    आवाज़े भी होती है तो लगता
    है कोई रंग बोल रहा हो....
    खुले आसमान को देखता हूँ तो लगता है कही तो रखीं है मैंने मेरी सोच।
    मैं अब डूबता जा रहा हु उस
    पिले रंग मे...उसके पहिले एकस कोई अंत है ?
    मुझे ढूँढना है सफ़ेद रंग मेरे भविष्य का ....पर मेरे पिछे कई ढेर पड़े है रंगो के ..
    उसमें से ढूँढना है मुझे मेरा
    काला रंग जिससे शायद
    मिट जाये ये पिला रंग।
    उन रातोंसे कई रिश्ते है
    मेरे ..
    जो कोई नज़्म के दायरे में
    सिमड़ गए है।
    उन रिश्तों की सच्चाई का
    रंगही मुझे आजादी देगा
    मेरे इस पिले रंग से ...
    पर उस स्कूटर का रंग कोई
    भी हो उसको मैं पिला ही बनाऊंगा।
    राहुल जगताप (जेपी)

    उत्तर देंहटाएं