बुधवार, 23 मार्च 2011

ऐसा कहते है...


ऐसा
कहते
है...








सीन-1

सैम- मुझसे शादी करोगी?
काया- नहीं।

सीन-2

काया- तुमने इतने सालों में कोई दूसरा तरीका नहीं सीखा।
सैम- तुमने इतने सालों में दूसरे तरीकों से जवाब देना नहीं सीखा।
काया- हाँ, तुमने कभी गिना हैं कितनी बार तुम मुझे शादी के लिए प्रपोज कर चुके हो?
सैम- मैं अपने फ़ेल्योर्स (failures) याद नहीं रखता।
काया- हमने कितना अच्छा समय साथ में गुजारा हैं अभी भी कहानियां कहते ही हो कि उन्हें लिखना भी शुरू किया हैं।
सैम- सुनने वाले कम हैं पर कहता ही हूँ मेरी कहानियां सुनना हैं तो मेरे पास आना पड़ेगा और वो मेरे साथ ही खत्म हो जायेंगी
काया- कुछ सुनाओं
सैम- क्या
काया- कुछ भी
सैम- एक छोटी कहानी

बहुत पहले अब तो मुझे याद भी नहीं कब
मैंने अपने हाथ पर लिख दिया था ’प्रेम’
क्यों? क्यों का पता नहीं पर शायद ये
भीतर पड़े सूखे कुंए के लिए बाल्टी खरीदने की आशा जैसा था।
से मैंने इसे अपने हाथ पर लिख लिया- ’प्रेम’
आशा? आशा ये कि इसे किसी को दे दूँगा।
जबरदस्ती नहीं चोरी से भी नहीं
किसी की जेब में डाल दूंगा या किसी की किताब में रख दूंगा
या ’रख के भूल गया जैसा’ किसी के पास छोड़ दूंगा
इससे क्या होगा ठीक-ठीक पता नहीं
पर शायद मेरा ये ’प्रेम’ उस किसी के साथ रहते-रहते जब बड़ा होगा, तब
तब मैं बाल्टी खरीदकर अपने सूखे कुंए के पास जाउंगा
और वहाँ मुझे पानी पड़ा मिलेगा
पर ऐसा हुआ नहीं- ’प्रेम’ चोरी से मैं किसी को दे नहीं पाया
वो मेरे हाथ में ही गुदा रहा





फिर इसके काफी समय बाद अब मुझे याद नहीं कब
मुझे तुम मिली और मैंने.....
अपने हाथ में लिखे इस शब्द ’प्रेम’ को वाक्य में बदल दिया.....
’मैं तुमसे प्रेम करता हूँ’
और इसे लिये तुम्हारे साथ घूमता रहा.....
सोचा इसे तुम्हें दे दूंगा.....
जबरदस्ती नहीं.... चोरी से.....

तुम्हारे बालों में फंसा दूंगा.....
या तुम्हारी गर्दन से लुढ़कती हुई पसीने की बूंद के साथ बहा दूंगा।
या अपने किसी किस्से कहानियां कहते हुए..... इसे बीच में डाल दूंगा।
फिर जब ये वाक्य तुम्हारे साथ रहते-रहते बड़ा हो जायेगा।
तब मैं अपने कुंए के पानी में..... बाल्टी समेत छलांग लगा जाउंगा।
पर ऐसा हुआ नहीं..... ये वाक्य मैं तुम्हें नहीं दे पाया.....
पर अभी कुछ समय पहले..... अभी ठीक-ठीक याद नहीं कब.....
ये वाक्य अचानक कहानी बन गया।
’प्रेम’..... मैं तुमसे प्रेम करता हूँ- और उसकी कहानी।
भीतर कुंआ वैसा ही सूखा पड़ा था.....
बाल्टी खरीदने की आशा...... अभी तक आशा ही थी!
और ये कहानी.....
इसे मैं कई दिनों से अपने साथ लिये घूम रहा हूँ।
अब सोचता हूँ..... कम से कम..... इसे ही तम्हें सुना दूंगा.....
जबरदस्ती नहीं..... चोरी से भी नहीं..... बस तुम्हारी इच्छा से.....


काया- ये तो कविता जैसी हैं.....
सैम- मेरे लिए ये कहानी है।
काया- मिलने के लिए तुम्हें ये ही जगह..... रेलवे स्टेशन
सैम- क्या करू दिन भर तुम्हारे पास समय नहीं था और शाम की ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं मिला।
काया- नहीं मिला या नहीं लिया।
सैम- जो भी हैं..... तुमसे मिलना जरूरी था।
काया- कितनी चुप्पी हैं यहाँ।
सैम- अरे तुम्हें ये कबूतरों की आवाज सुनाई नहीं दे रही।
काया- वो दिख भी रहें हैं। पर ये इस चुप्पी को और भी बढा रहें हैं।
सैम- चार पच्चीस की ट्रेन हैं..... शायद इससे कम ही लोग जाते है।
काया- ये कोना तो रेलवे स्टेशन का हिस्सा भी नहीं लगता है।
सैम- भई S-1 तो यहीं आयेगा।



काया- हम इतने सालों बाद रेलवे स्टेशन पर बात करते पाये जायेंगे, तुम्हें अजीब नहीं लग रहा ?
सैम- पता नहीं.... असल में मैंने तुम्हें लगभग हर जगह प्रपोज किया हैं पर रेलवे स्टेशन पर कभी नहीं इसलिये........
काया- जगह बदलने से कुछ नहीं होगा।
सैम- मैं भी काफी बदल गया हूँ।
काया- बस तुम्हारी कहानियां छोटी हो गई हैं।
सैम- बस..... मेरे कहने का तरीका भी बदला हैं.....
काया- क्या कहने का.....
सैम- पहले या तो मैं खड़े होकर या बैठ कर कहता था अब ये देखो नया तरीका, मैं अपने घुटनों पर बैठ कर कहता हूँ..... मुझसे शादी करोगी.....?
काया- नहीं......


सीन-3

सैम- तुम्हें ना कहने में बहुत सुख मिलता हैं ना.....
काया- मना करने का अपना तो सुख हैं..... पर .....
सैम- पर..... ?
काया- देखो हम एक दूसरे को स्कूल से जानते हैं मुझे पहले अजीब लगता था जब तुम मुझे प्रपोज करते थे.... पर अब तो ये मुझे अपनी बातचीत का ही हिस्सा लगता हैं प्रेडिक्टबल सी बात है और मैं इसके लिए हमेशा तैयार भी रहती हूँ.......
सैम- प्रेडिक्टबल.....
काया- सॉरी...... नहीं प्रेडिक्टबल सही शब्द नहीं है।
सैम- नहीं सही हैं, मैं यूं भी काफी प्रेडिक्टबल हूँ.......
काया- देखो मैं..... अब मैं तुमसे कैसे कहूँ...... मेरी इच्छा है.... नहीं इच्छा नहीं....मेरी कल्पना है.... फ़ैंटेसी है...... कि जब कोई मुझे प्रपोज करे तो वो ऐसा हो कि उसके प्रपोज करते ही चारों तरफ मुझे संगीत सुनाई दे..... फूल झड़ने लगे और सब कुछ..... सब कुछ बदल जाए एकदम..... और मैं चाहूँ मेरे मुँह से हाँ ही निकले।
सैम- तुम्हें पता हैं संगीत के मामले में मैं कौवा हूँ।
काया- शायद तभी तुम्हारे प्रपोज करने पर कभी संगीत सुनाई नहीं दिया।
सैम- कम से कम तुम कोशिश तो कर ही सकती हो।
काया- क्या...... मैं क्या कोशिश कर सकती हूँ ?
सैम- तुम महसूस कर सकती हो कि...... संगीत सुनाई दे रहा है।
काया- हे भगवान, तुम नहीं समझोगे.....
सैम- अच्छा एक मौका तो दो मुझे..... प्लीज... एक बार मेरे लिए एक कोशिश तो करो...
काया- मैंने तुमसे सब कहा ही क्यों ?
सैम- देखो तुम आँखे बंद करो.... कोशिश करो सब होगा...
काया- ये भी कर लो...
सैम- मुझसे शादी करोगी ?
काया- नहीं।

सीन-4

काया- कैसा लग रहा हैं... मेरा गाँव तुम्हें....?
सैम- कैसा लगेगा...
काया- मुझे विश्वास नहीं होता तुमने मेरे पीछे अपना ट्रांसफ़र करवा लिया।
सैम- तुम्हारे लिये नहीं अपने लिये...
काया- अपने लिये....?
सैम- मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ.... प्योर सेलफ़िश रीजन....
काया- खैर... इतने समय तुम कहाँ थे ?
सैम- क्यों, तुम मेरा इंतजार कर रहीं थी ?
काया- नहीं, इतने समय बाद दिखे इसलिए पूछा इतने समय कहाँ थे।
सैम- वहीं मेरा इलाज चल रहा था, फिर उसी बीच जॉब भी लग गया और पिछले कुछ महीनों से तो सिर्फ सरकारी लोंगों को घूस खिला रहा था कि मेरा तबादला यहाँ करा दो वैसे तुम इस गाँव में क्या कर रही हो ?
काया- NGOs के लिये काम।
सैम- जब मैं अपना तबादला करता रहा था तो लोग कह रहे थे कि लोग वहाँ से शहर तबादला करवाने के लिये पैसे देते हैं और आप वहाँ जाने के लिये पैसे दे रहे हो। सब हँस रहे थे मेरे ऊपर।
काया- तुम्हें इतना विश्वास कैसे है कि मैं हाँ कर ही दूंगी ?
सैम- पता नहीं... बस है... और इसका एक घटिया कारण भी हैं मेरे पास... देखो हम सालों पढ़ाई करते हैं कि अच्छा जॉब लग जाये और उस जॉब के साथ हम अपनी पूरी जिंदगी काट सके। जॉब तो मिल गया पर पूरी जिंदगी मैं जॉब के साथ नहीं काटना चाहता हूँ, ये समझ लो कि मैं फिर पढ़ रहा हूँ, मेहनत कर रहा हूँ.... कि पास हो जाऊँ, तुम हाँ कह दो और पूरी जिंदगी मैं तुम्हारे साथ काट सकूं। क्या हुआ.... अरे अच्छा नहीं लगा...?
काया- बचकाना है।
सैम- इसलिये तो मुझे भी अच्छा लगा।
काया- मैंने तुम्हें इतनी बार कहा हैं कि तुम मेरे दोस्त हो..... एक अच्छे दोस्त.... बस... और तुम जानते ही हो कि मैं engaged हूँ।
सैम- थीं तुम engaged थीं।
काया- ओह तो तुम्हें पता है।
सैम- जैसे ही तुम्हारा उससे रिश्ता शुरू हुआ क्या नाम था उसका?
काया- ईश्वर।
सैम- हाँ, जो भी हो मैंने उससे दोस्ती जैसी कर ली थी उसे फोन करता था इधर-उधर की बातें करता था, तुम्हारा हालचाल पूछता था और बस इंतजार करता था।
काया- कहीं तुमने उससे मेरे बारे में कुछ? कहीं तुम्हारी वजह से?
सैम- नहीं-नहीं... मैंने कहा ना मैं अपनी पढ़ाई कर रहा हूँ मैं अपनी मेहनत से पास होना चाहता हूँ दूसरों से कोई मतलब नहीं।
काया- तुम सच में थोड़ा बदल गये हो।
सैम- मैंने कहा था ना।
काया- इतनी देर से तुमने एक चाय भी नहीं पी।
सैम- इच्छा तो बहुत हो रही हैं, पर आज ही के दिन दुकान बंद रहती हैं।
काया- बैड लक
सैम- क्या तुम्हें मुझमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता ?
काया- लगता हैं ना जब तुम कहानियाँ सुनाते हो। मुझे तुम्हारे मुँह से कहानियाँ सुनना अच्छा लगता है।
सैम- ठीक हैं मैं तुम्हें जिंदगी भर कहानियाँ सुनाऊँगा ये वादा करता हूँ क्या अब तुम मुझसे शा।
काया- नहीं

सीन-5

काया- कुछ सुनाओ ना?
सैम- क्या...? क्या सुनोगी ?
काया- कुछ भी
सैम- अच्छा ये कहानी सुनो एक बार सर्कस के दो लड़के छोटू और बंटी चोरी के इल्जाम में पकड़े जाते हैं और (काया ताली तजाती हैं, सैम कहानी कहना बंद कर देता है।)
काया- नहीं मुझे प्रेम कहानी सुनाओ।
सैम- प्रेम कहानी... ???
काया- हाँ तुम प्रेम कहानी अच्छी सुनाते हो।
सैम- अच्छा
काया- पर कहानी सुखांत होनी चाहिये।
सैम- क्या ? एक तो प्रेम कहानी ऊपर से सुखांत
काया- हाँ कहानी का अंत बस सुखद होना चाहिए इतना ही तो कह रही हूँ।
सैम- कोशिश करता हूँ... अ अ अ अ क्या मैं इस प्रेम कहानी में तुम्हारा जिक्र कर सकता हूँ।
काया- तब तो उसका दुखांत होना निश्चित है।
सैम- नहीं पर मैं कोशिश... जाने दो।
काया- हुआ... सुनाओ कहानी।
सैम- मैं सोच रहा था, किसी कहानी में से प्रेम निकाल दो तब भी क्या प्रेम कहानी हो सकती है?
काया- तब वो सिर्फ कहानी होगी।
सैम- सिर्फ कहानी... सिर्फ कहानी मतलब सिर्फ कहानी।
काया- मैं तुमसे सिर्फ प्रेम कहानी सुनना चाहती हूँ।
सैम- हाँ, वो मैं समझा क्या मैं इस प्रेम कहानी में किसी और नाम से तुम्हारा जिक्र कर सकता हूँ।
काया- देखो मैं बात अंत की कर रहीं हूँ कहानी सुखांत होनी चाहिये बस।
सैम- मुझसे शादी करोगी?
काया- देखो...
सैम- नहीं-नहीं ये कहानी है।
काया- अच्छा तुमने अंत से शुरूआत की हैं।
सैम- नहीं, ये शुरूआत ही है। देखो तुमने कहा था कि अंत सुखद होना चाहिए तो शुरूआत मैं कैसे भी कर सकता हूँ।
काया- देखो फंस जाओगे।
सैम- देखेंगे।
काया- अच्छा फिर फिर क्या हुआ ?
सैम- मुझसे शादी करोगी (पॉज) और लड़की ने मना कर दिया।
(सैम उठकर स्टेज की तरफ आता हैं स्टेज पर पैर रखते ही उसे ट्रेन के सायरन की आवाज आती हैं वो डर जाता है।)
काया- क्या हुआ डर गए ?
सैम- बहुत दिनों बाद कहानी सुना रहा हूँ। दिमाग में काफी पागलपन भरा हुआ है।
काया- जाने दो तुमसे नहीं होगा।
सैम- हं अच्छा? तो लो।


सीन-6

(कौआ गाने की कोशिश करता है)


कितनी सारी चांद की रातें, कितना दिन का उजाला
बाकी सब क्यों बने कबूतर, मैं क्यों बना कौवा काला
जिंदगी थोड़ी सी हो जाती बेहतर, जो मैं भी होता कबूतर।
कबूतर-कबूतर

(सब लोग उसे मारकर भगा देते हैं।)

गाना-
कबूतर-कबूतर
कबूतरों की कहानियाँ
तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा
चुनके-बुनके निशानियाँ
कबूतरों की कहानियाँ
कबूतर-कबूतर
जो कह ना सके हम डर गये।
या कहने से पहले ही मर गये
मरे हुए लोंगो की जिंदा परेशानियाँ।
कबूतरों की कहानियाँ
कबूतर-कबूतर
जो बात अधूरी लेके मरेगा
वो बनके कबूतर फिरेगा।
इस शहर का हर इक परिंदा
आधी कहानी लेकर हैं जिंदा
कबूतर-कबूतर
पर आज तलक तो हुआ नहीं
किसी आधी कहानी को छुआ नहीं
अब बात फंसी हैं कुछ ऐसी
होंगे आँसु या होगी खुशी।

भाई- तुझसे मना किया ना, बीच में आकर मत गाया कर कौवे।
कौआ- मैं गाना चाहता हूँ।
भाई- चाह लेने से गाना नहीं होता हैं, रियाज करना होता हैं, मेहनत करनी होती हैं कौवे।
कौवा- कौवा मत बोल मुझे।
भाई- चल दूर जाके बैठ और बीच में गाया तो पड़ेगा एक कौवे।

(वो अलग बैठ जाता हैं)


माँ- आज कितना मजा आया ना इंसान-इंसान खेलके। हैं ना...? क्या हुआ तुझे ? वहाँ क्यों बैठा हैं? अरे सुन ठंड लग जायेगी।
कौआ- हं
माँ- तो ऐसा उकडू बैठने से अच्छा है, एक चादर ले ले।
कौआ- ना
माँ- अरे मर जायेगा। चल सब लोग अंदर रियाज कर रहें हैं, हम फिर इंसान-इंसान खेलेंगे।
कौआ- मुझे नहीं खेलना
माँ- बापू कहाँ हैं तेरे ? अच्छा ठीक है जा थोड़ा उड़ ले गर्मी आ जायेगी।
कौआ- माँ मैं कौआ क्यों हूँ ? जब आप सब कबूतर हो तो मैं कौआ क्यों पैदा हुआ?
माँ- फिर किसी ने तुझे कौआ कहा? किसने कहा किसने कहा ? तू बस काला है
तो क्या हुआ बोल तू क्या हुआ ?
कौआ- काला कबूतर।
माँ- सही जवाब। कहाँ मर गया तेरा बापू? चल रियाज करने चलते हैं। ऐसी आदत पड़ गई हैं इंसान-इंसान खेलने की कि उसके बिना मेरा खाना ही नहीं पचतां।
कौआ- माँ हम ये इंसान-इंसान क्यों खेलते हैं ?
माँ- बेटा, हम पहले इंसा ही थे ये हमें भूलना नहीं चाहिये वर्ना हर बार हम कबूतर बनके ही पैदा होते ऐसी बापू की खोज है, अविष्कार है तेरा बापू बड़ा साइंटिस्ट है।
कौआ- आपने तो बताया था कि हम लोग गवैये थे। ट्रेनों में गा-गाकर पैसा मांगते थे फिर बापू सांईटिस्ट कैसे हो गये।
माँ- देख ऐसा कहते हैं कि ट्रेन का यहीं एक्सीडेंट हुआ था, हम सब यहीं मरे और तेरे बापू सांईटिस्ट हो गये। हजार बार बोल चुकी हूँ दोबारा मत पूछना।
(बापू तेजी से दौड़ते हुए आते हैं और दोनों के बीच में आकर खड़े हो जाते हैं।)
बापू- डिश डिश डिश।

माँ- क्या हुआ ?
बापू- मैं प्रकट हुआ ना डिश।
माँ- अभी यहीं से तो चल कर आ रहे हो।
बापू- छी छी छी छी मेरा ये अविष्कार भी असफल रहा।
कौआ- बापू आपने मेरा कुछ किया मैं कौन हूँ।
बापू- बेटा तू कौआ नहीं हैं बस ये समझ ले। अगर तू कौआ होता तो काँव-काँव नहीं कर रहा होता पर तू तो गाता हैं गाता है ना ये।
बस बेमर से- हाँ हाँ
कौआ- बापू, पर मेरी कभी-कभी काँव-काँव कहने की इच्छा होती है।
बापू- दबा दे उस इच्छा को। रोक ले कुचल दे वहीं पे। अब सुनो जो मैंने आज खोज की हैं। जो भी आदमी बीच में मर जाता हैं अपनी पूरी कहानी नहीं कह पाता वो कबूतर हो जाता हैं।
माँ- ये तो पुराना हुआ
बापू- अरे आगे तो सुन मेरे सपने में एक बार फिर विचित्र किंतु सत्य जैसा एक कबूतर आया उसने कहा कहानी कहो। बस। अगर तुम्हारी आधी कहानी, उस कही हुई कहानी से पूरी हो जायेगी तो तुम आजाद हो गये समझो। आजाद आजादी।
भाई- उसे कैसे पता ये ?
बापू- मैंने भी उससे पूछा तो वो कहने लगा उसे ठीक-ठीक पता नहीं हैं पर हाँ ऐसा कहते हैं।
सीन-7

बंटी- चाय पीयेगा छोटू ? छोटू सो गया क्या?
छोटू- नहीं, अभी सोने का बहाना कर रहा हूँ थोड़ी देर तक बहाना करूँगा फिर सच में नींद आ जायेगी।
बंटी- मैंने क्या समझाया था जब तक हम भाग नहीं जाते, हम दिन में सोयेंगे और रात में जागेंगे। ऐसा ही होता है।
छोटू- बंटी नया प्लान आया है? सुनाओ ना, बहुत दिनों से कोई नया प्लान नहीं सुना।
बंटी- ये कहानी है क्या जो बहुत दिनांक से नहीं सुनी। देख हमारे पास बस आज की ही रात हैं फिर ये हमें डाल देगे, जेल में। वहाँ से हमारे पुरखे भी भाग नहीं सकते।
छोटू- हमारे पुरखे भी जेलों में हैं?
बंटी- छोटू।
छोटू- माफ करना प्लान सुनाओ ना।
बंटी- प्लान गया तेल लगाने, बस भागना है।
छोटू- ठीक हैं। एक बार अभ्यास कर लेते हैं भागने का।
बंटी- नहीं अभी मैं कुछ सोच रहा हूँ।
छोटू- सोच लो अगर मैं भागते समय डर गया और सब कुछ भूल गया तो ? एक बार बस एक बार मजा आएगा।
बंटी- ठीक हैं, तैयार भाग। (दोनो अलग-अलग भागते हैं) लेफ्ट कौन सा है?
छोटू- ये।
बंटी- तो भाग बोलने पर किधर भागेगा?
छोटू- माफ कर दो। एक बार, एक बार और।
बंटी- चल आखिरी बार। भाग भाग (दोनों आपस में टकरा जाते हैं) क्या कहा था जब दो बार भाग बोलूं तो राइट भागना हैं। अगर लेफ्ट ये है तो राइट कौन सा है?
छोटू- अगर लेफ्ट ये है तो राइट कौन सा है?
बंटी- हाँ, कौन सा है ये? हैं मर्ख?
छोटू- अरे हाँ, पर मुझे कैसे पता लगेगा कि तुम दो बार भाग बोलने वाले हो?
बंटी- फिर बहस की, चलो अब अकेले अभ्यास कर मुझे सोने दो।
छोटू- भाग-भाग, धोखे में मत रहना कौवे जाग।
कौवा- भाग-भाग-भाग
भाई- चुप बेसुरे, मरेगा मेरे हाथ से।


सीन-8

सलीम- मरना चाहते हैं, मैं मदद कर सकता हूँ। मेरा काम है ये धंधा हैं मेरा। बस इसके बदले में जाने दीजिए मैं क्या चाहता हूँ उससे आपको क्या मतलब लेकिन सच बताऊँ, मुझे वो लोग बहुत पसंद हैं जिन्हें पता लग जाता हैं कि अब इसके बाद वो इस दुनिया में जी नहीं रहे हैं, बस जिंदा हैं।
आशीष- क्या तुम्हें कैसे? मैं असल में
सलीम- जाने दो मैं समझता हूँ देखिये मेरा तो ये काम हैं लोगों के मरने में उनकी सहायता करना। किसी ने कहा हैं- @ Life, like all other games, becomes fun when one realizes that’s just a game गेम, खेल और खेल में आपको पूरी आजादी होनी चाहिये कि आप कभी भी खेलना बंद कर सके तभी खेलने का मजा है।
आशीष- हाँ तभी खेलने का मजा हैं
सलीम- लेकिन तारीफ करूँगा आपकी मतलब आप जैसे लोंगो की जो लोग यूँ ही घिसटते नहीं पाये जाते हैं आप लोग मस्त जीते हें और मस्ती से चले जाते हैं।
आशीष- मस्ती... तुमने कभी मरने के बारे में सोचा है? आत्महत्या? तुम्हारे पास किताबी ज्ञान है जैसे प्रेम के बारे में सारा पढ़ लिया, सीख लिया पर प्रेम कभी नहीं किया।
सलीम- देखों मैं अभी खेल में हूँ और अभी और खेलना चाहता हूँ।
आशीष- तुमने अच्छा खेल चुना हैं। पिछले चार दिन से मैं यहाँ रोज आ रहा हूँ।
सलीम- जानता हूँ पहले दिन ही आपकी चाल देखकर समझ गया कि आप यहाँ क्यों आ रहे हो।
आशीष- तो तुम पहले दिन ही
सलीम- नहीं पहले दिन आप बहुत परेशान थे अगर उस उक्त मैं आपके पास आता तो आप डाँट कर भगा देते और बाकी दो दिन आप लोंगो की आँखों से बच रहे थे पर आज... आज आप कुछ ठान कर आये हैं।
आशीष- मेरे पास दो कहानियाँ हैं, ये दूसरी कहानी मैंने कल ही पूरी की हैं, और इसके पूरी होते ही मुझे लगा कि मुझे मर जाना चाहिये।
सलीम- एक बात कहूँ सौ से ज्यादा लोंगो की मदद कर चुका हूँ अब तक मरने में, लेकिन जितनी गंभीर बात आपने कही बहुत कम ही लोग कह पाते हैं अक्सर जो बेमौसम मरने आते हैं।
आशीष- अब इसका मौसम भी होता है ?
सलीम- जब मौसम होता है तो मैं बहुत व्यस्त होता हूँ। खासकर जब स्कूल का रिजल्ट निकलता है शादियों के मौसम में प्रेमी आते हैं हारे हुए लोगों का भी एक मौसम होता हैं। धोखा खाये लोगों का भी अपना मौसम होता हैं। और मौसम के साथ-साथ आत्महत्या की एक उम्र भी होती है। बूढ़े लोग बहुत आत्महत्या करते हैं क्योकि एक उम्र के बाद खेल में मजा आए या ना आए खेल में बने रहने की आदत पड़ जाती हैं।
आशीष- आदत

गाना-
आदत हैं हमको
जैसे हैं वैसे ही होने की, आदत हैं हमको
चादर से बाहर रखकर पाँव
सोने की आदत हैं हमको
सूरज गर ना निकले दिन में भी अँधेरा हो
अंधेरे में जी लेने की
चाय में घोल के गम पीने की, आदत हैं हमको
अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं, जो सब कह दे वही सही
गलत को सही सुन लेने की, आदत हैं हमको
पाँव का जूता काटे तो आँख में आँसु ना आयें
दिल चाहे छलनी-छलनी हो होंठ हमेशा मुस्काए
आँसु को रूमाल में रखकर, फिर रूमाल को खो देने की
आदत हैं हमको


सीन-9

(गाना खत्म होता हैं सब लोग अपनी-अपनी जगह जाकर बैठ जाते हैं।)

कौआ- माँ! बापू कब आयेगें?
माँ- पता नही अब तो साल होने को आया।
कौआ- इस बार बापू ने वादा किया था कि मेरे लिए कुछ लायेंगे।
माँ- मैंने भी उनसे कहा था कि आते वक्त कुछ खाने के लिये लाना लेकिन वो नाराज हो गए कहने लगे कि मैं इस बार बड़ी खोज के लिये जा रहा हूँ। चल आ जा अब रियाज कर लेते हैं।
कौआ- मुझे नहीं करना रियाज वियाज। हे विचित्र किंतु सत्य जैसे जो भी हैं आप बस मेरे लिये मैं माँ , माँ वो देख अपनी तरफ कुछ आ रहा हैं।
माँ- कहाँ ? अरे किसी ने रॉकेट छोड़ा होगा नहीं-नहीं पतंग हैं नहीं जहाज अरे नहीं बेटा ये तो तेरे बापू हैं।
कौआ- बापू!! (धड़ाम से बापू बैक स्टेज से गिरते हुए प्रवेश करते हैं) बापू लगी तो नहीं ?
बापू- नहीं। हाँ हाँ हाँ मैं दुनिया घूम आया। मेरी खोज पूरी हुई मुझे पता लग गया दुनिया के मूल में क्या है, संपूर्ण सत्य क्या है।
भाई- क्या है बापू ?
बपू- मूल में कुछ भी नहीं हैं सत्य कुछ भी नहीं हैं।
कौआ- बापू मैं कौआ क्यों हूँ ये पता चला ?
बापू- तू कौआ नहीं हैं ये पता चला, पर तू क्या है ये पता नहीं चला।
माँ- कुछ खाने को लाये ?
भाई- माँ चुप करो। और क्या खोजा बापू ?
बापू- खोजा कि दुनिया बहुत बड़ी है बेटा उड़ते-उड़ते वाट लग गई।
भाई- और-और
बापू- और हाँ इंसानों की प्रजाति लुप्त होती जा रही है।
माँ- अरे जैसे हम लोग इंसान-इंसान खेलते हैं वैसे ही इंसान भी जानवर-जानवर खेलते हैं हम इसलिये खेलते हैं कि हम भूल ना जायें कि हम इंसान थे वो इसलिये खेलते हैं कि शायद उन्हें पता हैं कि असल में हम सभी जानवर हैं। जो भी हैं पर जो इंसान हैं वो लुप्तप्राय प्रजाति हैं।
कौआ- बापू पर मेरा क्या होगा ?
बापू- ऐसे बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। खुद के मरने से ही स्वर्ग मिलता हैं। तू कौन है ये तुझे खुद ही पता करना पड़ेगा। मैं चला।
माँ- अरे, अब कहाँ जा रहे हो ?
बापू- खोज में
माँ- काहे की।
बापू- खाने की। भूख लगी है।


सीन-10

छोटू- भूख लगी है।
बंटी- साला हमें बाँधकर कहाँ चला गया ? चाय चाय
चाय- क्या है?
बंटी- दो चाय देना।
चाय- पैसे कौन देगा।
बंटी- वो साहब देंगे।
चाय- वो बोलेंगे तभी दूँगा चाय।
छोटू- चाय भी नहीं मिलेगी। बंटी ऐ बंटी नाराज है क्या ?
बंटी- कहते हैं मूर्ख दोस्त से बुद्धिमान दुश्मन ज्यादा अच्छा।
छोटू- मैंने क्या बेवकूफी की है अब ?
बंटी- जब तूने मुझे अपना चोरी का आइडिया सुनाया था, तभी मुझे समझ जाना चाहिये था कि तू कितना बड़ा....
छोटू- क्या क्या ? हमने तय किया था कि हम इस संबंध में कोई बात नहीं करेंगे अब, और मैं बता दूं कि मेरा आयडिया एकदम सही था। एक तीर से दो शिकार।
बंटी- अच्छा! सर्कस से शेर चोरी करते हैं ये सही आयडिया था ? और तू सही कह रहा है एक तीर से दो शिकार। तीर होता शेर और शिकार होते हम दोंनो कभी सुना हैं तूने किसी ने सर्कस से शेर चोरी किया है?
छोटू- तो क्या करते बदला तो लेना था ना ? निकाल दिया सर्कस से बताओ। पूरी जिंदगी वहीं काटी जगलिंग करते, रस्सी पे साइकिल चलाते और अचानक एक दिन कह दिंया तुम्हारी जरूरत नहीं है शेर करते तो सर्कस का भी घाटा होता और शेर बेचते तो हमें भी फायदा होता हैं।
बंटी- अरे शेर बाजार में लेकर घूमते किये तो शेर खरीद लो।
छोटू- तू मेरे साथ शेर चोरी करने क्यों आया था ?
बंटी- तब थोड़ी पता था कि बाहर ऐसे शेर बिकते नहीं हैं।
छोटू- एक दहाड़ मारी शेर ने तो बचाओ बचाओ चिल्लाने लगा।
बंटी- तू जब पिंजरे के ऊपर चढ़ा था तो पिजरा खोलूं ये पूछा था ? सीधे पिंजरा खोल दिया।
छोटू- लेकिन इतना रंगे हाथों कोई नहीं पकड़ाया होगा। मैं पिंजरे के ऊपर बचाओ बचाओ और तू पिंजरा बंद करते हुए बचाओ बचाओ।
बंटी- चिल्ला... सबको बता दे।
छोटू- गलती हो गई।
बंटी- उससे अच्छा तो ये था कि खरगोश चुरा लेते। (ईश्वर प्रवेश करता हैं।)
छोटू- नहीं नहीं हाथी।
बंटी- श श।
छोटू- अरे मैंने देखा है हाथियों को पैसे कमाते हुए।
बंटी- चुप रह।
छोटू- बंटी, हाथी हमें कमा-कमा के हमें पैसे देता रहता और हम दोंनो हाथी की पीठ पर एक बड़ा सा घर बना लेते।
ईश्वर- सही है पहले शेर चोरी करते पकड़े गए अब हाथी चोरी करने की प्लानिंग कर रहें हो?
सीन-11

(काया ताली बजाती है कहानी रूक जाती है।)

सैम- हाँ हाँ हाँ मैंने जानबूझकर नहीं किया ये हो गया।
काया- नाम बदलो उसका।
सैम- नाम बदलने से क्या हो जायेगा यूँ भी ईश्वर मेरे एक पुराने दोस्त का नाम भी है।
काया- झूठ मत बोलो।
सैम- अच्छा ठीक है अब उसे ईश्वर नाम से कोई नहीं पुकारेगा।
काया- कितने जिद्दी हो तुम और मैंने तुमसे कहा था मुझे छोटू-बंटी की कहानी नहीं सुननी है।
सैम- तुम्हें क्या लगता है अब ये कहानी मैं कह रहा हूँ। कहानी की सिर्फ शुरूआत मेरे हाथ में थी। अब जैसी कहानी तुम देखना चाहती हो और जैसी बात ये कहना चाहते हैं।
काया- तुम्हारे इस पागलपन का एक अंत हैं मेरे पास और वो मेरे लिये सुखांत होगा।
सैम- क्या ?
काया- अगर कहानी नहीं कह पाओ तो माफी मांग लेना। मैं तुम्हें माफ कर दूँगी।
सैम- माफी तो नहीं माँगूगा और ये जिद हैं।
काया- अच्छा देखेंगे।
सैम- देखते है।
सीन-12
चाय- वर्मा जी, आज तो ग्राहकी भी कम हैं तो वहाँ स्टूल पे बैठ जाऊँ ?
वर्मा- नहीं
चाय- अच्छा थोड़ा सा इधर कोने में ऐसे।
वर्मा- नहीं।
चाय- अच्छा ऐसा हाथ करके ऐसे खड़ा हो सकता हूँ ना ?
वर्मा- स्टूल से दूर रह।
चाय- वर्मा जी कितना अच्छा लग रहा हूँ देखो।
वर्मा- देख दिमाग का दही मत कर अभी ट्रेन आने में टाईम हैं कोई ना कोई तो आयेगा।
चाय- जब आएगा तो उठ जाउँगा। बहुत दिनो से कोई किस्सा नहीं सुना।
वर्मा- बेटा किस्से सुनने के लिए अच्छे कान चाहिए। ये खाना बनाने वाले और खाना खाने वाले के संबंध जैसा होता हैं। खाना खाने वाला जितना चटकारे मारकर खाना खायेगा उतना ही खाना बनाने वाले को मजा आएगा।
चाय- पर मैं तो आपकी बनाई हुई चाय भी क्या चटकारे मारकर पीता हूँ।
वर्मा- तो अभी चाय ही पियो खाने में बहुत टाईम हैं। जरा सलीम भाई पे ध्यान दें, बहुत दिनांक बाद उनको ग्राहक मिला है। अगर काम हो गया तो तेरे मुंशी की किताब दिलाऊँगा।
चाय- प्रेमचंद... मुशी प्रेमचंद।
वर्मा- जो भी... अभी धंधा देख।

सीन- 13

सलीम- देखो ये मेरा धंधा है तुम जो भी कहोगे वो तुम्हारे मरते ही सब दफन हो जायेगा मैं धंधे में गद्दारी नहीं करूँगा, ये वादा है।
आशीष- मैं तो मरने ही वाला हूँ। उसके बाद तुम कुछ भी करो मुझे कोई मतलब नहीं।
सलीम- ठीक है पर क्या है क्यों मरना हैं कि अपेक्षा मरने के बाद सब उनके बारे में क्या सोचेंगे इससे लोग ज्यादा डरे हुए रहते हैं इसलिये
आशीष- मेरी कहानी का नाम भी डर ही है। ये कहानी एक ऐसे आदमी की कहानी है जो सबसे डरता है छिपकली, कॉकरोच, रात से, रात में पहाड़ से, पेड़ से और सन्नाटे से... ये आदमी शादीशुदा है और एक बैंक में कलेक्शन का काम संभालता है। दिनभर फील्ड पर रहता है कभी-कभी घर के पास होता है तो घर होता हुआ जाता है। उसकी पत्नी का एक प्रेमी है। पर हमेशा बेवक्त जब भी वो घर पहुँचता है तो दरवाजे पर घंटी बजाने के ठीक पहले वो एक डर महसूस करता है। डर कि कहीं वो दोनो साथ तो नहीं होंगें कैसे होंगे अभी क्या कर रहे होंगे मेरे पास सॉरी उसके पास घर की एक चाबी होती है पर वो हमेशा दरवाजे पे खड़े होकर फोन करता है अपनी पत्नी से कहता है कि मैं दस मिनट में आ रहा हूँ और फिर दरवाजे के बाहर खड़ा होकर इंतजार करता है। दस मिनट बाद बिना घंटी बजाये एक अच्छे पति की तरह दरवाजा खोलकर अंदर जाता है। कभी-कभी वो दोनों उसे साथ दिखते है और कभी नहीं। पर जब भी वो दोनों साथ मिलते है तो वो सीधा अपने बेडरूम में जाकर अपने बेड पर बेतरतीब से बिछी हुई चादर देखता है। बहुत से अजीब से ख्याल उसके मन में आते हैं। फिर अंत में वो दिखावे के सुखी विवाहित जीवन से परेशान होकर उन दोनों का उसी बेड पर रंगे हाथों पकड़ता है और ...... पर असल में ..... मैं अभी भी दस मिनट दरवाजे के बाहर खड़ा होकर इंतज़ार ही करता हू।
सलीम- वैसे ये अकेली ही वजह से बहुत से लोग आत्महत्या कर चुके हैं।
आशीष- नहीं .... मुझे लगता है सिर्फ ये ही वजह ठीक नहीं है मरने की। इस घटना की प्रतिक्रिया आत्महत्या नहीं हो सकती।
सलीम- चाय पीयोगे?
आशीष- हां।
सलीम- चाय ... एक चाय लाना। मैं अभी आया। ये कहानी का नाम क्या बताया तुमने?
आशीष- डर .....
गाना-
रा... रा.... रा... डर है
चारों तरफ फैला हुआ जंगल नहीं है
शहर है। डर है ...
काली रात का डर है, सन्नाटे का डर है
डर है ...
बंद हैं जो दरवाजे़, नहीं सुनी जो आवाजे़ं
उन आवाजों के सुनने का
उन दरवाजों के खुलने का
डर है ..... डर है।
और बचने को इक छोटा सा घोंसले सा घर है
डर है ... डर है।
पर घर के कोनों में भी छिपी हुई है छिपकली जैसी रात।
होंठों पे सूख के पपड़ी बन गई कह ना सके जो बात।
उस छिपी हुई रात का डर है।
उस अनकही बात का डर है ...... डर है। रा... रा... रा.... रा....

सीन-14

(गाना खत्म होता है भाई और एक उसका एक दोस्त, कौए को खींचकर अलग ले जाते हैं।
भाई- क्यों बे कौवे, तुझे कितनी बार समझाया है बीच में नहीं गाना
कौआ- भैया....
भाई- भाई मत बोल क्या कहा था क्या बोलना? क्या कहा था?
कौआ- उस्ताद...
भाई- अब तू दस बार कांव-कांव करेगा।
कौआ- मैं नहीं करूंगा।
भाई- तू कौवा है और तू कांव-कांव करेगा। यही तेरी सजा है.... कर नहीं तो देता हूं.......
कौआ- कांव-कांव-कांव-कांव......
(भाई हंसता है)
कौआ- मां! बापू आये तो कहना मैं चला गया।
मां- कहां जा रहा है?
कौआ- बापू ने सही कहा था खुद के मरने से स्वर्ग मिलता है। मैं खोज में जा रहा हूं कि मैं क्या हूं?
मां- बेटा ऐसी बात को दिल पर नहीं लेते, तू जितना तेरे लिये परेशान है हम लोग भी तेरे लिये उतना ही परेशान हैं। तूने देखा बापू तेरी कितनी चिंता करते हैं?
कौआ- मां! बापू के कहने पर कोई कहानी कह रहा है, कोई गाना गा रहा है। सभी कुछ ना कुछ कर रहे हैं। पर मैं क्या कर रहा हूं? ना तो मैं गाना गा पाता हूं ना कहानी कह पाता हूं। मैं जब तक सोच नहीं लेता कि मैं क्या कर सकता हूं मैं वापिस नहीं आऊंगा।
(बापू स्केटिंग करते हुए एक विंग से दूसरे विंग पर चले जाते हैं उनके गिरने की आवाज़ आती है)
कौआ- मां! बापू को भी बता देना।
(चला जाता है)
मां- बेटा.....
कौआ- मां! मुझे अब रोकना मत मैं जा रहा हूं।
मां- बेटा जब मैं तेरे बाप को नहीं रोक पाई तो तुझे क्या रोकूंगी। शाम को जल्दी आना फिर इंसान-इंसान खेलेंगे।
कौआ- मां....
मां- अच्छा जा।

सीन-15
ईश्वर- कैसे चुराओगे हाथी?
छोटू- हम लोग सबसे पहले.....
बंटी- मज़ाक कर रहे थे हम लोग.... टाईम पास। इसे भूख लग रही थी तो मेरा सिर खा रहा था।
ईश्वर- भूख लगी है... पान खाओगे? नहीं एक काम करो पहले खाना खाना फिर तुम लोगों को कुछ मीठा खिलाऊंगा और फिर पान खाना। चलेगा .....?
छोटू-बंटी- हां चलेगा।
ईश्वर- पर खाना तो तुम्हें मिलेगा नहीं और कुछ चाहिये तो बता दो। (छोटू-बंटी एक दूसरे की ओर देखते हैं ईश्वर लेट जाता है।)
बंटी- चाय?
छोटू- चाय.... हां चाय?
बंटी- हां चाय ठीक रहेगी।
छोटू- एक चाय मिल जाये तो....
ईश्वर- चाय.. एक चाय देना।
चाय- पैसे....?
ईश्वर- मैं दूंगा... क्या करे हो तुम लोग चोरी-चकारी के अलावा...?
छोटू- हम दोनों सर्कस में काम करते थे फिर उस सर्कस वाले ने हम दोनों को निकाल दिया तो .....
ईश्वर- सर्कस में जोकर थे?
छोटू- नहीं ये जगलिंग करता था।
ईश्वर- जगलिंग मतलब...?
छोटू- मतलब चार-पांच गेंदो को एक साथ हवा में उछालने का काम।
बंटी- और ये रस्सी पर साईकिल चलाता था।
ईश्वर- और....
छोटू- और....और क्या?
ईश्वर- और क्या करते थे?
छोटू- और ये वहीं खेल आंख बंद करके भी करता था। है ना........
बंटी- हां और ये रस्सी पर आंखे बंद करके भी साईकिल चलाता था।
ईश्वर- और....?
छोटू- और .... और ये जगलिंग करते हुए.... करते हुए एकदम मस्त.....
बंटी- और ये साईकिल चलाते वक्त हांथों को ऊपर नीचे भी....
छोटू- ऊपर नीचे नहीं कर पाता था हाथों में डंडा होता था।
बंटी- डंडा भी हाथों में और बहुत बढ़िया..... एकदम.....
ईश्वर- और....?
छोटू- और.....
बंटी- और.....
छोटू- और..... हम दोनों बचपन से सर्कस में.... है ना और...
बंटी- और .... बस।
ईश्वर- ठीक है। ठीक है समझ गया तुम दोनों क्या थे।
छोटू- तूने वो नहीं बताया कि मैं हाथी को नहलाता भी था।
बंटी- जैसे तूने बड़ा बताया कि मैं तोते को बोलना सिखाता था.. बेवकूफ....
छोटू- बेवकूफ मत बोल। गाली सिखाई थी तूने तोते को.....
बंटी- अच्छा चुप रह...।
छोटू- अब बोलूं.....एक बार चलते शो में तोते ने कहा था तेरी मां की.....
ईश्वर- चुप एकदम.....सोने भी नहीं देंगे।
चाय- ये....चाय।
ईश्वर- नहीं देना है किसी को


सीन-16

चाय- चाय।
आशीष- धन्यवाद।
चाय- सलीम भाई कहां है?
आशीष- आ रहे हैं.... पैसे चाहिए?
चाय- नहीं वो तो सलीम भाई देंगें।
आशीष- इतने खुश क्यों हो?
चाय- मैं बता नहीं सकता... चलता हूं।
आशीष- नहीं.... नहीं इतने खुश क्यों हो बोलो..?
चाय- बहुत दिन से सलीम भाई खाली बैठे थे, उनकी कमाई होती है तो हमको भी हर चाय का सौ रूपया मिलता है।
आशीष- अच्छा।
चाय- सलीम भाई को मत बताना।
आशीष- नहीं बताऊंगा।
चाय- मरना है
आशीष- एक चाय और दोगे?
चाय- अभी लाया।


सीन-17

ईश्वर- अरे ज़़रा उधर खिसकेंगे मुझे सोना है अरे भाई सुनाई नहीं दे रहा है क्या, अरे उठो भाई। अबे उठता है कि तेरी तो
ब्रम्हानंद- आ आ (चीखता है ईश्वर डर जाता है और वहां से अलग हट जाता है और वर्मा के पास पहुंचता है)
वर्मा- हां, क्या हुआ?
ईश्वर- अरे कुछ नहीं यार वो तो मैं बस सोना चाह रहा था मैंने बोला सरक जाओ तो वो चिल्लाने लगा। अगर मेरा एरिया होता तो साले को अंदर कर देता। कौन है ये
वर्मा- ब्रम्हानंद।
ईश्वर- अरे कौन ब्रम्हानंद?
चाय- मैंने देखा था आपको आप ब्रम्हानंद को मारने वाले थे तभी वो चीखा। ऐसे वो किसी को कुछ नहीं बोलता है
ईश्वर- तू कौन है बे? ये कोन है?
चाय- चाय।
ईश्वर- क्या?
चाय- चाय... सुनाई नहीं दे रहा।
ईश्वर- अब नाम पूछ रहा हूं तेरा काम नहीं।
वर्मा- अरे वो सच कह रहा है, इसका नाम ही चाय है।
ईश्वर- तो जाके चाय बेच बीच में मत बोल। चाय। ये ब्रम्हानंद इसी गांव का है?
वर्मा- हां।
ईश्वर- यहां क्या कर रहा है इसके बाप का स्टेशन है।
चाय- हां इसके बाप का ही है।
ईश्वर- अब तू
वर्मा- वो सही कह रहा है इसके बाप का ही है।
ईश्वर- मतलब?
वर्मा- ऐसा कहते है कि ये ब्रम्हानंद के पुरखों की जमीन थी, जिस पर सरकार ने रेलवे स्टेशन बना दिया। और वादा किया था कि इनको कहीं और जमीन देंगे, पर वो दी नहीं गई तो ये यहीं रहने लगा पहले इसके दादाजी यहां बैठते थे फिर पिताजी और फिर ये।
ईश्वर- ये तो गैर कानूनी है। इसको कोई भगाता नहीं?
वर्मा- क्यों भगायेंगे साहब, ये रेलवे स्टेशन को अपना घर मानता है और यहां के हर व्यक्ति को अपना मेहमान। सबकी खैर तबीयत पूछता है, पूरे स्टेशन को साफ रखता है। हर आने वाले को नमस्कार करता है, और हर जाने वाले को फिर आइये का सलाम। और इंतजार करता है।
ईश्वर- कौन कहते हैं?
वर्मा- ऐसा कहते है ये एक चमत्कार जैसा कि जिसका वो इंतजार करता रहता है।
ईश्वर- चमत्कार का इंतजार है।

इ्रंतजार इंतजार इंतजार इंतजार

सीन-18

भाई- मां! चल अब खाना खा ले बापू आते ही होंगे।
मां- तुझे खाने और गाने के अलावा और कुछ सूझता भी है। महीना होने को आया , अभी तक उसका पता नहीं चला कहां चला गया होगा। तेरे बापू भी उसको ढूंढ-ढूंढकर परेशान हैं।
भाई- मां! मैं भी उसे पिछले एक हफ्ते से ढूंढने जा रहा हूं। बाहर जाते ही डर लगने लगता है। शायद मेरे ही डांटने की वजह से वो चला गया है। वैसे ही मैं बहुत दुःखी हूं, तू खाना खा ले वरना मुझे और बुरा लगेगा।
मां- जो भी हो, जब तक वो नहीं आएगा मैं खाना नहीं खाऊंगी।

गाना-
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
वो तो चला गया रे
वो तो चला गया समुन्दरों के पार
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
वो चला गया समुन्दरों के पार -3
छोटा सा पंछी वो नन्हीं सी जान रे -2
कैसे वो झेलेगा आंधी तूफान रे -2
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार वो लेकर के आयेगा कोई ऐसी किताब
जिसमें मिलेंगे सब सवालों के जवाब
वो नाम करेगा, ऐसा काम करेगा।
चाहे रास्ते में आए मुश्किलें हजार।
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार
मेरा काला रे
मेरा कौआ काला रे
मेरा काग रे।
मेरा काला कागा रे
मेरा काक रे
वो जो बोले कांव, सुन के कोयल हो बेहाल, मैं तो हो जाऊं निहाल।
इंतजार इंतजार इंतजार इंतजार

सीन-19

छोटू- बंटी, हम कब तक जिंदा रहेंगे?
बंटी- क्या
छोटू- हम कब तक जिंदा रहेंगे?
बंटी- एक घंटे तक अरे मुझे क्या पता।
छोटू- और बंटी जब तक मैं जिंदा रहूंगा मैं छोटू ही रहूंगा और जब तक तू जिंदा है तू बंटी ही रहेगा?
बंटी- हां।
छोटू- याद है तूने मुझे ध्रुव तारा दिखाया था। सुबह चार बजे। वो कब से ध्रुव तारा ही है बेचारा ध्रुव तारा
बंटी- तो क्या है?
छोटू- मुझे इसी बात पे कभी-कभी रोना आ जाता है कि मैं कुछ नहीं होऊंगा मैं अपने मरने तक छोटू ही रहूंगा अंत तक छोटू एकदम अंत तक अरे ये रस्सी खुल गई साब साब ये रस्सी खुल गई।
बंटी- अबे
ईश्वर- इन दो जोकरों को भी तो संभालना है (ईश्वर छोटू-बंटी के पास जाता है।)

सीन-20

वर्मा- जल्दी से स्टूल साफ कर। ऐसे भूखे बहुत कम आते हैं।
चाय- मतलब
वर्मा- आज खाना बनाने में मजा आएगा। ये संभाल अपनी चाय की केतली और ये रहे कम और तू निकल ले।
चाय- मैं चुपचाप यहां कोने में बैठा रहूंगा। प्लीज प्लीज।
वर्मा- दिमाग का दही मत कर। वरना स्टूल पे बैठना तो दूर उसे साफ भी नहीं कर पायेगा।
चाय- और बीच में अगर चाय ठंडी हो गई तो।
वर्मा- तू जो मोटी-मोटी किताबें पढ़ता है ना उसे जलाकर गर्म कर लेना। चल अब जा भूखा आ रहा है।


सीन-21

आशीष- मेरी अगली कहानी का नाम फादर है- पिता।
सलीम- क्या हुआ?
आशीष- कुछ नहीं।
सलीम- देखो वैसे ये तुम्हारे किसी काम का नहीं है पर चूंकि ये मेरा धंधा है सो मैं बता दूं कि मैं अपनी क्लाइंट को क्या-क्या प्रोवाइड कराता हूं। कागज, कलम, डेथ नोट लिखने के लिए। किसे देना है, कितने दिनों में देना है आप ये भी बता सकते हैं। डेथ नोट लिखने में समस्या हो तो मेरे पास कुछ सौ से ज्यादा लोगों के डेथनोट हैं आपको उससे मदद मिल सकती है। और आपको बता दूं कि ये जगह आत्महत्या के लिए काफी प्रसिद्ध है। बाहर-बाहर से लोग यहां आत्महत्या करने के लिए आते है। मरे अधिकतर क्लांइट ने चार दस की सुपर फास्ट ट्रेन से आत्महत्या की है। वो यहां रूकती नहीं है धड़धड़ाती आती है और एक झटके में काम खत्म। और अब मुख्य बात इसके बदले में मुझको क्या मिलता है? मुझे मिलता है वो सब जो इस वक्त आप के पास है। पर्स से लेकर घड़ी, अंगूठी, चेन वगैरह-वगैरह... अरे आप हंस रहे हैं। इसमें मुझे घाटा भी होता है कई बार मुझे लोगों का अंतिम संस्कार अपने पैसों से करना पडा। अमीर ही नहीं गरीब लोग भी आत्महत्या करते हैं।
आशीष- ये लो। मुझे किसी को कुछ नहीं बताना (आशीष अपने जेब से पर्स, अंगूठी और घड़ी निकाल कर उसे दे देता है।)
सलीम- ये कहानियां भी दे दो
आशीष- नहीं मैं इन्हें अपने साथ ले जाना चाहता हूं।
सलीम- ठीक है आखिरी कहानी।
आशीष- हां फादर पिता बाप।

सीन-22

(ईश्वर, ब्रम्हानंद के चेहरे को देख रहा है)
ईश्वर- मुझे इस पर शक है। वर्मा जी मुझे इस आदमी पर शक हैं
वर्मा- क्या बात है मान गये आपको। आप पहले आदमी हैं जो समझ गए।
ईश्वर- क्या समझ गए?
वर्मा- यही कि ब्रम्हानंद असल में जाग रहा है।
ईश्वर- क्या? हाँ... अ अ मैं समझ गया वो जाग रहा है कैसे?
वर्मा- ब्रम्हानंद ने एक बार कहीं पढ़ लिया था कि एक आदमी ने एक बार तितली का सपना देखा। पर जब वो जागा तब उस आदमी को समझ में नहीं आया कि वो आदमी है जिसने तितली का सपना देखा या वो तितली है जो अभी आदमी का सपना देख रही है।
ईश्वर- हैं?
वर्मा- ऐसा कहते हैं कि ब्रम्हानंद ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया और अब वो खोज रहा है कि वो असल में क्या है तितली या आदमी?
ईश्वर- तो क्या है वो?
वर्मा- अरे आप तो देखते ही समझ गये थे। है ना?
ईश्वर- हां हां मैं समझ गया।

सीन-23

आशीष- ये एक ऐसे आदमी की कहानी है जो अपने पिता के साथ अकेला रहता है। मां थी नहीं और बड़ा भाई सालों पहले दुबई में काम करने चला गया। सुना था अब वो काफी पैसे कमाने लगा है। इसकी अभी-अभी छोटी नौकरी लगी थी जैसे-तैसे वो घर का गुजारा करता था तभी पिताजी को पैरालेटिक अटैक आ गया उनका चलना फिरना, बोलना सब बंद हो गया। कुछ समय तक ये अपने पिताजी का इलाज कराता रहा पर कुछ फायदा नहीं हुआ। यहां कर्जा भी बहुत बढ़ गया था। उसने भाई को पैसे के लिए खबर की पर वहां से कोई जबाव नहीं आया तो ये कारण बटोरने लगा।
सलीम- कारण किसके?
आशीष- कारण अपने बाप की हत्या के। उसमें बचकाने से बुद्धिजीवी सारे कारण मौजूद थे इतनी तकलीफ में घिसटते-घिसटते जी रहे हैं, जीवन से सारे संबंध खत्म हैं फिर क्यों जिंदा हैं, वगैरह-वगैरह और फिर एक दिन उसने अपने पिताजी के खाने में जहर डाल दिया। पिताजी की मृत्यु के कुछ ही दिन बाद भाई का दुबई से पैसा आ गया पिताजी के इलाज के लिए जबकि असल में भाई का दुबई से पैसा पिताजी के मरने से पहले आया था पर वो इतना पैसा था कि उन पैसों को पिताजी के इलाज के लिए खर्च करना मुझे बेवकूफाना लगा और पिताजी
सलीम- असल में तुमने पिताजी को जहर
आशीष- हां दिया था और जिन कारणों को उस वक्त अपने साथ रखा था वो सारे कारण अब मुझ पे लागू होते हैं।
सलीम- मतलब?
आशीष- मतलब में बस सांस ले रहा हूं जीवन से मेरा संबंध कब का छूट गया है हर आदमी मेरा क्लाइंट है या मैं किसी का क्लाइंट हूं सबकी आंखों में मैं अपना भारीपन देखता हूं अपने होने का भारीपन, जो मैंने मेरी आंखों में तब महसूस किया था जब मैं अपने बाप को मारने के कारण जमा कर रहा था।
सलीम- तो अब?
आशीष- अब तुम बताओ कैसे करना है?
सलीम- चार बज गया है ट्रेन आती ही होगी तैयार हो जाओ।
आशीष- एक आखिरी चाय।
सलीम- हां, क्यों नहीं चाय! चाय! कहां मर गया। मैं खुद बोल कर आता हूं।

सीन-24
ईश्वर- ब्रम्हानंद ऐ ब्रम्हानंद
वर्मा- वो नहीं सुनेगा।
ईश्वर- क्यों?
वर्मा- क्योंकि हम उसे ब्रम्हानंद कहते हैं लेकिन शायद उसे नहीं पता कि उसका नाम ब्रम्हानंद है।
ईश्वर- क्या? वो ब्रम्हानंद है उसे नहीं पता लेकिन तुम उसे ब्रम्हानंद कहते हो तो तुम्हें कैसे पता उसका नाम ब्रम्हानंद है
वर्मा- क्येांकि बहुत पहले ट्रेन में से एक आदमी ने ब्रम्हानंद चिल्लाया था और तब ये मुड़ा था दूसरे ब्रम्हानंद में ये खड़ा हुआ था और तीसरे ब्रम्हानंद चिल्लाने पर ये बहुत तेजी से भागा था मगर तब तक ट्रेन निकल चुकी थी। ओह अब समझ में आया ये हर ट्रेन के डिब्बे में इसलिए झांकता फिरता है कि ये शायद पता करना चाहता है कि किसने इसे इसके नाम से पुकारा।
ईश्वर- हां हां
वर्मा- शायद
ईश्वर- शायद शायद क्या?
वर्मा- देखो सच किसी को नहीं पता ऐसा कहते हैं?
ईश्वर- ये तुम्हारे स्टेशन पे कौन हैं जो कहते हैं कौन हैं ये?

गाना-
ये हम हैं जो कहते हैं, हां हां हम हैं जो कहते हैं
ज़रा नज़रें उठाकर देखो तो हम आसपास ही रहते हैं।
ये हम हैं जो कहते हैं।
कहते हैं दुनिया को ऊपर वाले ने हाथों से अपने बनाया था।
कहते हैं आदम अकेला था पहले फिर हौवा ने आके मुस्कराया था।
उसके ही कहने से फल खाया पहले खाया पहले फिर?
फिर कहते हैं धक्का भी खाया था।
कहते हैं उसकी ही संतान हैं सब। कौन हैं जो ये कहते हैं?
ये हम हैं जो कहते हैं, हां हां हम हैं जो कहते हैं
ज़रा नज़रें उठाकर देखो तो हम आसपास ही रहते हैं।
ये हम हैं जो कहते हैं



सीन-25

(गाना खत्म होता है सभी एक जगह इकट्ठे होकर बैठ जाते हैं।)
बापू- अरे क्या हुआ? चलो अपनी-अपनी जगह। अरे जाओ खड़े क्या हो? अरे चलो अपनी-अपनी कहानियां शुरू करो।
भाई- अभी क्या कहें?
बापू- मतलब कहानी किसने रोकी? कहानी किसने रोकी?
सैम- कहानी मैंने रोकी।
बापू- ये बेईमानी है।
सैम- माफ करना दो मिनट
काया- मैं कुछ कहूं।
सैम- हां, बस शुरू कर रहा हूं।
काया- मैं बस बताना चाहती हूं कि तुम्हारी ट्रेन का टाईम हो रहा है।
सैम- मैं जानता हूं।
काया- क्या करोगे प्रेम कहानी, ऊपर से सुखांत
सैम- हं
काया- मैं जानना चाहती हूं कैसे करोगे?
सैम- मृत्यु के बारे में इतना सोचोगी तो जीयोगी कब?
काया- क्या?
सैम- क्या हम जीते हुए लगातार मरने के बार में सोचते हैं नहीं ना अंत अपनी गति से होगा।
काया- पर अंत बोलने से तो नहीं होगा ना अंत करना पडेगा, पहली बार तुम इतनी बुरी तरह फंसे हो। है ना?
सैम- हं
काया- मुझे तुम्हारे ऊपर बड़ी दया आ रही है।
सैम- हा हा हा
काया- क्या हुआ?
सैम- मिल गया मुझे अंत।
काया- क्या?
सैम- हां अंत मिल गया अब मेरी इस प्रेम कहानी का अंत तुम्हीं करोगी अब अंत तुम्हारे हाथ में है।
काया- मैं? मुझे नहीं पता तुम क्या करने वाले हो? पर तुम्हारे पास समय कम है अगर अंत नहीं हुआ तो मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी।
सैम- पक्का। हा हा (हंसता है) शुरू करें?

(सैम कबूतरों की तरफ पलटता है, कहता है अंत है, जरा जमाके)
बापू- ताली तो बजा दो।
(सैम ताली बजाता है सब घूमकर एक तरफ देखने लगते हैं वहां से कहानी शुरू हो जाती है। कौआ प्रवेश करता है आकर बापू के गले लग जाता है।)

कितनी सारी चांद की रातें, कितना दिन का उजाला
क्या होता मतलब सफेद का यारों, जो ना होता रंग काला

मां- बेटा कहां चला गया था इतने दिन? कितनी चिंता हो रही थी तेरी।
कौआ- मां मुझे पता लग गया है कि मैं कबूतरों के बीच एक कौआ हूं।
बापू- किसने कहा तुझसे किसने कहा?
कौआ- इस बार किसी ने नहीं कहा मुझे पता लग गया है और मुझे इसमें कोई समस्या नहीं है। बापू मैं बाहर गया था बाहर संसार में मैं उड़ता रहा उड़ता रहा ना जमीन खत्म होने का नाम ले रही थी ना आसमान और तभी अचानक पता नहीं कहां से बहुत सारी भीड़ आ गई। बापू वो सब हवाई जहाज़ की तरह उड़ रहे थे बहुत तेज़ पता नहीं कितने तरीके के किसने सारे पक्षी उड़ रहे थे और वो कौए भी नहीं थे कबूतर भी नहीं थे फिर मैंने उनसे पूछा-
सैम- आप लोग कौन से स्टेशन पर रहते हैं और कौन से स्टेशन जा रहे हैं?

(सभी हंसने लगे)
मैं कौआ क्यों हूं?
(सभी हंसते हैं)
जब सभी कबूतर हैं तो मैं कौआ क्यों हूं

(तभी एक बूढ़ा आदमी सैम के बगल में आकर उड़ता है।)

बूढ़ा- तुमने क्या कबूतर कहा?
सैम- हां कबूतर।
बूढ़ा- बहुत पहले की बात है कि मैं जब ध्रुव से दक्षिण ध्रुव की ओर जा रहा था अचानक मुझे प्यास लगी। मैं नीचे जमीन पे एक पोखर में पानी पीने रूक गया। मैंने देखा वहां बहुत से सफेद-सफेद मोटे-मोटे पक्षी थे जो अपने आपको कबूतर कहते थे। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं दक्षिणी ध्रुव की तरफ जा रहा हूं तो सब मुझ पर हंस दिये पर उसमें से एक कबूतर था जो मुझ पे हंसा नहीं था। जब मैं दक्षिणी ध्रुव की तरफ रवाना हुआ तो वो काफी दूर तक मेरे साथ चला। फिर बीच में थक गया तो मैंने उससे कहा वापिस लौट जाओ। पर वो नहीं माना फिर वो बीच में कहीं भटक गया।
सैम- क्या वो दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचा था?
बूढ़ा- वो तो पता नहीं पर ऐसा कहते हैं कि उसे अलग-अलग समय में अलग-अलग जगह देखा गया तुम कहां जा रहे हो?
सैम- खोज में
बूढ़ा- किसकी
सैम- मैं कौआ क्यों हूं?
बूढ़ा- तुम्हारी आंखों में भी उस कबूतर की आंखों जैसी चमक है। मैंने उससे भी यही कहा था कि हम कितने किस्मत वाले हैं जो हमारे पंख हैं ज़रा उन बेचारों के बारे में सोचो जिनके पंख ही नहीं है तुम्हारे पास पंख है, उड़ने की क्षमता है। क्या ये काफी नहीं है।
सैम- पर मैं कौन हूं?
बूढ़ा- हा हा हा। अगर इस प्रश्न का उत्तर तुम्हें उड़ने में मदद होगा तो उत्तर ढूंढो? मैंने इस तरीके के सारे प्रश्न अपने बुढ़ापे के मनोरंजन के लिए रख छोड़े हैं जब मैं उड़ नहीं पाउंगा।
सैम- आप कौन हैं?
बूढ़ा- मैं
(तभी बहुत सारे पक्षी आकर उन दोनों को अलग कर देते हैं)
सैम- अरे अपना नाम तो बताते जाइये
कौआ- उसने चिल्लाकर अपना नाम बताया पर मैं सुन नहीं पाया।
बापू- विचित्र किंतु सत्य
कौआ- क्या?
बापू- बेटा मैं दक्षिणी ध्रुव तक गया था।
भाई- बापू क्या हो गया आपको?
बापू- मैं दक्षिणी ध्रुव गया था बेटा ये वही विचित्र किंतु सत्य कबूतर हैं जो मेरे सपनों में आता है। तू उसी कबूतर से मिलकर आया है।
भाई- भाई तू भी दक्षिणी ध्रुव तक गया था?
कौआ- नहीं
भाई- तो कहां तक गया था?
कौआ- बहुत दूर तक
भाई- अगली बार मुझे भी लेकर जायेगा?
कौआ- भाई! खुद के मरने से ही स्वर्ग मिलता है। (सब हंसने लगते हैं)


सीन-26

ईश्वर- वो देखो ब्रम्हानंद उठ रहा है।
वर्मा- ओ तेरी ये आज जल्दी क्यों उठ गया (वो आदमी कुली के कपड़े पहनता है अंगड़ाई लेता हुआ वर्मा के पास आता है ईश्वर हक्का-बक्का उसे देख रहा है।)
कुली- क्या भाई ब्रम्हानंद कैसे हो साला नींद टूट गई। चल मुंह धोके आता हूं। मेरे लिए चाय बोल ब्रम्हानंद मैं आता हूं। (कुली निकल जाता है ईश्वर गुस्से में वर्मा को देखता है वर्मा मुस्कुरा देता है)


सीन-27

बंटी- अब शांत रह और प्लान सुन।
छोटू- नया प्लान।
बंटी- नया नहीं आखिनी प्लान अभी चार दस की फास्ट ट्रेन निकलेगी वो क्रास करे उसके पहले हमें पटरी के उस पार कूद जाना है।
छोटू- और ये रस्सी?
बंटी- मैंने काट दी है और तू चुप रहना। सिर्फ भाग बोलूंगा और सीधा पटरी के उस पर कूद जाना जब तक ट्रेन क्रास करेगी हम भाग चुके होंगे।
छोटू- बंटी! बिना भागे काम नहीं चलेगा।
बंटी- छोटू! मार खायेगा।
छोटू- सॉरी।

सीन-28
चाय- ये चाय
आशीष- हं
चाय- चलता हूं
आशीष- सलीम भाई तुम्हें ही बुलाने गये हैं।
चाय- पता है। मैं पीछे से आया आपसे कुछ कहना चाहता हूं।
आशीष- बोलो
चाय- बोलो
चाय- पश्चाताप जीने में है मरने में नहीं माफ करना चलता हूँ।

सीन-29
(ईश्वर, वर्मा का कॉलर पकड़े हुए हैं।)
वर्मा- बताता हूं बताता हूं। मैं ही ब्रम्हानंद हूं। मेरा नाम ब्रम्हानंद वर्मा है।
ईश्वर- अबे तो मुझे बेवकूफ बनाने की क्या जरूरत थी?
वर्मा- मुझे क्या पता था आज ये जल्दी उठ जायेगा देखो मुझे रात भर जागना पड़ता है और ये रात भर सोता है। ये मेरे मनोरंजन का साधन है। आज पहली बार पकड़ा गया हूं। माफ कर दो।
ईश्वर- ठीक है लेकिन एक शर्त पर कि तूने मुझे बेवकूफ बनाया ये बात किसी को नहीं बतायेगा।
वर्मा- अच्छा, ठीक है।

सीन-30
छोटू- बंटी हमने अभी तक सिर्फ भागने के बारे में बात की है भागे कभी नहीं है।
बंटी- मतलब?
छोटू- मतलब हमने कभी भागना सीखा ही नहीं है हम भागने के लिए बने ही नहीं हैं। हमें बस एक जगह रहना आता है।
बंटी- तू चुप रहेगा? ट्रेन आने वाली है, तैयार हो जा।

सीन-31

सलीम- तो चलें
आशीष- कहां?
सलीम- यहां नहीं आगे। उस खंभे के पास ट्रेन आने वाली है।
आशीष- मेरी एक बात मानोगे?
सलीम- जो बोलो
आशीष- मैंने तुम्हें कहा था ना कि मैं सबसे डरता हूं कहीं मैं उस आखिरी क्षण में डर ना जाऊं मुझे पता नहीं तो क्या तुम मुझे धक्का दे दोगे?
सलीम- नहीं नहीं ये तो हत्या होगी।
आशीष- तुम्हारा धंधा है तुम आत्महत्या में मदद करते हो। तो मैं मदद ही तो मांग रहा हूं ये हत्या कैसे हुई?
सलीम- ये हत्या है बस और यूं भी मैं तुम्हें वहां छोड़ के आ जाउंगा, मैं कभी आत्महत्या के समय किसी के साथ नहीं रहता इसमें फंसने का डर है। चलें समय हो रहा है।
आशीष- चलो

सीन-32
बंटी- चल ट्रेन आ रही है।
छोटू- बंटी, हम दोनों के बीच भाग-भाग एक खेल है भेड़िया आया, भेड़िया आया जैसा एक खेल। इसमें सच के भेड़िये को मत लाओ।
बंटी- चुप ट्रेन आ गई है। भाग बोलूंगा सामने कूद जाना।
छोटू- बंटी इसे खेल ही रहने दे मुझसे नहीं होगा।
बेटी- अपना हाथ दे मुझे।
छोटू- नहीं।
बंटी- हाथ दे

(सलीम आकर नीचे खड़ा हो जाता है और आशीष को देख रहा होता है ब्लैक आउट होता है छोटू के चिल्लाने की आवाज आती है और साथ में ट्रेन के तेज़ी से निकल जाने की आवाज़ और गाना शुरू होता है स्पॉट आता है आशीष अपनी जगह नहीं खड़ा है। दूसरा स्पॉट आता है बंटी अकेला बैठा रो रहा है ईश्वर, बंटी के पास जाता है और पूछता है छोटू कहां है और बंटी रोता रहता है।)

गाना-
अंधेरे में ढूंढते हैं टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी
सांसो से छूके देखा अपनी है कि अजनबी
अंधेरे में ढूंढते हैं। रा रा रा रा
एक कतरा आंसु का या चमकती इक खुशी
हाथ जाने क्या लगेगा जानता कोई नहीं
अंधेरे में ढूंढते हैं। रा रा रा रा
एक टुकड़ा मेरे हिस्से का दर्द में डूबा हुआ
एक टुकड़ा मुस्कुराकर पूछता है क्या हुआ
एक टुकड़ा चुप्पी साधे
मेरे हाथें ही मौत मांगे। रा रा रा रा
ऐसे कितने टुकड़े सीकर
जैसे-तैसे मरके जीकर।
बन रही है कहानी।
चल रही है कहानी।
बुन रही है कहानी।
तेरी मेरी कहानी।

चाय- क्या हुआ सलीम भाई।
सलीम- अभी देख के आया हूं बुरी तरह कट गया है वो बता देना उनको और ये ले पैसा बहुत कमाई हुई इस बार क्या हुआ?
चाय- कुछ नहीं अच्छा आदमी था।
सलीम- अच्छे तो सभी होते हैं तू ऐश कर।

सीन-33

(आशीष आता है, चाय उसे देखकर उसके गले लग जाता है।)
आशीष- ये मेरी कहानियां हैं अब मुझे इनकी जरूरत नहीं है मैं चार पच्चीस की ट्रेन से जा रहा हूं।
चाय- कहां?
आशीष- नया जीवन शुरू करने। जिंदा रहकर पश्चाताप करने मरकर नहीं।
चाय- ये कुछ पैसे रख लीजिये टिकट तो खरीदना पड़ेगा ना।
आशीष- नहीं चाहिये।
चाय- आप ही के हैं।

सीन-34

सैम- कहानी हमारी पूरा संबंध ये शब्द है, कहानी मुझे पता ही नहीं चला कब तुम्हारी उंगलियों ने कहानी कहना सीख लिया, हां सच। जब मैंने तुम्हें पहली बार कहानी सुनाई थी तब उस कहानी को मैंने तुम्हारी उंगलियों से ही बाहर झांकते हुए देखा था। मैं हमेशा उस क्षण, उस पल को याद करता हूं जब तुम्हारी उंगलियां हिलीं थीं और मैंने एक कहानी को बाहर आते हुए देखा था और मैंने आज तक वो ही कहानियां पढ़ी हैं जिसे तुम्हारी उंगलियों ने दिखाया और तुमने सुनना चाहा।
काया- नहीं तुमने किसी न किसी ब्रम्हानंद के नाम से हमेशा अपनी ही कहानी कही है और तुमने अंत में आशीष को बचा लिया।
सैम- तुम्हीं चाहती थीं कि आशीष ना मरे तुम्हें अजीब लगेगा पर पता नहीं कितनी बार मैंने आशीष को मारना चाहा पर हर बार किसी ना किसी चाय ने आकर उसे बचा लिया और कई बार तो चाय बनकर तुम खुद आई हो।
काया- मैंने तुम्हें आत्महत्या से नहीं बचाया।
सैम- मैं आत्महत्या की बात ही नहीं कर रहा हूं मैं तो अपने उस आदमी की बात कर रहा हूं जो स्कूल के दिनों से तुमसे प्रेम करता था कई बार मैंने उसे मार देना चाहा और हर बार तुम्हारी किसी ना किसी बात ने उसे जिंदा रहने दिया और देखो वो आज तक जिंदा है।
काया- अरे तुम्हारी ट्रेन आ गई।
सैम- हां
काया- पर ये सुखांत नहीं है।
सैम- मैं जानता हूं ये सुखांत नहीं है।
काया- और मुझे सुखांत चाहिये।
सैम- वरना
काया- वरना तुम्हें मुझसे माफी मांगनी पड़ेगी।
सैम- मैंने आज तक जितना तुम्हें प्रपोज किया उससे कहीं ज्यादा तुम्हें कहानियां सुनाई है उन कहानियों का एक घर है जिसके लगभग हर कोने में तुम रह चुकी हो पर ये कहानी उस अंधेरे कमरे की है जो घर की छूटी हुई चीजें लिए पता नहीं कब से बंद पड़ा था स्टोर रूप जैसा और इसके हर पात्र हाशिये पर रखे हुए पात्र थे जो मुख्य पात्र को खूबसूरत दिखाने के लिये हमेशा कहानी के पीछे चुपचाप खड़े रहे। आज तुमने ये कमरा भी खोल दिया। अब किस्सों में नहीं, टुकड़ों में नहीं, जबरदस्ती नहीं, चोरी से भी नहीं बल्कि ये पूरा घर उसके मालिक के साथ तुमसे पूछता है मुझसे शादी करोगी?
ये प्रेम कहानी है और अंत तुम्हारे हाथ में हैं। अगर तुम हां कह दोगी तो सुखांत और ना कह दोगी। तो दुखांत।
काया- ये तो तुमने
सैम- मैंने कहा था अंत तुम्हारे हाथ में है।
काया- तुम्हारी ट्रेन
सैम- जल्दी बोलो मुझसे शादी करोगी? (ट्रेन का साउंड, सारे कबूतर भाग जाते हैं ट्रेन निकल जाती है ब्लैक आउट। लाईट आती है काया अकेली खड़ी है। वो मुस्कुकराकर चली जाती है। कबूतर प्रवेश करते हैं, गाना गाते हैं।)

अब बात फंसी है कुछ ऐसी
होगें आंसु या होगी हंसी
पर अंत तो हमने सुना नहीं
जब अंत हुआ हम उड़े कहीं
अब खत्म ये किस्सा कैसा हो
गर चाहे आंखे नम रहे
और साथ में थोड़ा सा गम रहे
तो थी ये कहानी इस दुखांत
गर चाहे होंठों पे हंसी खिले
और सबको सबका मीत मिले
तो थी ये कहानी इक सुखांत
तो थी ये कहानी इक सुखांत
तो थी ये कहानी|

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